प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अक्टूबर 2015
अंक -50

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कहानी- लाभ-हानि

तनु मनोयोग से संजय का चेहरा देख रही थी।
कितनी पथरीली, खुरदुरी हो गई है संजय के चेहरे की धरा! ज्यों तेज़ धूप के लम्बे सफ़र में झुलस गई हो।
पहले तो ऐसा नहीं दिखता था वह। जब तनु संजय की संस्था में टाईपिंग सीखने जाया करती थी। संजय के व्यक्तित्व का आकर्षण ही तो था, जिससे बंधी-खिंची तनु संस्था में जाया करती थी।


कितना सौम्य, आकर्षक था संजय का व्यक्तित्व। साथ ही अपनी चारित्रिक दृढ़ता के लिए भी वह विख्यात हुआ करता था। सज्जनता के पर्याय संजय से महिलाएं/लड़कियां पर्दा नहीं करतीं। बेख़ौफ़ अपनी बातें बतातीं, संजय उनके सुक्ख्म-दुक्खम सुनता और अपनी धीर-गम्भीर वाणी में वह दो बातें ज़रूर बताता। एक तो धैर्य, दूजा स्वावलम्बन। वह कहा करता कि दुनिया में वे महिलाएं सिर उठाकर जी पाई हैं, जो स्वावलम्बी रही हैं। परतंत्र नारियां कुंठा और निराशा से घिरकर नर्क यातना भोगती रहती हैं।


निर्धन और निराश्रित महिलाओं के उत्थान के लिए संजय के दिमाग में एक योजना थी, उसकी दीदी जो परित्यक्ता थीं, उनका और अन्य कई महिलाओं का सहयोग लेकर उसने एक संस्था की नींव डाली।
‘सिलाई प्रशिक्षण संस्था’। लहंगा, ब्लाऊज, बच्चों के झबले आदि कपड़े सिलकर तैयार होने लगे। संजय इन कपड़ों को थोक दुकानदारों को बेच आता। आय का एक हिस्सा संस्था में लगता। महिलाओं को भी अच्छी खासी आमदनी हो जाती।


धीरे-धीरे संस्था लोकप्रिय हुई। आय बढ़ी तो एक बड़ा हाॅल किराए पर लेकर संस्था में टाईपिंग प्रशिक्षण प्रारम्भ हो गया। सिलाई, टाईपिंग के अलावा कुकिंग-बेकिंग क्लास आदि का काम भी किया जाने लगा। राज्य-सरकार की महिला उत्थान योेजनाओं से अनुदान भी संजय के अथक प्रयासों से मिलने लग गया।
संजय की परित्यक्ता दीदी और उनके बच्चे साथ ही रहा करते थे। उसके पिताजी कलेक्ट्रेट में बड़े बाबू थे। उनकी मृत्यु के पश्चात संजय को अनुकम्पा नियुक्ति के तहत नौकरी मिली। पिता के जीवनकाल ही में दीदी ससुराल से प्रताडि़त अपमानित होकर मैके आ गई थी। दीदी के पति शराबी, व्यभिचारी और अत्याचारी निकल गये, परिणामतः दीदी ने उन्हें छोड़ना उचित समझा।


संजय की बेरोजगारी और दीदी की असफल वैवाहिक परिणति ने पिताजी को झकझोर डाला। वे दिमागी शून्यता का शिकार हुए। स्थानीय स्तर पर जो भी चिकित्सा सुविधा थी, उन्हें आजमाया गया। संजय के बड़े भाई अजय जो कि एन.टी.पी.सी. में अधिकारी हैं, उन्होंने भी अंत समय में काफी खर्चा किया, किन्तु पिताजी बचाए नहीं जा सके।
पिताजी की मृत्यु का कारण चाहे जो रहा हो, अजय भाई साहब इसे आज भी संजय की बेरोजगारी और अकर्मण्यता को मानते हैं। इसी बात पर उन्होंने संजय को वो जली-कटी सुनाई कि दोनों भाईयों के बीच सम्बंधों में दरार आ गई। अम्मा ने लाख प्रयास किए किन्तु ये खाई पटी नहीं।


