नवम्बर 2019
अंक - 54 | कुल अंक - 55
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम
अनुदान
 
“लो सुशीला दीदी आ गईं” रामदीन ने भोर से ही कार्यालय के दरवाजे पर बैठी बुढ़िया से कहा और चाय लेने बगल की टपरी पर चला गया। बुढ़िया कब से अपनी अर्जी देने के लिए सुशीला दीदी की राह देख रही थी। रामदीन की आवाज सुनते ही, मानो मिट्टी की ढेली में जान आ गई। वह निर्विकार भाव से उठी और तेज कदमो से सुशीला दीदी की मेज के निकट जा खड़ी हुई। उसका चेहरा भावहीन था, और आँखें सूजी हुई - कितने दिनों से आँखें सोयी कम और रोयी अधिक हैं। अपने दोनों हाथों की खुरदुरी उँगलियों से साड़ी के पल्लू को पकड़ कर कभी गांठ बांधती, कभी खोलती। मन में हो रही उथल पुथल को छुपाने की कोशिश भी नहीं कर रही थी। खड़ी हो कर सुशीला दीदी को एकटक घूर रही थी, बस दीदी एक बार उसे देखें और वह अपनी व्यथा सुनाना शुरू कर दे, मन ही मन तो कितनी बार दोहरा चुकी थी उन वाक्यों को, फिर भी कह पाना सहज न होगा। पर अभी तो सुशीला दीदी अपनी मेज सुधारने में लगी थी। रोज की दिनचर्या यही थी। दिन के पहले दस पंद्रह मिनट अपनी सारी फ़ाईलों को तरतीब से लगातीं, मेज को साफ करतीं, दराज में रखी सात आठ चीजों का आकलन करतीं, कल की डाक, बचा हुआ काम, कुछ गैर जरूरी कागज फाड़ कर फेकना, फ़ाईलों को उलट पुलट कर सिरे से लगाना, रोज का ही काम था और जब तक रामदीन चाय ले कर आएगा तब तक यही घटनाक्रम चलता रहेगा। अभी सुशीला दीदी की बैटरी चार्ज हो रही थी। 
 
सुशीला गत बीस वर्षों से बलरामपुर तहसील की कचहरी में अधिकारी है, पहले छोटे पद पर थीं आज बड़े पद पर हैं। पर उनका स्वभाव और चरित्र नहीं बदला। उन्हें जानने वाले कहते हैं कि उनकी दिनचर्या भी खास बदली नहीं। रुबाब और रुतबा भी जस का तस। अपने सरकारी काम के साथ साथ लोगों की घर की समायाओं को सुलझाना भी वो अपना दायित्व समझतीं। जो उन्हें जानते वो सीधे चले आते – ये मेरा बेटा है, सिगरेट, शराब की लत लग गई है इसे, या फिर, दीदी, बारहवीं हो गई अब मैं क्या करूँ, पापा कॉलेज नहीं भेजना चाहते? तो कभी दुकान के झगड़े, जायदाद के टंटे, सास बहू की किच-किच, क्या नहीं सुलझाया दीदी ने। हर विषय में उनका दखल है। दीदी को इन संवादों में बड़ा संतोष मिलता है और आनंद भी आता है। हर किसी को अपनी सलाह देना वह अपना कर्तव्य समझतीं हैं।
 
