प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अगस्त 2019
अंक -53

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ज़रा सोचिए

अपराजिता! तुम बहुत चुप क्यों हो
- प्रगति गुप्ता


"क्या हुआ अपराजिता, आजकल तुम बहुत ख़ामोश रहने लगी हो। मुझे भी कुछ बताओगी, किन बातों ने तुम को हैरान-परेशान कर रखा है। बेटी अपराजिता की ख़ामोशी को पढ़कर, अनायास ही मैंने आज बहुत दिन के अवलोकन के बाद पूछ ही लिया।

"नहीं माँ, सब ठीक है। शायद मेरी उम्र बढ़ रही है इसी वजह से छोटी-छोटी बातें मुझे आहत करती हैं। आप तो जानती ही हैं अब मेरी उम्र भी पचास से ऊपर हो गई है। कुछ न कुछ व्यवहार में परिवर्तन तो आएगा ही न!" शायद बेटी भी माँ को उम्र के इस पड़ाव में बेकार की छोटी-छोटी बातों में नहीं उलझाना चाहती थी सो उसने बात बदलने की कोशिश की।

"अपराजिता, तुम ज़रूर पचास से ऊपर की हो गई हो बेटा, पर मैं तुम्हारी माँ हूँ, जिसकी उम्र सत्तर साल है। अब मुझे तुम लोगों के बग़ैर बताये हुए भी, बहुत सारे आभास तुम्हारे चेहरों को देखकर हो जाते हैं। तुम्हारा काफ़ी समय से अपने आप में गुम हो जाना मुझे बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करता है, साथ ही बहुत आहत भी करता है।"

"तुमको याद है जब तुम छोटी थी या कैशोर्य अवस्था में थी, मैं तुम्हारे साथ जब घर के बगीचे में खेला करती थी और तुम्हारी बॉल जब किसी पौधे को टकराकर लौटती थी तो उस पर हिलते हुए फूलों को देखकर तुम मुझसे कहा करती थी- माँ, फूल ख़ुश होकर हाँ कर रहे हैं या ना कर रहे हैं और तुम ज़ोरों से खिलखिला कर हंस पड़ती थी। पत्तियों को छूकर तुम्हारा, उनको हवा के संग-संग झूमते हुए देखना तुम्हें उनका नृत्य करना लगता था और यही तुम्हारी मुस्कुराहट की वजह बनता था। बेटा, ऐसी ही न जाने कितनी बातें हैं, जो बहुत सरल और सहज थीं प्रकृति से जुड़ी हुई जो तुम्हारे बालमन की प्रकृति के अनुरूप थीं और यही सब बातें तुमको मुस्कुराने पर मजबूर कर देती थीं। कितना भी तुमको गुस्सा आया हुआ होता, तुम प्रकृति के सानिध्य में आते ही मुस्कुराने पर मजबूर हो जाती थी। तुम तो बहुत छोटी-छोटी बातों पर ख़ुश होने वाली मेरी बच्ची हुआ करती थी; फिर ऐसा क्या हुआ बेटा मुझे बताओ! बचपन में तुमने प्रकृति के सानिध्य में रहकर जो भी महसूस किया और अपनी आदतों में ढाला, वही तुम्हारे लिए आज तक सकारात्मक सोचों से जुड़ता गया। नतीजतन तुम किसी भी परिस्थिति में ख़ुश रहोगी और अपने आने वाले तनावों से निकल आओगी, मेरा हमेशा ही विश्वास रहा। प्रकृति ने तुमको ही नहीं मुझको भी एक तपस्वी की भांति जीवन के असल मायनों से जोड़ा है बेटा, फिर क्यों मैं तुमको तनाव में पाती हूँ! बताओ न अपराजिता?"

