सितम्बर - अक्टूबर 2019 (संयुक्तांक)
अंक - 53 | कुल अंक - 54
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कविता-कानन

प्रेम का नियम

मैंने किया है प्रेम
उस सिद्धांत के परे
अनगिनत बार
कि जिसके अनुसार
प्रेम सिर्फ एक बार होता है
इस नियम के विपरीत
कि प्रेम सिर्फ देने का नाम है
मैंने प्रेम किया इस आशा में
कि मैं भी प्रेम-पात्र बन जाऊँ
जब भी प्रेम घट रीता
नयनों की जलराशि सूखी
प्रेम की पिपासा
फिर से खींच ले गई
मुझे समुद्र की ओर
और अंजुलि में भर लिया
मैंने अपने हिस्से का प्रेम
पीकर माथे से लगाकर
फिर से प्रार्थना की
कि मेरे जीवन में
अब निर्वात मत देना
ओ अथाह प्रेमपुंज!
फिर से प्यास मत देना
यदि दो तो बचा रखना
अंजुलि भर जल मेरे लिए
जब-जब अन्तस में
धूल भरे बवंडर उठेंगे
मैं फिर से आऊँगी
तेरे ही घाट पर
तोड़ूंगी एक और
प्रेम का नियम।


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यूँ ही तो कुछ भी न हो

बस यूँ ही तो कुछ भी न हो
कुछ होने के पीछे
कुछ न कुछ तो होता है
चाहे हम समझें, न समझें
नेपथ्य प्रेम के एक कारण तो होता है
आसमान में छाने वाले
वो काले-काले से बादल
कितनी जलराशि लाते हैं
किंतु भूमि का मर्म समझकर
जो जल परतों से धीरे-धीरे रिसता है
स्थान वही धरा के अंतस में पाता
बाकी जल यूँ ही व्यर्थ होता है
बस इतना-सा व्याकरण है
प्रेमशास्त्र के ग्रंथों में
मन की गाँठें खोल सके जो
हृदय वही मन भाता है
बाकी चेहरों से आकर्षण हो सकता
जिसकी प्रकृति क्षणभंगुर है
संवेदनाएँ झंकृत यदि न हों तो
प्रेम नहीं हो सकता है।


- वर्षा श्रीवास्तव अनीद्या

रचनाकार परिचय
वर्षा श्रीवास्तव अनीद्या

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