प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
सितम्बर - अक्टूबर 2019 (संयुक्तांक)
अंक -53

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

मूल्याँकन

समकालीन हिन्दी ग़ज़ल में आलोचनात्मक हस्तक्षेप: हिन्दी ग़ज़ल की नयी चेतना
- डॉ. नितिन सेठी



हिन्दी ग़ज़ल ने आज लगभग पाँच दशकों का सफर तय कर लिया है। इन पाँच दशकों में हिन्दी ग़ज़ल ने अपनी कथ्यात्मकता और विशिष्ट अभिव्यंजना से एक अलग पहचान बनाई है। अपनी रूप संरचना की विशिष्टता के कारण ग़ज़ल अन्य काव्य रूपों से अधिक आकर्षण का केन्द्र रही है। कठोर छंद-विधान, शब्दार्थ का वक्रता सौन्दर्य और लोकोन्मुखता के कारण हिन्दी ग़ज़ल आज के समय की ग़ज़ल है। आज की परिस्थितियों, बदलते जीवन मूल्यों और पारस्परिक सम्बन्धों को हिन्दी ग़ज़ल ने बड़ी ही ख़ूबसूरती से दर्शाया है। एक विवाद इस संदर्भ में भी रहा है कि ग़ज़ल, ग़ज़ल है या हिन्दी-उर्दू ग़ज़ल। वर्तमान अनेक ग़ज़लकारों के अभिव्यंजना प्रसार को देखते हुए महसूस होता है कि हिन्दी ग़ज़ल की अपनी एक पहचान बनी है। आज का रचनाकार अपने समय का सच कहता है और सच को सच कहने में भाषा नहीं भावों-सद्भावों की आवश्यकता होती है। आज का ग़ज़लकार परम्पराओं को देखते-समझते हुए प्रयोगों की राहों का अन्वेषक है। वर्तमान ग़ज़ल या हिन्दी ग़ज़ल की यही विशेषता उसे नवीन सामाजिक-साहित्यिक चेतनाओं से जोड़ती है। संतोष की बात यह है कि हिन्दी ग़ज़ल के परिप्रेक्ष्य में आधुनिक दौर के आलोचकों का ध्यान इस ओर भी गया है। वर्तमान समय में अनेक हिन्दी ग़ज़लकार न केवल अपने मौलिक सृजन से ग़ज़ल का स्वरूप निखारने में रत हैं बल्कि सार्थक समालोचना के द्वारा इसे आधुनिक विमर्श का भी रूप देने में व्यस्त हैं।

ज्ञानप्रकाश विवेक अपनी नवीनतम प्रकाशित कृति ‘हिन्दी ग़ज़ल की नयी चेतना’ द्वारा इस दिशा में एक और मजबूत कदम बढ़ाते दिखाई देते हैं। समय की नब्ज़ को पकड़ने वाले ज्ञानप्रकाश विवेक हिन्दी ग़ज़ल के क्षेत्र में अपने रचनात्मक अवदान और अपने समालोचक व्यक्तित्व, दोनों के द्वारा ही जाने-पहचाने जाते रहे हैं। इससे पूर्व आपकी समालोचक दृष्टि से सम्पन्न दो कृतियाँ ‘हिन्दी ग़ज़ल की विकास् यात्रा’ और ‘हिन्दी ग़ज़ल: दुष्यंत के बाद’ बहुचर्चित रही हैं। प्रस्तुत कृति ‘प्रकाशन संस्थान, नयी दिल्ली’ से प्रकाशित है।

