नवम्बर 2019
अंक - 54 | कुल अंक - 55
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

जो दिल कहे
दुनिया में तीसरे स्थान पर हम हैं अशुद्ध जल के मामले में........ 120 / 122
 
पानी की दुनिया भी विचित्र है, ज्यादा हो तो समस्या, कम हो तो समस्या और न हो तो कहना ही क्या। बारिश हो तो मुश्किल, न हो तो मुश्किल। माना जाता है कि पानी घरो में सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है। वस्तुतः घरो में केवल 8% पानी की जरूरत होती है। परिवहन में 13%, खेती में 14%, वन निर्माण में 17% और उद्योग में 19% जल का उपयोग होता है। कार बनाने में, नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के मान्यता के विपरीत, अधिक पानी का इस्तमाल होता है। अगर एनजीटी कि बात मानकर नयी चलती हुई दस साल पुरानी गाड़ियों को कूड़े में डाला जाता है तो जल प्रदूषण बढ़ता है। सबसे अधिक 26% बिजली उत्पादन में इसका उपयोग होता है।
 
भारत का बुनियादी ढांचा चरमरा रहा है। गरीबी और असमानता सर्वव्यापी है। अर्थव्यवस्था मुश्किल में है। लेकिन, अगर तीन मसलों- पर्यावरण, शिक्षा और प्रशासन तंत्र की समस्याओं को सुलझा लिया जाए तो स्थिति में सुधार संभव है। दुनिया के सबसे ज्यादा प्रदूषित 15 में से 12 शहर भारत में हैं। जहरीली हवा से हर वर्ष 12 लाख मौतें होती हैं। पानी की #शुद्धता के सूचकांक में 122 देशों के बीच देश का क्रम 120 वां है।
 
प्रशासन का बुनियादी ढांचा लगभग 150 वर्ष पुराना है। उत्तर भारत में हर वर्ष किसान चावल की पराली में आग लगाते हैं। उत्तरी राज्यों के अलावा पाकिस्तान के लाहौर से बांग्लादेश में ढाका तक का क्षेत्र डीजल के धुएं, कोयला से चलने वाले बिजलीघरों के प्रदूषण और अन्य जहरीली गैसों से सराबोर रहता है। प्रदूषित हवा से हर वर्ष 12 लाख लोगों की अकाल मौत होती है। औसत आयु चार वर्ष कम हो रही है। शुद्ध पानी के अभाव में हर वर्ष दो लाख लोग मरते हैं।
 
भारत में दो तिहाई भारतीय अब भी ग्रामीण इलाकों में रहते हैं। इधर, शहरों की ओर पलायन बढ़ने से लोगों को अच्छी शिक्षा की जरूरत है। एनजीओ एसर की रिपोर्ट के अनुसार देशभर में पांचवीं क्लास के छात्रों का स्तर दूसरी के छात्रों जैसा है। आठवीं के 27% छात्र दूसरी कक्षा की पढ़ाई के हिसाब से कमजोर हैं। यह स्थिति 2010 के बाद से नहीं बदली है। भारतीय शिक्षा की संस्कृति और ढांचा बदलना पड़ेगा। स्कूलों का ध्यान कौशल या मूल्य सिखाने की बजाय परीक्षा पास कराने पर केंद्रित हैं। पूरा सिस्टम पढ़ाई के बदले छात्रों की भर्ती या बुनियादी ढांचे के निर्माण के आसपास काम करता है। वर्षों से शिक्षा पर भारत का खर्च जीडपी का 4% है। यह विश्व के औसत से कम है।
 
बड़े विकासशील देशों की तरह भारत का प्रशासन तंत्र बहुत बड़ा नहीं है। 21वीं सदी के भारत को 19वीं सदी की राज्य व्यवस्था चला रही है। एलीट भारतीय प्रशासनिक सेवा में केवल 5000 सक्रिय अधिकारी हैं। आबादी के अनुपात से देखा जाए तो यह संख्या 1889 के बराबर पड़ती है। पूरी क्षमता से 1500 अधिकारी कम हैं। राजनेताओं द्वारा कार्यपालिका (नौकरशाही) के कार्यों में बेवजह हस्तक्षेप एवं अधिकारिओं द्वारा उनके मनोकूल कार्य न करने पर बार-बार तबादला किए जाने की आदत के कारण स्थिति और ज्यादा बदतर रहती है।
 
