नवम्बर 2019
अंक - 54 | कुल अंक - 55
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम

कहानी- कछु अकथ कहानी

चौड़ी चिकनी सड़क पर बस पूरी ताकत लगाकर जितनी गति पकड़ सकती थी, उस गति से दौड़ी चली जा रही थी। बस के काँच यात्रा के धक्के खाकर पकड़ ढीली कर चुके थे। उनके खड़खड़ाने का शोर बस के अंदर भरा हुआ था। काँच अंदर से यात्रियों के सिर के थपेड़े खाकर और बाहर से बारिश, पानी, धूल, मिटटी खाकर दोनों ओर से अपारदर्शी हो चले थे। खिड़की के मटमैले काँच को भेदकर सूरज की किरणें झेमरिया की आँखों पर पड़ीं। उसने अचकचाकर आँखें खोल दीं। आँखें मिचमिचाकर उसने अपने आसपास की स्थिति का जायज़ा लेकर ख़ुद कहाँ है यह जाँचा। अपने कंधे पर टिके बगल वाले आदमी का सिर धकाकर सीधा करते अनायास उसका हाथ अपनी कमर पर बँधी गाँठ पर चला गया। उसने घबराकर बुशर्ट का किनारा उठाकर धोती की गाँठ में बँधे पैसे और फिर पेट पर हाथ से टटोलकर बंडी में रखे पैसों की थाह लेते लंबी साँस ली। अब उसने थोड़ा आगे झुककर पैरों के पास रखी अपनी पोटली टटोली, जो बस के धक्के से सीट के नीचे थोड़े पीछे चली गई थी। झेमरिया ने उसे खींचकर आगे अपने पैरों के पास रखा और नींद में पैर से उतर गयी चप्पलों को टटोलकर पैरों के सामने रखा।

सब सामान ठीक-ठाक होने की तसल्ली के बाद अब झेमरिया ने धुँधले काँच से बाहर देखकर पता लगाने की कोशिश की कि बस कहाँ पहुँची? अब तक बस जाग चुकी थी। खड़खड़ाते काँचों की आवाज़ लोगों की आवाज़ों से सहमकर मानों चुप-सी हो गयी थीं। झेमरिया ने बस के अंदर देखने की कोशिश भी नहीं की कि उसमें जान-पहचान का कौन है? वह तो धुँधले काँच से आँखें चिपकाये बस के बाहर के खेत-खलिहान, पेड़, झोपड़े देखते जानने की कोशिश कर रहा था कि और कितनी देर लगेगी गाँव पहुँचने में। सभी खेत और पेड़ एक से दिख रहे थे। दूर-दूर बनी झोपड़ी भी अपनी कोई अलग पहचान धारण नहीं किये थीं। झेमरिया को बैचेनी-सी होने लगी। उसने बस के अंदर नज़रें घुमाते दूसरी तरफ के काँच से बाहर कोई बस्ती या मकान देखने की कोशिश में गर्दन को उचकाया लेकिन असफल रहा। कुछ काँच के धुँधलेपन की वजह से तो कुछ किसी भी प्रकार की विशिष्ट पहचान के न होने से।

उकताकर झेमरिया बस के अंदर बैठे लोगों को देखने लगा। मटमैले सफ़ेद से बुशर्ट या कुरता पहने मजदूर, जिन्होंने कमर में धोती के नाम पर एक दुशाला-सा लपेट रखा था, जो प्रायः मैरून या हरा था जिनकी कोई अलग पहचान नहीं थी। वे सब मजदूर थे जो बड़ौदा से खेतों में मजदूरी कर फसल कटने के बाद अपने अपने गाँवों को लौट रहे थे। ये सभी मजदूर बारिश के पहले अपने खेतों के पट्टे ढोर डंगर ठीक करके अपने बूढ़े माता पिता या पत्नी को सौंपकर बड़ौदा के बड़े ज़मींदारों के यहाँ उनके खेतों में मजदूरी करने या बँटाई पर लेने चले जाते हैं। क्वाँर के पहले फसल काटकर अपने घर वापस आ जाते हैं। इस समय वे अपने छोटे-बड़े पट्टे से हुई फसल काट बेचकर नदी कुँए तालाब में पानी की उपलब्धता देखकर आगे की योजना बनाते हैं।