बलरामपुर एक छोटा सा कस्बा है, कोई बीस पच्चीस हजार लोगों की बस्ती होगी। लोगों को आए दिन सरकारी कचहरी के चक्कर लगाने ही पड़ते हैं। कभी कोई प्रमाणपत्र, कभी कोई कार्ड बनवाने के लिए। फिर शासन द्वारा भिन्न योजनाओं के अधीन दिया जाने वाला अनुदान भी यहीं से मिलता है। सुशीला दीदी भी ऐसे ही विभाग में कार्यरत हैं। सुबह से शाम लोग उनसे मिलने आते। दीदी उनका काम भी करती और आदतन, सलाह भी देती। उनके विभाग में आने वाले अधिकतर दिहाड़ी करने वाले गरीब लोग हैं। उन्हे कोई चाय पानी का पूछ ले, दो बातें प्यार से कर ले, उसी में उनका दिन बन जाता है। दीदी की बात को तो जैसे गांठ बांध लेते हैं बलरामपुर वाले, और फिर दीदी के चर्चे इतने हैं चारों ओर, कि उनकी सलाह को छोड देना आसान नहीं है। और दीदी भी पूरी बात जान कर न्यायसंगत सलाह देती। जैसा वो अपने मिलने वालों से अक्सर कहती हैं – मैंने इसी मेज के पीछे बैठ कर पूरी दुनिया देख ली है। और यही मेज उनकी दुनिया भी है, दुनिया का झरोखा भी। फिलहाल तो वो अपनी मेज की दुनिया को तरतीब से लगाने में व्यस्त हैं।
 
पाँच वर्षों के वैधव्य के बाद आपको जीवन के दर्द नहीं सताते। समय आपके दर्द पर मरहम भी लगाता है और आपको दर्द सहने की अपार क्षमता भी देता है। और फिर तीन छोटे बच्चों की परवरिश में आपको अपना दर्द कहाँ महसूस होता है। परिवार को दो वक्त के भोजन की जद्दोजहद आपको तीन दिन का शोक तक तो मनाने नहीं देती। ऐसे कष्टकर जीवन में बहुत ही कम ऐसी घटनाएँ हैं जो आपको विचलित करती हैं। पर जब आपको लगता है, सब सहने की आदत हो गई है, तभी विधाता एक और परीक्षा लेते हैं। सुशीला दीदी की मेज के सामने टकटकी लगाए व्याकुल बुढ़िया ऐसी ही परीक्षा का सामना कर रही है। वह अपनी बात कहना चाहती है, पर दीदी हैं कि अपनी दिनचर्या में व्यस्त हैं। जैसे इस बुढ़िया का उस कमरे में कोई अस्तित्व ही न हो। बैचेनी बढ़ती जा रही थी, अब स्वयं को रोक पाना संभव नहीं था। उसने अपने सिर को स्थिर रख, आँखों को इधर उधर घुमा कर कमरे का मुआयना किया, शायद कोई मदद करे, पर इतना सुबह कौन दफ्तर आता है? सारी मेज खाली पड़ी हैं। मुआ रामदीन भी जाने कहाँ मर गया, चाय ही तो लेने गया था, ऐसा लगता है कई दिन बीत गए। अब तो उसे ही कुछ करना होगा। बुढ़िया ने एक गहरी सांस अंदर ली, कुछ देर के लिए रोकी और अपनी सारी हिम्मत जुटा कर धीरे से कहा – दीदी जी.......
हाँ बोलो ...... दीदी ने भी कागज दराज में रखते हुए बिना आँख उठाए औपचारिक रूप से बुढ़िया का सम्बोधन स्वीकार किया। 
 
दीदी जी..... इस बार बुढ़िया के स्वर पहले की तुलना में अधिक तीव्र थे। अगर साथ वाली मेज पर कोई होता तो सुन सकता था। बुढ़िया ने थोड़ा विराम दे कर विचार किया, अब कहाँ से शुरू करूँ? कंपकपाती हुई आवाज में कहा.... दीदी जी, मैं हरिया की माँ हूँ। 
सुशीला खुली दराज में कागज रखते रखते रुक गई। उसका सिर अभी भी दराज की ओर ही था, माथे पर कुछ सिलवटें उभरी और नजरें कुछ ढूँढने लगीं। सुबह सुबह का अलसाता मश्तिष्क अब अचानक से दौड़ने लगा। 
हरिया.....हरिया.... कौन हरिया?...... नाम तो सुना सुना सा है...... सुशीला अपने ही मन में बुदबुदाई। 
बुढ़िया आगे कुछ बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाई, उसे प्रतीक्षा थी कि दीदी उसकी ओर देखें। वह चुप थी, पर दीदी अपनी स्मृति में हरिया की खोज कर रही थी। ओह! कहीं वो हरिया तो नहीं जिसके केस की फाईल का निपटान पिछले हफ्ते ही किया था। वो हरिया तो असामयिक ही सड़क दुर्घटना में मर गया था.... 
 
