जनवरी 2020
अंक - 56 | कुल अंक - 56
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम
कहानी - स्वयंसिद्धा
 
दिल्ली से बड़ौदा जाना था, बड़ी बेटी मंजू का फ़ोन आया था;“कुछ दिनों के लिए आ जाओ ,शुभ्रा अपनी नानी को याद कर रही है|”
दो बरस की राधा रानी सी मेरी नातिन से मेरा इतना मोह हो गया था कि तुरंत ट्रेन का टिकिट बुक करवा लिया, रिज़र्वेशन ए.सी थ्री टायर में था| नीचे की बर्थ मेरी थी सो आराम से सामान जमाकर बैठ गई| हवाई-यात्रा के इस युग में भी ट्रेन का सफ़र अपनेपन से भरपूर लगता है| आते-जाते सहयात्रियों से परिचय होना,उनके जीवन व जीवन-शैली में शामिल होना इस प्रकार प्रतीत होता है जैसे बरसों से वे आपके पड़ौसी हों| वास्तव में उन 20-22 घंटों में जितना प्रगाढ़ परिचय सहयात्रियों से हो जाता है ,उतना तो 20-25 बरस पुराने पड़ौसी से भी नहीं हो पाता|
 
सामने की बर्थ पर एक 30-32 वर्ष की महिला लगभग 5 साल की अपनी बेटी और पति  के साथ बैठी थी| मेरी बर्थ पर लगभग उसी उम्र की महिला 8-9 महीने के बच्चे के साथ सफ़र कर रही थी| सोचा,बच्चों की संगत में सफ़र अच्छा कट जाएगा|
ट्रेन अभी दिल्ली से निकली ही थी और तेज़ रफ़्तार पकड़ रही थी कि उस पाँच वर्षीय बच्ची ने अपनी माँ पर थूक दिया| माँ ने एक ज़ोरदार चपत बच्ची के गाल पर रसीद कर दिया|  बच्ची ने एक भद्दी गाली दी तो उसके दूसरे गाल पर एक और तमाचा पड़ा| बच्ची चीख़-चीख़कर रोने लगी| उसका रोना-पीटना व अभद्र व्यवहार देखकर वह महिला खिसिया गई, उसने बच्ची को उठाकर गोद में बैठा लिया व बैग से एक खिलौना निकालकर उसे दे दिया जिसे बच्ची ने तुरंत ज़मीन पर दे मारा और बोली ;
“सारे नए और सुन्दर खिलौने मामा ने अर्जुन को दे दिए ,मेरे लिए छोड़ दिया टूटा-फूटा,पुराना यह खिलौना! नहीं चाहिए ,फेंक दो,फेंक दो ट्रेन के बाहर!”
 
उसने खिलौना खिड़की की ओर फेंक दिया| खिड़की पर शीशा चढ़ा था अत:खोटे सिक्के सा खिलौना वापिस उसकी गोद में आ गिरा| उसकी माँ को काफ़ी बुरा लग रहा था| लाख आँखें दिखाने पर भी जब वह चुप नहीं हुई तो उसकी माँ ने उसे ज़ोर से च्यूँटी काटी व कान उमेठे| बच्ची दर्द से चिल्ला उठी| वह रो-रोकर अपनी माँ व पिता से दूर एक किनारे पर जा बैठी| फिर दोनों हाथों में अपना मुह थामे सुबक-सुबक कर रोने लगी| बच्ची के बाप ने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की| वह पैर पर पैर चढ़ाए ऐसे बैठा रहा जैसे बच्ची उसकी हो ही नहीं|
 