पिताजी की मृत्यु, दीदी के दुःख और अजय भाई साहब के अहंकार से संजय इतना आहत हुआ कि उसने प्रतिज्ञा कर डाली कि वह शादी नहीं करेगा।
अम्मा ने कसमें खाईं, मर जाने की धमकी तक दी, किन्तु संजय टस से मस न हुआ।
दो लड़के और एक लड़की की मां यानी अम्मा पर संजय की शादी के लिए समाज का दबाव बढ़ता जा रहा था। अम्मा करें तो करें क्या? कोई खोट भी तो नहीं था उसमें, दिन-रात काम में मगन रहता। संस्था, नौकरी और घरेलू जिम्मेदारियां, सभी मोर्चों पर चुस्त-दुरस्त। कहीं कोई खामी नहीं।

 

अजय भाई साहब जाने कहां-कहां से संजय के विवाह के लिए ‘हाई-प्रोफाईल’ रिश्ते ला-लाकर अम्मा के कान भरते। उन्हें उकसाते, लड़कियों के फोटो घर में छोड़ जाते। अम्मा ठहरीं भोली-भाली। हर तस्वीर उन्हें भा जाती लेकिन शादी तो उनकी थी नहीं। संजय बाबा को पसंद आए तब न बात आगे बढ़े।अजय भाई साहब संजय की उदासीनता से और अधिक उग्र हो जाते। दो चोंच झगड़ा दोनों भाई में हो ही जाता। संजय अल्टीमेटम दे देता- "शहर की चिंता में काजी जी न ही दुबलाएं तो अच्छा....मेरी चिंता कोई न करे...बस्स!"

 

अम्मा हर वाक-युद्ध के बाद अन्न-जल त्याग देतीं। फिर अजय भाई साहब के जाने के बाद संजय अम्मा को मना लेता।
ऐसे ही एक दिन छोटी बहु का मुंह देखे बिना अम्मा चल बसीं।
क्रियाकर्म के दौरान अजय भाई साहब ने कई लोगों के सामने ऐलान कर दिया कि पिताजी और अम्मा की मृत्यु के पीछे इस नालायक, जि़द्दी संजय का ही हाथ है। ये ऐसा ज़हर-बुझा तीर था, जिससे संजय आज भी आहत है।



तनु संजय के चेहरे को ताक रही थी। संजय एक फाईल खोलकर पेपर में उलझा हुआ था। बीच-बीच में वह कुछ बुदबुदाता जाता, जिसे तनु अपनी डायरी में लिखती जाती। राज्य-शासन की तरफ से ‘आॅडिट’ का झमेला आ खड़ा हुआ है। फर्जी संस्थाएं तो हिसाब-किताब एकदम फिट रखती हैं, लेकिन संजय जैसे भावुक व्यक्ति के लिए आय-व्यय की व्यवहारिकता को लिपिबद्ध करना मगजपच्ची का काम था। तनु अर्थशास्त्र से एम.ए. है, वह भी संजय की यथासंभव मदद कर रही थी। दीदी को सिर्फ नाम की संचालिका बनाया गया था। सारा काम तो संजय के मत्थे है। ये तो जब से तनु आ गई है, संजय का बोझ बहुत हल्का हो गया है।  दीदी और तनु मिलकर संस्था का अधिकांश काम सुलटा लेती हैं।


संस्था में एक बड़ा-सा हाॅल है, जिसके अलग-अलग खण्ड हैं। एक कोने में सिलाई, दूजे में टाईपिंग, तीसरे कोने में कूकिंग क्लासेज और चौथे कोने में कढ़ाई-बुनाई। हाॅल से लगा एक आॅफिसनुमा कमरा जिसमें चार कुर्सियां हैं। संजय, दीदी, तनु और चौथी कुर्सी आगंतुक के लिए।
तनु ने टाईपिंग इसी संस्था में सीखी है। फिर जाने क्या हुआ कि तनु ने महिला स्वालम्बन की संस्था से खुद को इस तरह जोड़ लिया कि संजय उसे संस्था की रीढ़ की हड्डी कहता है। तनु परवाह नहीं करती कि पीठ पीछे लोग क्या कहते हैं? छोटे शहर में जवान लड़की का इतना बिंदास होकर रहना चर्चा का विषय बन ही जाता है।