सुशीला के पास ऐसे ही प्रकरण आते हैं। निम्न आय वर्गों के परिवारों में यदि किसी कमाने वाले सदस्य की मृत्यु हो जाती है तो सरकार उसे रुपये पाँच लाख का अनुदान देती है। बलरामपुर तहसील में रहने वाले निवासियों को इस बाबत सुशीला से ही मिलना होता है। वही सारे दस्तावेज़ देख कर, सत्यापित कर के मंजूरी के लिए भेजती है और बाद में राशि का वितरण भी सुशीला के हस्ताक्षरों से ही होता है। सप्ताह में एक दो नए केस आ ही जाते हैं, और सुशीला उन्हे यथासंभव शीघ्रता से हल करती, बिना किसी अपेक्षा के। इस दौरान वो प्रार्थी से तीन चार बार मिल लिया करती, और कुछ लोगों से मित्रता भी हो जाती। पर सभी को याद रखना तो संभव नहीं, हरिया का मामला जरा अलग था, सो सुशीला को याद रहा। पर इससे पहले कि वो बात आगे बढ़ाए, यह सत्यापित करना आवश्यक है कि दोनों उसी हरिया की बात कर रहे हैं, जो अब इस दुनिया में नहीं है। 
इतनी देर में पहली बार अब बुढ़िया और सुशीला की नजरें मिली। सुशीला ने गंभीरता से पूछा – “कौन हरिया?” उसकी आवाज़ में प्रश्न कम और शक ज्यादा था। उन्हे आभास था, कि ये बुढ़िया उसी हरिया की माँ है जो महीने भर पहले सड़क दुर्घटना में मर गया था। किन्तु प्रश्न यह था, ये क्यूँ आई है? क्या चाहती है? जबकि इसके तो अनुदान का वितरण भी हो चुका है। 
आखिर सुशीला का शक सही साबित हुआ, बुढ़िया बोली – “हरिया, मेरा इकलौता बेटा, पिछले  महीने ट्रक के नीचे आ कर मर गया था....”
सुशीला ने एक गहरी सांस ली। निराशाजनक स्वर में बोली - “हाँ मुझे याद है..... उसकी तो शादी हो गई थी, बीवी थी उसकी…”
“जी मरने से छ: महीने पहले”
 
इतनी कम उम्र में, छ: माह की शादी के बाद ही हुई विधवा का दर्द कौन भूल सकता है भला! हरिया की विधवा जब पहली बार आई थी दस्तावेज़ जमा करने तो हरिया को मरे दस दिन भी नहीं हुए होंगे। किसी दूर के रिश्तेदार के साथ आई थी। एकदम बच्ची सी, पतली - दुबली, सर पर घूँघट से आधा चेहरा ढंका हुआ था। वो आकर मेज के सामने चुप कर के खड़ी हो गई थी। जब सुशीला ने पूछा तो कागजों का पुलिंदा सामने कर दिया। सुशीला ने दस्तावेज़ लिए तब उसके नाजुक हाथ और कलाई देखी, उन पर खरोंच के निशान भी ताजे थे, जो शायद नव विवाहिता की लाल हरी काँच की चूड़ियों को तोड़ते समय लगे होंगे। सुशीला की निगाह उन पर टिक गई, जिससे वह नवयुवती असहज हो गई और तुरंत कागज मेज़ पर छोड कर हाथ साड़ी के पल्लू में दबा लिए। वह अपना दर्द नहीं दिखाना चाहती थी, और छ: गज की सफ़ेद  मैली साड़ी उसके दर्द को छुपाने के लिए पर्याप्त थी। सुशीला ने तुरंत आँख ऊपर कर घूँघट के पीछे के चेहरे को पढ़ने की कोशिश भी की, परंतु असफल – उसने अपने तन को और मन को अपनी साड़ी में कस कर बांध रखा था, लोगों की नजरों से बचाकर। वह चुपचाप खड़ी थी। कुछ भी पूछो तो बस हाँ हूँ में जवाब दे दिया। कहीं उसकी वाणी की कंपकंपाहट से भी उसकी पीड़ा का आभास न हो जाये। वह जितना स्वयं को छुपाती, उतना ही सुशीला उसे जानने के लिए उत्सुक थी।
 
