सितम्बर - अक्टूबर 2019 (संयुक्तांक)
अंक - 53 | कुल अंक - 55
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

फ़िल्म समीक्षा

सही जगह वार करती 'ड्रीम गर्ल' 

 


बैनर : बालाजी टेलीफिल्म्स लि.
निर्माता : एकता कपूर, शोभा कपूर
निर्देशक : राज शांडिल्य
संगीत : मीत ब्रदर्स
कलाकार : आयुष्मान खुराना, नुसरत भरूचा, अन्नू कपूर, मनजोत सिंह, विजय राज


आयुष्मान खुराना अभिनीत फिल्म 'ड्रीम गर्ल' का निर्देशन किया है राज शांडिल्य ने। जो कपिल शर्मा के लिए कई शो लिख चुके हैं। कपिल की शो की सफलता का आंकलन करते समय राज ने संभवत: इस बात पर भी विचार किया होगा कि इस शो में पुरुष, महिला पात्रों में नजर आते हैं और यह बात दर्शकों को बेहद अच्‍छी लगती है।
इसी बात को उन्होंने अपनी फिल्म 'ड्रीम गर्ल' में आगे बढ़ाया है। इस फिल्म का हीरो, कॉल सेंटर में लड़की की आवाज में 'प्यार-मोहब्बत' भरी बातें पुरुषों से करता है।


आपको याद हो कि नही लेकिन एक समय अखबारों में ‘मीठी बातें कीजिए’ वाले विज्ञापन आया करते थे। जहाँ  ढेरों नंबर लिखे होते थे और जिन पर लगने वाली कॉल रेट भी बड़ी महंगी हुआ करती थी। जहाँ लोग किसी मीठी आवाज़ वाली लड़की से बात किया करते थे। ऐसे ही एक ‘फ्रेंडशिप कॉल सेंटर’ में काम करता है करम उर्फ़ पूजा। तो फ़िल्म की कहानी कुछ इस प्रकार है कि करमवीर सिंह यानी (आयुष्मान खुराना) बचपन से लड़कियों की आवाज में बात करने में माहिर है। इसलिए नाटक में भी उसे सीता का रोल मिलता है। बेरोजगार करमवीर एक कॉल सेंटर में नौकरी करता है जहाँ वह आवाज बदल पूजा बन जाता है और फोन कॉल्स पर पुरुषों से मीठी-मीठी बातें करता है।

इसी बीच करम को माही (नुसरत भरूचा) से प्यार भी हो जाता है, लेकिन उसे करम यह नहीं बताता कि वह क्या करता है। उसे लगता है कि उसकी यह बात सामने आ जाएगी तो माही उसे ठुकरा देगी। इधर दूसरी और पूजा की आवाज के सैकड़ों लोग दीवाने हो जाते हैं। उससे मोहब्बत करने लगते हैं और कुछ तो शादी के लिए उतावले हो जाते हैं। करम की मुसीबत तब और बढ़ जाती है जब उसके आस-पास के ही लोग उस पर मर-मिटने लगते हैं।
 

राज शांडिल्य और निर्माण डी. सिंह द्वारा लिखी इस फिल्म में कॉमेडी की भरपूर गुंजाइश थी क्योंकि यह आइडिया अनोखा है, लेकिन इस आइडिए का पूरी तरह इस्तेमाल फ़िल्म में नहीं हो सका है। फिल्म का पहला भाग कुछ तेजी और कुछ धीमी गति से आगे बढ़ता है। और करम का पूजा बनने तक सफर अच्‍छा लगता है लेकिन इसके बाद दूसरे भाग में फ़िल्म कॉमेडी और अपनी कहानी से भटकती हुई नजर आती है। इसलिए यह भाग पूरी फ़िल्म को कमजोर बनाता है। फ़िल्म का दूसरा भाग देखते समय महसूस होने लगता है कि लेखकों के पास अब संवाद और कॉमेडी का खजाना खाली होने लगा है। अब उनके पास देने को कुछ नहीं है। फ़िल्म के 'वन लाइनर' से फ़िल्म खिंचती सी चली जाती है।  
 