झेमरिया भी बड़ौदा में एक ज़मींदार के तीस एकड़ खेत को अपने काका, उनके लड़के और अपने बेटे के साथ बँटाई पर लेता है। जितने लोग उतने हिस्सेदार। अब तो उसका बेटा भी जवान हो गया है और इस साल तो वह भी एक हिस्सेदार बन गया है। सभी हिस्सेदार मजदूर भी हैं, मालिक भी और हिसाब ज़मींदार करता है सबका बराबरी से। अपने हिस्से की फसल बेचकर ये लोग बारी-बारी से घर आते हैं। झेमरिया के पास गाँव में छोटे से पट्टे पर एक झोपड़ी है, उसी में एक छोटी आटा चक्की डाल रखी है। एक गाय और दो तीन बकरे-बकरी, मुर्गी जिनकी संख्या घटती-बढ़ती रहती है। अभी वह अपने हिस्से की फसल बेचकर घर जा रहा है। उसका विचार लड़के की शादी तय करने का भी है। उसकी शादी कर देगा तो बड़ौदा में रोटी थापने से निरात मिलेगी। अभी तो गाँव से ख़बर आयी है उसके नाम कोरट का कागज आया है इसलिए वह भागते हुए घर जा रहा है।

झेमरिया ने बैचेनी से फिर बाहर झाँका। दूर तक फैली नर्मदा की घाटी दिखाई देने लगी। उसने देखा नर्मदा अपने भरपूर दिनों में है बाँध में पानी भरने के कारण बहाव थम सा गया है मटमैला पानी साफ़ काँच नीर हो गया है। दूर तक फैली घाटी में मिटटी के ऊँचे नीचे कटाव वाले टीले थे जिनके बीच तक पानी भरा था। मिटटी के इन टीलों पर जंगली बबूल उगे थे तो कहीं कहीं जहाँ पानी उतर चुका था भैसों की आवाजाही से दलदल सा बन गया था। उसने दोनों हाथ जोड़कर माथे से लगाये और काँच की फ्रेम में ऊँगलियाँ फँसा कर खिड़की खोलने की कोशिश की पर असफल रहा। वह काँच में आँखें लगाकर नर्मदा को देखता रहा। इस साल बारिश अच्छी हुई इसकी खबर तो उसे आने जाने वालों से मिलती रही थी। बस पुल से गुजर रही थी एक दो खिड़कियाँ जो खुली थीं उनसे एकाध सिक्का फेंका गया जो रेलिंग से टकरा कर गिरा पुल पर या नदी में वह यह ना जान सका।तभी काँच के सामने से धूल सी उड़ती दिखी शायद आगे की किसी खुली खिड़की से मछलियों के लिए लाइ परमल फेंकें गए थे। पम्पिंग स्टेशन के सामने से गुजरते झेमरिया ने उसके अंदर रखी बड़ी बड़ी मोटरों को देखने की कोशिश की बस एक झलक ही देख पाया। नर्मदा को घरों घर पहुँचाने के लिए कितने जतन किये हैं सरकार ने लेकिन कमाने खाने के जतन घर में कर देती तो ऐसे परिवार छोड़ परदेश नहीं जाना पड़ता। झेमरिया ने गहरी साँस ली और सिर को दाएँ बाएँ घुमाकर मन में आई उदासी को झटका , थोड़ी देर में वह पहुँच तो रहा है परिवार के पास।
दूसरी तरफ की खिड़की से साँवरियाँ सेठ के मंदिर का कलश दिखा उसने पैरों में चप्पल पहन कर पोटली उठाकर गोद में रख ली। बस एक दो ब्रेकर पर उचकती धीमी हुई और रुक गई। सभी को उतरने की जल्दी थी यहाँ से दूसरी बस पकड़ कर गाँव पहुँचने में अभी एक घंटा और लगेगा। सूरज चढ़ रहा था बारिश से धुले पुँछे आसमान में सूरज की किरणे अपनी पूरी प्रखरता के साथ फैली थीं। बस से उतरते ही झेमरिया की आँखें चौंधिया गईं। सामने ही पाटी जाने वाली जीप खड़ी थी झेमरिया जल्दी से गाड़ी में चढ़ गया।


