सितम्बर - अक्टूबर 2019 (संयुक्तांक)
अंक - 53 | कुल अंक - 53
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

धारावाहिक
गवाक्ष: 20
 
मंत्री सत्यव्रत जी बेटी को देखकर विचलित हो उठे थे, न जाने कब वे अपने शरीर में प्रवेश कर गए थे। भक्ति पिता के शव के गले मिली, उसने महसूस किया पिता का आधा शरीर कुछ ऐसे ऊँचा उठा जैसे वे जीवित थे। उसने पिता के वात्सल्य की उष्णता महसूस की और उसका रोम-रोम पुलकित हो उठा।
मंत्री जी की देह को इस प्रकार ऊपर उठता देखकर बेटों व वहाँ उपस्थित अन्य लोगों ने देह को ज़ोर लगाकर नीचे लिटाया। बेटी भक्ति अभी तक स्नेह की उष्णता महसूस कर रही थी। पिता का स्नेहिल स्पर्श उसके कानों में यह कहकर पुनः वहाँ से चला गया था, "सदा इसी मार्ग पर चलना, मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूँ।"
भक्ति एक बार भाईयों के गले मिलकर प्रोफ़ेसर के कंधे पर सिर रखकर शांत मुद्रा में पिता के पार्थिव शरीर को निहारने लगी। प्रोफ़ेसर उसके सिर पर स्नेह से सांत्वनापूर्ण  हाथ फिराते रहे। दोनों एक-दूसरे की मन:स्थिति समझ रहे थे।
 
दिवस की गहमागहमी से वातावरण में पुन:चुप्पी का अहसास पसर गया। मंत्री जी के पार्थिव शरीर को ले जाने का समय हो रहा था। तैयारियाँ ज़ोर-शोर से होने लगीं। जो लोग कल वापिस लौट गए थे,वे सब फिर दिखाई दे रहे थे। मीडिया के लोगों में अधिक चहलकदमी होने लगी थी। चारों ओर कैमरे घूम रहे थे। मंत्री जी के शव को बेटों व अन्य समीपी लोगों द्वारा गंगाजल से स्नान करवाया जा रहा था और वे आनंदमग्न कॉस्मॉस के साथ कमरे में जाकर प्रत्येक गतिविधि बड़ी उत्सुकता से देख रहे थे। प्रोफेसर व बिटिया भक्ति तथा कुछ और वे लोग जो मंत्री जी की वास्तविक सदाशयता को समझते थे, उदास थे।
 
"यह सब धर्म है क्या?" कॉस्मॉस ने मंत्री जी के शरीर को स्नान करवाते हुए देखकर पूछा।"
इस समय शरीर को घर से निकाला जा रहा है, हम कहीं पर जाते हैं तब स्नान करके स्वच्छ होकर जाते हैं न? अब यह शरीर सदा के लिए जा रहा है, इसे स्वच्छ किया जा रहा है। आज का धर्म तो पंडितों का व्यवसाय है, ये सामजिक परंपराएं बना दी गई हैं। ये सब पंडित लोगों का व्यवसाय है। बल्कि मैं तो कहूँगा..राजनीति है।" 
"इसमें राजनीति की बात कहाँ से आ गई?" कॉसमॉस की छोटी सी बुद्धि में इतनी गहन बातें कैसे आतीं?
"ये जन्म तथा मृत्यु के समय जो संस्कार होते थे उनके पीछे विज्ञान होता था किन्तु अब व्यवसाय  होता है। और तो और चिकित्सक से लेकर पंडित के क्षेत्र में, सबमें राजनीतिक भावनाएं प्रविष्ट हो गई हैं।  तुम्हें क्या  लगता है जो सब कुछ होगा वह मेरे लिए या मेरी मुक्ति होगा ,नहीं यह सब राजनैतिक चोंचले हैं।'
"वो कैसे?"   
"सबको एक राजनेता की पार्टी में रूचि है, मुझमें क्या और किसकी रूचि हो सकती है? मैं प्रयास करता रहा हूँ न तो किसी का गलत काम में साथ दूँ और न ही यथाशक्ति किसी को कुछ ऐसा दुरुपयोगी कार्य करने दूँ जिससे समाज का अहित हो। मेरे व्यक्तिगत रूप से जीवित रहते जो लोग लाभ नहीं उठा सके, इस समय मेरी अनुपस्थिति का लाभ तो उठाएंगे।" 
 
