प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अक्टूबर 2015
अंक -50

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

लघुकथा

श्रवण कुमार

‘‘बेटा समीर, मेरी और तेरे बाबूजी की आँखों का ऑपरेशन है रविवार को। तू दो-तीन दिन के लिए घर आ जा।’’
‘‘माँ, मैं कैसे आ पाऊँगा? आजकल काम बहुत ज्यादा है।’’
‘‘बहू को भेज दे दो-तीन दिन के लिए।’’
‘‘माँ, राहुल की परीक्षाएं चल रही हैं। उसे कौन पढ़ाएगा? मेरे पास तो कान खुजलाने की फुर्सत नहीं है। तुम दोनों बारी-बारी से करवा लो न ऑपरेशन!’’
सुधा हैलो-हैलो करती रही। समीर ने फोन काट दिया। वह कुढ़ती हुई दूसरे कमरे में पति रामलाल के पास जाकर बैठ गई।
‘‘क्या हुआ? इतनी दुखी क्यों हो?’’ अखबार में गड़ाई नज़रें उठाकर रामलाल ने पूछा।
‘‘एक ही औलाद है। वो भी किसी काम की नहीं। सोचा था बेटा बड़ा होकर श्रवण कुमार बनेगा।’’
‘‘माँ तो यही चाहती है परंतु पत्नी कहाँ बनने देती है।’’
सुधा पति का मुँह ताकती रह गई। कुछ बोल नहीं पाई।


- विनोद ध्रब्याल राही
 
रचनाकार परिचय
विनोद ध्रब्याल राही

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कथा-कुसुम (1)