अगस्त 2019
अंक - 52 | कुल अंक - 53
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

पुराने गीत-संगीत में आत्मा की मिठास अभी भी बाकी है- डॉ. अनिल शर्मा

 


आज हम आप सबकी मुलाक़ात करवा रहे हैं राजस्थान के जाने-माने ग़ज़ल गायक़ अनिल शर्मा जी से, जो ग़ज़ल गायकी में राजस्थान का एक चमकता सितारा बनकर उभरे हैं बल्कि यूँ कहिये कि यह सितारा कुछ रोज़ में चाँद होने को है। आप मूल रूप से हरियाणा के निवासी हैं लेकिन पिछले 25 सालों से आपकी कार्यस्थली जयपुर है। अतः आप राजस्थान और हरियाणा दोनों की सम्मिलित  धरोहर हैं, यह माना जाए तो भी कुछ ग़लत नहीं होगा। इत्तेफ़ाक़ देखिये कि जिन जगजीत साहब की गायकी के दीवाने अनिल जी हैं, वे जगजीत साहब भी राजस्थान और हरियाणा दोनों की धरोहर, दोनों जगह के निवासी व चहेते रहे हैं। आपने जगजीत सिंह, मो. रफ़ी, भूपेंद्र, किशोर कुमार सहित तमाम बेहतरीन गायकों द्वारा गाये गये संजीदा गीतों-ग़ज़लों को अपनी दर्दभरी पुरकशिश आवाज़ और भीगे कण्ठ से गाकर इन तमाम श्रद्धेय गायकों के प्रति अपनी श्रद्धांजलि व श्रद्धा व्यक्त की है। उसके लिए ये साधुवाद के पात्र हैं।

इन दिनों अनिल जी सबसे ज़्यादा चर्चा में अपने द्वारा कंपोज की गयी व गाई गयी ग़ज़लों  के लिए हैं। आप विभिन्न शायरों की बेहतरीन ग़ज़लों को अपने कम्पोजिशन के साथ अपनी ही आवाज़ के माध्यम से जो एक ज़िंदगी दे रहे हैं, एक आकार दे रहे हैं, एक रवानी दे रहे हैं; वह क़दम अभिनंदनीय है, प्रशंसनीय है। आपकी आवाज़ में समंदर की गहराई है तो नदी की रवानी है, पपीहे की सी हूक है तो गुड़ की सी मिठास है। आइए जानते हैं अनिल जी की ज़ुबानी अनिल जी के संगीत की कहानी कि आख़िर किस तरह कितनी जद्दोजहद के बाद आज उन्होंने यह मुक़ाम हासिल किया, जिस पर वो पँहुचे हैं।