कॉस्मॉस के मन में न जाने कितने  प्रश्न बारंबार कुलबुला रहे थे।
"यह जीवन कैसा उपहार है जिसकी प्राप्ति की अनुभूति प्रसन्नता है तो उसका बिछुड़ना पीड़ा है? जब मनुष्य का शरीर ही उसका साथ छोड़ देता है तब और कोई कैसे उसका साथ दे सकता है? क्या और कैसा रहस्य है यह जीवन का?"
"जब हम अपने आप में जीना सीख लेते हैं तब जीवन का रहस्य भी जान लेते हैं, जब मनुष्य प्रत्येक परिस्थिति में जीवन को सहजता से जीने लगता है तब वह अपने भीतर ईश्वर को पा लेता है, जीवन के रहस्य को पहचान लेता है, समझ लेता है उसके स्वयं के भीतर ही ईश्वर है जिसका वह भाग है, उसे कहीं खोजने की आवश्यकता नहीं है।"आपको अपने भीतर ईश्वर मिला क्या?" कॉस्मॉस की तहकीकात जारी थी।
"ईश्वर न तो कहीं खोता है,न ही उसे कहीं तलाशने की आवश्यकता है। मैंने स्वाति के मुझे दर्पण दिखाने के पश्चात सदा ईश्वर को अपने भीतर महसूस किया है।"    
 
अन्य मंत्रीगणों का पहुंचना प्रारंभ हो चुका था। प्रत्येक स्थान की भाँति सत्यव्रत जी की राजनैतिक पार्टी में भी कुछ लोग आस्तीन के साँप थे लेकिन उस समय वे इस प्रकार  चेहरे लटकाए घूम रहे थे मानो उनके सबसे बड़े हितैषी चले गए हों और वे निराधार हो गए हों, बिलकुल अनाथ! उनके कलफ लगे धवल वस्त्रों में से महंगे विदेशी इत्र की सुगंध आ रही थी। उन्होंने राजनीति के पर्दे में न जाने कितने डाके डाले थे और घोटालों पर घोटाले करते जा रहे थे जिनसे सत्यव्रत बहुत खिन्न थे।
"कॉस्मॉस ! मनुष्य को ज्ञात होता है उसके पास कितना धन है किन्तु उसे यह ज्ञात नहीं होता कि उसके पास समय कितना है? यह कितने आश्चर्य की बात है कि सब कुछ समझते हुए भी मनुष्य अपने धन को खर्च करने में संकोच करता है तथा समय को ऐसे नष्ट करता चला जाता है जैसे वह कभी ऊपर जाने वाली पंक्ति में खड़ा ही नहीं होगा। मेरी यहाँ की यात्रा समाप्ति पर है फिर भी मैं यही सोच रहा हूँ मेरे पास अभी कितना समय है?"
"क्या यहाँ कोई अपनी आत्मा की आवाज़ नहीं सुनता?" 
"कोई अपनी आत्मा की आवाज़ सुनना ही नहीं  चाहता,आत्मा तो कभी मरती नहीं कॉस्मॉस --!" मंत्री जी की मनोदशा से दूत भी पीड़ित था। अब भी कॉस्मॉस चुप  बना रहा।
  
"क्या सोच रहे हो?" सत्यव्रत ने कॉस्मॉस को चुप देखकर पूछा। 
"महोदय! मैं बहुत दुविधा में हूँ। मैं जानता हूँ संभवत: अब आप मेरी सहायता नहीं कर सकेंगे। मैंने ही देरी कर दी है..अब?" वह चिंतित दिखाई दे रहा था। 
"प्रयास करूंगा ,तुम समस्या तो बताओ.."
"आपके पास से लौटने के पश्चात मैं एक गर्भवती स्त्री को लेने पहुंचा किन्तु उसने अपने गर्भस्थ शिशु के कारण मेरे साथ चलने से मना कर दिया। मुझे इस बात का आश्चर्य था कि उसने पति अर्थात शिशु के पिता का नाम बताने से मुझे कठोरता से क्यों इंकार कर दिया था? उसने कहा था कि वह अपने शिशु की माँ व पिता दोनों है।"
"उसका नाम जानते हो?" मंत्री जी का स्वर अचानक बेचैन हो उठा। 
"सत्य पर ही तो था इसीलिए मैं उसे ले  जाने गया था लेकिन वह मुझ पर बरस उठी। मुझे भी पश्चाताप हुआ, मुझे गर्भवती स्त्री की संवेदनाओं को पीड़ित करने का अधिकार नहीं था।" वह रुंआसा हो उठा।
 