हवा के झोंकों के साथ झेमरिया के विचार भी गति पकड़ने लगे। इस बार इतवारी हाट में माई बापू के लिए कपडे लेगा घरवाली को भी इस बार लुगड़ा दिलवाएगा और उसको खर्ची के लिए पैसे भी दे आएगा। पिछली दफा उसने मांगे थे लेकिन उसके पास किराये पूर्ति पैसे ही बचे थे इसलिए नहीं दे पाया। इस बार फसल अच्छी हुई है उसके पास पैसे भी हैं लेकिन कोरट का कागज़ भी तो आया है , उसकी याद आते ही झेमरिया चिंता में पड़ गया। पंद्रह दिन पहले उसके बापू ने काका के हाथ खबर भिजवाई थी कि कोरट का कागज आया है पैसा की व्यवस्था करके आ जाओ। झेमरिया तो तुरंत आना चाहता था लेकिन फसल कटने में छह आठ दिन की देरी थी। काका बाबा के लड़कों के पास भी पैसे नहीं थे इसलिए उसने खबर भिजवा दी थी कि सरकारी बाबू से कैसे भी करके मोहलत माँग ले। पता नहीं उसमे कितना खर्चा होगा उसके बाद पैसे बचेंगे या नहीं सोच कर झेमरिया उदास हो गया। उसने जैसे थाह सी पाने के लिए जीप के पीछे खड़े लोगों के बीच से मुँह बाहर निकाल लम्बी साँस ली और इस लम्बी गहरी साँस के साथ उसने अपनी विवशता को भी पी लिया। जीप रुक गई झेमरिया को अपने फलिया तक पहुँचने के लिए अभी आधे कोस पैदल चलना था। उसने जीप की तरफ पीठ कर सावधानी से बुशर्ट की जेब से खुल्ले पैसे निकाले जो उसने चलते समय ही खुल्ले करवा लिए थे। वह बड़े नोट नहीं तुड़वाना चाहता था पता नहीं कैसी जरूरत हो पैसे बचाकर रखना ही ठीक है। फलिये की ओर बढ़ते उसने देखा झोपड़ी से धुँआ उठ रहा है बाहर खाट पर उसके बापू बैठे हैं पास ही दो बकरियाँ और तीन मेमने चर रहे थे और आठ दस मुर्गी दाना चुग रही थीं। 'बोकड़ी और मोरगी बढ़ी गई' उसने ख़ुशी से खुद से कहा और तेज़ी से झोपड़ी की तरफ बढ़ने लगा।


उसके बापू थावरिया ने किसी को झोपड़ी की ओर आते देखा तो आँखों को चुँधियाने से बचाने के लिए एक हाथ माथे पर रख दूसरे हाथ से कमर को सहारा दे खड़ा हो कर देखने लगा और उसे पहचान कर ख़ुशी से चिल्लाया झेमरू हो। जवाब में उसने भी हाथ उठाकर जोर से कहा हो।
चाय पीकर झेमरिया खाट पर बैठा बापू के साथ बातें कर रहा था माई पास ही जमीन पर बैठी थी वातावरण में मक्की की रोटी की खुशबू फ़ैल रही थी जो उसकी घरवाली मकुन चूल्हे पर बना रही थी।झोपड़ी के आसपास से उदासी उड़ गई थी। बापू ने बिजली के बिल के साथ कोरट का कागज दिखाया जिस पर लिखे अक्षर काले धब्बों से उसकी आँखों के सामने नाचने लगे। उसने सिर उठाकर देखा सूरज चढ़ आया था। अचानक उसे तेज़ गर्मी लगने लगी वह कागज़ हाथ में लिए खड़ा हो गया और गमछे से पसीना पोंछने लगा।