आशा पांडेय ओझा- नमस्कार अनिल जी। आप पिछले लंबे अरसे से जयपुर में हैं पर आप मूल रूप से शायद हरियाणा के निवासी हैं। यह गायकी का शौक़ आपको कब से लगा? मेरा आशय है कि आप गायकी के क्षेत्र कब व कैसे उतरे? क्या आपने गायकी की कोई ख़ास तालीम भी हासिल की है? आपको इस क्षेत्र में शुरुआती दिक्क़तें क्या रहीं?
अनिल शर्मा- जी, आशा जी। मैं मूल रूप से हरियाणा के हिसार का रहने वाला हूँ और हिसार में ही मेरी पढ़ाई-लिखाई, परवरिश हुई है। हरियाणवी माहौल में पलने-बढ़ने के कारण मेरी भाषा में हरियाणवी लहजे का असर था, जिसको ठीक करने के लिए मुझे बहुत मेहनत करनी पड़ी। जगजीत सिंह जी को कॉलेज में आने के बाद जब पहली बार सुना तो उनसे बहुत प्रभावित हुआ और तबसे मैं ग़ज़ल गायकी के क्षेत्र में उनको गुनगुनाते हुए आगे बढ़ने लगा। गाना बचपन से ही गाता था। जबसे होश संभाला तबसे गाता था। स्कूल में प्रेयर भी मैं करवाता था और स्कूल के हर कार्यक्रम में शुरू से ही हिस्सा लेता रहा था। मुझे उसका काफ़ी फायदा हुआ। मुझे गाने के लिए मंच मिलता रहा लेकिन परिवार की तरफ़ा से किसी तरह का सपोर्ट नहीं मिलता था। पिताजी गायकी करने के पक्ष में नहीं थे। वे कहते थे कि गाना बजाना अच्छे घर के बच्चों का काम नहीं है। पढ़ो-लिखो और अपना करियर बनाओ तो उनके आदेश को शिरोधार्य करते हुए मैंने पढ़ाई की ओर ध्यान दिया और आज मैं जिस मुक़ाम पर हूँ; पढ़ाई के कारण और उनके आदेश की पालना के कारण ही है। उनके आशीर्वाद के कारण ही है। लेकिन संगीत को मैंने कभी छोड़ा नहीं। मेरा रियाज़ जारी रहा। मैं छुप-छुप के रियाज़ करता था। यूनिवर्सिटी में जब मैं आया और हॉस्टल में रहने लगा तो मेरे लिए रियाज़ करना आसान हो गया। उसी दौरान कुछ संगीत सीखने का मौक़ा मिला। शुरुआती दौर में मेरे गुरुजी श्री विनोद गोल्डी थे, जिनसे मैंने संगीत सीखा और ग़ज़ल गायकी के क्षेत्र में धीरे-धीरे अपने पाँव जमाने लगा। मैं यूथ फेस्टिवल वगैरह में जाता था। आकाशवाणी पर जाता था और यूनिवर्सिटी में जितने भी प्रोग्राम होते तो उनमें पार्टिसिपेट करता था। इस तरह से संगीत के क्षेत्र में धीरे-धीरे मैं आगे बढ़ता गया और पढ़ाई भी जारी रही। नौकरी में आने के बाद कुछ वक्त के लिए संगीत पीछे छूट गया था। पारिवारिक ज़िम्मेदारियों की वजह से लेकिन जो संगीत धमनियों में रचा बसा था, उसने कभी मेरा साथ नहीं छोड़ा। कुछ ज़िम्मेदारियों से मुक्त होने के बाद मैंने वापिस अपने संगीत को एक्टिवेट किया, जागृत किया और आप सभी लोगों/ चाहनेवालों की दुआओं से संगीत के क्षेत्र में आगे बढ़ रहा हूँ।

आशा पांडेय ओझा- व्यक्ति जिस क्षेत्र में आगे बढ़ता है, प्रसिद्धि हासिल करता है; अपने उस क्षेत्र में आगे बढ़ने व प्रसिद्धि के पायदान पार करने के पीछे किसी न किसी का सहयोग ज़रूर मानता है। आप भी आज जिस मुक़ाम पर हैं, क्या उसके पीछे भी किसी का हाथ है, किसी का सहयोग, किसी की दुआ, किसी के प्रयत्न हैं?
अनिल शर्मा- संगीत सीखने की शुरुआत तो विनोद गोल्डी जी से हुई थी परन्तु उसके बाद में जयपुर में आ गया और जयपुर में आने के बाद से आज भी मैं श्री दिनेश चंद्र गोस्वामी से शास्त्रीय संगीत की तालीम ले रहा हूँ और बहुत कुछ सीख रहा हूँ उनसे। सीखने की यह परंपरा हमेशा क़ायम रहेगी क्योंकि इंसान ज़िन्दगी भर एक विद्यार्थी बना रहता है और सीखता रहता है। मेरी सफलता के पीछे मैं अगर किसी का हाथ मानूं तो सबसे बड़ा हाथ तो मेरी ख़ुद की लगन का, मेहनत का, जुनून का, डेडीकेशन का है। मैं पागलपन की हद तक संगीत से प्यार करता हूँ और सरकारी नौकरी में वेटरनरी के इतने चैलेंजिंग प्रोफेशन में होते हुए भी फील्ड जॉब करते हुए मैंने रियाज़ के लिए सुबह 2 घंटे और रात को 2 घंटे का वक़्त हमेशा निकाला है और आज भी निकालता हूँ। मेरा यह रियाज़  कभी नहीं छूटता। अगर किसी दिन रियाज़ न कर पाऊं तो बहुत ही ख़ालीपन महसूस होता है और यह लगता है कि मेरी दिनचर्या का एक बहुत अहम हिस्सा, जिसके बिन मैं अधूरा हूँ; वो मैंने मिस कर दिया।