लगभग आधे घंटे तक वह रोती रही फिर दुःख व चोट की पीड़ा और ढेर सारा अन्याय ओढ़कर सो गई| उसके सोने के बाद माता-पिता में से किसी ने भी उसे चादर नहीं ओढ़ाई ,न ही उसके जूते उतारकर उसके पैर सीधे किए ,उसके गालों पर बहते आँसू भी किसी ने नहीं पोंछे,न सिर के नीचे तकिया लगाया| वह जैसे पड़ी थी,पड़ी रही,घुटने समेटे जूतों समेत!
मेरे लिए यह दृश्य किसी हॉरर फ़िल्म के समान भयावह व उत्तेजित करने वाला था| मन हुआ कि उनसे बच्ची छीन लूँ ,आख़िर उन्हें क्या अधिकार है बच्ची से ऐसा व्यवहार करने का?
“दुर्व्यवहार मैं कर रही हूँ कि ये?” माँ बड़बड़ाकर पति से शिकायत कर रही थी;
“देखा आपने? कितनी बिगड़ गई है|” पतिदेव आधा-चौथाई मुस्कुरा दिए|
“वहाँ नाना-नानी के यहाँ भी इसने ऐसे ही तंग कर रखा था| मामा के लड़के अर्जुन से इतना चिढ़ती थी कि बस पूछो मत,”वह मेरी तरफ़ बैठी हुई महिला को सफ़ाई दे रही थी|
 
“मेरे मायके में 10 साल बाद लड़का पैदा हुआ है, अब लड़का तो लड़का ही है| नानी,दादी,मौसी,बूआ, भाई, बहन सब अर्जुन-अर्जुन करते नहीं थकते पर इसे तो अर्जुन से इतनी चिढ़ लगती है कि बस!”
बाप खुली आँखों से सो रहा था, मुझे लगा वह बहरा भी था| दोनों महिलाएँ बातें करने लगीं|     
”मेरी माँ ने कहा है कि इसकी कोई भी ज़िद पूरी मत करना| मारपीट कर काबू में लाना| आख़िर लड़की की जात है|”
बेटे की माँ इतराकर बोली,”सो तो है ,इसीलिए तो मैं लड़की चाहती ही नहीं थी|”
“चाहती तो मैं भी नहीं थी पर क्या करूँ हो गई|”
“आपको पता नहीं चला? इस अल्ट्रा सोनोग्राफ़ी के युग में कोई कहे कि पता नहीं चला ,यह तो हद है|”
 सामने वाली बेटी पैदा करने की अपराधिनी की तरह रूआँसी हो उठी| अपनी लाचारी और बेबसी पर आँसू बहाते हुए बोली ;
“हमें ध्यान ही नहीं रहा और जब ध्यान आया तो पाँचवा महीना शुरू हो गया था| ”डॉक्टर ने बताने से मना कर दिया कि लड़का है या लड़की? इसके जन्म पर हम सब कितना रोए थे,” उस दिन को याद करके उसके गाल पर 4-6 आँसू लुढ़क आए और वह गहरी साँसें लेकर रह गई|
 
बेटे की माँ ने खूब लाड़ से अपने सुपुत्र को लाल साटिन की लेस वाली चादर और तकिए पर सुला दिया| किसीकी नज़र न लग जाए इस डर से उसका चेहरा भी ढक दिया| मेरा मन हुआ कि उससे कहूँ कि बच्चे को साँस लेने लायक तो छोड़ दो परन्तु अपने सहयात्रियों का मानसपटल किस स्तर का है, यह सोचकर मूक दर्शक ही बनी रही|
बेटे को सुलाकर वह बोली,”हमारा तो अपना घर का अस्पताल है, सोनोग्राफ़ी भी लगा रखी है| मेरा गर्भ ठहरा तो चेक करा लिया था|”
“आप कितनी लकी हैं ! क्या यह आपका पहला बच्चा है?”
“बच्चा तो पहला है पर ....”उसने सतर्कतापूर्वक मेरी ओर देखा कि मैं उनकी बातें तो नहीं सुन रही| मुझे उनकी बातें सुन वितृष्णा हो रही थी,अत: मैं निर्विकार भाव से किताब पढ़ने का बहाना करने लगी| उन्हें जब यह इत्मीनान हो गया कि मैं उनकी बातें नहीं सुन रही हूँ,तो वे आत्मीयता से बातें करने लगीं| धीमे स्वर में उसने बताया,”बहन जी क्या बताऊँ कितनी मुश्किल से बेटा पैदा हुआ है|”
 
