नवम्बर 2019
अंक - 54 | कुल अंक - 55
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम
इमरती, रबड़ी और समोसा
 
मोतियाबिंद से धुँधली होती हुई आँखों से रामसिंह ने अपने बड़े होते हुए तीनों बच्चों को देखा। गरीबी में पले होने के बाद भी खूबसूरती में किसी भी साहब के बच्चों को पछाड़ दें। झुनिया नीम के पेड़ के नीचे बिखरे हुए पत्ते बुहार रही थी। पतझड़ से पीले पड़े हुए, झरे हुए पत्ते उड़ उड़ कर उसकी कोठरी में आ रहे थे।
‘चल मुन्ना, रोटी खा ले’, झुनिया ने बेटे को पुकार कर कहा।
‘मुझे नहीं खानी रोटी, मुझे दूध पीना है’।'
‘ रामू ओ रामू’ कहीं विलीन हो गये, समय से भी कहीं बहुत दूर से रामसिंह को माई की आवाज़ सुनायी दी,
‘ चल बेटा, रोटी खा ले’
‘ नहीं मैं रोटी  नहीं खाऊँगा’ मुझे मिठाई दे ‘
‘ कहाँ से लाऊँ मिठाई? हमारे भाग में यह सूखी रोटी के टुकड़े ही हैं। साग - भाजी तो हम खा नहीं सकते हैं तो मिठाई कहाँ से लाऊँ’।
‘ कहीं से भी ला, पहले मिठाई खाऊँगा फिर रोटी। अच्छा बता तो मिठाई खाने में कैसी लगती है?’
माई तो हकबका गयी। अरे ये कैसा सवाल पूछ लिया बचुआ ने। अब उसे क्या पता, मिठाई का स्वाद? उसने कौन सी चखी है। 
‘ मेरा राजा बेटा, चल रोटी खा ले’
‘पहले मिठाई’
सब्र की भी एक हद होती है।
‘ ले मिठाई, ले खा और खा । माई के लात- घूँसे उसे गेंद की तरह उछाल रहे थे।’
‘नहीं माँगूगा अब कभी मिठाई, मत मार माई’
पर अगर वह रूक जाये तो माई कैसी। जब तक वह स्वंय नहीं थक गयी, उसे मारती रही । वह दिन और आज का दिन, रामसिंह ने मिठाई का नाम तक अपनी जबान पर नहीं आने दिया।
 
उसे मारने के बाद, कितने ही दिनों तक माई दुखी होती रही और इस जुगाड़ में लगी रही कि कहीं से अपने बच्चे को मिठाई खिला सके। एक साल का था, जब बापू चल बसे थे। नन्दू ग्वाले के यहाँ कन्डे थापकर, दिन के तीस रूपये मजदूरी लेकर घर लौटती है, उसमें रोटी खाये या मिठाई। पर होंगे उसके बेटे के कुछ अच्छे करम, नन्दू के घर बेटा जन्मा और सभी काम वालों को गुड़ बाँटा गया।
‘ले जी भर कर मिठाई खा’
गुड़ की उस ड़ली को रामू दस दिन तक चाटता रहा। रोज चाट कर उसे कोठरी में बने आले में छुपा देता कि कहीं खतम ना हो जाये। कहीं माई ना देख ले और खा ना जाये।घिस घिस कर गुड़ की ड़ली छोटी सी रह गयी थी।
आज तो सारी खा जायेगा, सोच कर जैसे ही आले में हाथ ड़ाला, असंख्य लाल चींटियां उसके हाथ पर चढ़ गयीं। चींटियों के काटने की परवाह किये बिना उसने गुड़ की ड़ली को ढूँढा । उसकी हालत देखकर उसका रोना छूट गया। रोने की आवाज़ सुनकर आस- पास की झोंपड़ियों से लोग भागकर आ गये। 
‘लगता है, धनिया के बेटे को साँप ने काट लिया’
‘अरे साँप नहीं, लाल चींटियों ने पूरी देह को नोच ड़ाला है।’
लोग-बाग उसके बदन से चींटियों को झाड़ रहे थे पर उसे तो कुछ नहीं काट रहा था। वह तो उस अलभ्य डली के बिखरे हुए चूरन को देखकर तड़प रहा था। अब न जाने कब फिर से नन्दू के यहाँ बेटा जन्मेगा, न जाने फिर कब गुड़ मिलेगा। सच में ही न फिर नन्दू के यहाँ बेटा जन्मा, ना उसे मिठाई खाने को मिली।
 
