जनवरी 2020
अंक - 56 | कुल अंक - 56
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

मूल्याँकन

अंतर्मन से रचे नवगीतों का संग्रह है 'दिन कटे हैं धूप चुनते'
- मुकेश कुमार सिन्हा


 




नवगीत का इतिहास बहुत पुराना नहीं है। फिर भी, नवगीत ने आज जन-जन में पैठ बना ली है। सहजता, सरलता और इसके प्रवाह ने कवियों को नवगीत लिखने को उत्प्रेरित किया। गीत की तरह नवगीत भी प्यार और दुलार पाने की राह में है। आखिर कब तक इससे 'किनारा' किया जाता रहेगा? अवनीश त्रिपाठी जैसे साहित्य साधकों की बदौलत नवगीत आज लोगों की ज़ुबान पर है।
अवनीश त्रिपाठी का सतत् लेखन महज़ एक दशक से ही जारी है। कुछ एक गीत और कविताओं का सृजन पहले हुआ था लेकिन परिस्थितिवश क़लम सोयी पड़ी थी। हाँ, परिवार में साहित्य का माहौल था। पिता स्व. रामानुज त्रिपाठी जी उच्च कोटि के साहित्यकार थे। अवनीश के प्रथम साहित्यिक गुरु उनके पिता ही थे, जिनकी स्मृतियाँ पुस्तक को समर्पित हैं।

आदमी परिस्थितियों से विवश हो जाता है। पिता की वर्ष 2004 में मौत के बाद नवगीतकार का सामाजिक और पारिवारिक दायित्वों के निर्वहन की वजह से क़लम से दूरी बढ़ी, ऐसा होना स्वभाविक भी था। किंतु पिता की प्रेरणा ने नवगीतकार अवनीश को फिर से लेखनी की ओर मोड़ा। उनकी अनवरत् काव्य साधना का प्रतिफल है- 'दिन कटे हैं धूप चुनते'। यह पुस्तक नवगीतों का संग्रह है। इसके पूर्व कविता संग्रह 'शब्द पानी हो गये' प्रकाशित है। मसलन, निरंतर लेखनी ने किताबों के सृजन का सिलसिला शुरू कर दिया है, जो शुभ संदेश है।

क्या धूप को चुना जा सकता है? आप प्रश्न पूछने वाले को पागल क़रार दे सकते हैं, आपकी मर्जी? लेकिन शीर्षक कविता में मेहनतकशों के परिश्रम का चित्रण किया गया है। धूप को मेहनतकश ही चुनते हैं। गहलौर पहाड़ी का नाम सुना है न! आते-जाते लोगों को ख़ूब चोटिल किया करती। लेकिन धुनी दशरथ ने गहलौर पहाड़ी के सीने को महज़ छेनी-हथौड़ी से तोड़ डाला। तोड़ दिया पहाड़ी का गुरूर, पहाड़ी का अभिमान। दशरथ जैसे लोग धूप चुनते हैं-


दुःख हुए संतृप्त लेकिन
सुख रहे हर रोज घुनते
रात कोरी कल्पना में
दिन कटे हैं धूप चुनते।


अब किसी को किसी के दुख से मतलब नहीं रहा है। आप भूख से मरते हैं। आप चोटिल होते हैं, तो होते रहिए? क्या फर्क पड़ता है! आँखें भी सपने नहीं सजाती हैं, क्योंकि आँखें जानती हैं उसके सपनों का मर जाना ही लिखा है। मध्यम और ग़रीब वर्ग सपने देखकर करे भी तो क्या करे, वह बेचारा है! नवगीतकार को तकलीफ़ है-

द्वार देहरी
सुबह साँझ सब
लगते हैं रूठे
दिन का थोड़ा दर्द समझती
ऐसी रात नहीं।

आगे-
अँधियारे का
रिश्ता लेकर
द्वार खड़ी रातें
ड्योढ़ी पर
जलते दीपक की
आस हुई अब कम।

 
गाँव में संवेदना है, गाँव में अपनापन है, गाँव में भोलापन है। गाँव में प्यार है, गाँव में दुलार है। फिर भी गाँव को दुत्कारती नई पीढ़ी शहर की ओर भाग रही है। शहर संवेदनशील नहीं है। बावजूद शहर की चकाचौंध युवाओं को अपनी ओर खींच रही है। युवा मन बहक रहा है। शहरी मादकता उसे पागल कर रही है। शहर के लोग प्रेमगीत नहीं गाते, वहाँ चौपाल नहीं लगता, वहाँ समस्याएँ नहीं सुलझतीं, वहाँ बच्चे मिट्टी में नहीं लोटते। वहाँ सन्नाटा है अपनेपन का, सन्नाटा है प्यार और दुलार का। नवगीतकार आगाह करते हैं-

