सितम्बर - अक्टूबर 2019 (संयुक्तांक)
अंक - 53 | कुल अंक - 54
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

आलेख/विमर्श
मिजोरम : प्रकृति का अछूता सौन्दर्य
- वीरेन्द्र परमार
 
मिजोरम एक छोटा पर्वतीय प्रदेश है। मिजो का शाब्‍दिक अर्थ पर्वतवासी है। "मिजोरम" शब्द 'मि' (लोग),  'जो' (पहाड़ी) और 'रम' (भूमि) के संयोग से बना है और इस प्रकार मिजोरम का अर्थ है- 'पहाड़ी लोगों की भूमि'। मिजोरम उत्तर–पूर्वी भारत का एक महत्वपूर्ण राज्य है। इसके पश्चिम में बांग्लादेश और त्रिपुरा तथा पूरब एवं दक्षिण में म्यांमार हैं। इसके उत्तर में मणिपुर और असम की सीमा है। सामरिक दृष्टि से यह प्रदेश विशिष्ट महत्व रखता है क्योंकि लगभग 650 मील की सीमा म्यांमार एवं बांग्लादेश को स्पर्श करती है। इस क्षेत्र को पहले लुशाई हिल्स के नाम से जानते थे। बाद में लुशाई हिल्स का नाम परिवर्तित कर इसे मिज़ो हिल्स नाम दिया गया। 21 जनवरी, 1972 को इसे केन्द्रशासित प्रदेश घोषित किया गया। 20 फ़रवरी 1987 को मिजोरम को भारत का 24 वां राज्य बनाया गया। इसका कुल क्षेत्रफल 21,087 वर्गकिलोमीटर तथा 2011 की जनगणना के अनुसार कुल जनसंख्या 10,91,014 है, जिनमें पुरुष 5,52,339 एवं महिला 5,38,675 हैं। जनसंख्या का घनत्व प्रति वर्गकिलोमीटर 52 है। लिंग अनुपात प्रति 1000 पुरुषों पर महिलाओं की संख्या 975 है। मिजोरम की साक्षरता 91.58 प्रतिशत है। मिजोरम की राजधानी आइजोल है। अन्य प्रमुख शहर हैं- चम्फई, लुंगलेई, कोलासिब, सरछिप आदि। मिजोरम में राल्‍ते, पाइते, पोई, सुक्‍ते, पंखुप, बाइते, चकमा, पंग, लखेर, लुसेई इत्‍यादि जनजाति के लोग रहते हैं। मिजो इस प्रदेश की मुख्‍य भाषा है। यहाँ की अन्य भाषाएँ हैं– जाहू, लखेर, हमार, पाइते, लाई, राल्ते, रियांग इत्यादि। 19 वीं शताब्दी में ईसाई मिशनरियों के प्रभाव के कारण मिजोरम में ईसाई धर्म का तेजी से प्रसार हुआ और अब इस प्रदेश की अधिकांश आबादी ईसाई धर्म ग्रहण कर चुकी है। चपचर कुत, मिम कुत और थालफवांग कुत मिजोरम के प्रमुख त्योहार हैं। मिजोरम के सभी समुदायों में लोकसाहित्य की उन्नत परंपरा विद्यमान है। लोकगीत की दृष्टि से मिजोरम का समाज पूर्वोत्तर के अन्य समुदायों से विशिष्ट है। मिज़ो लोकगीत मात्रा एवं गुणवत्ता की दृष्टि से विशाल व विविध आयामी हैं।
 