"क्वाँर की धूप कड़ी हुई गी हे" कहते हुए थावरिया ने खटिया उठा कर छप्पर के नीचे डाल दी। झेमरिया ने एक लोटा पानी पिया फिर कागज़ लेकर खटिया पर बैठ गया।
"केतरा क बिल है बताया नहीं लेन मेन ने ?" झेमरिया ने पूछा हालाँकि उत्तर सुनने के इंतज़ार में उसका दिल डूबा जा रहा था।
"बतायो तो कई नी योज़ कियो के बिल जादा हे नी भरयो तो जेल हुई जावेगी। झेमरिया के केजो के जल्दी करे।" बापू ने चिंतित स्वर में कहा।
"लेन मेन अई गयो होवेगो हूँ जई ने पता करूँ।" कहते हुए वह उठ कर खड़ा हो गया।
"रोटड़ा खई जाता ," माई ने कहा तो वह सौंधी महक फिर उसके नथुनों में घुसी लेकिन कागज़ की चिंता ने उसे बाहर निकाल फेंका।
"बाद मs वह झोपड़ी के अंदर घुसा उसकी नज़र आटा चक्की पर पड़ी जाने क्यों उसके मुँह का स्वाद कसैला हो गया। उसने अंदर कोने में रखी लोहे की पेटी की तरफ देखा उसमे ताला लगा था। वह चाबी के लिए आवाज़ लगाने की सोच ही रहा था तब तक मकुन अंदर आ गई। उसने गले में पड़े लाल धागे को निकाला जिसमे चाबी बंधी थी और पेटी का ताला खोल दिया। झेमरिया ने बुशर्ट की जेब से रुपये का बण्डल निकाल कर मकुन को थमा दिया।
"केतरा हे?"
"पता लगेगो जरूरत पूरती है के नी।" उसने अनमने से जवाब दिया और वहीं बैठ गया। मकुन ने धीरे से उसकी जाँघ पर हाथ रखा "हो जायसी , म्हारी राखड़ी रख कर पिसा उठा लेसी तम होसला रखो।"
'राखड़ी रख देईस तो छुड़ाई कसे?' झेमरिया ने मन में सोचा पर बोला कुछ नहीं दोनों कुछ देर खामोश बैठे रहे फिर झेमरिया बाहर निकल गया।
बापू ने कहा "तेरसिंग को साथ लई जा " सुनकर वह ठिठका अकेले जाने में वह डर ही रहा था सरकारी कागज का डर बिल की रकम का डर और सरकारी दफ्तर का डर। झेमरिया ने बगल की टेकरी पर बनी झोपड़ी की तरफ देख कर आवाज़ लगाई "हो भाया" झोपड़ी से उसके काका का लड़का तेरसिंग बाहर निकला और आवाज़ की दिशा में देखने लगा।