यह रईसों का
मुहल्ला है ज़रा
आवाज़ कम कर
गिट्टियों सीमेंट
वाले मन
हुए हैं ईंट पत्थर।


शहर लाख तरक्की कर ले, लेकिन गाँव से शहर गये लोग उबने लगते हैं। शहर में गाँव की तरह स्वच्छ हवा नहीं मिलती! नहीं मिलती मखमली घास, हरे-भरे खेत, दादी माँ के नुस्खे। हाँ, शहर में नागफनी मिलती है। मेज़, फाइलें, बिखरे हुए काग़ज़, कसा हुआ दिन, खाना-पीना, धुआँ, सड़क, ट्रक, शोर-गुल और कामकाज़ी रातें मिलती हैं, लेकिन प्यार का अभाव रहता है! नवगीतकार ने लिखा-

बूढ़ी खाँसी
गहरी सूनापन।


यह केवल पंक्ति नहीं है, बल्कि इसमें दर्द छिपा हुआ है। खाँसी बूूढ़ी हो गयी है, लेकिन कोई देखनहार नहीं है। किसे फुर्सत? शहर तो भागना पसंद करता है, वह ‘ठहरना’ नहीं चाहता। जबकि, गाँव ठहर-ठहर कर लोगों से पूछता है। कोई पीछे छूट न जाये, इसलिए सबको साथ लेकर चलने में विश्वास करता है। शहर में गंवई संस्कृति में पले-बढ़े बुजुर्गोंं की सचबयानी है- ‘अम्मा-बाबू’। शहर के घर में आँगन कहाँ? बैठकी कहाँ? अब तो फ्लैटों में ज़िन्दगी सिमट गयी। बच्चों के हाथ में मोबाइल है, जो व्यस्त हैं गेम खेलने में, चैटिंग करने में। दादा-दादी कोने में सिमटे पड़े हैं। कोई दो बोल बोल दे उनसे? यह भी नसीब नहीं। रोटी खाने वाला मुँह पिज्जा-बर्गर से कैसे संतुष्ट होगा भला? बुजुर्गों की हालत पर नवगीतकार की लेखनी सच में पाठकों को रूला देगी। यह क़लम की सार्थकता है।

पड़े हुए
घर के कोने में
टूटे-फूटे बर्तन जैसे
'अम्मा-बाबू'
अपनी हालत
किससे बोलें, किसे बताएँ
सुबह-शाम
दिन रात दर्द से
टूट चुके हैं अम्मा-बाबू,
हाथ जोड़कर रोकर कहते
हे ईश्वर! अब हमें उठाएँ।


बचपन, जवानी, अधेड़, बुढ़ापा ये चार चरण हैं। बचपन जी-भर खेलने में गुज़र जाता है। जवानी की अपनी मस्तानी चाल है। तीसरे चरण में शरीर साथ छोड़ना शुरू कर देता है और चौथे चरण में बीमारियाँ उभर आती हैं। नतीजतन मानव शरीर में कष्ट होने लगते हैं। चिंताएँ बढ़ जाती हैं। कभी आवाज़ में तेज़ी होती, लेकिन एकदम मद्धिम पड़ जाती है। घर-आँगन, खिड़की-दरवाज़े, जो जवानी में इंसान की खनक देख चुका है, वो बुढ़ापा का निसहाय रूप देखकर विचलित हो उठता है। बुजुर्गों की उपेक्षा, बुजुर्गों की दारुण-दशा पर नवगीतकार की लेखनी-

दीवारों, खिड़कियाँ
सीढ़ियाँ
लेने लगीं उबासी।
अंतर भी अब
है घनघोर उदासी
वसा विटामिन
रहित सदा ही
मिलता भोजन बासी
सही नहीं
जाती है घर को
आँगन की बूढ़ी खाँसी।