आशा पांडेय ओझा- जब आपको गाते हुए सुनते हैं तब एक बार को तो यही लगता है कि जगजीत साहब को ही सुन रहे हैं। बहुत अधिक गहराई में जाकर डूबकर सुनने पर ही पता चलता है कि ये तो अनिल शर्मा जी गा रहे हैं। जो व्यक्ति आपको नहीं जानता, वह तो यही मानेगा कि जगजीत जी की गाई ग़ज़ल है। जगजीत जी की उस मख़मली शानदार आवाज़ और लहजे से मिलती-जुलती आपकी आवाज़ और लहजे के कारण क्या आपको कभी कोई फ़ायदा अथवा नुकसान हुआ?
अनिल शर्मा- जगजीत सिंह जी से आवाज़ मिलने का मुझे फ़ायदा ही फ़ायदा हुआ, नुक़सान कुछ नहीं। आज मुझे 'वॉइस ऑफ जगजीत सिंह' के नाम से भी जानते हैं लोग। पिछले साल 8 फरवरी 2018 को मुंबई में रेसकोर्स में जगजीत सिंह जी का 77 वां जन्मदिन मनाया गया था। उसमें चित्रा जी भी मौजूद थीं और उन्होंने स्पेशली मुझे आमंत्रित किया था उस प्रोग्राम में ग़ज़ल प्रस्तुत करने के लिए। चित्रा जी ने कहा कि बहुत से लोग हैं, जो जगजीत सिंह जैसा गाते हैं  लेकिन तुम उनके सबसे नज़दीक हो। यह मेरे लिए बहुत बड़ा कंपलीमेंट था, एक आशीर्वाद था कि ख़ुद चित्रा जी ने यह कहा। जगजीत सिंह जी के बड़े भाई जसवंत सिंह जी ने भी गंगानगर में जब मेरा एक प्रोग्राम था। उन्होंने बाहर से मुझे सुना। कहा कि भैया आवाज़ तो जगजीत सिंह की है। जब अंदर आए उन्होंने मुझे गाते हुए देखा तो उनको बड़ी हैरानी हुई कि यह हूबहू जगजीत सिंह की आवाज़ कहाँ से आ गई! मैं उनका बड़ा भाई होकर भी नहीं पहचान पाया। मैं मानता हूँ कि बिल्कुल वैसा कलाकार दुनिया में आ गया! उनका यह कहना मेरे लिए बहुत बड़ी सफलता है।
मैं कोशिश करता हूँ कि उनके जाने के बाद जो उनकी कमी इस दुनिया में महसूस की जाती है अगर मैं उसको पूरा करता हूँ तो यह मेरे लिए ख़ुशी की बात होगी और मैं उसी कोशिश में लगा रहता हूँ।