"क्या बोलूँ मैं माँ, बहुत थक जाती हूँ जब आज मैं, आपकी सिखाई हुई उन सब बातों को जो मुझे बहुत सहज रहना सिखाती थीं, हर स्थिति-परिस्थिति में आपके दिए जिन संस्कारों ने मुझे खुशी-खुशी सामंजस्य बैठाना सिखाया, जीवन जीने के असल मायने सिखाए, जब मैं उन्हीं बातों और संस्कारों को अपने जवान होते बच्चों को समझाने और सिखाने में अपनाती हूँ तो मुँह की खाती हूँ क्योंकि भेड़चाल के इस युग में सभी होड़ में गोड तोड़ सिर्फ़ दौड़ रहे हैं। अंधाधुंध अनुकरण इंसान को इंसान नहीं रहने दे रहा। परिणाम स्वरूप बच्चों को जब भी हंसते-मुस्कुराते देखती हूँ तो बहुत कुछ मशीनों-सा नज़र आने लगा है, जैसे कुछ भी नैसर्गिक नहीं रहा है। प्राकृतिक रंगों से दूर कर उन्हें कृत्रिमता ओढ़वाने में हम ही ज़िम्मेवार हैं। छोटी-छोटी कहानियाँ, जो जीवन में सुकोमल मन की पौध लगाती थीं, वो भी हमने ही गुम की हैं इस समय के हिसाब-किताब को रखने में।

"आज सोचती हूँ तो लगता है मेरे बच्चों ने कभी तसल्ली से बैठकर प्रकृति के किसी उपादान को एकाग्रता से निहारा हो और उसकी हर शय से कुछ सीखने का सोचा है.... शायद ही ऐसा कभी हुआ हो। बस भाग रहे हैं। हर ऱोज सोने से पहले कामकाज़ी बच्चे हों या कॉलेज स्कूल के बच्चे एक प्रोजेक्ट लेकर सोते हैं और उसी प्रोजेक्ट को अपने साथ लिए पूरा दिन गुज़ारते हैं। प्रोजेक्ट के पूरा होने न होने से ही उनके चेहरे की खुशियाँ और मुस्कुराहट ज़िन्दा रहती हैं और मरती हैं। कई-कई बार नम्बरों से जुड़े तनाव हों या नौकरी छूट जाने का डर और उनसे जुड़े टारगेट्स को पूरा करने के लिए, मैं उनको रात-रात भर बैचेन घूमते हुए देखती हूँ। उनकी रातें जीवन से जुड़ी जद्दोजहद के लिए अक्सर ही चक्कर काटते हुए गुज़रती हैं। सिर्फ यही वजह है, जो उनको स्वाभाविक-सी ज़िन्दगी जीने नहीं देती।" अब अपराजिता को गहरी साँस लेते हुए देखकर मैंने उसको कहा।

“बेटा! साँस तो ले ले। मैं यहीं हूँ तेरी सभी बातें सुनने को। पर आज इतने दिनों बाद तुझे सुनकर कम से कम मुझे तेरे अन्तेर्द्वंदों का पता तो चल रहा है।”
“माँ! मुझे प्लीज़ बता लेने दो हल्की हो जाऊँगी।” कहकर अपराजिता ने अपनी बात पूरी कहने की कोशिश जारी रखी।

"आज यह लैपटॉप और मोबाइल जैसी मशीनें, जो वर्तमान के कामकाज में ज़रूरी हैं और कुछ हमारे बच्चे लैपटॉप मोबाइल के दास बन चुके हैं। जब भी खाली होते हैं कामों से, मोबाइल में गेम या लैपटॉप पर गेम खेलने की दुनिया में चले जाते हैं। घंटों हमारे साथ बैठे हुए तो दिखते हैं पर ये लोग हमारे साथ होते नहीं हैं। कई बार लगता तो है साथ खाना खा रहे हैं या समय गुज़ार रहे हैं पर न जाने कौन-सी उधेड़बुन इनको सारा का सारा समय घेरे रहती हैं। इनकी शक्लें देखकर तो मुझे बहुत घबराहट होती है। अरसा हो गया होगा इनको खुल कर मुस्कुराए हुए....  एक दूसरे को महसूस किए हुए। बहुत पराजित महसूस करती हूँ मैं अपने आप को जब सोचती हूँ कि मैं क्या सिखाना चाहती थी पर सिखा पाई क्या? क्या मैं इनको शांत मन से रहकर जीना सिखा पायी? यही प्रश्न मुझे बार-बार आहत करता है।

