सितम्बर - अक्टूबर 2019 (संयुक्तांक)
अंक - 53 | कुल अंक - 54
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

मूल्याँकन

अनुभूतियों के उजले रंग: ओ मन पाखी
- डाॅ. शीताभ शर्मा


 



मन की पीड़ा से ले प्रेरणा सृजन का संधान किया है
देश, समाज और प्रकृति हित, अपना शब्द प्रदान किया है

के उद्घोष के साथ कवयित्री के मन-पक्षी की उन्मुक्त उड़ान    कुल पैंसठ शीर्षकों में निबद्ध है। ये अनुभूतियाँ कहीं गहरी तो कहीं उथली हैं; कहीं धुँधली तो कहीं उजली भी हैं। यह उपदेशात्मक की अपेक्षा अनुभूतिपरक हैं, यही मूल तत्व पाठक के आह्लाद का कारक बनता है। यही काव्य की सार्थकता में सहायक सिद्ध होता है।

वर्तमान में मुक्तक शैली के काव्य की परम्परा को काव्यशास्त्रीय दृष्टि से आँकना या इनमें काव्यशास्त्रीय तत्व ढूँढना; इनके साथ अन्याय-सा होगा क्योंकि इन संग्रहों की सार्थकता इनके अनुभूति पक्ष में अर्थात् काव्य-रस में है।
इस दृष्टि से 'ओ मनपाखी' की कविताओं में भाव के कहीं उथले तो कहीं गहरे धरातल अपने विविध उजले रंगों के साथ समाहीत हैं; अर्थात् संग्रह की अधिकांश रचनाओं में कवयित्री का आशावादी दृृष्टिकोण उजागार हुआ है।
 'हाँ मैं माँ हूँ' शीर्षक में अस्तित्व बोध की अनुगूँज के साथ वत्सलता के 'साइड इफेक्ट्स' भी आधी आबादी के लिए, समाज का एक कटु सत्य है-


हाँ! मैं माँ हूँ?
मुझे अहसास है अपने अस्तित्व का
अपने बच्चों की किलकारी से
उनके रूठने के अंदाज़ तक
जीती हूँ उलाहनों में सदा
अपनों से अपनों के लिए
आदि से अंत तक
आत्मा को सालते, तानों को सुनकर


रिश्तों के भँवर में फँसा मन उनकी टूटन-उलझन से प्राप्त संत्रास का स्पर्श भी कई शीर्षकों में लक्षित हुआ है तथा धन, वैभव व पद शक्ति से रिश्तों में उपजे विभेदीय व प्रस्थिति परक तनाव आज के अर्थ युग का विद्रूप यथार्थ है, जिसे कवयित्री की लेखनी ने व्यक्त किया है।

नादां इंसां ये समझ ही नहीं पाता
रुपयों की चकाचौंध में
कैसे
इंसानी रिश्तों की परिभाषा बदल जाती है


एक शायरी में भाव साम्यता देखिए-

घरों में नाम थे, नामों के साथ ओहदे थे
बहुत तलाश किया कोई आदमी न मिला
(बशीर बद्र)


किन्नरों पर लिखी कविता 'हम बीच के लोग' मानवीय संवेदनाओं को झकझोरती है। 'खुशरंग हीना' शीर्षक में मेहंदी के माध्यम से सद्भाव का एकदम धीरे-से अच्छा संदेश कवयित्री ने दिया है। मेहंदी कहो या हीना, हथेली हिन्दू की हो या मुसलमान की, मेंहदी रंग, लाल ही देती है। सम्पूर्ण सृष्टि अपनी प्रकृति अनुसार ही व्यवहार करती है, एक मात्र प्राणी को छोड़कर; जो मनुष्य है।

मृत्यु लोक का चक्कर' शीर्षक में हास्य व्यंग्य की तार्किक अभिव्यक्ति बड़ी ही सार्थक बन पड़ी है। जब कवि चेतना पौराणिक पात्र व प्रसंगों को अपनी बात कहने का माध्यम चुने तो निश्चित रूप से उस कविता की पैठ आम आदमी तक हो जाती है। डाॅ. रत्ना की कल्पना कृत यत्र-तत्र प्रयोगित इन मिथकीय फुहारों से पाठक अवश्य ही मानस आनंद ले सकेगा। इनमें काली, दुर्गा, बटुक भैरव, नारद, अश्वत्थामा इत्यादि पात्र व इन्द्रसभा का दृश्य प्रभावी हैं।