"लेन मेन से मिलने जाना है तू साथ चल।" बिना कुछ बोले तेरसिंग साथ चल पड़ा।
"तू वापस कब जायेगा ?" झेमरिया ने पूछा।
"आज रात की बस से।"
मुख्य सड़क पर आकर दोनों रुक गए अब किस दिशा में जाएँ दोनों को ही समझ ना आया। तीन टपरों के फलिया में कोई बिजली ऑफिस तो था नहीं। दोनों सड़क किनारे एक पेड़ के नीचे बैठ गए और विचार करने लगे। सूरज सिर पर चढ़ गया था पेड़ की छाँव देखते तेरसिंग ने कहा "दस बजी गया होगा लेन मेन एतरा टेम ही जाये हे। थोड़ी देर देखी लां।" दोनों सड़क के मोड़ तक टकटकी लगाए बैठे रहे। बीच बीच में झेमरिया पेड़ की छाँव पर भी नज़र डाल लेता।
"केतराक बिल आया है?"
" बापू कह रहा था बहुत ज्यादा है , इसलिए सरकारी कागज आया है।"
"नहीं भर पाया तो?"
झेमरिया खाली खाली नज़रों से सूनी सड़क पर देखने लगा। "कई जाने काय होगा? पोलिस रपट तो नी होगी ना?" उसने लाचारी से तेरसिंग से पूछा।
"लेन मेन अच्छा आदमी है उससे पता चलेगा। धीर रख सब ठीक होगा।"
"दो साल पहले भी बिल भरने बिजली आफिस गया था वहाँ का साब और बाबू भोत खोटा बोला था।"
"बिल कब से नहीं भरा?"
"बरसात के पहले भरा था फिर मैं गुजरात चले गया।"
"थोड़ा थोड़ा करके भरते रहना चाहिए " तेरसिंग ने धीरे से कहा।


लगभग आधे घंटे के इंतज़ार के बाद एक मोटर सायकिल की आवाज़ सुनाई दी। तेरसिंग उठ कर देखने लगा, उसने हाथ देकर गाड़ी को रोका। इलाके का लेन मेन था तेरसिंग थोड़ी देर उससे बात करते रहा फिर उसने झेमरिया को बुलाया। लाइन मेन ने बिल और नोटिस देखा और कहा कल तक बिल भर दो।
"केतराक बिल है?" झेमरिया ने डरते हुए पूछा। इस प्रश्न के जवाब पर उसकी मकुन और माँ बापू की ढेर सारी उम्मीदें टिकी थीं। उसका दिल जोरों से धड़क रहा था कान मानों सुन्न हो रहे थे। लाइनमेन ने एक नज़र बिल पर डाली फिर झेमरिया को ऊपर से नीचे तक देखा। चेहरे पर डर और चिंता की लकीरें खिचड़ी बाल गले में पड़ा मैला गमछा धुल धुल कर छिरछिरि हो गई मटमैले सफ़ेद रंग की  बुशर्ट कमर में लिपटा हरे रंग का शाल और पैरों में प्लास्टिक के जूते जो अपने जीवन की दुश्वारियाँ खुद बयान कर रहे थे। झेमरिया की यह हालत देख कर लाइनमेन को भी बिल की राशि बताने में संकोच हो आया। वह बीस साल से इस इलाके में था और सभी की आर्थिक स्थिति जानता था। झेमरिया और तेरसिंग बिना पलकें झपकाये मुँह खोले लाइनमेन को ताक रहे थे।
लाइनमेन ने धीरे से कहा "आठ हजार दो सौ रुपये " जवाब के इंतज़ार में खुले मुँह अब सदमे और आश्चर्य में बदल गए।
"तुम कल बड़वानी ऑफिस चले जाना साहब से मिल लेना जो भी कम हो सकता है वह कर देंगें।" लाइनमेन ने सान्तवना भरे शब्दों में कहा।
"केतराक काम हो जायेगा?" डूबती आवाज़ में उसने पूछा।
"यो तो नहीं बताई सकूँ पन साब भला आदमी हैं जो भी करि सकाँगा करि देगा। तम घबराओ मति कल जरूर चला जाजो।"


