प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अगस्त 2019
अंक -52

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ज़रा सोचिए

अपराजिता मिलो स्वयं से
- प्रगति गुप्ता


सुनो अपराजिता! कभी मिली हो तुम अपने अन्दर की उस नदी से जो कल-कल की ध्वनि कर; अपनी ही धुन में सुदूर किसी आकाश की श्रृंखलाओं से उतर; बलखाती हुई इस धरा पर अवतरित होती है। जानती हो अपराजिता! तुम्हारी एक अपनी ही तासीर है; बहुत ठंडी-सी, सारे दुःख-दर्द हरने जैसी। पहचानती हो न, तुम अपने इस गुण को! जो तुम्हारी इस ठंडक को महसूस कर लेता है, वो इसके नेह में बंधकर इसके साथ-साथ फिरता है।

तुम्हारी राह में अनगिनत छोटे-बड़े पत्थर बेशक आते रहे, उनका स्पर्श करना बेशक़ तुम्हारी मजबूरी हो सकती है पर उनके बीच से कुछ इस तरह निकलना कि ख़ुद को कोई चोट न पहुंचे। नदी हो न तुम..! तो तुम्हारा स्वरूप नहीं बदलना चाहिए। हो सकता है जितनी निर्मल और स्वच्छ तुम उतरी थी, उतनी न रह पाओ पर इतनी मलीन मत हो जाना कि स्वयं को न पहचान सको। एक लम्बी डगर पर तुमको बढ़ना है निर्भय।

तुम आगे बढ़ते-बढ़ते उस दलदल पर विशेष ध्यान रखना अपराजिता। कभी बहुत जल्दी-जल्दी आगे बढ़ने कि चाह में कहीं, इतनी मद में चूर मत हो जाना कि राह में आया हुआ दलदल कहीं तुम्हारी ही राह अवरुद्ध कर दें। अक्सर दूर से दलदल दिग्भ्रमित ही कर देते हैं। यह तुम्हारे सहज सरल प्रवाह को ख़ुद के जैसा बना देंगे। तब तुम्हारा सहज प्रवाह कहीं खो जायेगा अपराजिता और तुम ठगी-सी खड़ी, स्वयं ही स्वयं की पराजय देखोगी।  

ओह! अपराजिता, तुम्हारा नदी से परिचय करवाते-करवाते, मैं क्षण भर को भूल ही गयी, नदी अपराजिता है या अपराजिता नदी...बहुत परिचित-सी हो न एक दूजे से तुम! तुम भी तो उसी की तरह चंचल चपला बन अपने लक्ष्य को साधे निर्भीक बहना चाहती हो और उस विशालता को भी छूना तुम्हारे लक्ष्य में आता है। उस विशालता को छूना खोना नहीं है यह बहुत कुछ पाना है।
अपराजिता तुम्हारी जीत की परिकल्पना मेरा भी स्वप्न है पर तुम्हारा किसी भी तरह मलीन होना या किसी दलदल में ठहर कर स्वयं को खो देना मुझे स्वीकार्य नहीं। समझ रही हो ना!


सुनो अपराजिता, कभी मिलना उस बादल से भी, जो आवारा-सा तुम्हारे आसपास ऊपर ही मंडराता घूमता-फिरता है। उसका सिरफिरापन तुमको अक्सर ही बहुत लुभाएगा क्योंकि घुमत्तुपन किसको नहीं लुभाता है! तुम धरा के क़रीब और वह आसमान के बहुत ही क़रीब है इसलिए उसको अपना ऊँचा होना बहुत भाता है इसलिए गुरूर से भरा हुआ वो इधर से उधर घूम-घूम कर तुमको बहुत लुभाएगा, अति स्वछंदता के स्वप्न भी दिखायेगा, पर भटकना नहीं अपराजिता, तुम धरा के अति निकट हो, धैर्य और स्थिरता तुम्हारी भी प्रवृत्ति है| किसी दूसरे की प्रवृत्तियों को अपनाकर तुम अपनी मंज़िल पर पहुचों न पहुचों तय नहीं है। कभी मत त्यागना अपनी मूल प्रवृत्ति को क्योंकि तुम्हारी मंज़िल पराजय से नहीं जय से तय होगी।

सुनो अपराजिता! कभी स्वयं से ज़रूर मिलना जब तुम बंद नयनों को कर स्वयं से मिलोगी तो तुम्हारा मिलना उस प्रकृति से होगा जो तुम्हारा ही प्रतिरूप है। मूल रूप से निर्मल, निश्छल और निस्वार्थ बहने वाली, जिसका होना ही सृष्टि का होना है अपने आप में सम्पूर्ण। बस हरदम अपने अन्तः को सुनना वही सत्य है, वही सबसे सुन्दर और वही शिव है बाकी सब भटकन, दलदल और गर्त है। बहुत ऊँचे से अवतरित होने का मक़सद बहना, कलकल की ध्वनि में स्वयं के अन्तः को सुनना और भरपूर जीना है दलदल में गिरकर मलीन होना नहीं है बल्कि अपने साथ-साथ चलने वाले किनारों पर जीवन जगाना है, अपने होने को सार्थक करना है। राह में आने वाले हर रोड़े, पत्थर और शिला जैसी बाधा को छूकर या लाँघ कर लक्ष्य हासिल करना है क्योंकि अपराजिता तुम ही अपराजिता हो, आरम्भ से अंत तक अपराजिता ही रहोगी, अगर तुम भूली नहीं कभी भी कि तुम क्या हो......!


- प्रगति गुप्ता