"तुम्हें अचानक उसकी स्मृति क्यों आई कॉस्मिक?" 
"मेरे मन में न जाने जाने क्यों यह विचार उठा कि मैं पृथ्वी से सदा के लिए जाने वाले और इसी पृथ्वी पर कुछ  समय के लिए जन्म लेने वाले दोनों का साक्षी बन रहा हूँ।"
"उसका नाम कहीं सत्याक्षरा तो नहीं था?" मंत्री जी की आँखों में नन्ही सी चमक भर आई। 
" जी, बिलकुल! यही  नाम था। आप जानते हैं उसे?" दूत के चेहरे पर प्रसन्नता मिश्रित उत्कंठा थी।       
"क्या तुमने  प्रोफेसर से इस बारे में चर्चा की थी?" 
"जी नहीं"
"क्या आप सत्याक्षरा से परिचित हैं?" उसने अपना प्रश्न दोहराया जिसका मंत्री जी ने कोई उत्तर नहीं दिया। 
"कॉस्मॉस! मुझे अब चलना होगा, मेरी अंतिम यात्रा आरंभ होने वाली है। मुझे प्रोफेसर को इस सत्य से अवगत कराना है। तुम मेरे जीवन में आए, मैं तुमसे प्राप्त ज्ञान व  सूचनाओं के लिए तुम्हारा आभारी हूँ। मेरे साथ चलो और मेरे अंतिम संस्कार के पश्चात प्रोफेसर के साथ सत्याक्षरा के पास जाना, तुम्हें  सब ज्ञात हो जाएगा।"
मंत्री जी ने 'हाँ','न' कहने के स्थान पर समय की सीमा की ओर इंगित किया था। क्यों? संभवत:वे इस दुनिया को छोड़ते समय इस घड़ी किसी पीड़ा से गुज़रना नहीं चाहते थे
 
एक अजीबोगरीब मनोदशा में कॉस्मॉस ने आत्मा को प्रणाम किया, न जाने किस संवेदना के वशीभूत हो सत्यप्रिय ने उसके माथे पर अदृश्य चुंबन अंकित किया और पवन-गति से सब तितर-बितर हो गया। सत्यव्रत ने अंत:करण से सबको नमन किया तथा पृथ्वी से सदा के लिए विदा ली। एक सूक्ष्म पल के लिए पुष्पों से लदी उनकी पार्थिव देह में जैसे कंपन सा हुआ जिसको केवल ज्ञानी प्रो.श्रेष्ठी तथा कॉस्मॉस समझ सके। परम प्रिय मित्र की बिदाई की अनुभूति से  प्रो.पुन:लड़खड़ा से गए, उन्हें पास खड़ी भक्ति ने संभाल लिया।
मीडिया को न किसी से सहानुभूति थी, न ही किसी के जाने की पीड़ा। उसे तो समाचारों की दरकार थी। ऐसे समय में मीडिया के लोग भक्ति से पूछ रहे थे, "आपको कैसा लग रहा है?"
किसी पिता की मृत्यु पर किसी पुत्री को कैसा लग सकता है? भक्ति को अटपटे प्रश्न पर खीज आ रही थी। वह चुप बनी रही। 
"मैडम! प्लीज़ बताइए, कैसा लग  रहा है? "
“एक बेटी को अपने सदाचारी ,गांधीवादी पिता  की मृत्यु पर कैसा लग सकता है?" भक्ति ने उन पर प्रश्न दागा। 
"आप लोग प्रश्न रटकर लाते हैं क्या? यह कोई 'एवार्ड फंक्शन 'है जो आप यह प्रश्न पूछ रहे हैं?"
"मैडम! आपके पिता गांधी जी के विचारों से बहुत प्रभावित थे इसीलिए...गांधी जी के निर्णय को बहुत से लोग सही नहीं मानते लेकिन आपके  पिता  का निर्णय --"  
मीडिया के व्यर्थ के प्रश्नों से वह खीज गई --
आप यहां पर गांधी जी की राजनीति की चर्चा करने आए हैं क्या?"
जब राजनीतिक क्षेत्र के लोग भक्ति से गांधी जी के बारे में उल्टे-सीधे प्रश्न पूछते, वह सदा कहती, "मैं उस गांधी का चित्र प्रस्तुत करना चाहती हूँ जिसने दूसरों के प्रति करुणा सिखाई ,दूसरों की बेचारगी से जो पीड़ित हुए, भूख को महसूस किया ,स्वयं एक लंगोटी में रहे, दूसरों की नग्नता को ढाँपने का प्रयास किया, क्या उनके जैसा बनने की किसी ने भी चेष्टा की?"
 
