जनवरी 2020
अंक - 56 | कुल अंक - 56
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कविता-कानन
कोई चुरा रहा है
 
कोई चुरा रहा है चुपके-चुपके
हमारा समय
रोटी की तरह खाता है हमारा वक्त
सूती कपड़े की तरह
तंग हो गये हैं हमारे दिन-रात
हमारा वजूद समा नहीं रहा है उनमें
गरीब की चादर बन गया है वक्त
सिर ढँको तो पाँव नंगे
पाँव ढँको तो सिर
 
ये हाथ कहाँ दिखाई देते हैं
जो नचा रहे हैं हमें?
हम कठपुतलियाँ हैं बेशक
क्योंकि नाच रहे हैं
पर काठ के नहीं बने हम
कि जितना भी नचाओ
हम थके नहीं
हाँफे नहीं
हम जीवित हैं
साँसें चल रही हैं हमारी
हमारे हाथ-पैर भी चल रहे हैं
दिल और दिमाग भी
पर सब चल रहे हैं किसी और के इशारे पर
लगातार
 
हम बँधुआ मजदूर बन गये हैं
 बाजार के गुलाम
बाजार सिर्फ़ अपना विस्तार चाहता है
विस्तार... विस्तार... विस्तार
उसके लिए दुनिया में और कुछ नही
कोई नहीं
किसीका वजूद नहीं
सब बेजान-बेकार
 
 
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ठहरो ज़रा
             
ज़रा रुको !
कहाँ गायब हो गये
वे माटी के खिलौने?
अब कहाँ दिखते हैं?
कुम्हार के अनगढ़ हाथों से रचे गये
वे हाथी-घोड़े?
पनिहारिन और सिपाही?
मिट्टी के आम, केले और खरबूज़?
झूला झूलते कान्हा, राधा संग?
बछड़े को दूध पिलाती उजली गाय?
और अकुशल हाथों से निर्मित
हिंसक नहीं
मासूम दिखता शेर?
अपने पेट में पैसा डलवाने के लिए
मुँह खोले गुल्लक?
जो एक दिन अपना तन देकर
टुकड़े -टुकड़े में टूटकर
हमारी हथेलियों को
सिक्कों से भर देता था
अब
न जाने कहाँ गायब हो गया?
अब कोई झूला झूलेगा कहाँ?
न सावन समय पर आता है
न कदम्ब के पेड़ हैं
कदम्ब क्या
सारे पेड़ ही गायब होते चले जा रहे हैं
धेनुएँ कहाँ हैं ?
जो हैं वे भूख से दम तोड़ रही हैं
 
ये मिट्टी के खिलौने
क्या गायब हुए हमारे खेलों से
कि मिट्टी ही दूर हो गई हमसे!
अब आ गये बाजार में
प्लास्टिक के चिकने-चमकते खिलौने
और मनमोहक शो पीस
अब पैरों को भी टटोलनी पड़ती है धरती
कि पैरों के नीचे प्लास्टिक है
धातु है या है कुछ और
 
कट रहे पेड़ और जंगल रोज़
हर दिन तोड़े जा रहे पर्वत
जीवित झीलें की जा रही हैं दफन
आकाशछूती इमारतें खड़ी करने के लिए
 
रुको यहीं!
अभी भी बहुत-कुछ है
जिसे तुम बचा सकते हो
हम छोड़ जायें एक हरी धरती
अपने बच्चों
और उनके बच्चों के लिए
 
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पंडुक बैठा है
 
शश्श्श्...
पास न जाओ
चुप रहो
कि पंडुक बैठा है मुंडेर पर
जाड़े की इस कड़कड़ाती ठंड में
इंतजार कर रहा है
उन गुलाबी धूप-किरणों का
जो सीधे उतरती हैं रोज़
उसी दीवाल पर
जहाँ वह बैठा है
नरम धूप की यह जगह
वह पहचान गया है
अभी थोड़ी ही देर में
आज भी आकाश
कुछ और गर्म होगा
तब रोशनी की परियाँ उतरेंगी
सहला देंगी उसे प्यार से
गरमा जायेगा उसका अकड़ा हुआ बदन
उसे मिल जायेगी ऊर्जा
आज के लिए
तब मन -ही -मन
किरणों को प्यार भेजता हुआ
वह उड़ चलेगा
 
 

- अंजना वर्मा

रचनाकार परिचय
अंजना वर्मा

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