जनवरी 2020
अंक - 56 | कुल अंक - 56
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

जयतु संस्कृतम्
शीतलहरी
                     
 
खं वर्षतीव विततं विपुलं तुषारं
            मन्ये प्रचण्डनवशीतभयाद्विभीत:।
सूर्यस्य घर्मनिचयो न जहाति तापं
            दृश्यास्ति शीतलहरी बहु कम्पयन्ती।। 1
 
शीतासुरो जगति भापयते समस्तं
            विप्रोऽपि गाङ्गसलिले विशतीव कश्चित्। 
मन्त्राभिषेकमुदितो हुहुरावमग्नो
             हृन्मन्दिरे प्रकुरुते भगवत्समर्चाम्।। 2
 
हा वानरा द्रुमनिकुञ्जलतासु दूना:
             शीतासुरेण कुपिता: शिशुभिस्समेता:।
पश्यन्ति भास्करमहो मृततापमेते
             चन्द्रोदयो भवति किं दिवसेऽपि मत्वा।। 3
 
एते स्वनीडसुखिनो विहगा विपन्ना:
               श्रुत्वा च शावकमनोहरचुङ्कृतिं ते।
चुञ्चुं प्रियं कलरवं किमु शीतकाले
               कुर्वन्ति नैव भगवन् न डयन्त एव।। 4
 
श्वश्रूप्रिया नववधू:  प्रियबाहुपाशे
               शेते सुखं न कुरुते गृहकार्यमेषा।
चायं प्रदेहि सदने रटतीव वृद्धा
               तां तं च निन्दति मुदा सुवधू: प्रसुप्ता।। 5
 
तूले जपन् हरिरहौ श्वशुर: स्वभार्यां 
                ब्रूते प्रिये कथमये नदसीव गेहे।
शैत्ये प्रशान्तभुवने मम चायपानं
                पश्चाद् भविष्यति हरिं जप सुप्रभाते।। 6
 
श्रीमन्महेशसुकवे: पठ सुप्रभात-
                 पद्यं नवं सुललितं प्रियफेसबूके।
पेयं स्वचायसदृशं सुलभं प्रतप्तं
                 कालो निजं व्यपगतं स्मर स्मारयामि।। 7
 
पुत्रो युवापि कवितारचनेऽस्ति लीन:
                  शीघ्रं प्रदास्यति मदर्थमये य चायम्।
शेतां वधूर्गृहसमस्तसुकृत्यकर्त्री
                  श्रान्ता न शीतलहरीं किमु पश्यसीव।। 8
 
        शीताष्टकमिदं हृद्यं सर्वगेहकथां वदत्।
        हरतां  माननीयानां कवीनां मानसं ध्रुवम् ।।
 
 
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न लोके वर्तते कश्चित्!!
            
 
सखासौ मामको हृत्स्थो न लोके वर्तते कश्चित्।
अहं याचे कृपासिन्धो! न लोके वर्तते कश्चित्।। 1
 
मुखान्नो निस्सरेन्निन्दा प्रशंसा निस्सरेत् काचित्।
नवो मान्य: प्रभो कामो न लोके वर्तते कश्चित् ! 2
 
न याचेऽहं जनं कञ्चिज्जनं मां याचतां कामम्।
वरो मे दीयतां कल्प्यो न लोके  वर्तते कश्चित्।। 3
 
मया संवीक्षित: सर्वो दयासिन्धो! प्रियो दृव्य:।
जगद्न्धो! रव: श्राव्यो! न लोके वर्तते कश्चित्। !4
 
स्वमानार्थं जनो मत्तो निहन्ति प्राणदं बन्धुम्।
कवीन्द्रो मानदो यातो न लोके वर्तते कश्चित् ! 5
 
समक्षं प्रेक्षते कीदृक्परोक्षे प्रेक्षते कीदृक्।
द्विनेत्रो मे सखा वन्द्यो न लोके वर्तते कश्चित्।। 6
 
जनानां क्षीरभोज्येऽस्मिन् विषं संलक्ष्यते दूरात्।
कवि: क्षुब्धोऽरविन्दोऽयं न लोके वर्तते कश्चित्।। 7

 


- डॉ. अरविन्द तिवारी