सितम्बर - अक्टूबर 2019 (संयुक्तांक)
अंक - 53 | कुल अंक - 55
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

संदेश-पत्र
प्रिय सखा 
               कल्पित 
                            .....चुम्बकीय  शब्दों के...जादूगर,  लेखक क्या कहूँ....तुमने तो चंद पंक्तियाँ लिख कर प्यार की सम्पूर्ण गहराई को मुझे समझा दिया और मेरे आँचल को न जाने कितने ही आत्मिक स्नेह के फूलों से भर दिया।
सच कहूँ तो इतना स्नेह पाकर एक बार फिर से ज़िन्दग़ी खिलखिलाने और गुनगुनाने लगी। मन को कितने राग मिल गये। मन को मनचाहे सुर मिल गये....जानते हो न! जीवन में मनचाहा सुर मिलना ही मुश्किल होता है। इस मनचाहे सुर के बगैर जीवन बड़ा ही बेसुरा होता है।
सच तो ये कि अब तक कितना कुछ लिख चुकी तुम्हारे लिये...कभी कहानियाँ तो कभी कवितायें पर तुम्हारी चंद पंक्तियों के आगे मेरा लिखा सब छू-मंतर हो गया।
 
तुम्हारा लिखा, गायत्री मंत्र के श्लोक सा पवित्र है जो मेरे जीवन में ऊर्जा भर देता है। मैं जब भी कमज़ोर पड़ती हूँ न....बस तुम्हारी लिखी चंद पंक्तियाँ पढ़ लेती हूँ। वो कहते हैं न....गीता के पूरे अठारह अध्याय पढ़कर जो बात समझ नहीं आती.....वो दो पंक्तियों में लिखा गया श्लोक, गीता के सार को समझाने के लिए काफी होता है। बस ऐसा ही कुछ तुमने लिख दिया है। वेदों और पुराणों में लिखी हुई बातों में जो पवित्रता होती है, जो अकाट्य सत्य मिलता है वो ही तुम्हारी इन पंक्तियों में निहित है। सच ही कहा...प्यार अर्पण नहीं समर्पण है,प्यार बंधन नही स्वच्छंद है, प्यार पूजा और अर्चना नहीं..... आराधना है।  सोचती हूँ, इन पंक्तियों को किसी सिन्दूरी पन्ने पर अनार की कलम से लिखकर, थोड़ा रोली और चावल के संग एक पुड़िया बना, लाल और सफेद मोली के धागों में पिरो के इसको ताबीज़ बनाकर अपने हाथ पर बाँध लूँ।
 
एक अरसे बाद ज़िन्दग़ी में इतना स्नेह मिला है। पर फिर सोचती हूँ, कभी ये कहीं खुल के गिर गया और....ये खुशियों का ताबीज़ अगर किसी अजनबी को मिल गया और उसने बाँध लिया तो... फिर क्या होगा?
ना रे! मैं तो ऐसा बिल्कुल भी न सह पाऊँगी। पता है तुमने मन की न जाने कितनी उलझनों को सुलझा दिया है।
ओ मेरे रहस्यमय जादूगर लेखक! काश! मैं तुम्हारे पास होती....पता है मै तुम्हारा हाथ थामे बहुत देर तक तुम्हें देखती रहती और गले से लगकर एक बार तुम्हारी आवाज़ में इन पंक्तियों को सुनाने की जिद्द कर बैठती। आवाज़ के जिक्र से देखो न, वो सारे गाने याद आ गये जो अक्सर मुझे सुनाया करते हो।
वैसे मेरे जादूगर लेखक तुम्हारी आवाज़ भी जादुई है। केवल जादुई ही नहीं उसमें भरोसे की गूँज भी शामिल है। भरोसा केवल एक शब्द ही नहीं है ये दो अजनबी लोगों को जोड़ कर रखता है, ये रिश्ते निभाने की वजह बनता है। जैसे हम दोनों को....एक ख़ूबसूरत दोस्त के रूप में। सच कहूँ, तुम तो बड़े ही शब्दों के जादूगर निकले  रे.... और मैं बिल्कुल बावरी!
                           तुम्हारी 
                                   कल्पना 

- आराधना जोशी

रचनाकार परिचय
आराधना जोशी

पत्रिका में आपका योगदान . . .
संदेश-पत्र (1)