नवम्बर 2019
अंक - 54 | कुल अंक - 55
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

फ़िल्म समीक्षा

भारतीय समाज के विश्वासों, मान्यताओं और मूल्यों के खोखलेपन पर अचूक प्रहार करती ''हेल्लारो'

''हेल्लारो' अभिषेक शाह द्वारा लिखित और निर्देशित, गुजराती फ़िल्म है। सारथी प्रोडक्शन और हरफनमौला फिल्मों के बैनर तले आशीष पटेल, नीरव पटेल, आयुष पटेल, प्रतीक गुप्ता, मीत जानी और अभिषेक शाह द्वारा निर्मित है। दिल की गहराई से उठते मनोंभावो के लिए 'हेल्लारो' शब्द है, आंचलिक भाषा में कहें तो नदी के शांत बहते पानी में अचानक एक ऐसी लहर आए जो आपको चोट पहुँचा दे। एक बेहतरीन टीम वर्क को दर्शाती इस फ़िल्म को वर्ष 2019 का सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला, इतना ही नहीं फिल्म की 13 महिला अभिनेत्रियों को अपने श्रेष्ठ प्रदर्शन के लिए विशेष जूरी पुरस्कार भी मिला।

 

यह फ़िल्म पूरे भारतीय समाज और परिवार में महिलाओं की दयनीय स्थिति का प्रतिनिधित्व करती है। अभिषेक ने अपनी पटकथा में भारतीय समाज के कई ज्वलंत मुद्दों जैसे पितृसत्ता, जातिवाद और अंधविश्वास को एक साथ बुना है। कहानी की पृष्ठभूमि कच्छ के रण में बसा एक छोटा-सा गाँव समरपुरा है। समय है वर्ष 1975 का, जहाँ नवरात्रि के पहले दिन गरबा (गुजरात का पारंपरिक नृत्य) का आयोजन होता है। पारंपरिक मानदंडों के अनुसार केवल पुरुषों को गरबा करने की अनुमति है। इस गाँव और आस-पास के क्षेत्रों में पिछले तीन वर्षों से बारिश नहीं हुई है। गाँव के पुरुष देवी को प्रसन्न करने के लिए गरबा करते हैं। ऐसा माना जाता है कि यदि महिलाएँ गरबा करती हैं, तो वे देवी को निराश करती हैं और गाँव में तबाही लाती है। यही हमारे समाज की विडंबना है कि गाँव के पुरुष एक तरफ़ तो देवी की पूजा करते हैं लेकिन अपने परिवार की महिलाओं को नियमों में बाँध कर रखते हैं! पास ही के छोटे शहर की एक लड़की मंजरी, इस गाँव के एक फ़ौजी युवा की दुलहन बनकर आती है। उसका मानना है कि हर महिला या लड़की को अपनी ज़िंदगी जीने की अनुमति दी जानी चाहिए।
 
नियमों से बंधी महिलाएँ जब हर सुबह दूर के तालाब से पानी लेने जाती हैं तब कुछ देर के लिए उन्हें मुक्ति का अहसास होता है। एक दिन पानी लाने के अपने रास्ते में, महिलाओं को रेत में एक आदमी सोया पडा दीखता है। गाँव की महिलाओं को किसी अनजान पुरुष से बात करने की अनुमति नहीं है इसलिए वे डरती है, लेकिन मंजरी आगे बढती है। नजदीक जाने पर पता चलता है कि भीषण गर्मी में, प्यास के मारे वह आदमी पानी पानी चिल्ला रहा है। मंजरी उसे पानी पिलाती है, उसकी जान बच जाती है। आदमी अपना नाम मूलजी बताता है जो एक ढोली है। मंजरी के आग्रह पर मूलजी ढोल बजाता है और मंजरी के पैर थिरकने लगते हैं। यही शायद हेल्लारो है! थोड़ी सी हिचकिचाहट के बाद अन्य महिलाएँ भी गरबा में शामिल होती हैं।
अब हर रोज ये महिलाएँ ख़ुशी ख़ुशी पानी लेने जाती है। मूलजी उन्हें वहीं खड़ा मिलता है। वह ढोल बजाता है, महिलाएँ अपने परिवार वालों से छिपकर गरबा नृत्य करती हैं। उनके दिल में दबी पीड़ा, कुछ समय के लिए ही सही, कम हो जाती है! ये महिलाएँ जैसे गरबा के माध्यम से अपनी पहचान ढूंढती हैं। निर्देशक ने समरपुरा की महिलाओं की स्वतंत्रता की चाहत को मनोरंजन के माध्यम से यानि गरबा नृत्य के रूप में बख़ूबी प्रस्तुत किया है। यही इस फिल्म का सबल पक्ष है।
 
फ़िल्म में ऐसे कई संवाद हैं, जो हमें भीतर तक झकझोर कर रख देते हैं, जैसे पानी लेने जाते समय रास्ते में एक अनजान ढोली के ढोल के ताल पर चुपके से गरबा नृत्य करती अधिकतर महिलाएँ इसे पाप भी मानती है, तब एक महिला कहती है कि हर पाप की सज़ा कहाँ मिलती है? अगर ऐसा होता तो आधे से ज्यादा पुरुष मर गए होते। पितृसत्तात्मक समाज पर एक ही पंक्ति द्वारा किया गया चोटदार वार! एक और संवाद है, ‘ईश्वर ने कुछ मर्दों को स्त्री का दिल दिया है, दुनिया उन्हीं की बदौलत बची हुई है।’ 
ऐसी कहानियाँ किसी एक वर्ग की नहीं, सम्पूर्ण भारतीय समाज के विश्वासों, मान्यताओं और मूल्यों के खोखलेपन को दर्शाती है। फिल्म में सारी समाज व्यवस्था, रीति-रिवाज, मान्यताएँ ही पात्र के रूप में उभरकर आते हैं जो अनायास पन्ना लाल पटेल के उपन्यास “मानवीनी भवाई” की याद दिला देते हैं। प्रत्येक पात्र को उनके अभिनय की सर्वोत्तम क्षमता तक पहुँचाया गया है। उन्हें पर्याप्त समय दिया गया ताकि दर्शक उस पात्र के साथ जुड़ पाए।
 
इस बेमिसाल गुजराती फ़िल्म ने आज मलयालम भाषा के विख्यात साहित्यकार तकष़ी शिवशंकर पिल्लै द्वारा रचित एक उपन्यास “चेम्मीन” (मछुआरे) की भी याद दिला दी, जिसका ताना-बाना अंध-विश्वास के इर्द-गिर्द बुना गया है। मछुआरा समाज में प्रचलित एक मिथक के अनुसार सागर देवी उस मछुआरे का जीवन नष्ट कर देती है जिसकी पत्नी अपवित्र हो जाती है। अर्थात समुद्र का किनारा पवित्र होना चाहिए और इसकी पवित्रता की नैतिक जिम्मेदारी किनारे पर रहनेवाली स्त्रियों की है।
सौम्य जोशी के गीत और मेहुल सुरती के संगीत का सही मेल, गुजराती लोक संगीत की सुंदरता और कला का एक नया रूप लेकर प्रस्तुत होता है। गरबा के लिए कोरियोग्राफी अत्यंत आकर्षक है। कुल मिलाकर दर्शकों के लिए इस फ़िल्म को देखना एक अविस्मरणीय अनुभव रहेगा।
 
 

- मल्लिका मुखर्जी

रचनाकार परिचय
मल्लिका मुखर्जी

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