हम वर्तमान में होकर भी वर्तमान में नहीं रहते। वर्तमान में नहीं जीते, वर्तमान में साँस नहीं लेते। हमारी सोच पुरातन रहती है। अब भला कम्प्यूटर युग में ‘टाइपराइटर’ लिए बैठिएगा, तो पीछे छूट जाना लाज़िमी है। कम्प्यूटर युग में ‘कम्प्यूटर’ बनना पड़ेगा। ज़रूरत है समय के साथ चलने की, समय के साथ दौड़ने की। समकालीन बनने की नसीहत ज़रूरी है-

चुभन
बहुत है वर्तमान में
कुछ विमर्श की बातें हों अब
तर्क-वितर्कों से पीड़ित हम
आओ! समकालीन बनें।
कथ्यों को
प्रामाणिक कर दें
गढ़ दें अक्षर-अक्षर,
अँधकूप से बाहर निकलें
थोड़ा और नवीन बनें


हम मशीन हो गये हैं। मशीनीकरण में हम जी रहे हैं। मशीनी युग में मशीन न बनें तो पीछे छूट जायेंगे, यथार्थ है। मशीनी युग में इंसान के शब्दकोश से नैतिकता, वैचारिकता, इंसानियत जैसे शब्दों का ग़ायब होना चिंता का विषय है। अब दुख पर चर्चा नहीं होती, कोई नहीं पूछता- इतना अपराध क्यों है? पेट का दर्द कोई समझना भी नहीं चाहता। ऐसे में नवगीतकार ने करारा व्यंग्य किया है-

युग मशीनों का
हुआ जब
भूख की बातें विफल हैं।


दिन हमें विचलित करता है। रातें हमें डरा रही हैं। डर के वातावरण में हम जी रहे हैं। साँस पर गहरा पहरा है। हम ‘तीसरे नेत्र’ की गिरफ्त में हैं। हम मछली से दोस्ती नहीं कर सकते हैं और मगरमच्छ तो मगरमच्छ ठहरा। मतलब भरोसा नाम की चीज़ ही नहीं है। कई प्रश्न हैं, जो हमें खाये जा रहे हैं। अपनेपन में भी स्वार्थ की बू आ रही है। नवगीतकार ने लिखा-

माँस नोचते
लाशों के
व्यापारी सुबहो-शाम


आगे-
गली नुक्कड़ों
चौराहों पर
सहम रही हैं रातें

आगे-
चीख रहे हैं भरी भीड़ में
ममता, दया, स्नेह, आँचल सब


दुनिया इतनी नासमझ नहीं है। उसे मालूम है कि कौन मौत का सौदागर है। कौन ज़ख़्म पर नमक डालने को तैयार बैठा है? लेकिन, क्रांति क्यों नहीं? क्यों चुप्पी साधे हुए लोग हैं? बंजर धरती को लहलहाने वाले मौन क्यों हैं? बस्तियों में आखेट का भय क्यों? रातें लंबी क्यों? जानलेवा हवाओें से नवगीतकार बेचैन हैं और लिखते हैं-

कथनी करनी के
अंतर को समझ गये जो
नए चाँद-सूरज भी
क्या अब निकलेंगे?

आगे-
शीतयुद्धों में झुलसती
जा रहीं संवेदनाएँ
कब उठेगा शोर, किस दिन?
चुप्पियों के मरुस्थल में
बड़बड़ाती हैं हवाएँ
कब उठेगा शोर, किस दिन?


गीतकार उलाहना देता है। कहता है रहनुमा से, क्यों चुप रहा जाये? सपनों का महल ढह रहा है। आशाएँ खंडित हो रहीं हैं। निराशाओं के जंगल में आखिर कब तक सिसकते रहेंगे? ग़रीब मारा-मारा फिर रहा है, मड़ई के लिए, रोटी के लिए, अंगा के लिए। फिर भी सुख की चादर मयस्सर नहीं। समाज की चुप्पी पर क़लम की उलाहना-

मीट्रिक टन-क्विंटल ने आखिर
कुचल दिया माशा-रत्ती को
चुप बैठो, मत कहो किसी से
हत्यारी हो गईं हवाएँ
नोच रहीं पत्ती-पत्ती को
चुप बैठो, मत कहो किसी से।


क़लमकार चुप नहीं बैठ सकता, उसकी क़लम ख़ामोश नहीं रह सकती। क़लम पैदा ही हुई है सत्ता से टकराने की खातिर। उसकी क़लम डरती नहीं, बमों के गोलों से, बंदूक की गोलियों से, बल्कि खुलेआम कहती है-

