नवम्बर 2019
अंक - 54 | कुल अंक - 55
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

मूल्याँकन

मूलभूत आवश्यकताओं के दौर में पनपी समस्याओं का समाधान: है छिपा सूरज कहाँ पर
-शिवम 'खेरवार'



पुस्तक के शीर्षक से ही ज्ञात हो रहा था कि इस पुस्तक में आज की सामाजिक, मानसिक, आध्यात्मिक इत्यादि विसंगतियों पर प्रश्नचिह्न लगाते हुए चोट अवश्य की गयी है। पुस्तक में डॉ. शांति सुमन, डॉ. कुँअर बेचैन, नचिकेता जी और ख़ुद गरिमा जी के लेख पढ़ने के बाद यह बात स्पष्ट हो गयी।

मैं जहाँ तक काव्य के विद्यार्थी के रूप में नवगीत को समझ पाया हूँ, उसके आधार पर यही कहूँगा की 'हिंदी नवगीत काव्यगत विधाओं की पराकाष्ठा है।' हिंदी नवगीत तक पहुँचना, सामाजिक परिदृश्यों पर पी. एचडी करने के समान है। उसमें गरिमा जी के नवगीतों में एक अलग ही अनुभव है, जो आपको सहर्ष छुएगा। उदाहरण के तौर पर हमारे ही घर-परिवार में ऐसे न जाने कितने मसले और मुद्दे हैं, जिन्हें हम सामंजस्य के अभाव में सुलझा नहीं पाते और न सुलझा पाने का निष्कर्ष यह होता है कि हम अपने रिश्तों, अपने वज़ूद की नींव ख़ुद से उखाड़ फेंकते हैं। संकलन का पहला गीत इस व्यथा को रेखांकित करता हुआ दिखाई पड़ता है-


है बदलता आस में पन्ने कैलेंडर,
पर छला जाता है बस प्रस्ताव से।

ताक पर सिद्धांत,
धन की चाह भारी।
हो गया है आज,
आँगन भी जुआरी।

रोज़ ही गंदला रहा है आँख का जल,
स्वार्थ ईर्ष्या के हुए ठहराव से।


एक नवगीत और पढ़ा जो यथार्थ का हू-ब-हू ख़ाका खींच रहा है। इसे पढ़कर हमारी ही एक जानकर महोदया का एक प्रसंग और याद हो आया। कुछ समय पहले वह अपने बेटे के पास अमेरिका गयी थीं। उन्होंने मुझे बताया कि शिवम! बेटा-बहू के जॉब पर जाने के बाद वहाँ मैंने ख़ुद को चिड़िया की तरह किसी पिंजरे में बंद पाया। न कोई बात करने वाला, न हम कहीं जाने के। जब इस नवगीत को पढ़ा तो यह सीधा मेरे मन के पटल पर अंकित हो गया। एक बन्द आपके साथ साझा कर रहा हूँ-

अम्मा आँखों की स्याही से,
नया नहीं कुछ लिख पाती है।

जब से आई शहर सुआ-सा,
रहता है ये मन पिंजर में।
किसी पुराने कम्बल जैसी,
रहती है वह अपने घर में।

ठहरी हुई नदी-सी अम्मा,
बस ख़ुद में ही खो जाती है।


नवगीत है तो नयापन, नए प्रयोग तो होंगे ही। इसी गीत के दूसरे बन्द की पूरक ने इस बूढ़ी माँ के जीवन का सार ही कह दिया-

मन का शिशिर झेलती अम्मा,
ख़ुद से ही अब बतियाती है।


गरिमा जी के गीतों और नवगीतों का मैं काफ़ी समय से पाठक रहा हूँ। ये सब मन से मन की बात करते हुए प्रतीत होते हैं। पढ़कर यूँ लगता है कि चलिए कोई तो है, जो हमें समझ रहा है।