“क्यों ,क्या कुछ कठिनाई आ पड़ी थी?”
अपनी आँखें चारों तरफ़ घुमाकर रहस्यमय ढंग से पुत्रवती बोली,”मुझे तीन बार लड़की ठहरी थी|”
“क्या ,क्या....आपने तीन बार गर्भ गिराया?”
“हाँ ...हाँ बहन जी,तीन लड़कियों के बाद गर्भ में लड़का आया|”
“हाय,अपने 3 अजन्मी बच्चियों को गर्भ में ही खत्म कर दिया!”
तनिक सी विचलित हुई पुत्रवती माताश्री|
 
“क्या करती! करना पड़ा! सास-ससुर, पति सबने मना कर दिया| तीसरी बार तो मैं मरते-मरते बची थी| मेरी माँ तो डर ही गई थी| वह तो भगवान ने चौथी बार लड़का दे दिया ,वरना....”अपनी पीड़ा को याद करके उसकी आँखें नम हो गईं|
उसे तीन-तीन कन्याओं की भ्रूण हत्याओं का कोई पश्चाताप नहीं था| जिस रेशमी चादर पर उसका राजकुमार सोया था, मुझे वह बिस्तर तीन कन्याओं के खून से लथपथ लग रहा था| उस बच्चे के गद्दे के नीचे तीन अजन्मी लाशें पड़ीं थीं| मेरा ह्रदय तार-तार हो रहा था| इतनी बड़ी ट्रेन में मेरा दम घुट रहा था| ऐसा लग रहा था जैसे मैं हिटलर के गैस चैंबर में बंद हूँ| कितना वीभत्स दृश्य था! सहना मुश्किल था| क्या करती? क्या न करती? अजीब सी बेचैनी,अजीब तरह की पीड़ा भर रही थी मन में!                   
 
अपने को संयमित करने के लिए मैं वहाँ से उठ गई और बाथरूम की तरफ़ जाने लगी| चाय का समय हो गया था| जाते-जाते देखा कि बच्ची को ठंड लग रही थी, मैंने धीरे से उसके पैरों पर कंबल डाल दिया| गर्माहट पाकर उसका तना हुआ शरीर ढीला पड़ गया| उसके गालों पर सूखे आँसू चमक रहे थे,चेहरे पर तनाव था| वह नींद में भी सुखद सपने नहीं देख रही थी|  वह एक युद्ध कर रही थी, उस अत्याचार के विरुद्ध जो उसके माँ-बाप उस पर कर रहे थे|
 
पिछले पचपन सालों में ऐसे सहयात्री मुझे कभी नहीं मिले| बाथरूम में जाकर मैं रो पड़ी| मुह धोया और वापिस आकर ठंडी चाय ली| वे दोनों अभी भी खूब घुलमिलकर बातें कर रही थीं| बाप गुमसुम सा बैठा था एक भावना रहित मशीनी शरीर की भांति| स्टेशन आया तो बीच वाली बर्थ का यात्री अंदर दाखिल हुआ| सामने बच्ची को सोया हुआ देखकर वह हमारी बर्थ पर बैठने लगा| ऐतराज़ जताते हुए वह बोली ;
“आपकी बर्थ सामने है तो सामने ही बैठिए ,देखते नहीं यहाँ मेरा बेटा सोया है |”
“बैठने में कोई बर्थ का फ़र्क नहीं पड़ता | वहाँ बच्ची सोई है,वह डिस्टर्ब होगी |”
किन्तु उसने तुरंत पालथी मारी और लड़ाई पर उतर आई ,”अरे वाह ! यहाँ तो मैं आपको हरगिज़ बैठने नही  दूंगी |”
सामने के व्यक्ति के चेहरे की एक भी मांसपेशी नहीं हिली | अब मुझे यकीन हो चला था कि हो न हो वह एक रोबोट ही है |
आख़िर मुझे सीट-प्रकरण को अपने हाथ में लेना पड़ा | मैंने एक सूक्ष्म सा प्रश्न किया ;
“ क्या आपने अपने बेटे का अलग टिकट खरीदा है?”
 वह सकपका गई,”नहीं तो ,यह तो अभी छोटा है|”
“ठीक है ,फिर तो आप एक ही सीट पर बैठ सकती हैं|”
 