तनु पांच बहनों में सबसे बड़ी है। उसके क्लर्क पिता ने, पुत्र की चाह में धड़ाधड़ पांच अवांछित बेटियों का अम्बार लगा लिया। संजोग से छठवीं संतान पुत्र के रूप में हुई और उनके घर की प्रयोगशाला में बच्चे जनने की प्रक्रिया बंद हुई। ये अलग बात है कि इतनी मान-मनौती के बाद उत्पन्न पुत्र यानी तनु का भाई एक नम्बर का नालायक और बदतमीज़ निकला। लौंडो के साथ नशाखोरी करने लगा। अब तो वह घर भी कम ही आता है।

तनु से छोटी बहन एक लड़के से प्यार करने लगी और एक दिन ऐसा गई कि आज तक वापिस लौट कर घर नहीं आई। उसके बाद वाली बहन दसवीं परीक्षा में अनुतीर्ण होने पर आत्महत्या कर बैठी। अब ऐसी घटनाएं जिस घर में हों तो उस परिवार की सामाजिक दुर्दशा का अंदाज़ा सहज ही लगाया जा सकता है।

 

तनु के परिवार की नगर में कोई इज्जत नहीं है। लोग बड़ी हिकारत से उन्हें देखते हैं। बाकी बहनें भी इतनी जल्दी जवान हो रही हैं कि तनु खुद हैरान है, खाने-पीने का ठिकाना नहीं और जवानी के फूल खिलते जा रहे हैं। तनु ने तीसरे नम्बर की बहन रेणु की शादी एक स्वधर्मी विधुर से करा दी। छोटी मनु ज़रूर तेज़ है पढ़ाई में। वह अपनी दीदी तनु की हर बात मानती है। शर्मीली है और स्कूल में अच्छा रिजल्ट लेकर आती है। तनु अपनी छोटी बहन को बहुत मानती है और उसे बारहवीं के बाद बाहर पढ़ने भेजना चाहती है। घर में कम से कम एक बच्ची तो आगे बढ़े। बुझते दीए की आखिरी लौ को बचाकर रखने के लिए तनु ने घर में रहकर कोई काम ढूंढना चाहा। एम.ए. अर्थशास्त्र होने से ऐसा नहीं था कि काम मिल जाता। टीचर बनने गई तो निजी स्कूल के संचालकों ने बी.एड की मांग की और बिना बी.एड के नाम-मात्र की तनख्वाह पर नौकरी करने पर मजबूर किया। पांच-छः घण्टे की ड्यूटी और पेमेंट के नाम पर हजार-बारह सौ रूपल्ली। उसने सोचा कि टाईपिंग सीख ली जाए ताकि कोई अच्छा सा काम मिल सके। आजकल कम्प्यूटर के की-बोर्ड से भी टाईपिंग सिखलाई जाती है। संजय की संस्था में दोनों तरह की टाईपिंग सीखने की व्यवस्था है।


संजय की संस्था में आई तो थी वह एक प्रशिक्षु बन कर लेकिन देखते-देखते वह एक स्वयंसेविका बन गई। उसने अपने सम्पर्क से समाज की कई बेसहारा युवतियों को प्रेरित किया कि वे संस्था में आएं और कौशल-विकास करें। संस्था को कपड़े सिलने का थोक में आर्डर मिलता ही था। तनु के प्रयासों से संस्था में अचार, पापड़, बड़ी बनाने का प्रशिक्षण भी दिया जाने लगा। संजय ने कई व्यापारियों से सम्पर्क किया और उनसे कच्चा माल लेकर सिर्फ मेहनताना के बदले सामान बनाना शुरू कर दिया।
संजय अब तनु की उपस्थिति से अनभिज्ञ नहीं था। वह जानता था कि संस्था की उन्नति में इस लड़की का बड़ा हाथ है। समाज में तिरस्कृत रहकर भी स्वावलम्बन के लिए प्रतिबद्धता तनु का एक दूसरा नाम है। संजय की चारित्रिक दृढ़ता, काम के प्रति सनक से तनु इतना प्रभावित थी कि वह उसके अस्तित्व को अपने अस्तित्व के साथ जोड़कर देखने लगी थी। संजय को वह गुरू मानती थी।