'आत्म ग्लानि’ कविता में अश्वत्थामा की अंतर्वेदना व दुष्कृत्य के स्वीकार को जिस प्रकार कवयित्री ने व्यक्त किया है, यह उनकी लेखनी की परिपक्वता को पिछली कविताओं से चार कदम आगे ले जाता है। इस कविता में पीर की प्रगाढ़ता और भाव की तीव्रता के साथ ही भावानुकूल शिल्प गढ़ता चला गया है, जो कि श्लाघ्य है। अश्वत्थामा का जीवन स्पष्ट करता है कि भले ही आप अन्याय अनाचार के विरूद्ध लड़ें किन्तु अपने साध्य प्राप्ति में आपके साधन यदि अपवित्र हैं तो उनका अभिशाप जीवनभर भोगना पड़ता है। युग-युगों तक। जन्म-जन्मान्तर तक।

कवयित्री ने जीवन में एक बात तो अच्छे से समझ ली है कि ये 'मैं-मैं' के चक्कर में पड़ना अर्थात् जीवन में असफल हो जाना है। ये वही 'मैं' है- "जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि है मैं नाहीं" (कबीरदास) और यह सत्य जिसने स्वीकार कर लिया, इस भवसागर का असली तैराक वही है फिर चाहे वह कविता लिखे या न लिखे।

इनके अतिरिक्त जो कविताएँ गहरा मर्म लिए हैं, उनमें 'कविता का श्रृंगार', 'हौंसला', 'रंग जमाओ होली में', 'कामना', 'शब्द', 'मैं टूटूंगी नहीं' और 'वीरांगना' जैसी परिपक्व कविताएँ अपना विशेष स्थान रखती हैं। 'उठो द्रोपदी शस्त्र उठा लो', इस संग्रह की पूर्व चर्चित प्रभावी कविता है।

कवि कर्म और समीक्षक कर्म में और तो नहीं पर एक साम्यता तो है ही और वह है- कवि में अनुभूति और अभिव्यक्ति की प्रामाणिकता तो दूसरे में समालोचना की ईमानदारी। दोनों ही अपने-अपने कर्म में खरे होने ही चाहिए। इस आधार पर दृष्टिपात करूँ तो यह कहना असंगत नहीं होगा कि यदि सम्पूर्ण काव्य संग्रह में एक भी रचना किसी के जीवन में प्रेरणा शक्ति का संचार कर सके तो वह संग्रह सफल है। कभी-कभी किसी कविता की एक पंक्ति भी यही कार्य कर दिया करती है। इसी प्रकार इस संग्रह की 'सिसकता बचपन' की पूरी संवेदना इन दो पंक्तियों में है-


रोते सिसकते कराहते हैं मासूम
कागज के टुकड़ों पर रोता है कानून


सृष्टि में दुर्बलता है तो ही बल का महत्व है। जैसे प्रकाश का अंधकार के होने से। अतः जहाँ एक ओर काव्य संग्रह में कुछ कविताओं ने संग्रह को परिपक्वता दी है, उन्हें नवीन और आशावादी ऊर्जा दी है तो कहीं-कहीं कुछ भी यूँ ही कह देने में काव्यात्मकता तो छूटी ही है, अर्थ भी रूप नहीं ले सका है। जैसे-

तुम मेरे जीवन में आए, उसे सजाए तो आना होगा
तू मेरी जिन्दगी से दूर चला जाए तो जाना होगा


तो दूसरी ओर संग्रह की 'वीरांगना' कविता है, जो सहज ही पाठक को राष्ट्रकवि दिनकर की सुस्मृति करा देती है। इस कविता में भावानुकूल वर्ण व शब्द चयन ने आकर्षक काव्यमयी वातावरण तैयार कर दिया है। ओज की निर्झरणी में पाठक मन स्नात हो ऊर्जस्वित हुए बिना नहीं रह सकेगा। इसमें वीर रस की सफल सृष्टि हुई है। साथ ही एक पंक्ति में दो विरोधी भावों का प्रयोग भी विशिष्ट बन पड़ा है-

