प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
सितम्बर - अक्टूबर 2019 (संयुक्तांक)
अंक -53

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कविता-कानन

वो आवाज़

याद है तुम्हें
कभी किसी पहाड़ पर
जहाँ एक ओर थी
गहरी हरी घाटियाँ
इंतज़ार करते-करते तुम्हारा
दी थी आवाज़ तुम्हें
और फिर देखा था
चहुँओर
कहीं देख न ले कोई
कहीं सुन न ले कोई
और हो गई आश्वस्त
और सकुचाई-सी
फिर से
करने लगी इंतज़ार
लेकिन यह क्या
अचानक ही
गूँजने लगी घाटियाँ
लेकर तुम्हारा नाम
बार-बार, लगातार
और यूँ सुन लिया था तुमने
वो गूँज फैल गयी थी परबत पर
परबत से होकर
उतर आई मैदानों में
नदिया किनारे
और बह चली पवन संग
आ पहुँची स्वर्ण धरा पर
बिखर गई मरु गीत बन
रम गई झीलों के निर्मल जल में
और फिर सूरज की किरणों संग
उड़ चली गगन में
बन गई बादल
और बरस गई तन-मन पर
भिगो गई जाने कितने मन
प्रेम रस-रंग में
वो एक आवाज़
जो गूँजी थी
कभी परबत पर


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नेह गीत

रात
अमावस की
चाँद से दूर
रचती, गाती
विरह गीत
दर्द जगाती
विरहन मन में
बीता बिरहा
आई पूनम
रात ने छेड़ा
गीत मिलन का
तारों ने छेड़े साज
चाँद ने सुना
चाँदनी के संग
उतरा धरा पर
प्रेम गीत
बिरहन के मन में
उपजी आस
सूने मन में
हुआ उजास
रात संग गाया
नेह गीत
सृष्टि के कण-कण ने


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अहसास

पेड़ को अहसास तो होता ही होगा
पतझड़ का
जब हवा चलने पर भी
नहीं होती सरसराहट
दिल के नज़दीक
सुनाई देती है तो बस
सूखे पत्तों की खड़खड़ाहट
नहीं चहचहाती गौरैया
नहीं गाती कोयल
नहीं खेलते बच्चे आँख मिचौनी
छुप कर शाखाओं में
नहीं दौड़ती गिलहरी डालियों पर
एक अजब सी सांय-सांय
अहसास तो कराती ही होगी न
पेड़ को पतझड़ का


- नीलम पारीक
 
रचनाकार परिचय
नीलम पारीक

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कविता-कानन (1)