प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
सितम्बर - अक्टूबर 2019 (संयुक्तांक)
अंक -53

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ग़ज़ल-गाँव

ग़ज़ल-

चला तो जाऊँगा लेकिन निशानी छोड़ जाऊँगा
मैं दरिया की तरह नक्शे-रवानी छोड़ जाऊँगा

मिज़ाज अपना बदल पाना मेरे बस में नहीं सो मैं
फ़ना होकर तेरी आँखों में पानी छोड़ जाऊँगा

तो फिर उजड़ी रियासत को सँभालोगे भला कैसे
अगर मैं भी किसी दिन राजधानी छोड़ जाऊँगा

तुम अपनी याद से फिर किस तरह उसको मिटाओगे
मैं वर्क़-ए-दिल पे जो ज़िंदा कहानी छोड़ जाऊँगा

तुम्हारे जिस्म से आती रहेगी उम्र भर ख़ुशबू
तुम्हारी साँस में वो रातरानी छोड़ जाऊँगा


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ग़ज़ल-

कुछ ज़माने से सवालात करूँ या न करूँ
अपना इज़हारे-ख़यालात करूँ या न करूँ

मैं जो बोला तो ज़रा तल्ख़ भी हो सकता हूँ
मुझको बतलाओ कि फिर बात करूँ या न करूँ

इतने आँसू कि ख़ुदा पूछ रहा है मुझसे
अब तेरे शहर में बरसात करूँ या न करूँ

झाँक आया हूँ मैं कुछ ख़ौफ़ज़दा आँखों में
और डरता हूँ शिकायात करूँ या न करूँ

कशमकश है कि मैं मासूम परिंदों पे अभी
ज़ाहिरा गर्दिशे-हालात करूँ या न करूँ


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ग़ज़ल-

इबारत लिख गयी बहती हुई शहतीर पानी पर
दिखाई दे रही है साफ़ इक तहरीर पानी पर

किफ़ायत से इसे ख़र्चो ज़ियादा है नहीं पानी
वगरना एक दिन तन जाएँगी शमशीर पानी पर

इसे दुनिया की सबसे क़ीमती शै मान लेना तुम
मुनहसर है समूची क़ौम की तक़दीर पानी पर

बता 'पानी रे पानी' क्यूँ तेरी आँखों में पानी है
तेरे आँसू न ले आएँ कोई तग़ईर पानी पर

जो हमने मुल्क की ख़ुशहालियों के ख़्वाब देखे हैं
ये मुमकिन है कि मिल जाए उन्हें ताबीर पानी पर

मैं पानी को किसी सूरत भी ज़ाया कर नहीं सकता
मुझे बस 'दीप' दिखती है तेरी तस्वीर पानी पर


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ग़ज़ल-

मुहब्बत में ज़रा-सा रास्ता हार्डर चुना मैंने
तुम्हारे गेसुओं की छाँव में फ़्यूचर चुना मैंने

मेरा इन्ट्रेस्ट तो साइंस पढ़ने में बहुत था पर
तुम्हारे साथ की ख़्वाहिश में लिट्रेचर चुना मैंने

मुझे यूँ तो बिछौने नर्म फूलों के मयस्सर थे
मगर ज़ेरे-मुहब्बत ख़ार का ऑफ़र चुना मैंने

बहुत मिलता है तेरे नाम के हर्फ़े-रवी से जो
तुझे जी भर के सोचा फिर ये सिग्नेचर चुना मैंने

खड़ा हूँ सर झुकाए 'दीप' उल्फ़त की अदालत में
और हिम्मत देखिए क़ातिल को बैरिस्टर चुना मैंने


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ग़ज़ल-

जब भी कोई पैकर देखो
पहले उसके तेवर देखो

मंज़र तक जाने से पहले
मंज़र का पस-मंज़र देखो

जीने का है एक सलीक़ा
अगले पल में महशर देखो

जिसकी छह-छह औलादें हैं
वो वालिद है बेघर देखो

जिस मिट्टी में होश सँभाला
उसमें अपना मगहर देखो

पहले सूरत देखो उसकी
फिर हाथों के पत्थर देखो

जिस रस्ते पर चला कबीरा
उस रस्ते पर चलकर देखो


- भरत माथुर दीप
 
रचनाकार परिचय
भरत माथुर दीप

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ग़ज़ल-गाँव (1)