नवम्बर 2019
अंक - 54 | कुल अंक - 55
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

आलेख

तुलसीदासकृत रामचरितमानस के अरण्यकाण्ड का समीक्षात्मक अध्ययन
- सुविद्य धारवाडकार
 


हिन्दी साहित्यकारों ने हिन्दी साहित्य को सही तरीके से विश्लेषित करने हेतु उसे तीन कालखण्डों में विभाजित किया हैं। वह तीन कालखंड आदिकाल,मध्यकाल एवं आधुनिक काल कहलाते हैं। अगर हम संक्षिप्त में प्रत्येक काल-खंड का वर्णन करें तो आदिकाल में तो अध्येता को हिन्दी साहित्य का अभिर्भाव काल,प्रकृतभास हिन्दी के सबसे पुराने पद्य,आदिकाल की पूर्णावधि,लोकवृत्ति,साहित्यिक सामाग्री अपभ्रंश परंपरा आदि देखने मिलती है।

भक्तिकाल आपने काल-खंड की राजनीतिक और धार्मिक परिस्थिति,भक्ति प्रवाह,सगुण भक्ति परंपरा,निर्गुण भक्ति परंपरा आदि का साक्षी हैं।रीतिकाल रीति परम्पराओं के आरंभ का साक्षी हैं तो आधुनिक काल गद्य-निबंध साहित्य,भारतेन्दु युग का प्रत्यक्षदर्शी हैं। विषय भक्ति-काल पर होने के कारणवश  भक्ति काल पर अधिक ध्यान केन्द्रित करना आवश्यक हैं। भक्तिकाल में स्थित कवियों को विविध शाखाओं में विभाजित किया हैं।यथा प्रेममार्गी अर्थात सूफी शाखा, रामभक्ति शाखा और कृष्णभक्तिशाखा। इन सभी कवि भक्ति की पराकाष्ठा को लाँग कर इतिहास की रचना की। उनकी भक्ति से उत्पन्न साहित्य संसार का सर्वश्रेष्ठ साहित्य माना गया है। उनकी भक्ति ने संसार के समक्ष यथोचित उदाहरण प्रस्तुत किया है चाहे वह सगुणधारा से हो अथवा निर्गुण धारा से हो।
मध्ययुगीन भक्ति काव्य का हिन्दी साहित्य में अपना विशेष स्थान हैं क्योंकि इसी युग के रससिद्ध कवियों ने भाव के क्षेत्र में अल्लादकारिणी भाव धारा को बहाया तथा सुप्त जनता को जागृत करने का प्रयास किया।


रामभक्ति शाखा में महाकवि तुलसीदास का स्थान शिरोमणि हैं। गोस्वामी तुलसीदास का जन्म संवत 1554 माना जाता है। बाबा बेनीमधावदास के अनुसार तुलसीदास का जनम श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को हुआ था। गोस्वामी तुलसीदास के पिता का नाम आत्माराम दूबे और माता का नाम हुलसी था। कहा जाता है कि गोस्वामी मूल नक्षत्र में पैदा हुए थे जिसे वे अशुभ मानते थे अतः उनके माता-पिता ने उन्हें त्याग दिया।
कहा जाता हैं कि जी जब गोस्वामी जब उत्पन्न हुए तब वे 5 वर्ष के बालक के समान थे और उन्हें पूरे दांत थे जो की एक आश्चर्यजनक तथ्य हैं।वे रोये नहीं केवल राम शब्द ही उनके मुख से निकलता रहा। इन सभी आश्चर्यजनक हरकतों को देखकर उनके पिता उन्हें राक्षस समझ बैठे और उपेक्षा करते रहे।परंतु माता ने उद्विग्न होकर उसे अपनी एक मुनिया नामक दासी को पालने -पोसने को दिया और वह उसे लेकर अपने ससुराल चली गयी।इनका बचपन बहुत ही कष्ट और दरिद्रता में बीता  बाबा नरहरिदास ने गोस्वामी को अपने पास रखा और उन्हें शिक्षा-दीक्षा देकर वेद-शास्त्र में पारंगत कराया। 15 वर्ष तक अध्ययन करके वे अपनी जन्मभूमि राजपुर लौटे।उनकी पत्नी का नाम रत्नावली था कहा जाता हैं कि तुलसीदास जी अपनी पत्नी पर इतने अनुरक्त थे की एक बार उसके मेके चले जाने पर वे बढ़ी नदी पार करके उससे जाकर मिले।रत्नावली ने तुलसीदास के जीवन को सही दिशा प्रदान की। अयोध्या में सन 1572 में प्रसिद्ध महाकाव्य रामचरितमानस की रचना का शुभारंभ किया।