मैंने बच्चे को गोद में उठाया और उसकी माँ की गोद में थमा दिया| फिर सहयात्री को संकेत किया कि वह आराम से बैठे  मेरा कड़ा रुख देखकर वह चुप हो गई |  नीचे का होंठ निकालकर अभद्र सा मुह बना दिया| उसका बेटा उठ गया था| वह दूध की बोतल बैग से निकालना चाह रही थी किन्तु गोद में बच्चा होने के कारण परेशानी महसूस कर रही थी| मैंने सहज भाव से उसकी बोतल निकालकर दे दी तथा बैग बंद करके सहेज दिया|
रात हो चली थी| खाने का समय हो गया था| बच्ची भी उठ गई थी| वह खाने का डिब्बा खोलकर बेटी को देने लगी,” ले किरण ,खाना खा ले|”
“नहीं,खाना मुझे यह खाना| अर्जुन को रोज़ चिकन और पनीर खिलाते थे और मुझे रोटी-दाल! मेरी पसंद की कोई चीज़ नहीं हैं इस खाने में ,नहीं खाना ....बस नहीं खाना|”
 
पूरा बदन तानकर हाथ में हाथ डाले वह अकड़कर बैठ गई| रोबोट और मिसेज़ रोबोट ने पेट भर खाना खाया| बच्ची भूख और तिरस्कार झेल नहीं पाई और नीचे पड़ा हुआ जूता उठाकर बाप को मारने ही वाली थी कि बाप ने उसे गोद में उठा लिया और एक कोल्ड ड्रिंक खरीदकर दे दी| माँ ने बच्ची को गालियाँ देनी शुरू कर दीं|
“बाप ने बिगाड़ा है ,देख लेना ......”बच्ची के तन पर मांस का नाम नहीं था| हड्डियों का ढांचा मात्र थी वह! उसकी शारीरिक व मानसिक रचना साफ़-साफ़ उसकी कहानी कह रही थी |वह अपने लिए जगह बनाने की कोशिश कर रही थी| वह आग में झुलस रही थी| फिर उसने थोड़ा सा खाना खाया और टूटे खिलौने से खेलने लगी|
 
रात हो गई,सब सो गए| बेटे की माँ का स्टेशन रात में आया होगा ,सो वह उतर गई थी| सुबह जब मेरी आँख खुलीं तो देखा बच्ची मेरे पास सोई है| अनायास ही ममता भर आई| मैंने उसके सिर पर हाथ फेरकर ,उसके गालों को सहलाया | उसके जूते उतारकर पैर सीधे किए| गहन निद्रा में भी वह प्यार भरे स्पर्श को पहचान गई और पहली बार मुस्कुराई| कितनी मृदुल थी उसकी मुस्कराहट! मेरा मन एक अपराध-बोध करने को तत्पर हो गया .....क्यों न इसे लेकर भाग जाऊँ ,इन्हें इसकी ज़रुरत नहीं है|
 
मेरे मन के भाव शायद बच्ची की माँ ने पढ़ लिए थे| वह मेरी बर्थ आकर बैठ गई और रहस्यात्मक ढंग से बोली ,”जब किरण का जन्म हुआ तो मेरे साथ वाले बैड की औरत को बेटा हुआ था| उसकी और किरण की शक्ल ऐसे मिलती थी जैसे जुडवाँ भाई-बहन! मैंने सोचा ,बच्चा बदल दूँ किसी को क्या पता चलेगा? वह औरत तो दर्द के मारे बेहोश सी पड़ी थी| उसने तो अपने बच्चे की शक्ल भी ठीक से नहीं देखी थी| उसे तो पता भी नहीं था कि उसको बेटा पैदा हुआ है| परन्तु ,हाय री किस्मत! मैं ऐसा नहीं कर पाई|”
 