कृति दो खण्डों में विभाजित है। प्रथम खण्ड में ’हिन्दी ग़ज़ल चेतना’ नामक एक लम्बा आलेख है। प्रस्तुत पच्चीस पृष्ठीय आलेख, हिन्दी ग़ज़ल, उसके विकास, काव्यभाषा के तत्वों, कथ्यात्मक विशेषताओं जैसी बातों पर अच्छा प्रकाश डालता है। विवेक ने यहाँ रटी-रटाई बातों को सिरे से दरकिरनार किया है। समसामयिक कथ्य, जनचेतना, जनपीड़ा का शाब्दीकरण, ग़ज़लकारों का समय से सम्वाद, निजी अनुभव, अभिव्यक्ति कौशल, नवीन बिम्ब-प्रतीक विधान, कथन की प्रामाणिकता और प्रभाव- इन सभी आयामों से विवेक हिन्दी ग़ज़ल की चेतना को व्याख्यायित करते हैं। महत्वपूर्ण बात ये भी है कि अपनी बात को कहीं भी थोपते या जबरदस्ती मनवाते वे नहीं लगते। पहले प्रचुर मात्रा में ग़जल के शेरों को वे उद्धृत करते हैं। सम्बंधित शायरों की विशिष्टता बतलाते हुए वे अपनी बात को संदर्भित शेरों के माध्यम से विनम्रतापूर्वक रखते हैं। यहाँ लगभग सौ से अधिक शायरों की पंक्तियों का उपयोग हमें मिलता है। लेखक के गहन स्वाध्याय और पारखी शोधदृष्टि का समन्वित रूप है यह आलेख। महिला ग़ज़लकारों की भी उपस्थिति यहाँ पूरी शिद्दत से है। विवेक अपने निष्कर्षो के प्रति सजग और स्पष्ट हैं। अपने इस लम्बे आलेख में उनके निष्कर्ष महत्वपूर्ण हैं, "हिन्दी ग़ज़ल की यह चेतना यात्रा, हिन्दी ग़ज़ल के विकसित होते परिसर, परिवेश और परिदृश्य का भी संज्ञान लेती है। यह हिन्दी ग़ज़ल का वैभव है कि इसमें जीवन-राग की गूंज सुनाई देती है तो मानवतावादी सोच की गूंज को भी इसमें बड़े यकीन के साथ सुना जा सकता है।" 'हिन्दी ग़ज़ल की नयी चेतना’ के अन्तर्निहित स्वरों और अन्तर्गुंफित अभिव्यंजनाओं को इस महत्वपूर्ण आलेख में भली-भांति महसूस किया जा सकता है।


कृति के द्वितीय खण्ड में ’अनुभूति और अभिव्यक्ति’, के माध्यम से कुल बत्तीस प्रमुख हिन्दी ग़ज़लकारों पर ज्ञानप्रकाश विवेक ने अपनी आलोचनात्मक कलम चलाई है। हिन्दी ग़ज़ल के पैकर को संवारने-निखारने वाले ये बत्तीस नाम आज इसे विशिष्ट मुहावरा और नवीन अर्थबोध देने में लगे हैं। लेखक ने इस खण्ड का आरम्भ भारतेन्दु की ग़ज़लगोई से किया है। शमशेर की शेरियत, दुष्यंतः हिंदी ग़ज़ल का मुख्य द्वार जैसे आलेख ग़जल की नींव हिन्दी में स्थापित करने वाले कवियों शायरों पर केन्द्रित हैं। हरजीत सिंह की ग़ज़लें बिम्बों के प्रयोग से शब्द से अर्थ तक की काव्यमयी यात्रा है, तो नार्वी की ग़ज़लों को विवेक ने लोक संस्कृति और लोकरंजना के पावन स्वरों में देखा है। अदम गोंडवी जहाँ सीधे-सीधे प्रतिवादी स्वरों पर टिके हैं, वहीं सूर्यभानु गुप्त नवीन प्रतीकों से अपनी बात रखते हैं। रामकुमार कृषक की स्पष्टवादिता, सुल्तान अहमद का मानवतावाद, माधव कौशिक की यथार्थवादिता, विजय मानव की विसंगतियों को उठाने की क्षमता जैसे आयाम लेखक की पैनी दृष्टि से गुज़रे हैं। यहाँ अपने चुने हुए उदाहरणों और निष्कर्षों की कसौटी पर विवेक जी ने विवेक से ही विश्लेषण किया है।