प्रदेश में लगभग 100 प्रकार के लोकगीत प्रचलित हैं, जिन्हें दस वर्गों में विभक्त किया जा सकता है:
बाव हला : यह मिजोरम का युद्धगीत है। जब कोई योद्धा अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त करता है तो ‘बाव हला’ गाकर अपनी विजय का शंखनाद करता है। योद्धा इन गीतों के द्वारा अपने साहस और शौर्य का प्रदर्शन करता है तथा अपने लोगों को अवगत कराता है कि उसने दुश्मन को पराजित कर दिया। शत्रु को मारनेवाला योद्धा ही बाव हला गाने का पात्र है, युद्धक दल के अन्य सदस्य नहीं।
ह्लादो : यह शिकार सम्बन्धी गीत है I शिकारियों द्वारा शिकार में सफलता प्राप्त करने पर ‘ह्लादो’ गाया जाता है I इसका गायन आखेट स्थल पर भी किया जा सकता है, घर आते समय मार्ग में भी तथा विजय उत्सव के अवसर पर भी I 
थियम हला और दवी हला : यह अनुष्ठान के अवसर पर गाए जानेवाले लोकगीत हैं जिसका गायन पुजारियों एवं जादू- टोना करनेवाले लोगों द्वारा किया जाता है I 
दर हला : दर हला का नामकरण एक वाद्ययंत्र के नाम पर किया गया है I संख्या और लोकप्रियता की दृष्टि से ‘दर हला’ मिज़ो समाज में सर्वाधिक पसंद किये जानेवाले लोकगीत हैं I 
पुईपन हला : आनंद और उत्सव के अवसर पर ‘पुईपन हला’ गाए जाते हैं I 
लेंगजम जई : ये मिज़ो समाज के प्रेम गीत हैं I इनका कोई सुनिश्चित रूप विधान नहीं है परन्तु इन गीतों में प्रणय निवेदन, आत्म बलिदान और आत्म समर्पण की प्रबल भावना होती है I 
आदिवासी समूहों के नाम पर आधारित गीत : मिज़ो समाज में आदिवासी समूहों के नाम पर आधारित गीत भी पर्याप्त संख्या में उपलब्ध हैं I 
गाँव के नाम पर आधारित गीत : मिजोरम में कुछ ऐसे गीत प्रचलित हैं जिनका नामकरण किसी गाँव विशेष के नाम पर किया गया है I
आवाज अथवा ध्वनि पर आधारित गीत : मिजोरम में अनेक गीतों का नामकरण पशु- पक्षी अथवा किसी वाद्य यंत्र की आवाज के आधार पर किया गया है I  
व्यक्ति के नाम पर आधारित गीत : मिजोरम में व्यक्ति विशेष के नामों पर आधारित गीतों की प्रचुरता है I इस प्रकार के अधिकांश गीतों का नामकरण किसी रचयिता के नाम पर किया गया है I कुछ गीतों का नामकरण किसी सुन्दर महिला अथवा पराक्रमी पुरुष के नाम पर भी किया गया है I
 
यहाँ का समाज लोकनृत्यों के माध्यम से अपनी कोमल भावनाओं को अभिव्यक्त करता है I यहाँ युद्ध नृत्य, त्योहार नृत्य,स्वागत नृत्य की उन्नत परंपरा है I चेरव मिज़ो समाज का रंगारंग नृत्य है I इसे बांस नृत्य भी कहा जाता है I इस नृत्य में छह – छह लड़कियों के दो समूह होते हैं I सभी लड़कियाँ पारंपरिक परिधान धारण कर नृत्य करती एवं गीत गाती  हैं I यह मिजोरम की सर्वाधिक लोकप्रिय नृत्य शैली है I सामुदायिक उत्सव के अवसर पर किसी विशिष्ट अतिथि के स्वागत में खुल्लम नृत्य प्रस्तुत किया जाता है I यह नृत्य भी अन्य नृत्यों की भांति समूह में प्रस्तुत किया जाता है I चावल से बनी मदिरा पीने के बाद संध्या के समय चेईलम नृत्य प्रस्तुत किया जाता है I इस नृत्य में यौवन की उमंग और भरपूर मस्ती होती है I खललाम त्योहार नृत्य है जो पूरी रात चलता है एवं इसमे लडके -लड़कियाँ सभी भाग लेते हैं I इस नृत्य में ऊर्जा, उत्साह और उत्तेजना सबकुछ होता है I जु पार्टी में भी नृत्य-गीत प्रस्तुत किये जाते हैं I जु मिजोरम की चावल निर्मित मदिरा का नाम है जिसका सेवन सभी प्रकार के आयोजनों में अनिवार्य रूप से किया जाता है I लोककथाओं के लिए मिजोरम की भूमि अत्यंत उर्वर है I कहानियों में कल्पनाशीलता, मौलिकता और सृजनशीलता का मणिकांचन संयोग है I यहाँ सुखांत और दुखांत दोनों प्रकार की लोककथाएं मिलती हैं I इन लोककथाओं का संसार बहुत व्यापक है I अन्य समाजो की तरह मिजोरम में भी लोकनायक - नायिकाओं की कहानियां प्रचलित हैंI मिज़ो लोककथाओं का सबसे लोकप्रिय पात्र छुरबुरा है जिसे छुरा भी कहते हैंI कुछ लोग इसे बुद्धिमान मानते हैं तो कुछ लोग मूर्ख I वह घर – घर में लोकप्रिय परन्तु विरोधाभासी चरित्र है I उसके भाई का नाम नहाइया है जिसे लोग ना – आ भी कहते हैं I छुरा का अपने भाई से बहुत प्रेम था I दोनों भाइयों के बारे में अनेक कथाएँ प्रचलित हैं I दोनों के बीच घर तथा झूम खेतों की अदला – बदली की कहानियां, छुरा की लम्बी यात्रा की कहानियां, छुरा की मृत्यु सम्बन्धी कहानियां मिजोरम के घर – घर में प्रचलित हैं I कुछ कथाओं में वर्णित है कि छुरा की मृत्यु लम्बी यात्रा के दौरान हुई जबकि कुछ कहानियों के अनुसार मृत्यु के समय वह ग्राम प्रधान के पद पर कार्यरत था I इसी प्रकार मिजोरम में अनाथ लियनडोवा और उसके भाई की कथा, तुवलउंगी और जालपाला की कथा भी प्रचलित है I    
 