"आज की माँग के हिसाब से मैंने इनको ख़ूब पढ़ा-लिखा कर बड़ा कर दिया है, आगे बढ़ने के लिए इनको हर तरह की सुविधाएँ दीं ताकि अपने कार्यक्षेत्र में ऊँचाइयाँ हासिल कर सकें। इनको समर्थ बनाने के चक्कर में शायद मैं उतना संस्कारित नहीं कर पायी, जितना मैं करना चाहती थी। इनको विभिन्न परिस्थितिओं में कैसे शांत रहा जाये, मैंने यह सिखाने की कोशिश तो की पर बच्चे पूरी तरह अपने जीवन में उसको उतार नहीं पाये क्योंकि उनकी प्राथमिकता की सूची में कृत्रिम खुशियों ने भी घुसपैठ कर ली है।

"माँ, बच्चे तो चल पड़े हैं उसी राह पर, जो हम ने दिखाई थी, पर मैं ही साम्य नहीं बैठा पायी। हारने लगी हूँ मैं अब। आपको याद है, हालांकि आप टोकती भी थीं, पर मैं बच्चो के मोह में, जब भी ये स्कूल से आते थे, जो इनके हिस्से के काम होते थे, मैं ख़ुद करके देती थी ताकि जल्दी से जल्दी यह पढ़ाई में जुट सकें। इनको उस पढ़ाई के बीच कभी आसपास दिख रही परेशानियों और दर्द को महसूस करने का समय हमने ही नहीं दिया। हमने तो बस इनको आगे बढ़ने के लिए टारगेट दिया और उस टारगेट की पूर्ति के लिए सारी की सारी सुविधाएं उनके हाथों में लाकर कुछ इस तरह थमा दीं कि मानो इसके आगे सभी कुछ गौण है। हम टारगेट पर ही फोकस करते रहे और मानवीय संवेदनाओं और आपसी दुःख दर्द को दिल से महसूस करने के लिए हम लोगों ने उनको बहुत कम समय दिया। अगर बच्चे दिल से कभी कुछ महसूस करते तभी तो माँ, सब कुछ नैसर्गिक-सा होता और यही बच्चे बहुत अलग होते... पहले हमने टारगेट थमाये, अब जहाँ काम करते हैं वहाँ पर मिले हुए टारगेट इनको स्वयं से ऊपर नहीं आने देते। बहुत क़रीब से महसूस दर्द इंसान को हर कदम पर अपूर्व-सी अनुभूतियाँ देते हैं| हम जनक इनको आगे बढ़ते-पढ़ते देखने में इनको असल जिंदगी दिखाना भूल गये।

“हाँ बेटा, कई बार अनचाही गलतियाँ हो जाती हैं, जिनकी वजह से सारा दोष स्वयं पर मत ओढ़ो बेटा। इससे अत्याधिक परेशान हो जाओगी बस। मैंने अपराजिता को सांत्वना देने के उद्दश्य से कहा पर शायद बहुत कुछ कहने को बाकी था, जिसको उसने जारी रखते हुए कहा-
"माँ! जब भी कभी घर में मेहमान आते हम बच्चों को उनसे मिलने नहीं देते थे क्योंकि उनसे बातें करने में पढ़ने का समय न ख़राब हो जाये। हमने ही उनको सामाजिक प्राणी से व्यक्तिवादी बना दिया। नतीजतन हम ही अकेले रह गए ना। कितना दोष दें इन बच्चों को जबकि कभी इनसे हमने ही खुद कुछ नहीं करवाया। जिम्मेदारियों को ग्रहण करना हम ही को सिखाना था और हमने अपनी महत्त्वाकांक्षाओं को इनके उपर थोप दिया।