रामचरितमानस:
तुलसीदास की काव्यभाषा में अवधी और ब्रज दोनों का समान रूप से प्रयोग मिलता हैं।छंदों की दृष्टि से उन्होंने दोहा ,चौपाई आदि मांत्रिक शब्दों का प्रयोग किया हैं।रामचरितमानस हिन्दी काव्य जगत में ही नहीं समग्र विश्व साहित्य का ऐसा अनुपम ग्रंथरत्न हैं जो एक और काव्यकला का उत्कृष्टतम स्वरूप प्रस्तुत करता है तो दूसरी ओरदाम्पत्य एवंपारिवारिकजीवन,राजधर्म,कुलधर्म,पातिव्रत्य ज्ञान,भक्ति,वैराग्य,सदाचार,नैतिकता,आदि की भी व्यापक शिक्षा देता हैं।वस्तुतः लौकिकता एवं प्राथमिकता का ऐसा मणि-कांचन संयोग किसी भी अन्य ग्रंथ में उपलब्ध नहीं है।  
रामचरितमानस में रत्नशिरोमणि तुलसीदास जी ने अपने आदर्शमय श्री राम के चरित्र में शील और सौन्दर्य का अद्भुत समन्वय किया है।उन्होंने इस महाकाव्य में अपने आराध्य देव श्री रामचंद्र को ही भाव-सुमन अर्पित किए हैं।भारतीय संस्कृति में राम चरित्र को उज्ज्वलतम रूप में प्रस्तुत करने का श्रेय गोस्वामी तुलसीदास जी को जाता है।
रत्नाकर पाण्डेय के शुभवचनों से कहा जाए तो “शिव जी के आशीर्वाद से तुलसीदास जी के हृदय में काव्य का सूर्य जाग उठा। वे रामचरित को काव्य सूत्र में गूँथने लगे। संवत 1631 में रामनवमी भौमवासर को अवधपुरी में रामचरितमानस की रचना प्रारम्भ हो चुकी थी।संवत 1633 के मार्गशीर्ष शुखपक्ष में रामचरितमानस को तुलसीदास ने परिपूर्ण रच दिया। इस प्रकार दो वर्ष,सात महीने और छब्बीस दिन में रामचरितमानस जैसे लोकमंगलकारी महाकाव्य को पूर्ण रूप से लिखकर समाप्त किया”।


रमचरितमानस महाकवि तुलसीदास के रामभक्ति तथा श्री रामचंद्र की लीलाओं का संगम हैं जिसे बालकांड,अयोध्याकांड, किष्किन्धकांड ,सुंदरकांड, लंकाकाण्ड, उत्तरकाण्ड में विभाजित किया गया है।
अरण्यकांड वाल्मीकिकृत रामायण और रत्नशिरोमणि कवि गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरितमानस का एक भाग अथवा अध्याय हैं। यह अध्याय मर्यादापुरुषोत्तम श्री रामचन्द्र के वनवास संदर्भ पर आधारित है।



अरण्यकांड का समीक्षात्मक अध्ययन :
अरण्यकांड का आरंभ राम चित्रकूट से ऋषि अत्रि के आश्रम पहुँचने से होता है।वहाँ से श्री राम ने प्रस्थान कर शरभंग ऋषि से भेंट की। शरभंग ऋषि को रामदर्शन की अभिलाषा थी और अभिलाषापूर्ति के बाद सभी मोह-माया से विमुक्त शरभंग ऋषि ने अपनी योगाग्नि से स्वयं को भस्मीभूत किया।
पंचवटी में रावण की बहन शूर्पणखा ने आकर राम से प्रणय निवेदन किया।परंतु लक्ष्मण ने उसके प्रणाय निवेदन को अस्वीकार कर दिया और इसके चलते शत्रु की बहन होने के कारण लक्ष्मण ने शूर्पणखा की नाख तथा कर्ण काट दिए।
क्रोधग्नि तथा पराभव की अग्नि में जलती शूर्पणखा ने खर-दूषण की सहाय्य्ता ली। परंतु खर-दूषण की राक्षसी सेना का संहार राम ने सहजरूप से किया।अपनी भगिनी का अपमान रावण सह न सखा। अतः उसने मायावी दैत्य मारीच को राम से युद्ध करने हेतु भेजता हैं।