सामान्यत: इस वर्ग और क्षेत्र के लोग अपनी परेशानियाँ बढ़ा चढ़ा कर ही बताते हैं अधिकारियों को, रोना गाना भी बहुत मचाते हैं, उन्हे लगता है कि अधिकारी इस कृत्य से द्रवित हो कर उनका काम जल्दी से कर देंगे। कई बार तो सुशीला को रामदीन से कह कर उन लोगों को कमरे के बाहर करना पड़ता था। पर यहाँ मामला उलट था। बहरहाल, सुशीला ने दस्तावेज़ जांचे, कुछ कमियाँ थी उन्हे बताया, एक दो जगह सही करना बाकी था सो वो भी करवाई। पिछले एक माह में तकरीबन तीन से चार बार मुलाक़ात करने आई थी सुशीला से। पर हर बार वही रहस्यमयी, गुमसुम, ढंका चेहरा। सुशीला उसे देख द्रवित हो जाती। कितनी पीड़ा में होगी ये स्त्री, एक बार अपना दर्द साझा कर ले तो शायद मैं इसकी कोई मदद कर सकूँ। कभी कभी बात कर के भी मन हल्का हो जाता है। किससे बात करती होगी ये, किसको अपना दर्द सुनाती होगी, क्यों मन ही मन इतना घुटती है? अभी उम्र ही क्या है इसकी..... जब भी वो आती, सुशीला के मन को यही विचार देर तक घेरे रहते। पिछले हफ्ते जब नियत राशि का भुगतान होना था, तो सुशीला ने सोचा यह शायद उस युवती से अंतिम मुलाक़ात होगी। उसकी स्थिति देख कर सुशीला को बड़ी घुटन होती थी। वह उसकी मदद करना चाहती थी। उस युवती के दुख की परिकल्पना मात्र से ही सुशीला को आवसाद घेर लेता। आज वो उससे बात करेगी।
 
“बच्चे हैं”
उसने धीमे से ना में सर हिला दिया।
“सास ससुर?”
उसने हाँ में सर हिलाया, और बोली.... “सास है”
परेशान तो नहीं करती?
उसने ‘ना’ में सर हिलाया।
कुछ देर सुशीला उसे ताकती रही..... घूँघट के पीछे ये कौन है? क्या कोई गंभीर वयस्क नारी, जो जिंदगी से लोहा लेने को तैयार है या एक युवती जिसे आने वाली कठिनाईयों का अंदाजा ही नहीं? या इस आघात से सन्न एक बच्ची जिसे मालूम ही नहीं कि क्या हो रहा है?
 
दफ्तर की हलचल, साथियों की खुसर पुसुर, पंखे की खट खट की ध्वनि इस समय नेपथ्य में थी जिसे ये दोनों नहीं सुन रहे थे। एक लंबे शांत अंतराल के बाद सुशीला ने हिम्मत दिखाई और बोली, “देखो बेटी! तुम्हारे आगे बहुत लंबी जिंदगी है। बहुत मुश्किल राह है, मैं अपने अनुभव से बता रही हूँ। अपने आप को संभाल के रखना, बहुत देख भाल के कदम रखना।“
उसने ‘हाँ’ में सर हिलाया। कुछ सुबुकने की आवाज भी आ रही थी। वो अपने कृंदन को भी दबाना चाहती थी। सुशीला ने महसूस किया कि शायद घूँघट के पीछे उसने अपने निचले होठ को ज़ोर से दातों के बीच भींच रखा है। पर आँसू की एक बूंद धोखेबाज़ निकली, न चाहते हुए भी सीधे मेज पर आ टपकी। इस पर भी वह युवती सधी हुई बैठी रही। शायद इतने प्रेम से आज तक उससे किसी ने बात नहीं की थी, और वो इस संवाद के क्रम को तोड़ना नहीं चाहती थी।  
“और देखो, यह जो पैसे सरकार दे रही है, इन्हे संभाल कर रखना। किसी को नहीं देना। बहुत लोग आएंगे मांगने। पर ये तुम्हारे हैं, तुम्हारे आड़े वक्त के लिए.......”
 
