प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अक्टूबर 2015
अंक -47

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

पुस्तक समीक्षा

संवेदनात्मक रचनाशीलता का अलग स्वर: विनोद कुमार

 

 

युवा लेखक राहुल देव का कहानी संग्रह ‘अनाहत एवं अन्य कहानियां’ मेरे हाथ में है। यह उनका पहला कहानी संग्रह है। पुस्तक के प्रारंभ में मोहन राकेश की ‘कहानी क्यों लिखता हूँ’ पढ़कर मुझे उनका वृहत उपन्यास ‘अँधेरे बंद कमरे’ का द्वंद्व भी याद आ गया, जिसे मैंने अपनी युवावस्था में पढ़ा था। मोहन राकेश जैसे लब्धप्रतिष्ठित, लोकप्रिय रचनाकार की बतकही कहानियों और भूमिका से पहले देकर एक सार्थक पहल की है क्योंकि हम अतीत से पोषक तत्व ग्रहण करते हैं, तभी नवसृजन होता है। किताब की पहली कहानी ‘मायापुरी’ के सन्दर्भ में लेखक स्वयं कहता है कि गौरापंत शिवानी की कहानी ‘सती’ पढ़कर उसने प्रेरणा प्राप्त की थी। अरस्तू ने पोएटिक्स में साहित्य को जीवन का एमिटेशन कहा है, फिर यह एमीटेशन की क्रिया चलती ही रहती है। नाइजीरिया का लेखक चिनुआ ऐचव एक अर्धाली उठाता है W. B. yeats की कविता से थिंग्स फाल ए पार्ट इस कविता का शीर्षक था सेकंड कमिंग लेकिन ऐचव पूरा उपन्यास लिख जाता है, इसी अर्धाली को शीर्षक बनाकर। अतः सृजन, पुनः सृजन तो साहित्य में स्वाभाविक है। कहानी अपने उद्देश्यपूर्ति में सर्वथा सफ़ल है।


‘विजया’ कहानी में संतानहीन युवा दंपत्ति रवि और सविता की पीड़ा का दर्शन है लेकिन अनाथ विजया का उनके जीवन में आना और सविता का प्यार लुटाना मूक-बधिर विजया मातृत्व से अपनाना लेकिन रवि की ईर्ष्या पढ़कर कामायनी के मनु की याद आ गयी क्योंकि जब श्रद्धा गर्भवती थी, उस हालत में मनु उसे छोड़कर इड़ा के प्रदेश में पहुँच जाते हैं क्योंकि इन्हें भी श्रद्धा के प्रेम पर एकाधिकार की आकाँक्षा थी। यह कहानी बाल मनोविज्ञान का अच्छा विश्लेषण प्रस्तुत करती है। विजया की असली माँ सुजाता का आना और विजया को अपना बनाने के लिए रवि और सविता पर दबाव बनाना लेकिन विजया का न जाना कहानी में द्वंदात्मक बिंदु हैं। द्वंद्व तो सविता और रवि के अन्दर भी है लेकिन विजया को मोनालिसा तक पहुंचा देना लेखक की कल्पना का सुन्दर रूप है।


‘परिणय’ कहानी का उद्देश्य भी अच्छा कहा जायेगा। लेकिन आज के परिवेश में वर-वधू एक दूसरे को देख नहीं पाये, यह थोड़ा आश्चर्य की बात है। एक आधुनिक लेखक शायद इस बिंदु पर कहीं चूक गया है क्योंकि आज की जिंदगी के यथार्थ से इसे समझना कठिन है लेकिन लेखक ने इस लुका-छिपी के खेल को ही तो कहानी का सस्पेंस बनाया है। संग्रह की अगली कहानी ‘नायं हन्ति न हन्यते’ गुरु-शिष्य परपरा की सफ़ल कहानी है। कहानी बड़े रुचिकर और प्रवाहपूर्ण ढंग से आगे बढ़ती है। कहानी में एक स्थान पर बच्चे अपने अध्यापकों के मजाकिया पूर्ण नाम रखते हुए बातें करते हैं। अध्यापकों के नामकरण आज भी जारी हैं अतः लेखक विद्यार्थियों की मनोवृत्ति का सूक्ष्म अध्येता है। मुख्य पात्र सत्यप्रकाश जो कि एक अध्यापक हैं, का चरित्र चित्रण कहानी का प्रतिपाद्य है। शीर्षक 'नायं हन्ति न हन्यते' है और यह कहानी एक दुखांत पर समाप्त होती है अतः कथावस्तु और शीर्षक के बीच विडंबना के तत्व आसानी से देखे जा सकते हैं।