जैसा कि मैंने बताया कि जब मैं हॉस्टल में था यह बात है लगभग मेरे 18 वर्ष की आयु के आसपास की। दूरदर्शन पर मिर्ज़ा ग़ालिब सीरियल आता था। उसमें जगजीत सिंह जी की ग़ज़लें थीं और उसका जो टाइटल सोंग था- 'हजारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले' वह जब सीरियल रात को शुरू होता था तो हमारे हॉस्टल के कॉमन रूम में टीवी में उनकी आवाज़ मुझे जहाँ भी दूर तक सुनाई पड़ती थी, मैं दौड़ा चला आता था और उस आवाज़ की कशिश की वजह से मैं खाना छोड़कर भी भाग पड़ता था। वह आवाज़ मुझे इतनी इंप्रेसिव लगती थी कि उसी में डूब जाने को मन करता था। फिर मैंने जगजीत सिंह जी की कैसेट ख़रीदी और उनको घंटों सुनता रहता था। ऐसा जादू था उनकी आवाज़ में कि वह अपनी तरफ खींचती थी। एक सम्मोहन था उनकी आवाज़ में। मैंने उनको इतना सुना, इतना सुना कि उन्हें सुन-सुन, सुन-सुन कर ही मैंने अपने तलफ्फुज़ में सुधार किया, जो हरियाणवी लहजा मेरी ज़ुबान में था, उस लहजे को मैंने जगजीत साहब को सुन-सुन कर ही ठीक किया है। एक बार यूनिवर्सिटी के प्रोग्राम में मेरे द्वारा जगजीत सिंह जी की ग़ज़ल सुनाने के बाद श्रोताओं ने इतनी तारीफ़ की कि "तुम्हारी आवाज़ तो बिल्कुल जगजीत जी जैसी लगती है।" मैं मानता हूँ भगवान ने मुझ पर इतनी बड़ी कृपा की है और मुझे जगजीत सिंह जी जैसी आवाज़ दी है तो यह मेरे लिए बहुत बड़ा आशीर्वाद है। मैं बचपन से कई गायकों को सुनता आया लेकिन मुझे जगजीत सिंह जी की गायकी ने और उनकी आवाज़ ने इतना प्रभावित किया कि मेरे अंदाज़ में जाने-अनजाने जगजीत जी समा गये और मेरी गायकी का अंदाज़ उनसे मिलने लगा। यह मेरे लिए सौभाग्य की बात है।


आशा पांडेय ओझा- आपके पसंदीदा गायकों, गायिकाओं में कौन-कौन आते हैं?
अनिल शर्मा- मेरे पसंदीदा ग़ज़ल गायकों में मेहंदी हसन साहब, जगजीत सिंह जी, गुलाम अली साहब मेरे पसंदीदा गायक हैं। पुराने बॉलीवुड फिल्मों के गायकों में रफ़ी साहब मेरे पसंदीदा गायक रहे हैं। किशोर दा, मुकेश जी इन सब के गीत मैं गुनगुनाता रहता हूँ।

आशा पांडेय ओझा- ग़ज़ल गायकी यूँ तो बहुत पुरानी विधा रही है। मीर ग़ालिब से लेकर मेहंदी हसन साहब हों या गुलाम अली साहब, बेग़म अख़्तर हों या परवीन शाक़िर यहाँ तक कि फिल्मों में भी ग़ज़ल बहुतायत मात्रा में गाई जाती रही है परंतु धड़कन-धड़कन में ग़ज़ल को अगर किसी ने उतारा है, ग़ज़ल को किसी ने सचमुच सँवारा है तो उसमें आदरणीय जगजीत साहब का बहुत बड़ा योगदान माना जाता है। आपकी क्या राय है इस विषय पर?
अनिल शर्मा- ग़ज़ल गायकी में बेग़म अख़्तर, मेहंदी हसन, गुलाम अली साहब जैसे बहुत बड़े-बड़े ग़ज़ल गायक हुए हैं लेकिन उन सबकी ग़ज़ल गायकी जो थी वह ख़ास लोगों के लिए थी दरबारों के लिए, महफ़िलों के लिए ज़रूर थी परन्तु वह गायक़ी आम आदमी के लिए नहीं थी। जगजीत सिंह जी ने ग़ज़ल को ख़ास लोगों से निकालकर आम लोगों तक पहुंचाया। हर ड्राइंग रूम तक पहुंचाया। हर कार, बस तक एक कॉमन मैन तक पहुंचाया। क्लासिकल संगीत ज़्यादा न समझने वाले लोगों के लिए भी उन्होंने ग़ज़ल को सुलभ संस्करण के तौर पर मुहैया किया। जगजीत जी कहते थे कि ग़ज़ल गायकी में आप शायर के जो जज़्बात को, अल्फ़ाज़ को म्यूजिक तले कुचलें नहीं, आप शायर को प्रस्तुत कर रहे हैं उसमें संगीत की ज़्यादा प्राथमिकता न हो। उसकी कंपोजीशन, संगीत उस पर हावी न हो और ऐसा न हो कि संगीत के नीचे अल्फ़ाज़ दब के रह जाएँ और शायर की जो फीलिंग है, वह गुम हो जाए, आपका म्यूजिक डोमिनेट हो जाए। जगजीत साहब की गायकी में म्यूजिक का रोल कम होता था, शायर के अल्फ़ाज़ का रोल ज़्यादा होता था। जैसे- होठों से छू लो तुम...बड़े सिंपल तरीके से गाया। एक ठहराव के साथ ख़ूबसूरत धुन के बावजूद ग़ज़ल के बोल कहीं दबे, कुचले, मसले नहीं गये। जगजीत जी द्वारा गाई गयी तमाम गज़लों की ये ख़ासियत थी इसी वजह से वे जन-जन मन-मन को प्रिय हुए।

