अगस्त 2019
अंक - 52 | कुल अंक - 53
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

उभरते-स्वर

सुबह की पहली किरण

सुबह की पहली किरण
जब भी निकलती है
नीलगगन को चीरते हुए
पर्वत-पठारों,
झरने और नदियों के
लाल रुख़सार का
चुम्बन लेते हुए
शजर की शाखाओं से
मदमस्त अठखेलियाँ
करते हुए
बिखर जाती है
मेरे दिल के आँगन में
पक्षियों के मधुर संगीत के सहारे
और कुछ इस तरह से
सवेरा हो जाता है
मेरे दिल के गलियारों में

सुबह की पहली किरण के सहारे ही
निकल पड़ती है निगाहें
तेरी तलाश में
हर गली,
हर दिशा,
हर चौराहे की ओर
एक अनजान-सी
मंज़िल की तरफ
और पा ही लेती हैं
अपनी मंज़िल का मुक़ाम

तेरे चेहरे पर
पल दो पल का
विश्राम पाकर
दूर हो जाती है
दिन भर की अटूट थकन
और फिर ओढ़कर
तेरे ख़्वाब की चादर
नींद के आग़ोश में
महक उठता है
शब का हर एक पहर
रात की रानी की तरह
और फिर से आरम्भ
हो जाता है वही सिलसिला
सुबह की हर पहली किरण के साथ
निकल पड़ती हैं निगाहें
तेरी तलाश में...!


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मुहब्बत

मुहब्बत की तलाश में
लहू उगलते छालों सहित
नंगे पाँव भटकता है
तप्त रेगिस्तान की
तपिश भरी सिलवटों के बीच
हर इंसान
पर कहाँ मिल पाती है
सबको
इबादत से तृप्त मुकम्मल मुहब्बत!

हर दिल पाना चाहता है
रूहानी रूह में बसी
उस अमूर्त-सी मुहब्बत को
जो ख़ुदा के नूर से निर्मित है
जो प्रेम और समर्पण की भाषा को
बिन अल्फ़ाज़ के
महसूस करती है
सिर्फ़ दिल के पाक एहसासों से!

मैंने किया है तुम्हें हर पल महसूस
उस अमूर्त-सी मुहब्बत के रूप में
मुहब्बत की बेमिसाल मूरत है तू
तेरे मुखमण्डल से सदा
ख़ुदा का वही नूर बरसता है
मुहब्बत की अनमोल साधना से
पाना चाहता हूँ तुम्हें
दिल की हर धड़कन के स्पंदन पर
गुनगुनाना चाहता हूँ तुम्हें
जो गुंज रही हैं अतीत की
परछाइयाँ मुहब्बत के दरमियान
उन दर्द भरी परछाइयों से
निजात दिलाना चाहता हूँ तुम्हें
तेरी मुहब्बत की ख़ुशबुओं से
दिल के पाक मंदिर को
सनातन महकाना चाहता हूँ मैं
तेरे प्रीत भरे एहसासों की
रोली-मोली से
मेरे दिल की पाक कलाई को
सजाना चाहता हूँ मैं
स्वार्थ और छल-कपट से परे होकर
मेरी चाहत का कुमकुम
तेरे माथे पर लगाना चाहता हूँ मैं
मेरे दिल में पल रहे मुहब्बत के
असंख्य महाकाव्यों की
तुम्हें राजकुमारी बनाना चाहता हूँ मैं
मेरी नेह भरी नज़रों के चंदन से
तेरी कंचन-सी देह का
वंदन करना चाहता हूँ मैं
खोलकर दिल की बाँहे
तनहा खड़ी है रूह
तेरी रूहानी रूह के इंतज़ार में
बस इसी रूहानी रूह को
मुहब्बत की जय माला पहनाना चाहता हूँ मैं
रस्मों-रिवाजों के बंधन से तो
मैं बंध नहीं पाया
पर प्रीत के अटूट बन्धन से
तुझे बेपनाह मुहब्बत करना चाहता हूँ मैं
बस बेपनाह मुहब्बत करना चाहता हूँ मैं


- अमित कुमार मीना

रचनाकार परिचय
अमित कुमार मीना

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उभरते स्वर (2)