संजय भी तनु को संस्था की एक आवश्यक सहायक मानता था। लेकिन इसके अतिरिक्त भी वहां कुछ था जो तनु के जीवन में रासायनिक परिवर्तन ला रहा था। क्या संजय इस बात से अंजान हैै? तनु यही सोच रही थी कि संजय की घुड़की ने उसकी तंद्रा भंग की- "काम के समय काम की सोचा करो...!"
तभी बाहर किसी कार के रूकने की आवाज़ आई। संजय कार्यालय से बाहर आया। कार संस्था के प्रांगण में आ कर रूकी। दरवाजा खुला और अजय भाई साहब नमूदार हुए।
संजय को खटका लगा। अजय भाई साहब, इस समय बिना किसी पूर्व सूचना के, वह भी कार पर सवार? कई प्रश्न एक साथ कुलबुला उठे। समाधान भी शीघ्र मिल गया।
अजय भाई साहब तोप के गोले की तरह कमरे में दाखिल हुए। संजय ने अभिवादन किया, जिसे अनदेखा कर भाई साहब बोले- ‘‘संजय, चलो साथ में घर चलो।’’
एक आदेश था वह...जिसमें प्रश्न की कोई गुंजाईश नहीं दिखती थी।


संजय ठंडे स्वर में बोला- ‘‘आप बिना सूचना के इस समय? कोई बात है क्या?’’
भाई साहब की आवाज़ पिनपिना गई- "यार समझा करो, प्रश्न बाद में कर लेना। पहले उठकर बाहर तो चलो।’’
संजय को क्रोध हो आया- "ऐसी कौन मुसीबत आ गई है या पहाड़ टूट पड़ा है। बताते क्यों नहीं?"
भाई साहब की भृकुटि तन गई- "होशियारी दिखाने से बाज नहीं आओगे, बस जिद पर अड़े रहोगे। अरे भाई, बाहर गाड़ी में हमारे क्षेत्र के विधायक जी बैठे हैं। अपनी भतीजी के लिए वह तुम्हें देखने आए हैं, समझे।"
तो यह बात है...संजय मन ही मन सोचकर गम्भीर हो गया- "आप मुझसे पूछकर तो आए नहीं कि अगवानी के लिए बैंड-बाजा लेकर हाजिर रहूं। आप उन्हें लेकर घर चलिए....ज़रा सा काम निपटाकर मैं घर पहुंच रहा हूं।’’


संजय की इस बात ने अजय भाई साहब के लिए आग में घी का काम किया। उनका पारा सातवें आसमान में चढ़ गया। बिगड़कर बोले- "उन्हें लेकर घर चलिए...हुंह...कौन से घर, उसी कबाड़खाने में...जो कहता हूं वह करता नहीं और सलाह देता है मुझे। विधायक जी कितनी मान-मनौती के बाद तैयार हुए हैं बेवकूफ...जिन्दगी बन जाएगी तेरी...समझा!"
‘‘मत बनाइए आप मेरी ज़िंदगी...समझे भाई साहब, अम्मा-पिताजी के जीते जी यदि मेरी शादी न हुई तो अब शादी करूंगा भी नहीं। समाज का यदि बहुत ज्यादा दबाव पड़ेगा या मुझे जरूरत महसूस होगी तो तनु के पिता से आज्ञा लेकर इस लड़की से विवाह कर लूंगा। लाभ-हानि की मुझे फिक्र नहीं। आप अपनी सोचिए...इसके आगे मुझे कुछ नहीं कहना.."


अजय साहब भन्नाकर कार्यालय से बाहर चले गए। तनु अवाक संजय के चेहरे को निहारने लगी।
क्या वह भी ऐसा ही सोच रही थी जैसा संजय ने भाई साहब से कहा था...!!!


- अनवर सुहैल
 
रचनाकार परिचय
अनवर सुहैल

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