मिज़ो समाज में मिथकों की समृद्ध परंपरा है I प्रदेश के सभी समुदायों में अपने देशांतरगमन, पूर्व पुरुषों तथा ईश्वरीय प्रतीकों के सम्बन्ध में भिन्न- भिन्न मिथक प्रचलित हैं I यहाँ वन एवं वन्य- प्राणियों से सम्बंधित लोककथाओं और मिथकों का बाहुल्य है I पूर्वोत्तर के अन्य आदिवासी समूहों की तरह मिज़ो मिथकों में भी सृष्टि, पेड़, पर्वत, जल, मानव, पशु- पक्षी, जीव- जंतु आदि की उत्पत्ति की कथा वर्णित है I मिज़ो लोगों का विश्वास है कि उनकी उत्पत्ति एक गुफा से हुई है I ऐसी मान्यता है कि एक गुफा (चिनलुंग ) से इनके पूर्वजों की उत्पत्ति हुई I उस गुफा से एक – एक कर मानव प्रकट हुए लेकिन जब गुफा से एक राल्ते दम्पति बाहर आया तो इतनी तीव्र गर्जना हुई जिससे गुफा के संरक्षक(ईश्वर) भयभीत हो गए I उन्हें लगा कि मनुष्य की जनसंख्या अधिक हो गई है, इसलिए उन्होंने पत्थर से गुफा-द्वार बंद कर दिया I  इसके उपरांत पृथ्वी से मानव की उत्पत्ति का सिलसिला बंद हो गया I माना जाता है कि मिजोरम में अभी भी वह गुफा मौजूद है परन्तु कोई व्यक्ति वहां जाने का साहस नहीं करता है I मिजोरम रहस्य, रोमांच और मिथकों की भूमि है I धुंध से आच्छादित चोटियाँ, घने जंगल, हरित घाटी, कल –कल करते जलप्रपात और अखंड शांत वातावरण हमें रहस्य लोक में ले जाने के लिए पर्याप्त है I 
 
मिजोरम में प्रचलित कुछ लोकोक्तियों अथवा कहावतों का हिंदी अनुवाद 
# बुरी आदतों एवं गलतियों को सुधारा जा सकता है पर कुरूपता का कोई इलाज नहीं I
# अच्छे पेड़ में अच्छा फल, बुरे पेड़ में बुरा फल I 
# नया राजा, अत्याचारी राजा I 
# अपराधी बचे, निर्दोष फंसे I
# बड़ों के निर्देशों का विरोध उचित नहीं I 
# बुरी पत्नी और बुरे बाड़ को बदल देना चाहिए I
# इतना धीरे चलो जैसे बड़ा सर्प चलता हो I 
# मौसम और बच्चों के जन्म के समय की सटीक जानकारी संभव नहीं I
# घर में प्रवेश करने से पहले आवाज दो I
# छोटे कंकड़ की सहायता के बिना कोई बड़ी चट्टान स्थिर नहीं हो सकती।
# मानव अपना दुश्मन स्वयं है।
# बैल के भागने के बाद गेट बंद करना मूर्खता है अर्थात रोकथाम इलाज से बेहतर है।
# जो तुम आज कर सकते हो उसे कल के लिए मत छोड़ो I
# बुरे काम करने वाले अपने औजार को दोष देते हैं।
# बुद्धिमान व्यक्ति अपने ज्ञान के सभी फल नहीं खा सकता है और मूर्ख व्यक्ति अपनी मूर्खता की कीमत नहीं चुका सकता है।
# दोषियों के बजाय निर्दोष को दंड ।
# अच्छी सड़क ऊंची होती है और खराब सड़क समतल होती है अर्थात अच्छाई की तुलना में बुराई करना आसान है।
 
 

- वीरेन्द्र परमार