धूल फाँक हम भूख मिटाते
प्यास बुझाते आँसू से जब
गीत पनपने लगता है तब।
शोषित चीखें खिसियाहट में
सत्ता से टकरातीं हैं जब
गीत उपजने लगता है तब।


ग़रीब ज़्यादा नहीं माँगता? उसके पास सोचने की बहुत ज़्यादा संभावना भी नहीं है। वह तो चाहता है कि उसकी मड़ई बची रहे, उसे और उसके परिवार को दो जून की रोटी मिल जाये, बस। दो जून की रोटी के लिए ही वो प्रतिकूल परिस्थितियों से लड़ता है। गर्म हवाओं को पराजित करने के क्रम में कई बार वो खुद जलता है, लेकिन पेट के लिए उसका लड़ना ज़रूरी है और मजबूरी भी। किसान को कौन नहीं छलता? नीचे के हाकिम से लेकर ऊपर के भगवान तक। ग़रीब और बेबसी पर नवगीतकार की क़लम-

सूखी आँतें
खेतों में भी
पड़ी दरारें मोटी
पेट-पीठ
में फर्क नहीं कुछ
पिचकी देह, पोपला मुखड़ा।


चिंता करने की परंपरा रही है। चिंतन करना भी ज़रूरी है, क्योंकि चिंतन करने से ही असफल पुरुष सीख लेता है। घुड़सवार लक्ष्य तक पहुुँच पाता है, बिना रूकावट वैतरणी पार। भारत आध्यात्मिक देश है। ऋषि-मुनियों का गढ़ रहा है आर्यावर्त में। तब परिवेश पर चर्चा होती थी, चिंतन होता था। लेकिन अब चिंता करे कौन? चिंतन भी बाज़ारवाद का शिकार हो गया है। स्थिति सामने है? बाज़ारी चिंतन से मानवीय हित पर गहरा आघात पहुँच रहा है। सच कहा नवगीतकार ने-

मार्केट वैल्यू
वाले ही अब
संवादों के मीटर
चिंतन भी तो
अर्थवाद से
हो बैठा इंस्पायर।


हम मंगल और मिसाइल की बातें करते हैं। करनी भी चाहिए लेकिन जड़ को छोड़कर नहीं। हम जड़ को छोड़ रहे हैं। अपनी संस्कृति, अपना संस्कार भूल गये हैं। भारत की ऐसी संस्कृति रही है कि इसका लोग अनुसरण करते हैं लेकिन वर्तमान पीढ़ी 'मॉड' हो गयी है। उसे रोटी पसंद नहीं, भात नहीं खाता, उसका पेट भरता है पिज्जा-बर्गर और चाउमिन से। अब चिट्ठी कौन लिखता? बुजुर्गों से ‘अक्षरज्ञान’ कौन पाता? बुझा-बुझौव्वल, बड़ों की सीख के अब मायने कहाँ? ‘भीतर है पुरवाई’ के माध्यम से नवगीतकार ने भारतीय संस्कृति पर संकट के मंडराते बादल को रेखांकित करने की ईमानदार कोशिश की है। कहा-

पीढ़ी नई नहीं सुनती अब
ज्ञान, ध्यान की बातें
अंतर्जाल, फेसबुक, ट्वीटर
की गहरी परछाई
तकनीकी युग में नैतिकता
होती हवा हवाई
पश्चिम की आँधी शहरों से
गाँवों तक है आई।


कवि की पीड़ा-

संस्कार की भाषा बदली
परम्परा की थाती
नूतनता की कड़ी बोलियाँ
कूट रही हैं छाती।


मोबाइल से तरुणाई खो रही है। चलचित्रों की ओछी हरकत से किशारों का मन बदल रहा है। शर्म और संकोच के भाव ख़त्म हो गये। समस्याएँ बेलगाम हो गयीं हैं। खुशियाँ भी टुकड़ों-टुकड़ों में बँटी हैं। ऐसी स्थिति में उम्मीद की किरण दिखायी नहीं देती। नवगीतकार चिंतित होकर कहता है-

बढ़ती सीलन बूढ़ा सूरज
कैसे कितना सोखे।


भारत लोकतांत्रिक देश है। यहाँ सबसे बड़ा लोकतंत्र है। लेकिन लोकतंत्र के बाद भी लोक से तंत्र दूर हो गया है। यह सबसे बड़ी विडम्बना है कि जनता द्वारा चुने गये जनप्रतिनिधि भी जनता से मुँह चुराने लगे हैं। उनके वादे खोखले साबित हो रहे हैं। ऐसे में नाराज़गी स्वभाविक है। गीतकार साफ-साफ लिखते हैं-