लाइनमेन के जाने के बाद भी दोनों देर तक सड़क किनारे बैठे रहे। इस साल पानी अच्छा बरसा बीज खाद सभी अच्छे पड़े तो फसल भी खूब हुई। बेटा भी एक बँटाईदार हो गया। तेरसिंग के बाप की तबियत अब ठीक नहीं रहती वह हट गया छोटे काका उसका बेटा और तेरसिंग सहित कुल पाँच बँटाईदार हैं और जमींदार तो है ही। इस साल झेमरिया की कमाई दुगुनी हुई है लेकिन इस साल उसे बेटे की शादी करना है झोपड़ी बनवाना है गाँव में थोड़ी सी जमीन खरीदना है।कितनी बड़ी बड़ी बातें सोच रखी थीं उसने लेकिन यह बिजली का बिल सब ख़त्म कर देगा। क्या करे चक्की बंद कर दे क्या ? फिर तो बस गुलुप जलेगा इतना बिल नहीं आएगा लेकिन फिर ऊपरी खर्च कैसे चलेगा? आसपास के दस बारह फलिये में उसके यहाँ चक्की है अच्छा पिसान आता है ऊपरी खर्च निकल आते हैं। नहीं नहीं चक्की बंद नहीं करूँगा अब से हर महीने बिल भरूँगा उसने सोचा। लेकिन कल तो आठ हजार दो सौ रुपये निकल जायेंगे सोच कर ही उसका मन बैठ गया।  
अगले दिन सुबह तक झेमरिया घर के खर्च और पैसों का तारतम्य बैठाता रहा कभी आठ हजार रुपये के साथ कभी उसके बिना।


"साब " कमरे में झाँकते उसने धीरे से कहा।
"हाँ अंदर आ जाओ " बड़ी सी टेबल के पीछे माध्यम कद मंझोले शरीर का एक व्यक्ति सामने फैली फाइलों में नज़र गड़ाये बैठा था। उसके सामने ना देखने के कारण झेमरिया ने हिम्मत करके उनके चेहरे पर एक भरपूर दृष्टी डाली और तुरंत नज़रें हटा लीं। एतना बड़ा साहब के ऐसो घूरनों काई अच्छो लगे उसने मन में सोचा।
"बैठो " बिना उसकी तरफ देखे साहब ने कहा तो वह असमंजस में पड़ गया "कूण जाने साब ने देख्यो नहीं महारा जैसा आदमी के कुर्सी पर बैठालेगा कई ?
कोई आहट ना पाकर साहब ने ऊपर देखा और कुर्सी की तरफ इशारा करके बोले "बैठो बस दो मिनिट।"
हतप्रभ से झेमरिया ने इस बार कुर्सी को और एक बार साब को देखा। बिल की बड़ी रकम , धूप में गाँव से बड़वानी तक का सफर सरकारी ऑफिस में बड़े साहब के कमरे में उनके सामने बैठना कितना बिल माफ़ होगा की धुकधुकी झेमरिया के पाँव काँप रहे थे मुँह सूख रहा था वह धीरे से कुर्सी खींच कर उसके किनारे बैठ गया। बैठ क्या गया समझो बस टिक गया। लगभग पाँच मिनिट बाद साहब ने सारे कागज और फ़ाइल एक तरफ सरकाई और घंटी बजाते हुए उसकी तरफ भरपूर नज़र डालते हुए पूछा "क्या काम है?"


धड़कते दिल से उसने बिल निकाल कर साहब की तरफ बढ़ा दिया तभी एक आदमी फाइलें उठाने कमरे में आया "ये फाइलें बड़े बाबूजी को देना है। पानी भिजवाओ " साहब ने उसे देखते हुए कहा। पानी सुनते ही उसने अपने सूखे होंठों पर जीभ फेरी। साहब ने बिल सीधा किया और देखने लगे।
"आटा चक्की का कनेक्शन है?"
"हओ साब "
"इतने महीने से बिल क्यों नहीं भरा?"
"साब हूँ गुजरात गयो थो म्हारा डोकरा से अवाये नी।" (बूढ़े पिता से आते नहीं बनता)
"छह महीने से बिल नहीं भरा है इसलिए तो इतना बिल हो गया है। तुम लोग कनेक्शन लेते हो तो बिल भरने की व्यवस्था करके क्यों नहीं जाते गुजरात?"
"गरीब मानुस हूँ साब आप ही कई करी सको हो" उसने हाथ जोड़ लिए। चेहरे पर पसरी लाचारी काँपते कटे फटे धूप से तपे हाथों तक उतर आई थी।
"कब गए थे गुजरात?"
"तीन चार महीना हुई गया।"
एक बाई ने पानी का गिलास उसकी तरफ बढ़ाया वह फिर दुविधा में पड़ गया उठाये या नहीं उठाये? किसी सरकारी दफ्तर में इतने बड़े साब के कमरे में कुर्सी पर बैठने का ही पहला मौका था उस पर काँच के चमचमाते गिलास में पानी पीना। प्यास पानी को देखकर और तेज़ हो गई थी और उसकी कश्मकश भी।
"पानी लो " साहब ने उसकी मदद की और उसने हाथ बढ़ाकर गिलास उठा लिया। पानी पीकर उसकी जान में जान आई
। खाली गिलास धीरे से टेबल पर रखते हुए वह धीरे से कुर्सी पर पीछे खिसक कर  बैठ गया। यह मेज के उस पार बैठे साहब की सज्जनता से उपजा विश्वास था।