किसी प्रकार मीडिया के लोगों से छुटकारा दिलाकर प्रोफेसर ने भक्ति को गाड़ी में बैठा दिया। कुछ समय पश्चात ही सब लोग विद्युत-श्मशान गृह पहुँच चुके थे। कैमरे साथ-साथ चल रहे थे,श्मशान-गृह में  उपस्थित महत्वपूर्ण लोगों पर कैमरे घुमाए जा रहे थे और कुछ छिछले लोग कैमरों की ओर अपने चेहरे घुमा-घुमाकर अपनी उपस्थिति दर्ज़ करने का अहसास करने की चेष्टा कर रहे थे।    
मंत्री जी की इच्छानुसार बिना किसी टीमटाम के अंतिम क्रिया संपन्न हुई सामूहिक रूप से सस्वर प्रार्थना की गई;
सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:। 
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु माँ कश्चिद् दुःखभाग् भवेत्॥
ॐ शांति:शांति:शांति:!
भीड़ तितर -बितर हो चली,केवल वे ही लोग उपस्थित रहे जो मंत्री जी के बहुत समीप थे। गाड़ियों की पीं-पीं,पुलिस वालों के वाहनों को नियंत्रित करने की आवाज़ें वातावरण में पसर गईं। 
संभवत:पृथ्वी के लोगों में तथा उसमें दोनों में ही बदलाव आ रहे थे।
अब सब शांत हो चला था, कुछ समय  के लिए सबके मन में नीरव शान्ति ने श्मशान वैराग्य की भावना को  प्रसरित कर दिया था।
 
कॉस्मॉस पृथ्वी से जाने वाले के पश्चात होने वाली क्रियाओं को अचंभे से देख रहा था। जिस हॉलनुमा कमरे में मंत्री जी का पार्थिव शरीर था, उसमें तथा अन्य सब स्थानों पर सफाई की जा रही थी। भक्ति ने एक सुन्दर सी मेज़ पर अपने स्वर्गीय पिता की तस्वीर रख दी थी जिस पर ताज़े पुष्पों का हार चढ़ा दिया गया था। मेज़ एक सुन्दर श्वेत रेशमी मेज़पोश से ढकी गई थी जिसको पुष्पों से भर दिया गया था। मेज़ के नीचे भी एक छोटी मेज़ जिस पर पुष्पों के एक बड़े से सुन्दर टोकरे को रख दिया गया था। पूरे वातावरण में एक अजीब सा सहमापन, स्तब्धता व चुप्पी पसरी हुई थी। बड़ी मेज़ पर मंत्री जी की प्रसन्नवदन तस्वीर के समक्ष दोनों कोनों पर धूप-दीप रख थे जिनमें सुगंधित अगरबत्तियाँ लगा दी गईं थीं। हॉल में नीचे दोनों ओर गद्दे बिछाकर धवल चादरें बिछाई गईं थीं। स्नान आदि से निवृत होने के पश्चात अफ़सोस करने वालों का ताँता फिर से लग गया था। सब शांति से आते, मंत्री जी की तस्वीर के समक्ष झुककर प्रणाम करते, पुष्पांजलि अर्पित करते और जाकर नीचे बिछे हुए गद्दे पर बैठ जाते। इस प्रकार का कार्यक्रम अब कम से कम दो-तीन दिनों तक चलने वाला था, क्रमश:भीड़ कम होने वाली थी। भक्ति के दोनों भाई श्रद्धांजलि देने आने वालों के लिए वहाँ उपस्थित थे। वह कुछ समय के लिए बाहर निकल सकती थी। वह किसी फोन की प्रतीक्षा कर रही थी।  
 
