नवम्बर 2019
अंक - 54 | कुल अंक - 55
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

मूल्याँकन

बाली उमर
-डाॅ. सीमा शर्मा

 



‘बाली उमर’ भगवंत अनमोल का दूसरा उपन्यास है। वे अपने पहले ही उपन्यास ‘जिन्दगी 50-50’ के साथ साहित्य जगत में अपनी एक विशिष्ट पहचान बना चुके हैं। यदि बाली उमर के कथानक की बात करें तो यह बाल्यावस्था से निकलकर किशोरावस्था की ओर बढ़ते हुए बच्चों की कहानी है। किशोरावस्था मानव जीवन का ऐसा पड़ाव है, जहाँ जीवन में सर्वाधिक उथल-पुथल होती है। बचपन और युवावस्था के बीच झूलते बच्चों की एक अलग ही दुनिया होती है। जोश, जिज्ञासा, कच्चा-पक्का ज्ञान, आदर्श और यथार्थ किशोरवय बालकों को अलग-अलग ढंग से प्रभावित करते हैं। इन प्रभावों को ‘बाली उम्र’ के पाँच प्रमुख पात्रों (बालकों) पर स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। (1) बंटी (पोस्टमैन), (2) पेट्टर (ख़बरीलाल), (3) झंडीलाल (आशिक़), (4) रिंकू (गदहा), (5) गोविन्द (पागल है) इन सभी बच्चों को लेखक ने एक-एक उपनाम भी दिया है, जो इनके चरित्र को उभारता है लेकिन ‘पागल है’ नाम गोविन्द की परिस्थितियों का परिचायक है।

समीक्ष्य उपन्यास की कथा अवध क्षेत्र के 'नवाबगंज' गाँव से जुड़ी है और इसका समय लगभग दो दशक पहले का है। तब लोग इंटरनेट और 'सोशल मीडिया' के कारण इतने व्यस्त नहीं थे, जैसे कि आज दिखाई देते हैं। इसीलिए इन कथा नायकों के पास समय की कोई कमी नहीं थी। 'बाली उमर' के पाँचों बच्चे समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। यही कारण है कि कोई एक नायक नहीं है बल्कि वे सभी नायक हैं। लेखक ने उपन्यास के आरम्भ में इन पाँचों पात्रों का परिचय बहुत रूचिकर ढंग से दिया है, जिससे पाठक अपने बचपन की गलियों में विचरण करने लगता है। इन ‘बाली उमर’ के बच्चों की भोली शरारतें पाठक के मन को मोहती हैं। ऐसे बच्चे घर में, मोहल्ले में, स्कूल में, खेल के मैदान में हम सभी ने देखे हैं। इनके मन में न जाने कितनी जिज्ञासाएँ हैं लेकिन सही जानकारी प्राप्त करने का माध्यम कोई नहीं।

प्रेम का आकर्षण, दैहिक गोपन जगत इनके लिए किसी तिलिस्म से कम नहीं। वर्तमान में कई स्रोत हैं, जिनसे वे कुछ ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं लेकिन दो-तीन दशक पहले की परिस्थितियाँ अलग थीं। इसीलिए फिल्म देखते समय नायक-नायिका के रोमांस के एक दृश्य से वे चारों आश्चर्यचकित रह जाते हैं ‘‘भाई ये बताओ कि जौन हीरो हेरोइन एक-दूसरे से लिपट जाते हैं तो उनके अम्मा बाबूजी कुछ नहीं कहत आये।’’(पृ. 72) ‘‘बात तो सोचने वाली थी, अगर दो नौजवान युवग-युवती एक-दूसरे से लिपट जाते हैं, प्रेम करते हैं तो उनके घरवालों की क्या प्रतिक्रिया होगी? गदहा और आशिक के लिए यह सोच का विषय था। आख़िर यह सब तो गंदी बात है। उनके गाँव में तो एक लड़का-लड़की के एक-दूसरे को देखभर लेने से गाँव में अफवाह फैल जाती है कि वह लौंडा बिगड़ गया और वह लड़की चरित्रहीन है।’’(पृ. 72) यह भी उन्होंने भोगिल और टेलर की दुलहिन के प्रकरण के बाद जाना। इस प्रकरण को ठीक-ठीक समझने के लिए उपन्यास को पढ़ना आवश्यक है। लेखक ने इस प्रकरण को बहुत हल्के-फुल्के ढंग से प्रस्तुत किया है लेकिन यही अंश थोड़ा और सधा हुआ होता तो यह उपन्यास बड़ों के साथ-साथ बच्चों के लिए भी पठनीय बन जाता।