बच्चा न बदल पाने का मलाल उसे आज तक साल रहा था ,अपनी बेटी को गँवा देने का दुःख उसकी कल्पना तक में नहीं था|
बड़ौदा आने में लगभग आधा-पौना घंटा बाक़ी था| सभी यात्री अपने सामान बाँधने में लग गए थे| मेरी बर्थ पूरी खाली थी| मैंने बच्ची की माँ को अपने पास बुलाया| वह झट से आकर बैठ गई| अपना मुँह उसके कान के पास ले जाकर मैंने उसे बहुत सी बातें बताईं| लगभग 7-8 मिनट तक मैं उससे बातें करती रही| मेरी बातें सुनकर उसका मुँह खुला का खुला रह गया| विस्मय से उसकी आँखें झपकने लगीं  उसके दोनों हाथ प्रश्नवाचक मुद्रा में खुले पड़े थे| वह कभी अपनी बेटी को,कभी मुझे देख रही थी| कभी सिर झुकाकर अपने को भी निहार रही थी| मुझे उसने असंख्य बार देखा मानो टटोल रही हो और हर बार मेरी विश्वास भरी मुद्रा कह रही थी ;
”मेरा यकीन करो ,मैं सच कह रही हूँ|”
 
इससे वह मुझ पर विश्वास करने के लिए बाध्य सी होने लगी| उसे विश्वास हो गया कि 55-60 की संभ्रांत दिखने वाली यह महिला जो कह रही है,वह झूठ नहीं हो सकता |मैंने अपने पर्स से अपना विज़िटिंग कार्ड निकालकर उसे दे दिया ,”मेरा नाम प्रोफ़ेसर शुक्ला है, जब चाहो मुझसे इस फ़ोन नं पर बात कर सकती हो, परंतु याद रखना मेरी बातों का पालन करने में तनिक भी चूक मत करना|”
उसने मेरा कार्ड संभालकर रख लिया| फिर खिड़की के पास बैठी अपनी बेटी को अचानक ही गोदी में लेकर भींच लिया| बच्ची को लगा कि उसकी पिटाई होने वाली है ,उसने रक्षात्मक तेवर अख्तियार करते हुए अपने गालों को दोनों हाथों में ढक लिया| माँ ने उसके हाथ हटाकर पहले एक गाल पर फिर दूसरे गाल पर उसे चूम लिया| प्यार पाकर बच्ची चहचहा उठी,”मम्मी ! मैं अर्जुन को अपने सारे खिलौने दे दूंगी|”
 
बडौदा आ पहुंचा था| ट्रेन रूक गई| प्यार के दृश्य आँखों के कैमरे में कैद करके मैं घर पहुंची| शुभ्रा को ढेर सारा प्यार किया और मंजू को अपने सफ़र की दास्तान सुनाई 
“मम्मी! तुमने ऐसा उसको क्या कहा?”
मंजू की जिज्ञासा देखकर मुझको हँसी आ गई| मेरी बातें सुनकर मंजू आश्चर्यचकित रह गई|
“साठवें साल की उम्र में तुमने झूठ बोला?”
“हाँ,झूठ बोलने का अपराध तो किया पर पता है मंजू,मुझे मुंशी प्रेमचन्द जी की लिखी हुई एक कहानी याद हो आई| कहानी का नाम तो याद नहीं पर सारांश मेरे मानस–पट पर अमित छाप छोड़ गया था| मैंने आज उसे जीवन रूपी प्रयोगशाला में प्रयोग किया है|”
 