आशा पांडेय ओझा- आज़कल जो गाने बन रहे हैं उनमें न तो अर्थ होता है न ज़ेहन में उतर पाने की क्षमता। अगर साफ़ शब्दों में कहूँ तो संगीत के नाम पर पिछले 25-30 सालों में जो एक फूहड़ता उतरी है, एक छिछोरापन आया है, क्या आपको नहीं लगता कि यह संगीत के लिए घातक समय है? साधना के साथ खिलवाड़ है?
अनिल शर्मा- जी बिल्कुल। जो आजकल के गाने बनते हैं, उसमें कहीं आत्मा नाम की चीज़ नहीं होती। वह संगीत के साथ एक तरह से बलात्कार है। पहले गाना एक शायर लिखता था जब उसका मूड होता था वह सिचुएशन के आधार पर गाना लिखता था। फिर उसका संगीत बनता था, उसकी धुन कंपोज की जाती थी। सिंगर्स को बुलाकर रिहर्सल की जाती थी। बार-बार रिहर्सल की जाती थी। तब जाकर वह कई टेक-रीटेक के बाद गाना रिकॉर्ड होता था। उसके अंदर आत्मा होती थी, फील होती थी। अगर हम पुराने गाने सुनते हैं तो आज भी मीठे लगते हैं लेकिन अब जो नए गाने बने हैं, उसमें न तो अल्फ़ाज़ होते हैं न कोई अच्छी शायरी होती है। उल्टे-सीधे अल्फ़ाज़ को गाली-गलौज को भी गानों में शामिल करके बना दिए जाते हैं और उसमें उसकी धुन भी ऐसी होती है तो महीने भर से ज़्यादा वह गाने चलते नहीं है और फिर ऐसे ग़ायब हो जाते हैं जैसे कभी बने ही नहीं। पुराने गीत-संगीत में आत्मा की मिठास अभी भी बाक़ी है। बिल्कुल शास्त्रीय संगीत पर आधारित होती है। आज के फूहड़ गाने सुनकर तकलीफ़ होती है कि हमारा नया संगीत किस दिशा में जा रहा है!