फ़िल्म में कई प्रश्नों के उत्तर अधूरे भी छोड़े जाते हैं मसलन करम की यह बात समझना मुश्किल है कि वह अपनी मंगेतर से यह बात क्यों छिपाता है कि वह कॉल सेंटर पर काम करता है। माही उसके साथ सगाई कर लेती है, यह जाने बिना कि करम काम क्या करता है? ये बात सिर के ऊपर से जाती है। अब इसमें दिमाग लगाना न तो निर्माता निर्देशक ने उचित समझा लेकिन भाई ये जनता है जो आपके किए कर्मों का फल ही आपको देगी।


आयुष्मान खुराना के अलावा विजय राज की बात करें तो उनकी शायरी वाले सीन भी खासा प्रभाव नहीं छोड़ पाते।  
राज शांडिल्य का निर्देशन औसत से बेहतर है। उन्हें कलाकारों का अच्छा साथ मिला इसलिए उन्होंने एक ठीक-ठाक फिल्म बना डाली।
आयुष्मान खुराना लगातार ऐसी फिल्म कर रहे हैं जो लीक से हटकर हैं। रंगीले बाप के रूप में अन्नू कपूर ने भी दर्शकों को जम कर हंसाया है। नुसरत भरुचा के पास करने को ज्यादा कुछ नहीं था। इसलिए उनकी एक्टिंग पर कुछ न बोला जाए तो ही बेहतर है।


विक्की डोनर,  शुभ मंगल सावधान, बधाई हो और आर्टिकल 15 जैसे गंभीर सब्जेक्ट के बाद अब अपने चिर-परिचित अंदाज में ड्रीम गर्ल फिल्म में एक बार फिर आयुष्मान खुराना हाजिर हुए हैं। बावजूद इन सबके ड्रीम गर्ल एक परफेक्ट मसाला कॉमेडी फिल्म जरूर कही जा सकती है। फिल्म देखते समय 'छिछोरे' फ़िल्म की यादें फिर से ताजा हो जाएगी। छिछोरे की तरह ही ये फिल्म भी क्लाइमैक्स में एक सोशल मैसेज देते हुए सही जगह पर वार करती नजर आती है।
फ़िल्म का संगीत व्याख्यायित करने योग्य नहीं है। फिर भी इसके एक दो गाने अच्छी धुन लिए हुए हैं और याद भी रहते हैं। जैसे ‘राधे-राधे’ या ‘इक मुलाकात’। जोनिता गांधी का गाया ‘दिल का टेलीफोन’ बहुत अच्छा लगता है। फ़िल्म का एक मराठी गाना ‘ढगाला लागली कळ’ प्रमोशन में तो इस्तेमाल किया गया था लेकिन फिल्म में उसका न होना अवश्य खटकता है।
 

अपनी रेटिंग 2.5 स्टार 
 

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मोटिवेशनल स्टोरी है 'छिछोरे'

 

 
कलाकार: श्रद्धा कपूर, सुशांत सिंह राजपूत, वरुण शर्मा, ताहिर भसीन, तुषार पांडे, प्रतीक बब्बर, सहर्ष शुक्ला, नवीन पोलिशेट्टी, शिशिर शर्मा आदि
निर्देशक: नितेश तिवारी
निर्माता: फॉक्स स्टार स्टूडियोज, साजिद नाडियाडवाला


हिंदी सिनेमा में खेल और मोटिवेशनल स्टोरीज पर आधारित कई फ़िल्में बनी हैं। साजिद नाडियाडवाला ऐसे निर्माता, निर्देशक हैं जिन्होंने ढेरों फिल्में बनाई हैं लेकिन 'छिछोरे' उन सबसे हटकर है। 'दंगल' के बाद बतौर निर्देशक नितेश तिवारी की ये अगली फिल्म है। दंगल ने कमाई के मामले में विश्व रिकॉर्ड बनाया था। लेकिन छिछोरे से ऐसी कोई उम्मीद रखना हानिकारक है।
नितेश तिवारी की खासियत है कि वे अपनी कहानियाँ खुद गढ़ते हैं। और बाकी के लोग उसमें खाद पानी डालते हैं नितेश का सिनेमा कहानियों में एक आम इंसान की भावनाएं लेकर आता है। 


