नवम्बर 2019
अंक - 54 | कुल अंक - 55
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कविता-कानन

दीवार

वो लोग जो दीवार के इस पार रह गये
उन्होंने कल्पना की कि दूसरी ओर वाला क्या सोचता है
चीन की दीवार के इस पार बैठे लोग सोचते रहे
कि उस तरफ के लोग बस हमला करने ही वाले है
घर की दीवार के इस पार बैठा एक भाई सोचता है
कि दूसरी तरफ उसके लिए ईर्ष्या और द्वेष भरा है
लिंगभेद दीवार की ओट में छुपी बैठी एक लड़की
वो भयभीत रही कि उस पार के सभी लड़के बलात्कारी है
अपनी विचारधारा की दीवार के इस पार बैठे लोगों को
उस पार के लोगों की सोच अँधेरे में डूबी दिखी
धर्म की दीवारों के अंदर मग्न लोगों को
दूसरी तरफ के सारे लोग पाप करते लगे
और इस सब के बीच
दीवार के इस पार या उस पार बैठे लोग ये सोच ही न पाए
कि दीवारों में छुपे बैठे लोग कुछ सोच नहीं सकते
सिर्फ शक कर सकते हैं।


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अल्पमत

ये एक जोखिम भरा काम है
या फिर कहें कि बेवकूफी ही
नक्कारखाने में तूती की आवाज़-सा
चपटी दिखती धरती को गोल बताने-सा
छैनी, हथौड़ा लेकर किसी पहाड़ को काटने-सा
या फिर 'आ बैल मुझे मार' की कहावत-सा
भेड़ों के झुंड एक साथ ही चले जाते हैं
और भेड़िए समवेत स्वर में हूक लगाते हैं
चुप रहो, बोलने पर ज़बानें काट दी जाएँगी
मुँह मत खोलो, ज़हर से भर दिए जाएँगे
गर्दन उठाई अगर तो धड़ से अलग हो जाएगी
बहुमत को अल्पमत से टेढ़ी उंगली कर घी निकालना आता है
पर अल्प होकर भी अल्पमत चला जाता है
तीन सौ के आगे तीन-सा टिका रहता है
अल्पमत संभवत अल्पविराम तो होता है
पर पूर्णविराम हरगिज़ नहीं बन पाता है।


- हरदीप सबरवाल