आशा पांडेय ओझा- क्या कभी राजस्थानी या हरियाणवी लोक गीत या फिल्मों में गाने के बारे में विचार नहीं किया? क्या निकट भविष्य में ऐसी कोई योजना है?
अनिल शर्मा- हरियाणवी और राजस्थानी गाने अभी तक नहीं गाये हैं लेकिन अगर कोई अच्छा ऑफर आता है, कोई बेहतरीन प्रोजेक्ट होता है, जिसमें अच्छे अल्फ़ाज़ हों और अच्छा संगीत हो तो मुझे गाने में कोई हर्ज नहीं है, कोई गुरेज नहीं है। हरयाणवी मेरी मातृभाषा है और राजस्थानी मेरी मौसी भाषा है, क्योंकि मैंने अपनी ज़िन्दगी का जितना वक़्त हरियाणा में गुज़ारा है, उससे से ज़्यादा मैंने राजस्थान में गुज़ारा है तो दोनों भाषाएं मुझे बहुत प्रिय हैं और दोनों भाषाओं में कभी अगर कोई अच्छा मौका मुझे मिलेगा तो मैं गाने की कोशिश करूँगा।

आशा पांडेय ओझा- अभी अभी जैसा कि आपने कहा जगजीत जी के मुख से जब आप यह सुनते 'हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पर दम निकले/ बहुत निकले मेरे अरमां लेकिन फ़िर भी कम निकले।' तो ग़ालिब साहब के इस शेर के मुताबिक़ आपके कितने अरमान इस क्षेत्र में पूरे हो चुके, कितने बाक़ी हैं?
अनिल शर्मा- जहाँ तक मेरे अरमान की बात है मेरे अरमान अभी पूरे नहीं हुए। मुझे अभी संगीत के क्षेत्र में और आगे बढ़ना है। जगजीत सिंह जी की जगह तो कोई नहीं ले सकता लेकिन मुझे अपना एक मुकाम हासिल करना है। ग़ज़ल को और आगे तक लेकर जाना है। ग़ज़ल गायकी में जगजीत जी के जाने से जो ख़ालीपन आया है, उसको भरने के लिए मुझे मेहनत करनी है और मैं मेहनत कर रहा हूँ। अच्छे-अच्छे बड़े-बड़े शायरों की ग़ज़लें गा रहा हूँ। कुछ अच्छे शायरों की ग़ज़लें भी मैंने कंपोज की हैं, उनका म्यूजिक ख़ुद कम्पोज करता हूँ और ख़ुद रिकॉर्ड करता हूँ। कम्पोजिशन के वक़्त संगीत में गायकी में नयापन लाने की कोशिश करता हूँ और काफ़ी हद तक क़ामयाब हुआ हूँ। मेरी अपनी कंपोजिशन को लोगों द्वारा बहुत पसंद किया जा रहा है। सोशल मीडिया पर लोग इंतज़ार में रहते हैं कि मेरी नई कम्पोजिशन कब आएगी। बहुत कुछ हासिल किया है इस क्षेत्र में पर अभी बहुत कुछ हासिल करना बाक़ी है। मेरे अरमान अभी पूरे नहीं हुए हैं। अभी बहुत कुछ ऊंचे मुक़ाम हासिल करने हैं और संगीत की सेवा करनी है, संगीत की साधना करनी है।

आशा पांडेय ओझा- आदमी जब कोई कार्य करता है तो उसके हर कार्य मे यूँ तो उसका समर्पण होता ही है, मेहनत होती ही है, त्याग होता है और उनकी बदौलत हर कार्य पूजा हो जाता है परंतु कुछ कार्य या मुक़ाम ऐसे होते हैं, जिनको करके लगता है मेहनत सफ़ल हो गई, 100 परसेंट हो गया। आपने भी बहुत अल्बम निकाले, बहुत सारी ग़ज़ल कम्पोज की, क्या किसी एक अल्बम या ग़ज़ल से किसी कारणवश विशेष लगाव हुआ?  क्या लगा आपको की आपकी अमुक ग़ज़ल दिल के बहुत क़रीब है?
अनिल शर्मा- वैसे तो किसी भी कलाकार को उसकी सारी कृतियाँ बेहद पसन्द होती हैं। मुझे भी मेरी सारी कंपोजिशंस बहुत प्रिय है लेकिन फिर भी कुछ कंपोजीशन ऐसी होती हैं, जो दिल के बहुत क़रीब होती हैं। मेरा पहला ग़ज़ल एल्बम 'इम्तिहान' रिलीज हुआ था 2011 में। उसकी ग़ज़ल-