धीरे धीरे वह बड़ा होता गया। इतने अभावों में जहाँ खाने के लाले पड़े हों, पढ़ाई की बात सोचना भी पाप था। अब वह नन्दू की गायें चराने जाता था। धनिया बुढ़ाती जा रही थी, पर उसे सन्तोष था कि उसकी आँखों के सामने उसका बेटा काम पर लग गया। धनिया को अब उसके व्याह की चिन्ता सताने लगी।
‘मेरे बचुआ की सादी करा दो परमेसुर’ प्रत्येक मन्दिर, गोखले के सामने वह आँचल फैला कर भीख माँगती। आखिर परमेसुर ने सुनी और झुनिया से उसका व्याह हो गया। समय बीता और एक दिन धनिया चल बसी। कन्डे थापने का काम अब झुनिया के जिम्मे था। 
एक दिन रामसिंह का एक मित्र शहर से आया और बोला,
‘ कब तक यहाँ गाय चराते और कन्डे थापते रहोगे, मेरे साथ शहर चलो, जिस सेठ के यहाँ मैं ड्राइवर हूँ, उन्हें चौकीदार की जरूरत है। पगार तो मिलेगी ही, साथ में रहने को एक कमरा और एक समय का खाना मुफ्त।
रामसिंह और झुनिया की आँखों में हजारों सितारे एक साथ जगमगा उठे। झुनिया माँ बनने वाली थी। इतने कम पैसों में गुजारा मुश्किल था। उन्होंने शहर जाने का फैसला कर लिया।
 
शहर में सेठ की कोठी देखकर दोनों की आँखें चौंधिया गयीं।अपनी कोठरी भी उन्हें किसी महल से कम नहीं लगी, दो कमरे, रसोई भी और तो और नहाने के लिए भी एक छोटा सा कमरा । काश आज माई जिन्दा होती। सेठ की विशाल कोठी का चौकीदार था अब रामसिंह। झुनिया उनके घर में काम करने लगी। अच्छी गुजर बसर होने लगी। साहब लोग, साहब लोगों की बड़ी बड़ी बातें। रोज रात को झुनिया थाली भर खाना लाती। ऐसी चीजें , जिन्हें देखना और खाना तो दूर, नाम तक ना सुना था दोनों ने।
‘इस तीन कोने वाले को समोसा कहते हैं। साहब- मेमसाहब लोग जब मिठाई लाते हैं तब ये जरूर लाते हैं’।
जिंदगी में पहली बार समोसा खाया रामसिंह ने. लगा जैसे अभी अभी स्वर्ग की यात्रा सम्पन्न करके लौटा हो।
 
हँसी खुशी से दिन गुजर रहे थे कि एक रात झुनिया प्रसव- पीड़ा से तड़पने लगी। सेठ ने अपनी कार से उसे हॉस्पीटल भिजवाया पर उसकी हालत बहुत खराब थी। रामसिंह रोने लगा, एक झुनिया के सिवा उसका है ही कौन? उसे कुछ हो गया तो कैसे जी पायेगा वह। बेचारी ने अभी अभी तो सुख देखा है। वह भगवान के सामने उसके जीवन की भीख माँगने लगा। उसे याद आया माई बताती थी कि बचपन में एक बार वह बहुत बीमार पड़ गया था तब माँ ने कहा था यदि मेरा बचुआ बच गया तो मैं जीवन में आलू नहीं खाऊँगी। और वह जी गया था। तो क्या वह भी ऐसा कुछ बोल दे! पर क्या? इतने दिन हो गये यहाँ आये हुए, सब कुछ खा लिया, दाल- चावल, तरह तरह के साग, रायता यहाँ तक की समोसा भी पर मिठाई अभी तक नहीं खाई। शंकर बता रहा था, दो दिन बाद घर में पार्टी है। तरह तरह के व्यंजन बनेंगे। पन्द्रह तरह की तो सिर्फ चटनियां हैं। इक्कीस तरह की मिठाई। मालपुए और रबड़ी बनाने राजस्थान से हलवाई आ रहा है। इमरती और मलाईपूरी बनाने उत्तर प्रदेश से। सुनकर रामसिंह की जीभ से लेकर पेट तक पानी भर गया था। ओ माई री! कैसे कैसे नाम, कभी सुने ही नहीं। पहली बार देखेगा ही नहीं खायेगा भी। अब क्या करे! ये झुनिया भी दो दिन बाद बच्चा पैदा नहीं कर सकती थी। 
 
उसने कसकर आँखें बन्द की, दिल पर पत्थर रखा और भगवान के चरणों में गिर पड़ा,
‘ हे कन्हैया, हे गिरधारी मेरी झुनिया को बचा लो, जीवन में कभी मिठाई नहीं खाऊँगा ‘
मृत्यु से लड़कर झुनिया ने एक बच्ची के जनम दिया और माँ बेटी दोनों बच गयीं। दोनों के जीवन की कितनी बड़ी कीमत चुकायी रामसिंह ने। जिस अलभ्य पदार्थ के लिए जीवन भर तरसता रहा, जो परमात्मा की कृपा से, बिना किसी प्रयास के विविध रूपों में उसके करतल पर उपस्थित था, उसी को उसने त्याग दिया।फिर भी एक असीम तृप्ति है मन में। पार्टी जोर- शोर से चल रही थी। शंकर एक प्लेट में कुछ मिठाइयां लेकर आया। दुखी हृदय से मित्र से बोला, 
‘मैं जानता हूँ, तू नहीं खायेगा। पर देख तो सही, कैसी - कैसी अनोखी चीजें हैं। यह गोल गोल रस से भरी है, इसे इमरती कहते हैं, इसे रबड़ी, इसे बर्फी....
शंकर बोले जा रहा था, रामू कुछ और सोचे जा रहा था। घर पहुँचते ही उसने झुनिया से कहा,’ बच्ची का नाम इमरती रखेंगे’
‘अमरती? यह भी कोई नाम हुआ भला। मैं तो इसका नाम मुनिया रखूँगी, झुनिया की बेटी मुनिया।’
‘ठीक है, तू मुनिया कहना, मैं इमरती कहूँगा’
 
