सितम्बर - अक्टूबर 2019 (संयुक्तांक)
अंक - 53 | कुल अंक - 54
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

जयतु संस्कृतम्
प्रस्थाय संस्थिता पुनः 
संस्थाय प्रस्थिता। 
नक्तन्दिवापि प्रत्यहं 
यात्रा नवा कृता।। 1।। 
एकैकमेव सर्वदा
मार्गे पदं धृतम्। 
श्रान्ता कदापि नैव
सदैवोर्जितार्जिता।। 2।। 
रुद्धा यदा पथि प्रवृत्त-
झञ्झयाऽहता। 
उन्मुच्य तत्पथं पुन: 
सृतिर्नवा श्रिता।। 3।। 
लब्धं कदापि नैव 
सुखं वातजं मृदु। 
छायाऽतपेन मामके
शीर्षे सदा कृता।। 4।। 
सङ्घर्ष आत्मशक्ति-
मतीत्यापि कल्पित:। 
किन्तु क्षणेन हन्त! 
शतं निर्बलैर्जिता।। 5।। 
किंस्वित्सुकोमलै: 
सुमैर्न पीड्यतामत:। 
स्नेहस्पृशै: सदाशयै: 
शूलैश्च सम्मता।। 6।। 
ज्ञातं न लक्ष्यमेव
पुनर्नैव साधनम्। 
चक्रे भ्रमामि केवलं
वाहेन कर्षिता।। 7।। 
नित्यं चरन्त्यखण्ड-
मनन्तं कदापि तत्। 
लप्स्ये स्वगम्यमित्यतो-
ऽद्यापीह जीविता।। 8।।

- डाॅ. नवलता

रचनाकार परिचय
डाॅ. नवलता

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