फ़िल्म की कहानी श्रद्धा कपूर और सुशांत राजपूत पर ज्यादा टिकी हुई नजर आती है। सनद रहे कहानी में दो चार झोल भी हैं। कहानी है अन्नी, माया, सेक्सा, डेरेक, एसिड, मम्मी, वेबड़ा और रैगी की। इन मुख्य किरदारों के अलावा और भी किरदार हैं जो कहानी में रंग भरने आते हैं। कॉलेज लाइफ की कहानी है तो कॉलेज में जूनियर्स और सीनियर्स का गैंग भी फ़िल्म में है। कॉलेज के हॉस्टलों में  होने वाली मस्तियाँ, लड़ाई आदि सब कुछ इस फ़िल्म में नजर आता है। फ़िल्म में एच 4 हॉस्टल लूजर्स का है तो वहीं एच 3 विनर का। कारण ये कॉलेज में होने वाले खेल में हमेशा आगे रहते हैं। दो हॉस्टल एक दूसरे के आमने सामने हैं खेल के मैदान में।
ये कहानी अतीत में चलती है और वर्तमान में ये सारे दोस्त अन्नी यानी अनिरुद्ध पाठक (सुशांत राजपूत) के बेटे की जान बचाने के लिए मिले हैं। इम्तिहान में नाकाम रहने और उसके बाद का तनाव न झेल पाने के कारण अन्नी का बेटा अपने दोस्त के कमरे की बालकनी से कूद कर सुसाइड का प्रयास करता है।

नितेश तिवारी निर्देशित 'थ्री ईडियट्स' की कहानी में भी इंजीनियरिंग कॉलेज के छात्र के पंखे से कूद जाने का किस्सा था तो यहाँ आईआईटी की प्रवेश परीक्षा पास न कर पाया बच्चा छत से छलांग लगा देता है। इस मायने में नितेश तिवारी चूके हैं। नितेश के निर्देशन की दूसरी दिक्कत है अपने कौशल का अतिरिक्त प्रदर्शन। अस्पताल की घटनाओं और हॉस्टल की घटनाओं को वह मानवीय संवेदनाओं से जोड़ने की कोशिश करते हैं और यह फिल्म के कथ्य में कई बार खटकती हैं।

नितेश ने इस फ़िल्म की कास्टिंग सटीक की है। इसके लिए कास्टिंग निर्देशक मुकेश छाबड़ा ज्यादा तारीफ़ के हक़दार हैं। इस  फिल्म में कोई एक हीरो नहीं है। सुशांत का किरदार कहानी का आधार है जबकि श्रद्धा कपूर और बाकी कलाकार सुई की घड़ी की तरह सहयोगी हैं। वरुण शर्मा का किरदार हो या फिर मम्मी के नाम से पुकारे जाने वाले तुषार पांडे, दोनों की अदाकारी फिल्म की जान है। सहर्ष शुक्ला, बेवड़ा के किरदार में प्रभावित करते हैं तो डेरेक बने ताहिर भसीन का काम भी लाजवाब है।

बावजूद इन मसालों के फ़िल्म थोड़ी और चुस्त दुरुस्त हो सकती थी। फ़िल्म में मात्र एक गाना 'खैरियत' ही जुबां और दिल में चढ़ता है। बाकी फ़िल्म हँसते हँसाते कब मोटिवेशनल सन्देश देकर चली जाती है पता ही नहीं चलता। संगीत के मामले में अरसे से कुछ नया नहीं बना पा रहे हैं। फिल्म के टाइटल से लगता है कोई छिछोरा होगा लेकिन जितने भी  किरदार हैं, उनमें से कोई भी ऐसा नहीं जिसे छिछोरा कहा जा सके। वरुण शर्मा इस फ़िल्म में भी फुकरे के चूचा ही नजर आते हैं।
तिवारी का डायरेक्शन उम्दा है और वे कहानी में उत्सुकता भी बनाए रखते हैं। बावजूद इसके फिल्म थोड़ी सी ज़रूर खिंच गई है। एक और बात, जब तमाम दोस्त बूढ़े दिखाए जाते हैं तो उनका मेकअप नकली सा लगता है।  


अपनी रेटिंग - 2.5 स्टार
 
 
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बेदम बेअसर 'साहो'
 