समसामयिक हिन्दी ग़ज़ल वर्ण्य-विषय के वैविध्य और समसामयिक भावबोध के प्रस्तोता ये हिन्दी ग़ज़लकार अपने कथ्य और प्रस्तुतिकरण से प्रभावित करते रहे हैं। महेश अश्क, ध्रुव गुप्त, देवेन्द्र आर्य, कमलेश भट्ट कमल, हरेराम समीप, हस्तीमल हस्ती, नसीम बेचैन, विनय मिश्र जैसे प्रमुख रचनाकार यहाँ विमर्श का विषय बने हैं। नये प्रयोग, बाजारवाद, विडम्बनाएँ, अपसंस्कृति जैसे तत्व विवेक यहाँ उल्लेखित करते हैं। विज्ञान व्रत, सत्यप्रकाश उप्पल, अशोक आलोक की ग़ज़लों को अनात्म और अज्ञात की तलाश के आलोक में देखा गया है। पुस्तक की महत्वपूर्ण विशेषता है, कुछ नए ग़ज़लकारों पर भी दृष्टि और समालोचना। पवन कुमार, सौरभ शेखर, गौतम राजऋषि, स्वप्निल तिवारी, इरशाद खान ’सिकंदर’, के.पी. अनमोल, कुमार विनोद जैसे कुछ नाम हिन्दी ग़ज़ल की पावन यात्रा परम्परा में वे नये मुकाम हैं, जहाँ से हिन्दी ग़ज़ल ने अपनी नवीन दिशाओं की ओर रूख किया है। ज्ञानप्रकाश विवेक इन्हें नए समय का संज्ञान लेकर, नए इलाकों की खोज करने वाले, कल्पनाशीलता और कलात्मकता से भरपूर सम्भावनाओं की सृजनशील साहित्यिक सम्पदा कहकर इनका विशिष्ट विवेचन करते हैं। समकालीन साहित्य पर विवेक की गहरी दृष्टि यहाँ द्रष्टव्य है।

'हिन्दी ग़ज़ल की नयी चेतना' पुस्तक अपने 'कंटेट और कल्चर' दोनों ही दृष्टियों से महत्वपूर्ण बन पड़ी है। ज्ञानप्रकाश विवेक ख़ुद भी प्रख्यात ग़ज़लकार और कथाकार हैं। ग़ज़ल को ग़ज़ल की ही दृष्टि सम्पन्नता से कहना-सुनना-पढ़ना और समझना उन्हें बा-ख़ूबी आता है। जिन प्रश्नों को प्रस्तुत पुस्तक में विवेक उठाते हैं, उन्हें केवल वे प्रश्नमात्र ही नहीं बने रहने देना चाहते, बल्कि सार्थक विमर्श की सीढि़यों पर चढ़ते हुए कुछ ठोस वक्तव्य भी देना चाहते हैं। इन शायरों की ग़ज़लों की अन्तर्वस्तु की विेवेचना करते हुए वे यह बात भी ध्यान रखते हैं कि हिन्दी ग़ज़ल को समृद्धि करने में उस रचनाकार का क्या योगदान है। हिन्दी ग़ज़ल की सम्भावनाओं और साहित्यिक मूल्यों को दृष्टिगत रखते हुए लेखक ने कुछ विशिष्ट शेरों को उद्धृत किया है। यहाँ उसकी वस्तुनिष्ठता भी समादरणीय है। बिना किसी पूर्वाग्रह और दबाव के, परम्परा व प्रयोग की सरणि पर समाकलित और संतुलित ये ग़ज़लकार, ज्ञानप्रकाश विवेक की आलोचना दृष्टि का आलोक पाकर अपनी समग्रता में चमक उठे हैं। पुस्तक की भूमिका भी अपने आप में पठनीय है। प्रस्तुत अध्ययन का मूल उत्स है लेखक का ‘सकारात्मक दृष्टिकोण’।

अपनी भाषा शैली और प्रस्तुतिकरण में भी पुस्तक उपादेय है। हिन्दी ग़ज़ल के गूढ़ और व्याकरणिक ज्ञान को, सरलतम शब्दों और सार्थक विवेचना द्वारा ज्ञानप्रकाश विवेक भली-भाँति समझाने में सफल रहे हैं। ‘हिन्दी ग़ज़ल की नयी चेतना’ अपने नाम को सार्थक-सफल सिद्ध करती दिखती है। पुस्तक के सुंदर-आकर्षक मुद्रण हेतु ‘प्रकाशन-संस्थान’ भी बधाई का पात्र है।







समीक्ष्य पुस्तक- हिन्दी ग़ज़ल की नयी चेतना
रचनाकार- ज्ञानप्रकाश विवेक
विधा- आलोचना
प्रकाशक- प्रकाशन संस्थान, नई दिल्ली
संस्करण-
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- डाॅ. नितिन सेठी
 
रचनाकार परिचय
डाॅ. नितिन सेठी

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