वक्त-ए-नाज़ुक में भी अपनों का सहारा न मिला
एक भटके हुए मांझी को किनारा ना मिला


बहुत ही पसंद की गई और मेरे शो में भी लोग मुझसे हमेशा यह ग़ज़ल ज़रूर सुनते हैं और बार-बार फरमाइश करते हैं। यह ग़ज़ल मेरे दिल के बहुत क़रीब है।
मनोज कुमार जी रेलवे में ऑफिसर हैं, जिनकी ग़ज़ल मैंने अभी हाल ही में कंपोज की है, जो सोशल मीडिया पर बहुत पसंद की जा रही है। फेसबुक पर लगभग 40,000 से ज़्यादा उसके व्यू हो चुके हैं। उन्होंने बेरोजगारी की समस्या पर एक युवक की पीड़ा को कुछ इस तरह से बयां किया है कि-


चंद सिक्के फिर पसीने में बहा ले आऊंगा
आज चावल ला सका माँ कल दवा ले आऊंगा।


नूरुद्दीन फ़रशोरी साहब की ग़ज़ल-

नजर के सामने तस्वीर-ए-यार गुज़रे है
तू मुस्कुराता हुआ लालाज़र गुज़रे है


वसीम बरेलवी साहब की एक ग़ज़ल रिकॉर्ड की और उनको सुनाई तो वो बहुत ख़ुश हुए और आशीर्वाद दिया और बोले कि जगजीत जी के जाने के बाद फिर से उम्मीद जगा दी आपने। वह ग़ज़ल कुछ इस तरह से है-

तू समझता है कि रिश्तों की दुहाई देंगे
हम तो वो हैं तेरे चेहरे से दिखाई देंगे।


ऐसे ही बहुत सारी ग़ज़लें हैं, जो मेरे दिल के बहुत क़रीब हैं।

आशा पांडेय ओझा- क्या आपको नहीं लगता राजस्थान या हरियाणा कहीं भी सरकारों को क्या ग़ैर सरकारी संस्थाओं के साथ साझे प्रयास नहीं करना चाहिए अपनी माटी के कण-कण में छिपे हीरों को तलाश कर एक सही मुकाम तक लाने की? हालांकि कुछ प्रयास होते हैं पर जितने होते हैं मुझे नहीं लगता संतोषजनक हैं। आप क्या कहना चाहेंगे इस बाबत! क्या आप हमारी सरकारों के प्रयासों से संतुष्ट हैं?
अनिल शर्मा- बिल्कुल सही कह रही हैं आप। कला के क्षेत्र में आमतौर पर कलाकारों को ख़ुद ही संघर्ष करके अपना नाम, मुक़ाम हासिल करना पड़ता है। सरकारें कोई बहुत ज़्यादा सहयोग नहीं करती। कला से जुड़े लोगों को आगे बढाने में सरकार को प्रयास करने चाहिये हमारी जो सांस्कृतिक विरासत है हरियाणा की, राजस्थान की और इस मिट्टी में पैदा हुए उभरते हुए कलाकार जो किसी भी कला क्षेत्र से हों उन सब को आगे बढ़ने का मौका मिलना चाहिए और उनके लिए एक वातावरण तैयार किया जाना चाहिए। उनके लिए मंच और सुविधाएं मुहैया कराई जानी चाहिए ताकि वे कला के क्षेत्र में आगे बढ़ सके और करियर बना सकें। लेकिन सरकार के माध्यम से ये प्रयास ऊँट के मुँह में जीरा जितने ही हैं। ये प्रयास संतोषजनक नहीं हैं। सम्भावनाएँ जितनी अधिक हैं, प्रयास उतने न्यून हैं।