दो साल बाद झुनिया ने फिर एक बच्ची को जनम दिया। दूध सी उजली, गोरी बच्ची को देखते ही रामू की अतृप्त मूकता ने वाणी का रूप ले लिया,
‘इसका नाम रबड़ी रखेंगे’
‘पागल हो क्या, बच्चे हैं या मिठाई की दुकान’ मैं तो इसका नाम गुनिया रखूँगी। झुनिया के लिए दोनों बच्चियां मुनिया और गुनिया थीं पर रामू के लिए तो इमरती और रबड़ी ही रहीं। बस अब एक ही आस दोनों के मन में थी, एक बेटा हो जाये तो उनकी बुढ़ापे की लाठी भी आ जाये। भगवान ने उनकी सुन ली और झुनिया ने एक पुत्र रत्न को जन्म दिया। नाम रखने की बारी आयी तो झुनिया ड़र गयी कि कहीं रामू इसका नाम लड्डू या गुलाबजामुन ना रख दे। बड़े लाड़ से रामसिंह ने अपनी बुढ़ापे की लाठी को देखा और बोला,
‘झुनिया हम बेटे का नाम समोसा रखेंगे’
झुनिया जैसे आसमान से धरती पर गिरी।
‘ तू ही तो कहती थी, जब साहब लोग मिठाई खाते हैं तो साथ में समोसा भी खाते हैं। देख आज हमारा परिवार पूरा हुआ।
‘ इमरती, रबड़ी और समोसा’
झुनिया कुछ नहीं बोली । करूणा ले उसकी आँखें भर आयीं। आर्द्र चित्त से उसने पति को देखा। बेचारे की अतृप्त इच्छाएं ही बच्चों के नाम रूप में सिमट आयी हैं।
 
‘मैं तो ना पढ़ सका, पर इसे जरूर पढ़ाऊँगा।’
‘समोसा छ: साल का हुआ तो रामसिंह उसे सरकारी स्कूल में दाखिला देने ले गया।
‘ क्या नाम है बच्चे का’
‘समोसा’
‘क्या? प्रिंसिपल के हाथ से पैन छूट गया। समोसे ने अपने को बहुत अपमानित महसूस किया, वह बोला, ,मास्साब मेरा नाम समोसा नहीं, चन्दर है’।’
 
यादें, यादें, यादें कोठरी में चारपाई पर पड़े पड़े रामसिंह जैसे पूरी जिन्दगी जी गया। इमरती, रबड़ी और समोसा तीनों बच्चे जवान हो गये हैं। चन्दर भी बारहवीं पास करके किसी साहब के ऑफिस में काम करने लगा है।
रामसिंह अंतिम प्रयाण पर जाने को तैयार है। बहुत जी लिया, बहुत देख लिये जीवन के सुख दुख। खूब साथ निभाया झुनिया ने भी। उसने बड़ी ममता से बुढ़िया को देखा। झुर्रियों से भरे झुनिया के मुख पर बुढ्ढै के लिए चिन्ता थी। बूढ़े ने काँपते स्वर में बुढ़िया को कुछ कहना चाहा पर आवाज ने साथ नहीं दिया। कुछ ना बोल पाने की पीड़ा में दो आँसू ढुलक कर तकिये को भिगो गये।
‘बाबू’
कौन, चन्दर !
हाँ बाबू देख तेरे लिए क्या लाया हूँ। मुझसे शिव- मन्दिर के पुजारी ने कहा था, यदि किसी और की मन्नत कोई अपने सिर ले ले तो मन्नत माँगने वाला उस मानता में से मुक्त हो जाता है। तेरी मानता मैंने अपने सिर ली। कोई अतृप्त इच्छा मन में लेकर ना जा। तृषार्त आँखों से बूढ़े ने मिठाई भरी थाली को देखा। इमरती उठाने के लिए जैसे ही उसने हाथ बढ़ाया कि उसके दिल में ऐसी मरोड़ उठी कि हाथ थाली तक पहुँचने से पहले ही लटक गया। दर्द सहन करने के प्रयास में आँखों की कोर से आँसू निकल गये। आँसू भरी आँखों मे चन्दर के लिए असंख्य आशीर्वाद थे। स्थिर रह गयी खुली आँख की पुतलियाँ इमरती पर ही टिकी थीं। बूढ़ा मिठाई का स्वाद जाने बिना ही इहलोक से प्रस्थान कर चुका था।
 

- निशा चंद्रा

रचनाकार परिचय
निशा चंद्रा

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