सितम्बर - अक्टूबर 2019 (संयुक्तांक)
अंक - 53 | कुल अंक - 54
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

यादें

प्यारे भैया,
            स्नेह 

आज बहुत सारी बातें करनी है तुझसे। वैसे तो हम बातें करते ही रहते हैं पर आज दिल की बात लिख रही हूँ। मुझे वो बचपन के दिन याद आ रहे हैं जब हम आपस में खूब झगड़ा करते थे लेकिन एक दूसरे के बिना रह भी नहीं पाते थे। मुझे याद है कि गर्मियों की छुट्टियों में, मैं तुझे मम्मी- पापा के पास छोड़कर कभी दादी के तो कभी नानी के घर चली जाती थी। जिस दिन छुट्टियाँ होती थी उसी दिन शाम को मेरी रवानगी तय होती थी और स्कूल खुलने के एक दिन पहले ही वापस आती थी। कभी ताऊजी तो कभी मामाजी ले जाते थे मुझे। तू बहुत जोर- जोर से रोता था और मुझसे 5 साल छोटा होने के बावजूद कभी दीदी नहीं कहने वाला मेरा भाई उस दिन मुझे 'जीजी' कहकर न जाने कितनी मिन्नतें करता था। मैं फिर भी इतराते हुए चली जाती थी। तुझ पर किए गए इस 'सितम' के लिए सॉरी.....

'बेटी' होने के नाते मुझे हमेशा तुझ पर 'प्रिफरेंस' मिली। पापा अक़्सर बालहंस लाकर मेरे हाथ में ही देते थे यानी पहले पढ़ने की आज़ादी मुझे थी पर शुक्र मान मैं तुझे साथ में ही बैठकर पढ़ लेने देती थी। पापा जब दोनों के लिए कोई पेन, पेंसिल, डायरी वगैरह लाते थे तो पसंद करने का पहला हक़ मुझे ही होता था। तू बहुत नाराज़ होता था पापा से... पर पापा कहते थे "तेरी बहन है, उस पर बड़ी भी है, कल जब इसकी शादी हो जायेगी तब बहुत याद आयेगी तुझे।" और तू मुझे चिढ़ाता हुआ कहता था - "मजे हो जायेंगें मेरे तो, पापा- मम्मी जो भी लायेंगें मेरा होगा।" फिर एक बात बता- "मेरी विदाई में फूट- फूटकर क्यों रोया था? और अब क्यों चीजें मुझे देने की सोचता रहता है?" हाँ... पर मेरी उस 'दादागिरी' के लिए भी सॉरी।
 
मुझे याद है जब साइंस का होम वर्क पूरा नहीं होने के कारण तू बहुत परेशान था और तूने मैडम की डाँट से बचने का 'यूनिक़' यानी नायाब तरीका खोज निकाला था। तूने बड़ी सफाई से वो अधूरे होमवर्क वाली नोटबुक स्कूल बस से बाहर फेंक दी थी और क्लास में मैडम को कह आया था कि तेरी नोटबुक गुम हो गई। घर लौटने पर तेरी बोलती तब बंद हो गई जब तूने वो नोटबुक मेरे हाथ में देखी। तूने देखा कि मैं मम्मी से कह रही थी कि "किसी स्कूटर वाले अंकल ने ये कहते हुए नोटबुक ड्राइवर अंकल को लौटाई थी कि किसी बच्चे से गिर गई थी।" इसे कहते हैं 'आसमान से गिरे और खजूर पर अटके।' मैंने बैठकर तुझे सारा होम वर्क कराया था और तेरा चेहरा देखने लायक था। अभी भी वो बात याद करके हँसी आ रही है मुझे। 
तेरी कोशिश रहती थी कि मुझे पढ़ाई करते हुए 'झपकी' लेते हुए पकड़े, तूने कई बार ऐसा किया भी.... ये और बात है कि मैंने कभी माना नहीं। गनीमत है उस समय आज की तरह 'हाई टेक्नीक' वाले मोबाइल नहीं होते नहीं तो तू मेरी 'झपकी' के सबूत वायरल कर देता।
 
मम्मी- पापा जब वॉक पर जाते थे तब हम 'रहना है तेरे दिल में', 'आवारा, पागल, दीवाना' जैसी फिल्में देख लेते थे और ऐसा महसूस होता था मानो जंग जीत ली हो। कितने मजेदार दिन थे वो ....तुझे याद है वो शक्तिमान, तू - तू मैं मैं, श्रीमान श्रीमती, तहकीकात, शाका लाका बूम - बूम, चंद्रकांता और अलिफ - लैला जैसे सीरियल्स हम कितने मजे से देखते थे। 'अलिफ लैला' तू मेरे साथ देख तो लेता था लेकिन फिर तुझे डराने में बड़ा मज़ा आता था। रात को तो तेरी घिग्गी बंध जाती थी। लेकिन एक राज़ की बात बताऊं ... डर तो मुझे भी बहुत लगता था।
 
मुझे याद है कि मम्मी कभी - कभी तेरा फेवर करती थी लेकिन पापा के सपोर्ट की वजह से पलड़ा तो मेरा ही भारी रहता था। अपनी कितनी ही शरारतों का ठीकरा मैंने तेरे सर फोड़ा था। पर दूध का धुला तो तू भी नहीं था.... बदला लेने का कोई मौका नहीं छोड़ता था। जब भी कोई पसंदीदा चीज खाने को बैठते थे तो तू मुझे  बहला- फुसलाकर, इमोशनली ब्लैकमेल करके मेरा हिस्सा भी खा जाता था।
याद है तुझे ... जब मम्मी हम दोनों के पसंद का खाना बनाती थी जैसे इडली सांभर या ब्रेड पकोड़े, कोफ्ते..  तो हम 'भर - पेट' नहीं' 'पेट- भर' खाना खाते थे और गलती से कुछ बच जाए तो दोनों रात को ही खाके दम लेते थे। झगड़ा करके खाने का मजा ही कुछ और था।
 

मुझे वो बातें भी याद है जब तू मुझे मोटी - मोटी कहकर मेरे गाल खींचकर भाग जाता था। पर ये बता अब क्यों नहीं कहता? तुझे शुरू से ही मुझ 'बुद्धू' को मूवीज़ दिखाने का शौक रहा है। मुझे दिखाने के लिए दोबारा भी देख लेता था और मेरा चेहरा पढ़ता था कि मुझे समझ में आई कि नहीं। मेरा 'ब्लैंक' चेहरा देखकर कभी- कभी पॉज करके मुझे तेरा वो समझाना बहुत याद आता है ..अब शादी के बाद तो तुझे दो बुद्धुओं ( मैं और तेरी बीवी ) को समझाना पड़ता है।
आज भी जब तू मुझे लेने आता है तो कितने बड़े- बड़े प्लान बनाते हैं हम जिसकी शुरुआत 'रावत  की कचोरी' खाने के साथ होती है।

क्या- क्या कहूँ! तेरी नन्ही बेटी और मेरे नटखट बेटे को अब जब एक- दूसरे के साथ खेलते हुए देखती हूँ तो अक़्सर सोचती हूँ कि काश ये भी वैसा ही बचपन जियें जैसा हमने जिया था। क्या दिन थे वो....बेमिसाल!
 
तेरी बहना

 


- डॉ. अलका जैन आराधना

रचनाकार परिचय
डॉ. अलका जैन आराधना

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