मिट्टी महँगी बिकती लेकिन
सस्ता हुआ ज़मीर।
समस्याओं पर साहेब की उपेक्षा पर व्यंग्य-
पर कानों में तेल डालकर
सोया हुआ वजीर।


किस पर भरोसा किया जाये। हर मोड़ पर छलने को हाथ तैयार खड़ा है। राजनीति...न बाबा न। उस पर भरोसा कैसे? व्यवस्था, अजी जनाब उसकी भी हालत लचर है। ऐसे में ग़रीब अपनी फ़रियाद लेकर कहाँ जाये? धरती के इंसान से जब भरोसा उठ जाता है, तो ऊपर बैठे भगवान से आशा टिक जाती है। राम-रमैया बचायेंगे, यह तो अलग प्रश्न है, लेकिन यह पीड़ा है उस ग़रीब की, जो अच्छे दिन के इंतज़ार में पता नहीं कब से छला रहा है।

टूट गयी
खटिया की पाटी
बैठे, सोये किस पर
अब उधार
की बात करे क्या
गिरवी छानी-छप्पर।


आगे-
केवल धन के उद्बोधन से
विस्फोटित हैं सभी दिशाएँ
शोषित का अवहेलना करतीं
भाव स्नेह की सभी ऋचाएँ


आगे-
खाली पेट रहेंगे सोते
किस्सों में है
राजा रानी।


नवगीतकार व्यथाओं से दुखी हैं। पता नहीं कब से व्यथा की वजह से आँखों में पानी है, लेकिन व्यथा है कि छूटने का नाम ही नहीं ले रही। रावण प्रतीक है बुराई का। हर साल हम रावण के पुतले जलाकर इठलाते हैं। लेकिन क्या घर-घर में राम है? आज इंसानी शक्ल में रावण गली-गली नहीं, बल्कि घर की चहारदीवारी के भीतर ठहाका मार रहा है। नवगीतकार की वेदना-

कितने रावण जलते हैं पर
सीताहरण नहीं रूक पाया,
असुरों के विकराल आचरण
से असहज विकृत काया।


दुनिया मौन है। ऐसे में चिल्लाने से क्या फायदा। नवगीतकार ने लिखा-

बोलते ही
रह गए हम
मंच पर संवाद केवल।


नवगीतकार चित्र गढ़ना चाहता है, लेकिन वो गढ़े कैसे? उसके सामने विवशता है। ईंट अहंकार लिये बैठा है और हर बार ब्रश को मात देने की जुगत में हैं। यहाँ ईंट को प्रतीक के तौर पर रखा गया है। समाज की दशा ऐसी ही है। अहंकार चहूँओर है। ऐसे में स्वस्थ और सबल समाज की परिकल्पना बेमानी ही होगी।

बेड़ी जकड़ी हुई
पाँवों में
कैसे पाँव बढ़ें?
ऊबड़-खाबड़
दीवारों पर
कैसे चित्र गढ़ें?


इंसान का हमेशा दुख से वास्ता रहता है। दुख ही सच्चा साथी है। सुख तो 'झलक दिखला जा' है। झलक दिखलाकर सुख चला जाता है। आदमी के पाँव में इतने काँटे चुभे होते हैं कि उसे पता ही नहीं चलता कि कब उसके पाँव मख़मली चादर पर पड़े हैं।

दुख की पाती पढ़ते-पढ़ते
सुख आया कब पता नहीं
अक्षर-अक्षर जीवन का मैं
पढ़ पाया कब पता नहीं

साहित्य को साधना चाहिए। जो जितना सधा, उसकी लेखनी उतनी ही प्रखर हुई। 'सोशल मीडिया' के प्रभाव से कथित तौर पर लेखकों और कवियों की संख्या बढ़ी है। लेकिन साहित्य के नाम पर फास्ट फुड रचनाएँ परोसी जा रहीं हैं। कविता में न शिल्प है, न कथ्य, न छंद हैं, न मात्रा। बस जो मर्जी आये, लिख दिये और चिपका दिये सोशल मीडिया पर। आह, वाह, बहुत अच्छा जैसी प्रतिक्रिया पाकर लोग ख़ुद को महाकवि तक समझने लगते हैं। साहित्य क्या है? काव्य क्या है? छंद क्या है? इन चीज़ों की जानकारी नहीं है, लेकिन धड़ल्ले से रचनाएँ रची जा रही हैं। नवगीतकार ने साहित्य के घायल होने की स्थिति में पूछा-