"तुम्हारे झोपड़े के आसपास कितने मकान हैं किसी ने तार तो नहीं टाँगा?"
"नहीं साब तार तो नी टांग्यो, बगल में दो झोपड़ा हैं दोनों म्हारा सगा काका छे।"
"तार नहीं टाँगा तो फिर इतना बिल कैसे आ गया?" साहब की आवाज़ में अविश्वास की बू आई उसे। झेमरिया ने अचकचा कर दोनों पैर सिकोड़ लिए बड़ा साब सरकारी दफ्तर का डर फिर उस पर हावी हो गया।
"कांई बोलूं साब हउ तो यां थो ज नी" ( मैं तो यहाँ था नहीं )
"ठीक है एक आवेदन लिख देते हैं कि तुम तीन चार महीने से बाहर थे तुम्हारे कनेक्शन से बिजली चोरी हुई है इससे बिल थोड़ा कम हो जायेगा। सच बोल रहे हो ना ?"
"हओ साब सच बोलूं। केतराक पिसा कम होयेगा साब?"
"कितने हैं तुम्हारे पास?"
झेमरिया ने क्षणांश में हिसाब लगाया और बोला "चारेक हजार हैं। " बोलते हुए उसका कलेजा मुँह को आ गया कहीं बहुत कम तो नहीं बोल दिया। आठ हजार का बिल इतना कम थोड़ी हो पायेगा। अगर नहीं हुआ तो कहीं पूरा ही बिल ना भरना पड़े।
"बस चार हजार ? इतने से क्या होगा ? कहीं से पैसे की व्यवस्था करो बिल नहीं भरा तो केस कचहरी में जायेगा जेल हो जाएगी। "


झेमरिया का कलेजा काँप गया जेल हो गई तो उसकी बँटाई चली जाएगी कमाई आधी हो जाएगी क्या करे ? मोहलत ले के घर पर विचार करे कल फिर आये ? उसने काँपती आवाज़ में पूरी दीनता से कहा "आप ही कई कर सको हो साब भोत गरीब मानुस हूँ।"
हूँ कहते हुए साहब ने बिल के पीछे कुछ हिसाब लगाया एक खाली कागज पर कुछ लिखते हुए उन्होंने फिर घंटी बजाई। झेमरिया उन्हें देखते हुए सोचने लगा पता नहीं बिल केतरा काम होयगा ?साब तो कई बोली नी रिया। कूण जाने हउ कमती तो नी बोली दियो ? आठ हजार को बिल चार हजार कैसे होयगो ? साहब की चुप्पी झेमरिया को परेशान कर रही थी। पता नहीं साब ने उसकी बात का भरोसा किया या नहीं ? वो कागज में कुछ लिख रहे थे तभी एक आदमी अंदर आकर टेबल के पास खड़ा हो गया। उसने एक बार झेमरिया को देखा तो वह सकुचा गया।


