प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अगस्त 2019
अंक -52

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

बाल-वाटिका

ख़ुशियों के मज़े

फुलवारी-सी दादी मेरी,
बाग़-बगीचा दादा।

दादीजी ममता की मूरत,
जी भर नेह लुटातीं।
लाड प्यार की बूंदें बनकर,
बच्चों पर झर जातीं।
प्यार भरी झिड़की देती हैं,
पर चेहरा मुस्काता।
फुलवारी-सी दादी मेरी,
बाग़-बगीचा दादा।।

वाणी दादाजी की ऐसी,
जैसे झरने गाते।
हँसी फुलझड़ी जैसी होती,
फूलों-से मुस्काते।
मस्ती में रहते जैसे हों,
ख़ुशी नगर के राजा।
फुलवारी-सी दादी मेरी,
बाग़-बगीचा दादा।।

घर के सभी नन्हियाँ नन्हें,
तितली-से मंडराते।
घेर-घेर दादा-दादी को,
अल्हड़ गीत सुनाते।
जो भी घर आता खुशियों के,
मज़े लूट ले जाता।
फुलवारी-सी दादी मेरी,
बाग़-बगीचा दादा।।


********************


फूल हँस पड़ा गमले में

नीला प्यारा सरल सलोना
फूल हँस पड़ा गमले में।

हवा चली तो हिला-हिला सिर,
करने लगा नमस्ते जी।
सोते पड़े अभी तक बच्चों,
जल्दी क्यों न उठते जी!
डाल पत्तियाँ हो गये शामिल,
मस्ती के इस अमले में।
नीला प्यारा सरल सलोना
फूल हँस पड़ा गमले में।।

हाय-हेलो भौंरों से की तो,
तितली से हुई दुआ सलाम।
नन्हीं दोस्त चींटियों से भी,
उसने झुककर किया प्रणाम।
छूकर कान निकल गई चिड़िया,
डरा नहीं उस हमले में।
नीला प्यारा सरल सलोना
फूल हँस पड़ा गमले में।।

तभी किरण सूरज से आकर
छूने लगी फूल के गाल।
धूप भरी उसकी झोली में,
किया फूल को माला माल।
हँसी सुनी तो सभी पास के,
पेड़ जुड़ गए मजमें में।
नीला प्यारा सरल सलोना
फूल हँस पड़ा गमले में।।


- प्रभुदयाल श्रीवास्तव
 
रचनाकार परिचय
प्रभुदयाल श्रीवास्तव

पत्रिका में आपका योगदान . . .
कविता-कानन (1)बाल-वाटिका (2)