प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अगस्त 2019
अंक -52

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ग़ज़ल-गाँव

ग़ज़ल-

साँसों में ख़ुशबू का घुलना, तो माज़ी का किस्सा है
बाग़ हुआ करते थे जिस जा आज वहाँ पर सहरा है

क़ब्र हमारी खोद रहे हैं आग लगा कर जंगल को
अह्ल-ए-ख़िरद की सोच पे देखो, भारी पत्थर रक्खा है

और ज़ियादा का लालच, ये पेड़ों की गिरती लाशें
कल वो हवा को तरसेगा जो आज एसी लगवाता है

हारे लोग सिमट जाते हैं अपनी-अपनी हस्ती में
बाहर से मायूस हुआ जो अपने अंदर जीता है

बाद घुटन के चैन मिलेगा इस दुनिया में कुछ पल को
इस उम्मीद के रस्ते पर ये जीवन पैहम चलता है

दिखता है तेरी सूरत पर यूँ तूफाँ का अंदेशा
पुरख़ौफ़ निगाहें चुप-चुप सी, दिल भी सहमा-सहमा है

शोर-ए-मज़ाहिब पर हम नादां कान लगाए बैठे हैं
और किसी जानिब से लेकिन तूफाँ आने वाला है


माज़ी= भूतकाल, अह्ल-ए-ख़िरद= अक्ल वाले
पैहम= निरंतर, मज़ाहिब= धर्मों (मज़हब का बहुवचन)


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ग़ज़ल-

इस तरह हमने दिन गुज़ारा है
बारहा ख़ुद को ही पुकारा है

संग से क्या डरेगा वो जिसने
कू-ए-क़ातिल में दिन ग़ुज़ारा है

ज़र्द पत्ता हूँ मैं खिजाँ ने मुझे
पेड़ की शाख से उतारा है

कम है सोचो तो काइनात भी और
जीना हो तो जहान सारा है

जज़्ब कर दर्द मुस्कुराहट में
हमने चेहरा बहुत सँवारा है

हमपे कुछ इख़्तियार तो रखते
जो हमारा है वो तुम्हारा है

बाँट सकते हो तुम भी अपने ग़म
जो तुम्हारा है वो हमारा है


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ग़ज़ल-

किस ओर जाएँ हम कि हमें रास्ता मिले
फ़िरक़ापरस्ती का न कहीं फन उठा मिले

दिल इस जहान का अभी इतना बड़ा नहीं
हर हक़बयानी पर मेरा ही सर झुका मिले

नाज़ुक है मसअला ये अक़ीदत का दोस्तो!
आईना जो दिखाऊँ तो बस बद्दुआ मिले

ख़्वाहिश कहाँ रही मुझे महलों की ऐ ख़ुदा
बस ज़ेरे-आसमाँ तेरा ही आसरा मिले

ढहने लगी हैं आज अदब की इमारतें
इतिहास मलबे में यहाँ कुचला हुआ मिले

धरती थमी-थमी है फलक भी झुका-झुका
मैं मुंतज़िर हूँ अब कि कज़ा मुझसे आ मिले

इंसान खो गया कहीं आभासी दुनिया में
अब तर्जनी से अपनी, सुकूं ढूँढता मिले


फ़िरक़ापरस्ती= सम्प्रदायवाद, अक़ीदत= श्रद्धा,
ज़ेरे-आसमाँ= आसमान के नीचे, मुंतज़िर= इंतज़ार में, कज़ा= मौत


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ग़ज़ल-

तसव्वुर की भटकती फ़ाख्ता मुझमें
तलाशे मानो कोई घोसला मुझमें

खुले कैसे कहो ये राज़ दुनिया पर
कि उट्ठा है कोई तूफ़ान-सा मुझमें

वो ऐसे देखते हैं आजकल मुझको
कि जैसे बस अँधेरा रह गया मुझमें

मैं जितनी बार ख़ुद को देखता हूँ तो
नज़र आता है इक चेहरा नया मुझमें

मैं हर दिन देखता हूँ ख़ुद में शिद्दत से
कि जीने के लिए है आज क्या मुझमें


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ग़ज़ल-

लो आई ये हयात फिर अपने शबाब पर
उम्मीद तारी है मेरे हर एक ख़्वाब पर

दिखने लगी अलामतें अब तो बहार की
फिर क्यों निगाह जाए तुम्हारी सराब पर

आ-आ के बैठती हैं यूँ पलकों पे हसरतें
जैसे हुबाब बनते दिखाई दें आब पर

तुमको कभी विरोध गवारा ही था कहाँ
कितने सवाल उठा दिेए मेरे जवाब पर

आसां नहीं है राह-ए-मुहब्बत के मरहले
नक़्श-ए-जहां बनाते हो तुम तो हुबाब पर


अलामत= निशानी, सराब= मृगतृष्णा, हुबाब= बुलबुला
आब= पानी, मरहला= सफर


- शिज्जू शकूर
 
रचनाकार परिचय
शिज्जू शकूर

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