अगला महायुद्ध जब भी होगा, उसका प्रमुख एवं तात्कालिक कारण जल समस्या ही होगी। पानी की सबसे बड़ी समस्या है आप इसका न तो पुनर्निर्माण ही कर सकते हैं न ही आयात कर सकते हैं। पानी, पेट्रोल से 20 प्रतिशत भारी होता है और इसको ढोना मुश्किल होता है। और यदि किसी कारणवश कभी-कभी करना भी पड़ता है तो यह बहुत ही महंगा पड़ता है। पेट्रोल का तो विकल्प है, पर पानी का नहीं है। थोडा सा भी पर्यावरण से छेड़छाड़ किया जाये तो पानी का रुख बदल जाता है।
 
चीन ने तिब्बत पर कब्जा कर एशिया के जल और ग्लेशियर पर कब्जा कर जल को युद्ध के लिए इस्तेमाल कर रहा है। एशिया में विशेषकर भारत में जल संकट पैदा कर रहा है। चीन भारत पर पानी को रोककर और बारिश के समय छोड़ कर पूर्वोत्तर राज्यों में भीषण स्थिति पैदा कर रहा है। चीन भारत को हाइड्रोलिक आंकड़ा नहीं दे रहा है। इससे असम और पूर्वोत्तर राज्यों को बाढ़ की विभीषिका झेलना पड़ता है।
 
1960 में भारत ने पाकिस्तान के साथ ‘सिन्धु जल संधि’ किया था, यह विश्व का सबसे उदार जलसन्धि है। इसके तहत सिन्धु नदी क्षेत्र के चेनाब, झेलम और सिन्ध के 80 प्रतिशत पानी पाकिस्तान को दिया गया। केवल रावी और सतलज का 19.48 प्रतिशत जल ही भारत को मिलता है। पाकिस्तान ने इसे अपनी आधी जीत मानने की भूल करता है।
 
पानी विश्व के लिए संकट है। इसे सर्वत्र दोस्त बनाकर ही समाप्त क्या जा सकता, जीवनदायिनी शक्ति का रणनीतिक उपयोग नहीं होना चाहिए। विश्वमैत्री से यह संभव हो सकता है। प्रकृति से प्यार करना चाहिए। पानी से प्यार होगा तो खुशहाली होगी, बैर होगा तो परेशानी होगी। भारत विश्वगुरु पर्यावरण के साथ मैत्री भाव से ही बना था। उसी से यह देश सोने की चिड़िया कहलाती थी। सोच में प्रदुषण से ही विश्व में परेशानी है। विश्व के जो अपने को थानेदार समझते है, शोषण और बांदी कर रहे है। जिसके हाथ लाठी उसके भैस होती जा रही है।
 
पानी के इस समस्या से निबटना आसान नहीं है। नदी और भूमिगत जल का अत्यधिक दोहन हो रहा है। इससे सूखे की भयंकर स्थिति पैदा हो रही है। जल के व्यवहार को सम्यक बनाने की जरुरत है। साथ ही स्वच्छ जल तकनीक को अपनाने की जरुरत है। पानी को रिसायकल करना भी जरूरी है। सिंगापुर अपने जल संसाधनों का 60 प्रतिशत गन्दा पानी रिसायकल करता है। अमेरिका के कैलिफोर्निया में भीषण संकट है, वहां पर केवल 5 प्रतिशत पानी को शोधन किया जाता है। लेकिन इजराइल 85 प्रतिशत जल का पुनर्शोधन कर पुनः प्रयोग करता है।
 
2005 के बाद चीन सहित दुनिया भर में कार्बन डाई ऑक्साइड का उर्ल्सजन घटा है लेकिन, भारत में दोगुना हुआ है। वह किसानों को पराली जलाने से रोकने के लिए संदेशों के प्रचार और नए उपकरणों पर एक हजार करोड़ रुपए खर्च कर रही है। 2030 तक ऊर्जा उत्पादन में सोलर बिजली की हिस्सेदारी 36% रखने का लक्ष्य है। 

- नीरज कृष्ण

रचनाकार परिचय
नीरज कृष्ण

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