53 गीतों के इस संग्रह में मुझे ऐसा कोई गीत नहीं लगा कि जिसकी आलोचना में मैं दो शब्द भी कह सकूँ। इस नवगीत संग्रह की यही ख़ासियत है। दौर-ए-हाज़िर में युवा पीढ़ी और पुरातन पीढ़ी में विचारों के सामंजस्य का न होना कहीं न कहीं भविष्य की पीढ़ियों के लिए ख़तरे की घंटी अवश्य बजा रहा है। इसमें कहीं न कहीं मैं माता-पिता और अभिभावकों को भी ज़िम्मेदार मानता हूँ क्योंकि आज अधिकतर माता-पिता और अभिभावक अपने सपनों का बोझ बच्चों की अच्छाई के लिए उनके कन्धों पर लाद रहे हैं। और काफ़ी हद तक बच्चों को ज़िम्मेदार इसलिए ठहरा रहा हूँ क्योंकि वो माँ-बाप के द्वारा उनके हित में किए गए प्रयत्नों का ही खंडन कर रहे हैं। नवगीत 'चकित हो रहा बबूल' इस ओर इशारा कर रहा है। इसका एक अंश देखिए-


कई पीढ़ियाँ जहाँ साथ में,
पलती, बढ़ती थीं।
बूढ़े बरगद की छाया में,
सपने गढ़ती थीं।

वहीं पिता से बेटा कर्जा,
करने लगा वसूल।


तो दोनों ही पक्षों को एक-दूसरे को समझना होगा, सामंजस्य स्थापित करना होगा क्योंकि ताली एक हाथ से कभी नहीं बजती। थोड़ा आप आगे आइये, थोड़ा हम आगे आते हैं वाला हिसाब अपनाना ही होगा। वरना भविष्य की पीढ़ियों के स्वर्णिम भविष्य का गणित गड़बड़ा जाएगा।

इसी प्रकार कुछ नवगीत हैं, जो धरातल के वाजिब मसलों पर चोट करते और कहीं उनकी वाजिब बात को उठाते हुए नज़र आते हैं। उदाहरण के तौर पर उन नवगीतों का कुछ-कुछ अंश मैं आप सभी से साझा कर रहा हूँ-


"बने बिजूके हम सब,
वर्षों से चुपचाप खड़े।
नर गिद्धों के सम्मुख हम सब,
बस माँसल टुकड़े।"

''जी रहा है इक शहर,
जैसे हमारे गाँव में।
अब नहीं मुद्दे सुलझते हैं,
बड़ों की छाँव में।''

''दौड़ रहे धन की चाहत में,
बने वक़्त के बंदी हम।
....धन अर्जित कर सहे जा रहे,
निज मूल्यों की मंदी हम''


अब तीन गीतों से ये तीन अंश मैंने इसलिए उठाए कि थोड़े से हिंट से आपके भीतर इन्हें पढ़ने की जिज्ञासा उत्पन्न हो जाए।

अभी दो-तीन दिन पहले बाल-श्रम पर एक गीत लिख रहा था, जिसकी लीक गरिमा जी के नवगीत 'घाव हरा है' ने पकड़ी है-


''राजमार्ग पर सपने सजते,
पगडंडी का घाव हरा है।

झोपड़पट्टी छोड़ ख़्वाब में,
जिसने हैं मीनारें देखीं।
चटक-मटक वाले कपड़ों सँग,
जिसने मोटर कारें देखीं।

वह क्या जाने पकी फसल में,
कितना भू ने नेह भरा है।''


सही ही तो कहा है गरिमा जी ने। वह व्यक्ति, जिसने कभी चमचमाती गाड़ियों, बड़े और शानदार घरों से बाहर धरातल की ज़िंदगी में नहीं झाँकना चाहा, वो भला क्या बताएगा कि धरातल कैसा है। 'ख़ैर, जाने दीजिए...' मैं आपसे बोलने वाला नहीं हूँ। क्योंकि यदि मैंने यह बोला तो गरिमा जी का, मेरा धरातल का अनुभव किसी काम का नहीं है। तो ये सामाजिक परिप्रेक्ष्य पर लिखना, आज की समस्याओं, मुद्दों को उजागर करना, लोगों को जगाने के कर्तव्यबोध से मुक्ति पा लेने के समान होगा। और जब हमने कमर कस ही ली है तो फिर मुँह फेरने की बात तो बनती ही नहीं। बदलाव तो लाना ही है।