 
फ़िल्म - साहो 
निर्देशक - सुजीत
कास्ट- प्रभास, नील नितिन मुकेश, श्रद्धा कपूर, जैकी श्रॉफ, महेश मांजरेकर, चंकी पांडे, मंदिरा बेदी, टीनू आनंद, मुरली शर्मा आदि 
 
सबसे पहले बता दूँ कि साहो एक तेलुगु एक्शन फिल्म है, जो 'रन राजा रन' के निर्देशक सुजीत द्वारा निर्देशित है।  इस फिल्म में बाहुबली यानी प्रभास मुख्य भूमिका में हैं। फिल्म का निर्माण वामसी और प्रमोद ने यूवी क्रिएशन्स के बैनर तले किया है।
फ़िल्म की कहानी कुछ इस प्रकार है, रॉय ग्रुप ऑफ कंपनीज को एक दुर्घटना का सामना करना पड़ता है। यह फ़िल्म प्रमुख सदस्यों के बीच सत्ता की लड़ाई है। इस बीच, फ़िल्म के दूसरे हिज्जे में अशोक चक्रवर्ती और उनकी टीम मुंबई में दो लाख करोड़ की एक चोरी के मामले की जांच कर रही है। इन दोनों घटनाओं के बीच क्या संबंध है? इसी के इर्द गिर्द फ़िल्म घूमती नजर आती है। महिष्मती की प्राचीन भूमि में सर्वोच्च शासन करने के बाद, प्रभास ने अपनी नवीनतम एक्शन-थ्रिलर साहो में टी-शर्ट, स्वैग और कारगो के लिए महलों और शाही कपड़ों को छोड़ दिया बावजूद इसके यह फिल्म 350 करोड़ रुपये के असाधारण बजट में बनी है और इसे बनाने में दो साल लगे हैं।
 
खाली बर्तन जिस तरह शोर करता है साहो भी उसी तरह चमकते रैपर में खाली शोर मचाती दिखाई देती है। यही कारण है कि फ़िल्म को आलोचनाओं का सामना करना पड़ा और फ़िल्म का निर्देशन भी उन आलोचनाओं के घेरे में आ गया। 
फ़िल्म एक प्रकार से टैटू में कवर किए गए घातक बदमाशों के साथ सवार है, और ऊंची इमारतों पर चमकते हुए हैं जो एक वीडियो गेम से ज्यादा कुछ नही नजर आता है। इतना ही नहीं, शहर के चारों ओर एक जादुई आभा है इसे लोग अपनी इच्छा से गुरुत्वाकर्षण के नियमों को धता बता सकते हैं।  
हर किसी के सवालों का जवाब देती यह फ़िल्म रहस्यमयी  है, जिसका रहस्य कहीं न कहीं दबा हुआ है जो फ़िल्म के आखिर में खुलता है।  
 
अमृता नायर के रूप में श्रद्धा कपूर सहज नजर आई है। कुछ जगह प्रभास की डायलॉग डिलीवरी से भी ज्यादा चौंकाने वाली बात है श्रद्धा का किरदार। मंदिरा बेदी फिल्म में व्यावहारिक रूप से गैर-मौजूद सी लगी हैं और उनके पास केवल कुछ ही डायलॉग्स हैं जो पूरी तरह उन्हें फ़िल्म में स्थापित करने में कम असरकारक हैं। हर फ़िल्म की तरह इस फ़िल्म में भी तमाम अभिनेत्रियाँ सौंदर्य प्रसाधन मात्र हैं।  
 
इस फ़िल्म को केवल बाहुबली के फैन होने के नाते तथा  प्रभास के कभी-कभार अपने वन-लाइनर्स के साथ फ़िल्म का कुछ डैमेज-कंट्रोल करने की कोशिश करने के नाते देखा जा सकता है।
फ़िल्म की कहानी भी उतनी ही हल्की है जितना कि इसका निर्देशन। फ़िल्म के अंत से निर्माता निर्देशक ने बताया है कि इसका सीक्वल भी बनेगा। 
फ़िल्म का गीत संगीत औसत दर्जे का है। 
 
अपनी रेटिंग 2 स्टार

- तेजस पूनिया