प्रचंड मुंड चांडिका, मैं काली हूँ कपालिनी
बरस पडूँ जो तेज से, मैं हूँ चमकती दामिनी
मेरी भुजाओं में है शौर्य, और मात प्यार भी
मैं दुर्गा हूँ तेजस्विनी, और मैं हूँ रागिनी
जब मैं हँसती हूँ 'ठठा', नक्षत्र भी हैं डोलते
वात्सल्य भाव इतना कि सब 'मातृ' मुझको बोलते
(पृष्ठ 45)


इस कविता में 'ठठा' शब्द ही स्वयं में अद्भुत है। दिनकर की 'हुंकार के विपथगा' सर्ग में क्रांति भाव से इसका साम्य आह्लादक व ओजस्वी बन पड़ा है।

मेरी पायल झनकार रही, तलवारों की झनकारों में
अपनी आगमनी बजा रही मैं, आप क्रुद्ध हुंकारों में
मैं अहंकार-सी कड़क 'ठठा' हँसती विद्युत की धारों में
बन काल हुताशन खेल रही, पगली मैं फूट पहाड़ों में
अंगड़ाई में भूचाल, साँस में लंका के उनचास पवन
झन झन... झन झन झन झनन झनन .........।


'ऐ बादल' कविता निराला की बादल राग से भाव साम्यता रखती है। इसमें कवित्व की सौंधी-सी गंध है। 'गुलाबी नगरी' भी अच्छी कविता है। संग्रह की लगभग 15-18 कविताओं के पश्चात लेखनी में प्रखरता व काव्यात्मक परिपक्वता दृढ़ हुई है, आगे और भी सुदृढ़ हो गई है और अगले संग्रह में कवयित्री से बिम्ब, रूपक और उत्प्रेक्षाओं के सौन्दर्य की भी साहित्य जगत अपेक्षा अवश्य रखेगा। इस संग्रह में अनुप्रास और उपमा यत्र-तत्र ही दृष्टव्य हैं। पर रस पुष्ट है।
एक और बात से मन को बड़ा संतोष हुआ कि कवयित्री की भाषा में बड़ी प्रांजलता है। खड़ी बोली हिन्दी की साहित्यिकता प्रशंसनीय है। प्रकृति अनुसार उर्दू के शब्द भी आ गए हैं किन्तु दिग्-दिगन्त अर्थ में सहायक बनकर आए हैं। गुंजार, भ्रमर तरंगित, खग कुल दिग्-दिगन्त, झंकृत, त्वरित जैसे अनेक शब्दों के प्रयोग सुष्ठ से काव्य सौष्ठव निखर उठा है।


आज की भागती-दौड़ती जिंदगी में भी कवि हृदय प्रकृति से सहसा सम्पृक्ति का अवसर निकाल ही लेता है। इस संग्रह में प्रकृति के आलम्बन रूप को- 'करो बसंत का स्वागत', 'ये चाँद', महकता सावन में तथा उद्दीपन रूप, बहती सरिता व 'मैं नदी' कविताओं में देखा जा सकता है।

मौत और रात पर सोचते हुए भी कवयित्री ने आशावादी दृष्टिकोण को आगे रखा है। सकारात्मक स्वरों की अनुगूंज सर्वत्र है, यही जीवन की विजय का मूल कारक है। कविताओं में तरलता है, रवानगी है।

यदि मैं एक पंक्ति में कहूँ तो यह रचनाएँ 'अनुभूतियों के उजले रंग' हैं और अब कवयित्री से साहित्य जगत की उम्मीदें बढ़ जाती हैं। गीति तत्व कविता के प्राणों को संचार देता है। संग्रह की कुछ कविताओं से स्पष्ट है कि इस लेखनी में और श्रेष्ठतर सम्भावनाएँ हैं।





समीक्ष्य पुस्तक- ओ मन पाखी
रचनाकार- डॉ. रत्ना शर्मा
विधा- कविता
प्रकाशन- काॅपरेशन प्रकाशन, जयपुर
संस्करण- प्रथम, अक्टूबर 2017


- डॉ. शीताभ शर्मा