"माँ, आपने तो बहुत दिया सभी रूप में, तभी तो मैं आज आपको और आप मुझे महसूस करती हो और हम एक-दूसरे के सुख और दुख को साथ-साथ जीते हैं। पर हम जैसे आज के जाने कितने ही जनक इसी भागदौड़ की वजह से रीते हो चुके हैं। राजा जब छोटा था, तुम कहा करती थी इसको लेकर खाली समय में बगीचे में बैठो और उसको ठंडी हवा महसूस करवाओ और मैं खुद ही अपने फोन, अपनी नौकरी की व्यस्तता के साथ इन सब में सामंजस्य नहीं बैठा पाई माँ।
राजा जब मेरे मोबाइल में व्यस्त रहता था या खेलता था, मैं उसी समय अपने कामों को निपटाया करती थी। उसकी आदतें तो मैंने ही खराब कीं, आज पलट कर देखती हूँ तो एक बहुत बड़ा निर्वात मुँह खोले मुझे नज़र आता है। माँ उस निर्वात के गले में बच्चे ही नहीं हम सभी भी गिरते चले गए हैं। आपको याद है, आपका और पापा का हम सभी को हिल स्टेशंस पर ले जाना, पहाड़ों को करीब से देखना, घंटों सड़कों पर पैदल चलकर शहर की सैर करना, इनकी महत्ता से हमको रूबरू करवाना ही था। मैं आज अपने बच्चों को यह सब नहीं सिखा पायी।"
बोल कर मैं सुबकने लगी तो माँ ने क़रीब आकर बहुत देर तक गले लगाकर रखा और बोली, "बेटा, परम्पराएँ, रीतियाँ और संस्कार पुराने और नए नहीं होते, ये ज़रूरतें हैं जीवन की, जिनको अपने संग जोड़कर हम एक ज़िन्दा ज़िन्दगी जीते हैं। यही जीवन है बेटा। पर किसी भी बात की प्रकृति और उद्देश्य को महसूस किये बगैर कुछ भी जीवन्त नहीं लगता। समय के हिसाब से परिवर्तन भी बहुत ज़रूरी है। बेकार की परम्पराओं और रीतियों पर सकारात्मक विश्लेषण बहुत ज़रूरी है।

"अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा, खुद को संभालो, खुद उदाहरण सेट करो। बच्चे तुम्हारे हैं, उनके अंदर भी तुम्हारा अंश है, समय के साथ ज़रूर समझेंगे। तुम्हारे हारने से सब हार जाएगा। कोशिश करो तभी जीतोगी। तुम्हारा नाम अपराजिता है, तुम को पराजित नहीं होना है, सब ठीक हो जाएगा। जीवन में बहुत सारे ऐसे दोराहे आते हैं, जिन पर हम अपनी गलतियों को सोचने लगते हैं पर बहुत कुछ सीखते भी हैं। देर-सबेर थक कर यह बच्चे भी लौटेंगे बेटा क्योंकि शांत रहने के लिए जतन करना प्रकृति से जुड़ी हर शय का मूल रूप है बेटा। बस अपनी कोशिशें जारी रखो। उम्मीद से ही संभावनाओं के अंकुर फूटते हैं बेटा।"

अपराजिता को समझाते-समझाते कब मैं भी सोच में डूब गयी। माना कि आज की परिस्थितियाँ पहले की स्थिति-परिस्थितियों से थोड़ी भिन्न हो चली हैं पर भावों और संवेदनाओं का रूप कभी नहीं बदलता, अगर उनकी नैसर्गिकता को सहेजने की कोशिश की जाये। जीवन लाख़ संघर्षमय हो, सकारात्मक सोच और महसूस किये हुए भाव रिश्तों में प्रगाढ़ता पैदा करते हैं। इंसान की महसूस की हुई संवेदनाएँ रिश्तों को जिन बंधनों से बांधती हैं, वही ठहराव नज़र आता है। सोच कर देखिए।


- प्रगति गुप्ता