इसी प्रकार अब संग्रह के 'शीर्षक नवगीत' की बात पर आता हूँ। 'है छिपा सूरज कहाँ पर....' जैसा कि मैंने शुरुआत में ही कह दिया था कि शीर्षक से ही ज्ञात हो रहा है कि अंदर सामाजिक, मानसिक और आध्यात्मिक मूल्यों पर चिंतन अवश्य मिलेगा। पुस्तक पढ़ने पर ठीक वैसा ही मिला।


''ढूँढते हैं,
है छिपा सूरज कहाँ पर।

कब तलक, हम बरगदों की,
छाँव में पलते रहेंगे।
जुगनुओं को सूर्य कहकर,
स्वयं को छलते रहेंगे।

चेतते हैं,
जड़ों की जकड़न छुड़ाकर।''


गरिमा जी हक़ीक़ी गीत कहने में माहिर हैं। गीतों की लिखावट में पेंटिंग उकेरने में 'हस्ताक्षर' टाइप हैं। हम अपने ही आस-पास देख लें, कुछ लोग मिल जाएँगे जो किसी के रहमो-करम को ही अपना 'माई-बाप' समझते हैं या फिर कुछ ऐसे भी होंगे जो अपनी मनगढंत 'भ्रांतियों' में ही ख़ुशी से झूम रहे होंगे। तो मेरा आपसे कहना है कि ऐसों से सतर्क रहें। हो सके तो इन्हें बदलने का प्रयास कीजिए। हाँ पर, मशविरा ये है कि इन्हें बदलने के प्रयास में ख़ुद के मूल्यों से समझौता न कीजिएगा।

एक बात जो मुझे खटकी, वो यह है कि नवगीत 'समाधान के गीत' को पुस्तक के आख़िरी पन्नों में जगह देनी चाहिए थी। इतने गंभीर चिंतन के बाद ये अद्भुत नवगीत लोगों के जेहन में कुछ अच्छा, कुछ नया कर गुज़रने की ताज़गी भरने के क़ाबिल है। देखिए, एकता के शब्दों में कितना प्यारा संदेश दिया गया है-


''हरे-भरे जीवन के पत्ते,
हुए जा रहे पीत।
आओ हम सब मिलकर गाएँ,
समाधान के गीत।

अँधियारे पर क़लम चलाकर,
सूरज नया उगाएँ।
उम्मीदों के पंखों को,
विस्तृत आकाश थमाएँ।

चलो, हाय-तौबा की, डर की,
आज गिराएँ भीत।''


अंत में आज के सिनेमाई शब्दों में कहूँ तो ट्रेलर से आप समझ ही सकते हैं कि पिक्चर कैसी होगी। मेरे लिए तो यह अनुभव बहुत ज्ञानवर्धक और चिंतनपरक होने के साथ-साथ समाधान युक्त रहा है। अब आपकी बारी है, इसे पढ़िए और जटिलताओं से भरे अपने जीवन के लिए समाधान को खोज निकालिए। इस अद्भुत और संकलित करने योग्य पुस्तक को पाठकों के पास पहुँचाने के लिए गरिमा जी को आभार प्रेषित करता हूँ। गरिमा जी, लेखनी के इस वृहद आकाश में आपके स्वर्णिम भविष्य के लिए ढेर सारी शुभकामनाओं और अनेकानेक मंगलकामनाओं के साथ अपने शब्दों को विराम देता हूँ। शादो-आबाद रहें, सलामत रहें।





समीक्ष्य पुस्तक- है छिपा सूरज कहाँ पर
विधा- नवगीत
रचनाकार- गरिमा सक्सेना
प्रकाशक- बेस्ट बुक बड्डीज टेक्नोलोजीज लिमिटेड, नई दिल्ली
पेज- 136
मूल्य- 249 रूपये


- शिवम खेरवार

रचनाकार परिचय
शिवम खेरवार

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