प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
सितम्बर - अक्टूबर 2019 (संयुक्तांक)
अंक -53

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

जयतु संस्कृतम्
पुस्तकपरिचयम् -
 
अहिंसा का संदेश देता नाटक : हंसरक्षणम्
 
आज जब सम्पूर्ण विश्व हिंसा की आग में झुलस रहा है, भाई-भाई को नहीं पहचान रहा है, चंद रुपये और इंच भर जमीन के लिए लोग आपस में मरकट रहे हैं, लोग एक-दूसरे के खून के प्यासे हैं; ऐसे समय में समाज को ‘हंसरक्षणम् जैसे नाटक की आवश्यकता महसूस होती है, जो भटके हुए राही को सही रास्ता दिखा सके। ‘हंसरक्षणम् नाटक प्रो.ताराशंकर शर्मा ‘पाण्डेय’ द्वारा प्रणीत है।
समकालीन संस्कृत रचनाकारों में प्रो.ताराशंकर शर्मा ‘पाण्डेय’ किसी परिचय के मोहताज नहीं है। आपकी दर्जनों पुस्तकें तथा सैकड़ों शोध पत्र प्रकाशित हो चुके हैं। आपने ‘मुद्राराक्षस’ बडे पर्दे की संस्कृत फिल्म के संवाद भी लिखे हैं। आपने जगद्‍गुरु रामानन्दाचार्य राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय, जयपुर में संस्कृत के प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष पद को सुशोभित किया है। प्रो. शर्मा का नाम हिन्दी और संस्कृत साहित्य में बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है आप हिन्दी और संस्कृत के अच्छे कवि, नाटककार, कहानीकार और कुशल रंगकर्मी हैंआपके कार्यक्रम आकाशवाणी तथा दूरदर्शन से समय- समय पर प्रसारित होते रहते हैं आपको साहित्य अकादमी (केन्द्रीय),भारत सरकार तथा राज्यसरकार की विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित भी किया गया है।
 
महात्मा गौतम बुद्ध को यदि करुणा की प्रतिमूर्ति कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। बुद्ध के इन्हीं गुणों के कारण उनके अनुयायी भारत में ही नहीं अपितु विश्व के अनेकों देशों में फैले हुए हैं। उनके जीवन पर अनेक प्रेरक प्रसंग लिखे जा चुके हैं। उसी श्रृंखला में ‘हंसरक्षणम्' नाटक भी है। प्रो.शर्मा कहते हैं कि पीड़ित को शरण देने वाले
का अधिकार जीव पर अधिक होता है, न कि उसको पीड़ा पहुँचाने वाले का। परन्तु आज समाज में इसके एकदम विपरीत हो रहा है।
सिद्धार्थ:- नहि नहि भ्रात: ! शरणागतस्य रक्षक स्वामी इति वर्तते प्रचलित: सिद्धान्त:।
सिद्धार्थ:- “.....शरणागतस्य रक्षा अस्माकं परमोधर्म: एव ....”।
सिद्धार्थ देवदत्त को बारम्बार समझते हैं कि हिंसा, घृणा, ईर्ष्या और क्रोध से नुकसान ही होता है, फायदा नहीं।
सिद्धार्थ:- प्रिय! भ्रात:! इतोऽप्यधिकं किञ्चित्।
आर्तप्राणिनो रक्षक एव अधिकारी । वध्यो हन्तुरेव न्यासः  इति तु जांगलो विधिः।
शिकार मारने वाले की धरोहर होती है यह तो जंगलियों का नियम होता है।
देवदत्त: - रे रे! सिद्धार्थ! बुद्धिबलं मा दर्शय। चेद्‍ बाहुबले विश्वासस्तर्हि आगच्छ द्वन्द्वयुद्धं कुरु। द्वन्द्वे विजित्य एव हंसं स्वीकुरु।
सिद्धार्थ: - नैव नैव, कदाचिदपि एवं मां ब्रूहि भ्रात:! आवयोर्मध्ये कस्यापि जीवनज्योति: मा लुप्यात्।  
 
प्रो. शर्मा जी ने अपने नाटक को लोकप्रिय बनाने के लिए सरस, सरल एवं सुमधुर भाषा का प्रयोग किया है उनके छोटे-छोटे वाक्य सरस एवं चुस्त हैं जो अनायास ही भाषा बोध कराने में पूर्ण सक्षम हैं। इस नाटक में कुल 3 अंक हैं। इस नाटक का हिन्दी अनुवाद भी स्वयं लेखक द्वारा किया गया है। इस नाटक को दिल्ली संस्कृत अकादमी द्वारा
पुरस्कृत किया जा चुका है। रंगमंच की दृष्टि से भी यह एक सफल नाटक है। नाटक के बीच-बीच में प्रयोग किये गये गीत नाटक की सुन्दरता तथा रोचकता को और बढ़ा रहे हैं। संस्कृत जगत् को आप से बहुत आशायें हैं |
 
प्रस्तुतकर्ता- डॉ.अरुण कुमार निषाद
पुस्तक- हंसरक्षणम् (संस्कृत नाटक)
लेखक- प्रो.ताराशंकर शर्मा ‘पाण्डेय’
प्रकाशन- हंसा प्रकाशन, जयपुर 
संस्करण- प्रथम संस्करण 2010
मूल्य-35 रुपया, पृष्ठ संख्या-32 

- डॉ. अरुण कुमार निषाद