नवम्बर 2019
अंक - 54 | कुल अंक - 55
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

संदेश-पत्र
प्रिय दोस्त,
 
समझ नहीं पा रही क्या लिखूं आजकल जब कोई पत्र नहीं लिखता मेरा ख़त लिखना मुझे ही असामयिक लग रहा है और इसकी उपयोगिता केवल लिखावट देखने की ही रही हो तो बात और अटपटी हो जाती है| ये शिकायत नहीं है एक विचार आया था मन में सो लिख दिया| हालांकि जानती हूँ भावनाओं से जीवन की आवश्यकताएं पूरी नहीं हो सकतीं फिर भी भावनाओं का प्रवाह इतना तीव्र है कि न लिखना असहनीय ही होगा| जानती हूँ तुमसे मिल पाना दुष्कर है,सम्भावना लगभग समाप्त सी हो गयी है लेकिन उम्मीद अभी जिंदा है |
अगस्त की एक दोपहर खास हो गयी थी जब आपको फेसबुक पर मित्रता के लिए प्रार्थना भेजी थी तस्वीर देखकर| तस्वीर में गहरी आँखें ,उज्जवल रंग और तीखे नाक-नक्श दृष्टिगोचर थे जिन्हें देखकर आकर्षित हुयी थी बेबाक हंसी बहुत अच्छी लगी थी और पहली दृष्टि में ही दिल दे बैठी थी| जब मैंने लिखा मुझे क्रश हुआ है तो शीघ्र ही आपका जबाब मिला था कि घर बैठे बिना किसी मशक्कत के आप मिली हैं शुक्रिया|
 
फिर बात करना क्रम सा बन गया था | हर सुबह ताजगी भरी लगाने लगी थी,उदासी भी काफूर हो गयी थी सच कहूँ तो ज़िंदगी हसीं लगाने लगी थी| पहले सोचती थी ये अब बचकाना है लेकिन जीवन की इस वय में मैं एक नया जीवन जीने लगी थी दरअसल प्यार की आवश्यकता हर उम्र में ताजगी देती है, बनी रहती है| प्यार का बेशकीमती रंग रंग चेहरे पर झलकने लगा था,शामें कुछ रंगीन सी लगने लगीं और मन खिलखिला ख्यालों में आप रहने लगे और आपकी बातें रस में पगी सी लगने लगीं |जिस दिन आपसे बात नहीं हो पाती थी वो दिन और दिल खाली ख़ाली लगते हैं| बोझिल लगने वाले दिन,पल,घंटे सब आपके ख्यालों में डूबकर बिताये हैं मैंने| ज़िन्दगी का सारा खालीपन भर गया इस सुखद एहसास से| ये शायद दीवानापन है आपके लिए|
 
प्रेम तो सभी चाहते हैं उम्र फिर कोई भी हो| प्रेम के प्रकार अवश्य बदलते रहते है| जो लोग आदर्शवाद का डंका पीटते रहते हैं वे भी यथार्थ में प्रेम से बच नहीं पाते | अब कल्पना का उन्मुक्त गगन है और सपनों के पर फैलाये पंछी की उड़ान| सच कहूँ तो प्रेम स्पंदन है मेरे लिए| प्रेम में आप जिसे चाहें उसकी हर तकलीफ महसूस कर सकें वो हँसे तो आप हंसें, वो रोये तो आप रोयें | जब कभी उसके हाथ कांपें तो आप सहारा देकर उसका हाथ थाम लें ,वो परेशान हो तो हर संताप हर लें उसका, जब कभी उसके पैर गर्मी से जल उठें तो उसके मार्ग में आप फूल बिछाने का हौसला रखें,वो रोये तो उसकी आंख के आंसू आपके भी आंसू बन जाएँ और होंठ थरथरायें तो होठों के स्पर्श से रूह में उतर सकें| शाश्वत प्रेम में गहराई होनी ही चाहिए| वास्तव में प्रेम आपने यदि दो पल भी जी लिया तो आप स्वयं ही हर्ष और उल्लास से भर उठते हैं| प्रेम का प्रदर्शन लोग हज़ार तरह से करते हैं लेकिन प्रेम महसूस भी हो तब न| वैसे मीलों दूर से भी प्यार महसूस कर लेते हैं हम |
 
बेचैनियों का आलम इस कद्र बढ़ गया है कि क्या बताऊँ? उदास मन से हर काम करती हूँ आपकी आवाज़ सुनकर खिल उठती हूँ मैं| नहीं जानती आप मेरे बारे में क्या सोचते हैं लेकिन मैं आपसे बेहद प्यार करती हूँ| शेष कुशल है आपके अच्छे स्वास्थ्य और मंगल कामनाओं की ईश्वर से गुज़ारिश हर एक दिन करती रहूँगी
 
आपकी दोस्त
श्रेया 

- दिव्या माथुर

रचनाकार परिचय
दिव्या माथुर

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