मायाजाल की विद्या से युक्त इस दैत्य ने स्वर्णमृग का रूप धारण कर सीता का मन विचलित करने का प्रयास किया। माया से ग्रसित सीता ने राम से स्वर्णमृग की खाल की माँग की। अतः उस स्वर्णमृग की खोज में राम चल पड़े। उसी दौरान रावण ने छल एवं कपट से सीता का अपहरण किया।
जब रावण ने सीता को पुष्पकयान से लंका ले जाने लगा तब सीता का आक्रोश सुनकर रामभक्त जटायु वहाँ आ गया। रावण और जटायु के भीषण युद्ध में जटायु आपने प्राण त्यागता है। 
राम को इस कटु वास्तविकता से अवगत कराते हुए रक्तरंजित जटायु अपने प्राण त्याग देता है। जटायु का देह-संस्कार कर राम सीता की खोज में लक्ष्मण सहित लंका की ओर बढ़ने लगे।

 

तुलसी भक्तिरस की अगाध निधि है। भाव,भाषा और शैली के प्रयोग में जो विविधता तुलसीदास में पाई जाती है वैसे पाना अत्यंत दुर्लभ है। अपनी गरिमा के कारण तुलसी का काव्य आज जनमानस का कंठ हार बन चुका हैं।
अरण्यकांड में महाकवि तुलसीदास जी ने अवधी भाषा द्वारा  पाठक के सामने मानो अपना महाकाव्य दृश्य में रूपान्तरण किया है।
डॉ॰ रमा सूद के रत्न वचनों द्वारा कहा जाए तो “तुलसी की काव्यसरिता में मैंने जितना ही अवगाहन किया उतना ही अधिक मुझे आत्म-तुष्टि और जीवन अनुभूतियों से साक्षात्कार हुआ”।   





संदर्भ सूची :
1.र॰सी प्रसाद,1988,गोस्वामी तुलसीदास कृत श्रीरामचरितमानस,मोतीलाल प्रकाशन,दिल्ली
2. डॉ॰ योगेन्द्र प्रताप सिंह,2002,चतुर्थ संस्करण,श्रीरामचरितमानस द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड लोकभारती प्रकाशन
3. डॉ॰ योगेन्द्र प्रताप सिंह,2001,द्वितीय संशोधित संस्करण,श्रीरामचरितमानस सप्तम सोपान उत्तरकाण्ड,लोकभारती प्रकाशन
4.प्रेम प्रकाश बंसल ,2007, प्रथम संस्करण,रामचरितमानस में राम और काम .
5. डॉ॰ विनय प्रकाश गौड़,2009,गोस्वामी तुलसीदास का जीवन वृत्त,अनुभव प्रकाशन,दिल्ली
6.आचार्य रामचंद्र शुक्ल,2007,प्रथम संस्करण,हिन्दी साहित्य का इतिहास,कांति प्रकाशन।  (प्रकरण ४)
7. डॉ॰ (श्रीमती) रमा सूद,1998,महाकवि तुलसीदास : एक अध्ययन,यूनिवर्सिटी पब्लीकेशन,नई दिल्ली
8. विद्यानिवास मिश्र,2002,प्रथम संस्करण,तुलसीदास-भक्ति प्रबंध का नया उत्कर्ष
9. रत्नाकर पाण्डेय,2008,प्रथम संस्करण,अंधेरे का सूर्य-तुलसीदास,स्वराज प्रकाशन,दिल्ली

 


- सुविद्य धारवाडकार

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सुविद्य धारवाडकार

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