कुछ ही देर में भक्ति के मोबाईल पर शायद कोई आवश्यक फोन आया था, भक्ति भाइयों से कुछ देर में वापिस लौटने का बात कहकर बाहर निकल आई। भक्ति  को बाहर जाते देखकर कॉस्मॉस भी पल भर में बाहर पहुँच गया। प्रोफेसर ने भक्ति से सत्याक्षरा के बारे में चर्चा की और भक्ति  प्रोफ़ेसर के साथ  बँगले के कंपाउंड के बाहर आकर गाड़ी में बैठ गई।
कुछ ही दूर गाड़ी चली  थी कि प्रोफेसर विद्य ने पूछा, "तुम हो न?"
"जी"   
भक्ति को कोई दिखाई नहीं दे रहा था। स्वाभाविक था, वह चौंकी। प्रोफेसर ने भक्ति को संक्षिप्त में कॉस्मॉस की कहानी बताकर उसको आज्ञा दी, "मानव-रूप  में आ जाओ।"
इस बार कॉस्मॉस को अपने  रूप परिवर्तन में समय लग गया किन्तु कुछ कुछ देर पश्चात वह एक सुदर्शन युवक के रूप में गाड़ी में था। 
"क्या बात है, इतनी देर क्यों लगी?" प्रोफ़ेसर ने पूछा। 
"लगता है सर, मेरी शक्ति समाप्त हो रही है।"
भक्ति आश्चर्यचकित हो उठी, 'यह क्या? खुल जा सिम-सिम सा उसकी दृष्टि सत्य को स्वीकार नहीं कर पा रही थी लेकिन वास्तविकता थी, एक सुदर्शन युवक ने एक झौंके की भाँति बंद गाड़ी में प्रवेश किया था जो उसको हाथ जोड़कर प्रणाम कर रहा था। 
वह हँस पड़ी, "कोई इतनी बड़ी भी नहीं होऊंगी तुमसे कि तुम मुझे झुककर प्रणाम करो किन्तु तुम हो कौन?" आश्चर्य में भरकर भक्ति ने फटी हुई दृष्टि से युवक को घूरते हुए पूछा जैसे वह गाड़ी में बैठे हुए कोई जादूगर का तमाशा देख रही थी। 
"आपने जादू कब से  शुरू कर दिया?"उसने प्रोफेसर विद्य से पूछा। 
 
प्रोफेसर ने भक्ति के प्रश्न का कोई उत्तर नहीं दिया,वे बता चुके थे कि वह कॉस्मॉस है, भक्ति विस्तार से जानना चाहती थी। वे कॉस्मॉस से मुखातिब हुए। 
“भक्ति की बहुत प्रिय सखी  है सत्याक्षरा। दोनों मेरे साथ ही पी.एचडी का कार्य कर रही थीं। वह सत्याक्षरा से एक वर्ष पूर्व मेरे पास आ गई थी। समयाभाव के कारण मैंने उसे अपने साथ कार्य करने के लिए मना कर दिया था किन्तु उसकी लगन तथा दर्शन के प्रति उत्सुकता देखकर मुझे उसका मार्गदर्शक बनने के लिए बाध्य होना पड़ा । मुझे विदेश व्याख्यान के लिए जाना पड़ता था । भक्ति मेरी व्यस्तता के बारे में भली प्रकार  परिचित थी किन्तु  सत्याक्षरा की लगन देखकर इसने भी मुझे बाध्य किया कि मैं उसे अपनी शिष्या के रूप में स्वीकार करूँ। इसका निबंध पूरा हो चुका था, यह मेरे साथ जर्मनी के विश्वविद्यालयों  में गांधी-दर्शन की चर्चा करने गई थी, सत्याक्षरा अपने निबंध के अंतिम छोर पर थी। वह दिन-रात एक करके अपने कार्य को उच्च कोटि का बनाकर मेरे समक्ष प्रस्तुत करना चाहती थी। किन्तु जब हम जर्मनी में थे तभी हमें सूचना प्राप्त हुई कि सत्याक्षरा अचानक विलुप्त हो गई। हम दोनों शीघ्रताशीघ्र लौटे थे किन्तु हमें निराशा प्राप्त हुई। हमने उसे बहुत खोजा, सत्यव्रत जी ने अपनी सारी शक्ति लगा दी किन्तु वह नहीं मिली। भक्ति का वहाँ कार्य शेष था अत: वह वापिस जर्मनी चली गई और मैं अपने अधूरे ग्रन्थ में व्यस्त होकर सत्याक्षरा की प्रतीक्षा करता रहा। विदेश जाने से पूर्व भक्ति उसे बहुत खोजती रही थी। अब तुम्हारे माध्यम से हम सत्याक्षरा से मिल सकेंगे।"
भक्ति उसे देखकर प्रसन्न व चकित थी। 
"मेरे गुरु व पिता के माध्यम से तुमने बहुत कुछ जाना है और अब हम उस स्थान के  विषय में जान सकेंगे जिसमें से तुम आए हो और आगे की भी कुछ शोध कर सकेंगे?"
"जी, अब संभव नहीं लगता "कॉस्मॉस विनम्र था।
"क्यों?"
 