कहाँ गए सब ज्ञानी?
आज तलक
साहित्य जिन्होंने
कभी नहीं देखा,
उनके हाथों
पर उगती अब
कविताओं की रेखा।


साहित्यकार साहित्य के माध्यम से समाज की बेहतरी चाहता है। उसकी चाहत रहती है कि समाज ज्ञानवान हो! समाज बुद्धिमान हो! समाज में समस्याएँ नहीं, बल्कि विकास हो! नवगीतकार इंसानी मन में बैठे वहम को मिटाना चाहता है, ताकि हर चेहरा 'बुद्ध' हो जाये। जो कुहरा आसमान में है, उसको ‘शुद्ध’ करना चाहता है। उसे खुद पर भरोसा है, इसलिए खुलेआम कहता है-

धुंध बहुत है
तुुम छुप जाओ
हम मौसम से युद्ध करेंगे।


साहित्यकार यह कहते रहते हैं कि जब तक कुछ लिख न लूँ, नींद नहीं आती! दिल को चैन नहीं मिलता। मतलब ज़िन्दगी बेरंग-सी हो जाती है लेखनी के बगैर। सच है कि जब हृदय वेदनाओं से भर उठता है, तो मन को सुकून तभी मिलता है, जब कुछ लिख लिया जाये! हर साहित्यकार की पीड़ा एक सी है। नवगीतकार ने कविता को शुक्रिया कहा और कहा- ‘आज तुम्हारी वजह से मेरे जीवन में गीत हैं!’

हर बसन्त था मरुथल जैसा
नीरवता कलरव की प्यासी
थिरकन चहकन भूल गया मैं
भरी भीड़ में गहन उदासी।
हे कविता!
जीवन्त जीवनी
तुमने मुझको गीत बनाया।
छूकर बुझते
अहसासों को
तुुमने मन खंजन चहकाया।


गीत कर्णप्रिय हैं। घर-घर में गीत गाये जाते हैं। लेकिन साहित्य के कथित पुरोधाओं ने इसे मुख्य धारा से अलग करने की कोशिश की। उनके अपने तर्क थे। यह मान्यता थी कि यह गंभीर साहित्य नहीं है। फिर साहित्य के क्रांतिवीरों ने नवगीत रचकर उन लोगों के मुँह पर ताला जड़ा। लेकिन आज भी वैसा तबका नाक-भौं सिकोड़ता है। वैसे लोगों से नवगीतकार पूछता है-

लेखनी की
पीर हूँ या
द्वन्द्व हूँ, प्रतिरोध हूँ,
हाशिये पर
हूँ टँगा या
पृष्ठ का प्रतिशोध हूँ?
नव प्रयोगों की धरा पर
छटपटाता हूँ निरन्तर
गीत हूँ, नवगीत हूँ
या जनगीत हूँ
क्या हूँ बता दो?


गीतकार की ज़िद है-

अपनी ढपली पर हरदम ही
अपने दुखड़े गाता हूँ
राग बेसुरा बुरा भले हो
फिर भी गीत सुनाता हूँ।


उत्कृष्ट शब्दों के धनी अवनीश त्रिपाठी जी ने अंतर्मन से नवगीत रचे हैं। अंतर्मन से रची रचनाएँ ज़्यादा पुष्ट होती हैं। लेकिन एक सवाल है कि क्या वाक्य को और सरल या सहज नहीं बनाया जा सकता था? हाँ, नवगीतों में प्रयोग किये गये शब्दों से साहित्यिक पाठकों को नये-नये शब्द मिलेंगे? लेकिन, उन्हें शब्दकोश में अर्थ ढूँढने पड़ेंगे। गीत और नवगीत में सरल और सहज शब्द का प्रयोग आवश्यक है ताकि उसे पढ़कर एक बार में ही सहजता से समझा जा सके।

अरे नवागत! आओ गाएँ।
कुहरा छाँटे, धूप उगायें।।


- मुकेश कुमार सिन्हा

रचनाकार परिचय
मुकेश कुमार सिन्हा

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