ठक..... की आवाज से सुशीला की तंद्रा टूटी और उसने वर्तमान में पुन: प्रवेश किया। रामदीन ने चाय का गिलास टेबल  पर रखा था – “दीदी चाय! आज बहुत देर कर दी उसने चाय बनाने में”
उसने रामदीन को देखा, आँखों से चाय के लिए धन्यवाद दिया। आमतौर पर इस समय रामदीन से आसपास के गली मोहल्ले की चटपटी जानकारी मिल जाया करती थी। पर आज तो देखना है, यह बुढ़िया क्या चाहती है। 
बुढ़िया को आभास हुआ कि दीदी उसकी बात नही सुन पायी, वह फिर से बोली “मरने के छ: महीने पहले ही शादी हुई थी उसकी”
“हाँ मुझे याद है, उसकी बीवी से मैं मिल चुकी हूँ” रामदीन के जाते ही सुशीला ने संवाद को आगे बढ़ाया। 
“दीदी जी, मेरा पति तो पाँच साल पहले ही मर गया था। हरिया ही मेरा और मेरी दो बेटियों का सहारा था, वो भी जाता रहा।“ चेहरे पर दया के भाव लिए हाथ जोड़ कर बुढ़िया बोली, मानो भीख मांग रही हो। 
 
“हम्म” दीदी ने चाय का घूंट भरते हुए कहा। ऐसा पहले भी कई बार हुआ है, लोगबाग भोली सूरत बना कर आते हैं और अपनी कहानी सुनाते हैं, उन्हें  उम्मीद रहती है कि कुछ पैसा या नौकरी मिल जाये, पर सरकारी नियम भी कुछ होते हैं। और सुशीला सिर्फ कायदे कानून से काम करती है। उसने यह सब पहले भी देखा हुआ है। उसे नफरत होती है ऐसे लोगों से। झुंझलाहट उसके चेहरे पर आना शुरू हो गयी थी। वह प्रतिउत्तर लिए तैयार थी। 
“तो मुझे क्यों बता रही हो? उसका तो सरकार की तरफ से अनुदान का पैसा भी दे दिया है।“
 
“वही तो दीदी, बहू को उसके पिताजी आकर अपने घर ले गए......  आपने उसकी बीवी से कहा है कि पैसा किसी को नही देना.... सो वो पैसा भी ले कर चली गई.... मैंने पूछा तो उसने कह दिया सुशीला दीदी ने देने से मना किया है.....जो हरिया के साथ छ: महीने रही उसे तो हक मिल गया...... मैं तो उसकी माँ हूँ, बीस साल से उसके साथ रही हूँ..... हरिया मेरा बेटा था और वो ही मेरा एकमात्र सहारा था..... अब और कोई नहीं है जो मेरा और मेरी दो बेटियों का खयाल रख सके। मैं अब कहाँ जाऊँ उन बेटियों को ले कर? क्या बेटे के ऊपर माँ का कोई हक नहीं....... मेरी तो किसी ने नहीं सुनी... न ऊपर वाले ने, न बहू ने, न समधी ने, न ही सरकार और आपने सुशीला दीदी...”
सुशीला को इसकी कोई उम्मीद नहीं थी। बुढ़िया सच ही तो कह रही है। काश कि उसने यह सलाह नहीं दी होती.....  कोई गलत इरादा न होते हुए भी सुशीला से यह कैसा अक्षम्य अपराध हो गया। माँ और दो बेटियों पर इतना अत्याचार। अब क्या जवाब दे इस बुढ़िया को? 
सुशीला अपनी पथराई आँखों से बिलखती हुई बुढ़िया को घूरती रही। वह निरुत्तर थी। 
 

- डॉ. आशीष जैन

रचनाकार परिचय
डॉ. आशीष जैन

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