"मैं अपनी शक्ति खोता जा रहा हूँ "
अचानक उसने प्रोफ़ेसर से निवेदन किया ; 
"सर! क्या आप एक पल के लिए इस वृक्ष के नीचे गाड़ी रोक सकेंगे?"
"कोई विशेष कारण?" उन्होंने गाड़ी रोक ली। 
" जी,मैं अभी आया" कहकर वह गाड़ी से निकल गया। 
वह एक सामान्य मनुष्य की भाँति चल रहा था। प्रोफेसर व भक्ति प्रश्नचिन्ह बने एक-दूसरे की ओर अपलक निहारने लगे। कुछ पल पश्चात वह शिथिल चरणों  से लौट आया। 
"बहुत गंभीर लग रहे हो?" प्रोफेसर ने पूछा। 
"सर मैं दंडित कर दिया गया हूँ"
"कैसे पता चला?"
"मैं जिस विमान से गवाक्ष से पृथ्वी पर आता था, वह स्वामी ने वापिस मँगवा लिया है। वृक्ष पर मेरे लिए गवाक्ष में प्रयुक्त होने वाली भाषा में सूचना लिखी गई है। मुझको काफी पहले से ही महसूस होने लगा था किन्तु अब स्थिति स्पष्ट रूप से मेरे समक्ष है। मुझे एक पूरा जीवन पृथ्वी-लोक में व्यतीत करना है। समय आने पर मुझे भी मनुष्यों की भाँति ले जाया जाएगा लेकिन मैं यह सब किसी के समक्ष कह नहीं पाऊँगा क्योंकि पूर्ण  मनुष्य के चोले में आने तथा मनुष्य के कर्म करने के पश्चात मैं इसी दुनिया का अंग बन जाऊंगा और मुझे भी दुनियावी परिस्थितियों से गुज़रना होगा।"
 
प्रोफ़ेसर हँस पड़े, भक्ति भी मुस्कुरा दी। वह अब भी पशोपेश में थी, उत्सुक थी, उद्विग्न थी। वह कॉस्मॉस के बारे में  सब कुछ जानना चाहती थी।
"क्या तुम्हें इस बात का अफ़सोस है?" प्रोफ़ेसर ने कॉस्मॉस से पूछा। 
"शायद हाँ या फिर शायद नहीं" वह किंकर्तव्यविमूढ़ था। 
"नहीं, दुखी मत हो जो भी होता है, उसे स्वीकार करने में आनंद है। तुम जैसे कितनों  को यह सौभाग्य प्राप्त होता है कि वे पृथ्वी पर एक संवेदनशील प्राणी की भाँति रह सकें। वे जीवन भर एक रोबोट बनकर रहते हैं। 
"रोबोट??"
" समय आने पर समझ जाओगे। देखो हम अस्पताल पहुँच गए हैं।"
 