कागज और बिल उस आदमी की ओर बढ़ाते हुए साहब ने कहा "ये इनका बिल कम कर दिया है इस आवेदन पर इनका अँगूठा लगवा लेना और इसे बड़े बाबू को कहकर बिल के साथ फाइल में लगवा लेना।" उसकी तरफ देखते हुए साहब ने कहा "साढ़े चार हजार का बिल है ठीक है? देखो यहाँ किसी से थोड़े पैसों का इंतज़ाम कर लो और बिल भर दो। "
"साब थोड़ो ओर कमती नी हो सके गरीब आदमी हूँ साब।" ना जाने क्यों मुकुन का चेहरा झेमरिया की आँखों में घूम गया इस बार उसे खर्ची जरूर देकर जायेगा। थोड़ा रो गिड़गिड़ा कर अगर दो पाँच सौ रुपये और कम हो जाएँ तो कोशिश कर ले।
साहब ने एक नज़र उसकी तरफ देखा खिचड़ी बाल झुके कंधे चेहरे की बेचारगी और निस्तेज आँखें। वह हाथ जोड़े खड़ा था जिस पर खाद की बोरी का बना घिसा हुआ झोला झूल रहा था। साहब ने अपनी जेब से एक पाँच सौ का नोट निकाल कर उस आदमी की तरफ बढ़ाया। "चार हजार इनके पास हैं ये मिलाकर बिल भरवा दो। अब से हर महीने बिल भर दिया करो।"


कुर्सी धीरे से खिसका कर अवाक वह हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या हो गया ? आठ हजार का बिल आधा हो गया। उसने चार हजार रुपये बताये तो साहब ने अपनी तरफ से पाँच सौ रुपये दे दिए। मतलब बिल इससे कम नहीं हो सकता था नहीं तो साब कर देते। वह उस आदमी के पीछे पीछे बाहर चला गया। अँगूठा लगा कर बिल भरने में झेमरिया को ज्यादा समय नहीं लगा। उसके बाद वह एक पेड़ के नीचे बैठ गया। कल से जारी बैचेनी अब बिल आधा होने और बिल भरा जाने के बाद ख़त्म हो जानी चाहिए थी लेकिन वह अब भी बैचेन था।


तेरसिंग ने कहा था लेन मेन ने बिल कम करने को कियो है लेकिन तू बिल बरोबर पैसे ले जाजे। कदी कम नी हुआ तो फेरती चक्कर नी लगेगा। उसने एक जेब में चार हजार और दूसरी में साढ़े चार हजार रुपये रख लिए थे। साहब ने पूछा तो उसने कम वाले पैसे ही बता दिए। साब ने उसकी बात का विश्वास करके अपनी जेब से पैसे भर दिए। अपनी ही बात को काट कर साब के सामने उससे बोला ना गया। केतरा भला मानस छे साब। लेन मेन ठीकज केतो थो। जिनगी में पेली बार एतरा बड़ा आफिस में कुर्सी पर बैठाडी चमचम गिलास में पानी पीवाडो। ए झेमरिया तू कई एतरा भला मानस के धोको देवेगो ? उसने खुद को धिक्कारा। अब क्या करे ? साब का पैसा वापस करके खुद को झूठा साबित कर दे कि रहने दे साब को धोके में कि उसके पास पैसे नहीं हैं। इन पाँच सौ रुपये में मुकुन के लिए बढ़िया लुगड़ा और पायल भी आ जाएगी। वह उसे थोड़े पैसे हाथ खर्च के दे देगा। क्या करे क्या नहीं की कशमकश में वह देर तक पेड़ के नीचे बैठा रहा। सूरज सिर पर आ गया झेमरिया उठ कर खड़ा हो गया उसने देखा उसकी छाँव छोटी हो गई है। उसने गले में पड़े गमछे से पसीना पोंछा जेब में रखे रुपये देखे उसमे से पाँच सौ का नोट निकाल कर बाकी रुपये सँभाल कर रखे और साहब के कमरे की तरफ चल दिया।


- कविता वर्मा

रचनाकार परिचय
कविता वर्मा

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कथा-कुसुम (1)