अगली कहानी ‘परिवर्तन’ को मैं एक आंचलिक कहानी कहूँगा। इस कहानी में लेखक ने भाषा के स्तर पर नयापन दिखाया है। इस कहानी में अवधी भाषा का प्रयोग सार्थक ढंग से हुआ है, जिससे लगता है कि लेखक अवधी भाषा की गोद में सहज ही पला बढ़ा और विकसित हुआ है। यह कहानी ‘गद्यम कवीनाम निकषम वदन्ति’ की उक्ति को भी दर्शाती है। ‘परिवर्तन’ एक श्रेष्ठ कहानी है। कथावस्तु और वर्ण्य विषय वस्तु की दृष्टि से भारत आज़ाद तो हो गया लेकिन रामधेनु को रामू, रमुआ महज इसलिए पुकारा जाता है और जिसका दिल करता है उस पर हाथ साफ़ करता है। गाँव की कहावत है कि ‘निबरेक जोइया सबकी सरहज’ लेकिन रामधेनु जब शक्तिशाली हो जाता है और सेना की सर्विस पा गया तो उच्च वर्ग के द्वारा उसकी खुशामद समाज के दोगलेपन का अच्छा उदाहरण दे जाती है। ‘एक टुकड़ा सुख’ कहानी के मुख्य चरित्र लालचंद की आरामतलबी लेखक को कष्ट दे रही है। उनके भोलेपन में उनका लुटते जाना लेखक का मानसिक द्वंद्व बनता है और पन्नों पर कहानी बनकर उतरता गया है। लालचंद की अकर्मण्यता से लेखक को पीड़ा होती है लेकिन लालचंद के मानवीय संवेदन को प्रस्तुत करके लेखक विरेचन की सुखानुभूति करता है। सन 1972-73 के दौरान स्व. श्रीमती इंदिरा गाँधी ने गरीबी हटाओ का नारा लगाया था। 2014-15 में प्रधानमंत्री मोदी भी गरीबी और गरीब के बारे में व्याख्यान दे रहे हैं। लेखक राहुल जिस गरीबी का चित्रण कर रहे हैं, उसे पढ़कर मुंशी प्रेमचंद की पंक्तियाँ याद आती हैं, “लेखक राजनीतिज्ञों के पीछे चलने वालों के जुलूस में नहीं होता बल्कि वह राजनीति के आगे मशाल लेकर चलने वाला राही होता है।”