आशा पांडेय ओझा- यूँ तो एक कलाकार में असीम संभावनाएं होती हैं और उनका कार्य क्षेत्र भी असीमित होता है अतः आपसे बहुत कुछ जाना समझा जा सकता है, बहुत कुछ आपके बारे में और लिखा जा सकता है परंतु आपकी व्यस्तता के चलते फिर किसी रोज़ रूबरू होंगे आप हम नए सवालों के साथ नए जवाबों के साथ। आपकी गायकी नित नए मुक़ाम हासिल कर आप हरियाणा, राजस्थान ही नहीं गायकी के क्षेत्र में भारत की पहचान बने ताकि आपके गुरु तुल्य जगजीत जी जिनको सुन-सुन ख़ुद को सँवारा आपने व आदरणीय चित्रा जी ने आप पर आपकी गायकी में जो विश्वास किया, वो पुख़्ता हो आपको उज्ज्वल भविष्य की अंनत शुभकामनाओं के साथ इजाज़त लेती हूँ
नमस्कार

अनिल शर्मा- मेरी भी यही कोशिश है कि और आगे बढूँ सफलता के और नए मुक़ाम हासिल करूं। बड़ी असीम संभावनाएं हैं। बहुत कुछ हासिल किया जाना है और मैं चाहता हूँ कि जगजीत सिंह जी के जाने के बाद जो वैक्यूम रह गया है, उस वेक्यूम को मैं पूरा करूं और जो विश्वास चित्रा जी ने और जगजीत सिंह जी के बड़े भाई जसवंत जी ने और मेरे सभी चाहने वालों ने मुझ पर जताया है और मेरे कंधों पर इतनी बड़ी ज़िम्मेदारी दी है तो मैं पूरी निष्ठा से, ईमानदारी से उस ज़िम्मेदारी को निभा पाऊँ और ग़ज़ल की संगीत की साधना करता रहूँ, सेवा करता रहूँ। नए उभरते हुए जो कलाकार हैं, उनको भी प्रोत्साहित करता रहूँ। मेरी यही ख़्वाहिश है, यह प्रयास भी रहेगा। आपका धन्यवाद इस इंटरव्यू के लिए आपने मुझे यह मौका दिया, इसके लिए मैं आपका और आपकी पूरी टीम का तहे-दिल से शुक्रगुज़ार हूँ।

 
 
यूट्यूब पर डॉ. अनिल शर्मा को सुनें-

जाते-जाते वो मुझे अच्छी निशानी दे गया
https://www.youtube.com/watch?v=i9rEG66TgQk&feature=youtu.be

अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं-
https://www.youtube.com/watch?v=Z0G5umwHfRI&feature=youtu.be

कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता-
https://www.youtube.com/watch?v=BXmnsLbjp64&feature=youtu.be

दिल ढूँढता है फिर वही-
https://www.youtube.com/watch?v=AJmXWioBbU0&feature=youtu.be
 
 
साक्षात्कारकर्ता का परिचय

आशा पाण्डे ओझा
जन्मतिथि- 25 अक्टूबर, 1970
जन्म स्थान- ओसियां (जोधपुर)
शिक्षा- स्नातकोत्तर (हिंदी साहित्य), एल. एल .बी.
प्रकाशित कृतियां-
दो बूंद समुद्र के नाम (काव्य), एक कोशिश रोशनी की ओर (काव्य), त्रिसुगंधि (सम्पादन), ज़र्रे-ज़र्रे में वो है (नज़्म), वक़्त की शाख से (काव्य)
देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं व ई-पत्रिकाओं में कविताएं, मुक्तक, ग़ज़ल, दोहा, हाइकु, कहानी, व्यंग्य, समीक्षा, आलेख, निंबंध, शोध-पत्र आदि विधाओं की रचनाएँ निरंतर प्रकाशित
वर्तमान निवास- उदयपुर (राजस्थान)
ई-मेल: [email protected]
संपर्क: 07597199995

 

 


- डॉ. अनिल शर्मा

रचनाकार परिचय
डॉ. अनिल शर्मा

पत्रिका में आपका योगदान . . .
ख़ास-मुलाक़ात (1)