पोस्टमैन, ख़बरीलाल, गदहा और आशिक़ इन चारों का जीवन तो सामान्य है लेकिन ‘पागल है’ बहुत जटिल परिस्थितियों में अपना जीवन काट रहा है। उसका अपना ही चाचा निजी कटुता के चलते उसे कर्नाटक से लाकर अवध क्षेत्र के एक दूर-दराज गाँव में लाकर छोड़ देता है। बच्चे सबसे आसान ‘टारगेट’ होते हैं इसलिए कितने ही बच्चों को नारकीय यातनाएँ झेलती पड़ती हैं जैसे कि ‘पागल है’ को। उसकी अलग बोली-बानी के कारण वह अपनी बात किसी को नहीं समझा पाता है और किसी की रूचि भी नहीं है उसके विषय में जानने की। वह पूरे गाँव के लिए ‘पागल है’ बनकर रह जाता है और कहीं न कहीं उसने भी अपनी परिस्थितियों को नियति मानकर स्वीकार कर लिया था। मुखिया जी जिनके यहाँ उसे पनाह मिली ‘पागल है’ की सच्चाई पता चलने पर भी उसे ‘पागल’ बनाए रखना चाहते हैं चूँकि उनके लिए वह मुफ्त का बंधुआ मजदूर है। बाल मजदूरों पर होने वाले अत्याचारों के कितने ही किस्से हम सबने सुने हैं। मनुष्य अपने छोटे से हित के लिए किसी अन्य की कितनी भी हानि हो जाए, परवाह नहीं करता। बोली, भाषा या क्षेत्रीय विविधता होने पर तो संवेदनाएँ और भी कम हो जाती हैं।

उपन्यास बहुत खिलंदड़े अंदाज में शुरू होता है लेकिन जब बंटी, पेट्टर, रिंकू और झंडीलाल को पता चलता है कि ‘पागल है’ असल में ‘पागल नहीं है’ बल्कि उसकी भाषा अलग है तो चारों अपनी संपूर्ण ऊर्जा उसे बचाने और उसके गाँव तक पहुँचाने के प्रयास में लगा देते हैं। यह उपन्यास का ऐसा मोड़ है, जहाँ इन बाली उमर के बच्चों की अच्छाई, सकारात्मक सृजनात्मकता और मानवीयता जैसे गुण पूर्णतया उभर कर सामने आते हैं और बाली उमर के बच्चों का लड़कपन, बड़प्पन में बदल जाता है। लेखक का प्रश्न है कि ‘‘हम क्यों अपने से भिन्न लोगों के साथ ग़लत बर्ताव करते हैं।’’ भाषाई और वेशभूषा के अन्तर के कारण ‘पागल है’ को कितनी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है कि एक बार तो वह आत्महत्या के बारे में भी सोच लेता है लेकिन लेखक के लिए इस रचना का उद्देश्य उसका जीवन समाप्त करना नहीं बल्कि बालकों के जीवन में मानवीय मूल्यों का विकास कर विविधताओं को स्वीकृति एवं सम्मान प्रदान कराना है। लेखक को इस कार्य में पूर्ण सफलता भी मिली है। उपन्यास शुरू तो खिलंदड़ भाषा और शैली के साथ होता है लेकिन इसकी समाप्ति बहुत भावनात्मक मोड़ पर होती है। कथा यथार्थ के धरातल से उठकर आरोही क्रम में आदर्श के शीर्ष पर पहुँचती है। उपन्यास की भाषा और शैली बहुत सहज और प्रवाहपूर्ण है, साथ ही कथानक एवं पात्र भी ऐसे हैं जिनकी पकड़ से आप बच नहीं पाएँगे। एक बार आपने उपन्यास पढ़ना शुरू किया तो इसे आप बीच में नहीं छोड़ सकते, यह एक लेखक की सफलता है।





समीक्ष्य पुस्तक- बाली उमर
विधा- उपन्यास
लेखक- भगवंत अनमोल
प्रकाशक- राजपाल एण्ड सन्स, दिल्ली
मूल्य- 175 रूपये मात्र
संस्करण-    प्रथम, पेपर बैक


- डाॅ. सीमा शर्मा

रचनाकार परिचय
डाॅ. सीमा शर्मा

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