‘हरियाली बचपन’ कहानी को मार्क्सवादी आलोचक अपनी दृष्टि से देखने को स्वतंत्र हैं लेकिन वस्तुतः इस गरीबी और फटेहाली को बिना किसी चश्मे के भी समझा जा सकता है। राहुल ने एक यथार्थवादी दृष्टि से यह कहानी लिखी है। रूप का लावण्य गरीबी का आभूषण है या गरीबी में एक समस्या है। लेखक में इस मर्मान्तक व्यथा का भावन उचित अनुपात में है। इस कहानी को पढ़कर निराला की भिक्षुक, तोड़ती पत्थर आदि कविताओं की स्मृति भी आ जाती है। आज भी शाइनिंग इंडिया के बाद मेकिंग इंडिया के युग तक उन गरीबों का बचपन और किशोरावस्था आहत और निरादृत है, अतः लेखक खुली आँखों से जिंदगी को करीब से देख रहा है और यह किसी भी लेखक की असली पूँजी होती है। ‘अनाहत’ कहानी को लेखक ने अवश्य अधिक महत्त्वपूर्ण समझा होगा क्योंकि पुस्तक के शीर्षक में उसे आदृत स्थान प्राप्त हुआ है। आजकल की प्राइवेट नौकरी में किस तरह एक युवक प्रशांत मानसिक दबाव झेलता है, उस बिंदु से कहानी की शुरुआत है। बाज़ारवाद के इस दौर में टारगेट, एम्बीशन, अचीवमेंट आदि शब्दों से अर्थमानव की सर्जना हो रही है- इस ओर भी सांकेतिक अभिप्राय कहानी देती है। ये तीनों शब्द केवल आर्थिक उन्नति से जोड़कर देखने लगा है। आज का समाज जो अंधी दौड़ का संकेत है। ‘अनाहत’ अनुषा और प्रशांत के असफल प्रेम की कथा है लेकिन फिर भी अव्यक्त प्रेम की पीड़ा की सुगंध गुलाब की पंखुड़ियों को सहेजकर लेखक ने व्यक्त की है। इस कहानी को समझने ले किये राष्ट्रकवि दिनकर की एक पंक्ति “गीत-अगीत कौन सुन्दर है?” या जॉन कीट्स ने Ode on a gracian urn में लिखी गयी पंक्ति भी याद आती है Heard are sweet but those unheared are sweeter. अब प्रश्न है कि जो कहा गया वह सुन्दर है या जो कहा नहीं जा सका वह सुंदर है? जो देख लिया गया वह सुन्दर है या जो नहीं देखा जा सका वह सुन्दर है। हद के बाहर कबीर का अनहद है। सच तो यह जिसे दुनिया स्वीकार नहीं कर पाती, जिसे मानव या मानवी व्यक्त नहीं कर पाते, वह सबकुछ सुन्दरतापूर्वक युगों से साहित्य की गोद में पलता रहा है और लेखक ने उसी परम्परा में अपना नाम ‘अनाहत’ कहानी लिखकर जोड़ लिया है।


संग्रह की अंतिम कहानी ‘रॉंग नंबर’ बहुत ही मर्मस्पर्शी कहानी है। मोबाइल का क्रेज़ और उसके प्रति सनक की हद तक चाहत आज के शिष्य, किशोर, युवा और कुछ वृद्धों तक में भी दिखाई देती है और उसे लेखक ने जफ़र के माध्यम से उकेरा है। गरीबी से उठकर बिगडैल, चोर, लफंगा और फिर जफ़र का सुधरना- उसे लेखक बड़े सहज और वास्तविक ढंग से लिख ले गया है। यह कहानी एक बार प्रेमचंद की आदर्शोन्मुख यथार्थवाद की अवधारणा को आधुनिक परिप्रेक्ष्य में साकार करती है और एक पाठक के रूप में कोई भी अच्छा अध्येता या समीक्षक जफ़र के इस हृदय की अच्छाई को एक आशा की किरण की तरह देखेगा कि Every clould has a silner lining- दूसरी बात है कि इस महास्वार्थमय आधुनिक बिगड़े हुए समाज से जफ़र नाम के चरित्र से भलाई करवा लेना लेखक के चरित्र चित्रण की शिल्पगत विशेषता भी मान सकते हैं। इस युवा कथाकार की कहानियों को अवश्य पढ़ा जाना चाहिए।





समीक्ष्य पुस्तक- अनाहत एवं अन्य कहानियां (कहानी संग्रह)
लेखक- राहुल देव
प्रथम संस्करण- नवम्बर, 2014
पृष्ठ-80
मूल्य- 60/-
प्रकाशक- बोधि प्रकाशन, जयपुर


- विनोद कुमार
 
रचनाकार परिचय
विनोद कुमार

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