“कैसे भला? क्या कहानी थी ,बताओ,”मंजू ने आग्रह किया|
“इस कथा में एक चतुर भाभी अपनी गर्भवती ननद को सास के प्रकोप से बचाती है| ननद की दकियानूसी सास को पोता चाहिए था और ननद दो बेटियों को जन्म दे चुकी थी| अब तीसरा गर्भ था और ज़मींदार ससुर पोते के जन्म की आस लगाए बैठे थे| वे हाथ में रूपए-पैसों की थैली लिए उस दिन की बाट जोह रहे थे, जब उनके दरवाज़े पर शहनाई बजे और वे सब पर खूब धन लुटाएं| दो बार तो उनकी बहू उन्हें निराश कर चुकी थी|
 
बेचारी बहू का डर के मरे बुरा हाल था| ऐसे समय उसकी विदूषी भाभी ने ननद की सास से आकर कहा कि उसके मायके के प्रसिद्ध ज्योतिषी ने बताया कि इस बार शर्तिया लड़का होगा और सास को कुछ व्रत आदि बता गई| अब तो ननद की नौ महीने खूब सेवा हुई| खूब घी,दूध और मेवा मिली खाने को किंतु जब तीसरी बार लड़की पैदा हो गई, तो घर में सन्नाटा छा गया| तुरंत विदूषी भाभी ने आकर सास को ज़िम्मेदार ठहरा दिया| उसने उनसे पूछा;
“आपने कहीं कोई व्रत,दान आदि में गड़बड़ी तो नहीं कर दी थी? मैंने जो विधि, तिथि बताई थी, उसी तिथि में व्रत-दान किए?
“हाँ,जैसे-जैसे तुमने बताया था, ठीक वैसे-वैसे ही मैंने किया|”
 
“तब तो कभी गलती हो ही नहीं सकती, आपने कौनसे व्रत किए?” भाभी ने सास की ख़बर ली|
सास ने कहा; ”मंगलवार को जल दिया|”
भाभी ने कहा ,”तभी तो लड़की पैदा हो गई ,आपसे कहा था बुधवार को उत्तर दिशा में तारे को जल देना और मंगलवार को उगते सूरज को,शनिवार को चन्द्रमा और शुक्रवार को जल नहीं देना इत्यादि,इत्यादि|”
इतना सब बताकर सास से कहा,”अगली बार गलती मत करना ...” ननद को आँख मारकर वह चलती बनी|
 
“बस,मैंने भी उसी तर्ज़ पर राग अलापा| मैंने उस बेटी की दुश्मन से कहा,
”मैं चेहरे की रेखाएं पढ़ना जानती हूँ,मैंने तुम्हारी बेटी के पैरों के तलवों में साक्षात लक्ष्मी माता के चक्र देखे हैं |तुम भी देख सकती हो,बड़े स्पष्ट हैं| ये भाग्यदात्री हैं| जब ये 18 वर्ष की होगी तब तुम्हारे यहाँ धन की बरसात होगी| एक नहीं चार-चार कारें होंगी ,बंगला-शंगला होगा| किंतु यदि इसका भूल से भी निरादर किया तो तुम्हारे समस्त परिवार पर घोर अमंगल होगा| तुम्हारी अगली पीढ़ी में बेटा क्या सन्तान भी पैदा नहीं होगी| तुम्हारे मायके में लड़का पैदा हुआ है ,वह भी तुम्हारी बेटी के कारण ही|”
 
“परंतु मम्मी, अगर ऐसा न हुआ तो?”मंजू आशंकित हो उठी| वह कुछ डर सी गई|
“तो...तो क्या ,अठारह वर्ष की उम्र तक अच्छी परवरिश व संस्कार पाकर कन्या स्वयंसिद्धा हो जाएगी| आख़िर हम भी कुछ ज्योतिष जानते हैं,”और हम दोनों खिलखिलाकर हंस पड़े|
लोग तरह-तरह के सट्टे लगाते हैं,जूआ खेलते हैं,बाज़ी लगते हैं| बच्ची का जीवन सुधारने के लिए मैंने भी एक पासा फेंका है,शायद सीधा पड़ जाए?              
 
 

- मधु

रचनाकार परिचय
मधु

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