 प्रोफ़ेसर ने अस्पताल के बाहर गाड़ी रोकी और तीनों  सत्याक्षरा से मिलने चल पड़े। भक्ति काउंटर पर आज्ञा-पत्र बनवाने चली गई और प्रो.श्रेष्ठी कॉस्मॉस के साथ प्रतीक्षा -स्थल में सोफे पर बैठकर प्रतीक्षा करने लगे। प्रोफ़ेसर मन ही मन कुछ प्रार्थना कर रहे थे।
"आप क्या प्रार्थना कर रहे हैं?" कॉस्मॉस ने फिर न जाने कहाँ से एक और शगूफा छोड़ दिया।
"नहीं, आपकी आँखें बंद थीं और आप मन में जैसे कुछ बोल रहे थे।" कॉस्मॉस बहुत कुछ समझने लगा था। 
"मैंने तुमसे एक बार इस बात पर चर्चा भी की थी। मनुष्य का मन किसी पल भी शांत कहाँ रहता है कॉस्मॉस!" कॉस्मॉस को इस चर्चा की कोई स्मृति नहीं थी। 
"मैंने तुम्हें बताया था कि प्रार्थना यानि अपने वर्तमान में रहना, अपने पल में रहना, जब हमारा मन  किसी विशेष विचार में, वर्तमान में स्थिर होता है तब वह प्रार्थना ही होती है।"
 
कॉस्मॉस का मन भी पीछे सत्यनिधि के साथ नृत्य करने वाले उस क्षण में पहुँच गया जब वह अपने आपमें नहीं था,उसे न अपने अस्तित्व ध्यान था, न स्थान का! वह बस वृत्ताकार में समर्पित हो रहा था। उसे लगा साधना और प्रार्थना का कोई मेल तो है। दोनों में एक पावन सी अनुभूति! पावन सुख, पावन अहसास! 
दोनों में एक पावन सी अनुभूति! पावन सुख ,पावन अहसास! उसे गवाक्ष के निर्देशों की स्मृतियाँ हो आईं जब उन्हें पृथ्वी पर प्रेषित करने के लिए तत्पर किया जाता था तब स्वामी के द्वारा कितने निर्देश दिए जाते थे। पृथ्वी का जीवन कारागार के समान चित्रित किया जाता था किन्तु यहाँ आकर और असफलता के मापदण्डों को नाप-तोलकर  उसे यह महसूस होने लगा था कि गवाक्ष का जीवन  कितना सपाट है। बेआवाज़ घुटी हुई पवन को अपने भीतर उतारते गवाक्ष के दूत इधर से उधर डोलते दिखाई देते। न हँसना ,न रोना ,न गाना ,न नाचना,न संवेदना न कोई हँसी-ठहाके..केवल एक मशीन पर जीवन अपने आगे प्रेषित किए जाने की प्रतीक्षा में न जाने कैसी घुटी हुई श्वांसों के सहारे घड़ी के पेंडुलम की भाँति टिक-टिक करता रहता है। यहाँ आकर इस कॉस्मॉस को ज्ञात हुआ कि मनुष्य को व्यक्ति की चेतना के साथ संबंध बनाने पड़ते हैं, शरीर के साथ नहीं! यहाँ संवेदना का महत्व है यानी मन का महत्व जो शरीर के न रहने पर भी चारों ओर छाया रहता है।
 
"इतना सब कुछ देखा-भाला,  इतना पृथ्वी की उथल-पुथल में डूबता-उतरा लेकिन अब तक जीवन क्या है? समझ नहीं सका।" वह बड़बड़ कर रहा था इसीलिए प्रोफेसर का मन भटका।
"क्या नहीं समझ पाये?"
"क्या नहीं समझ पाये?"
"यही कि जीवन है क्या? इसमें बहुत सी खूबसूरती मैंने जानी लेकिन फिर भी भूल-भुलैया में घूमता ही रहा हूँ, आज भी घूम रहा हूँ।"
"जब मनुष्य वर्षों से इस भूल-भुलैया में भटक रहा है तब तुम सोचो तो सही तुम्हें यहाँ कितना समय बीता है?"
"फिर भी जीवन की कोई परिभाषा तो होगी ,जैसे हम दुनिया में कितनी वस्तुओं को परिभाषित करते आए हैं, वही सब तो दुनिया के जीवन की परिभाषा है।   
--------------- क्रमशः -----------------
 
 

- डॉ. प्रणव भारती