अगस्त 2019
अंक - 52 | कुल अंक - 55
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

फिल्म समीक्षा
खानदानी शफाख़ाना: 'बात तो करो पर ठीक से'
 
 
निर्माताः भूषण कुमार, महावीर जैन, मृगदीप सिंह लांबा, दिव्या खोसला कुमार व कृष्ण कुमार
निर्देशकः शिल्पी दास गुप्ता
लेखकः गौतम मेहरा
संगीतकारः तनिश्क बागची, रोचक कोहली, बादशाह व पायल देव
कलाकारः सोनाक्षी सिन्हा, वरूण शर्मा, नादिरा बब्बर, प्रियांशु जोरा, कुलभूषण खरबंदा, अन्नू कपूर, परेश आहुजा
 
हिंदी सिनेमा में 'विकी डोनर' , 'शुभ मंगल सावधान' और  बधाई हो जैसी अच्छी कहानी, सकारात्मक सोच पर खत्म होने वाली फिल्मों के बाद इस हफ्ते आई है - ' खानदानी शफाखाना। जहाँ विकी डोनर में आयुष्मान खुराना मुख्य भूमिका में थे उसी तरह खानदानी शफाखाना में सोनाक्षी सिन्हा मुख्य भूमिका है। एक औरत और वह जब सैक्स जैसे विषयों पर खुलकर बात करे तो उसे समाज अच्छी नजरों से नहीं देखता। लेकिन ये तो फ़िल्म है साहेब। परन्तु कमजोर पटकथा और हल्का निर्देशन यहाँभी कहानी के साथ न्याय नहीं कर पाता। 
 
फ़िल्म की कहानी शुरू होती है पंजाब के होशियारपुर में जहाँ खानदानी शफाखाना यानी ‘सैक्स क्लिनिक’ चलाने वाले हकीम ताराचंद (कुल भूषण खरबंदा) अपनी वसीयत में अपना यह दवाखाना अपनी भाँजी बेबी बेदी (सोनाक्षी सिन्हा) के नामकर जाते हैं। जिसमें भी एक शर्त है कि कम से कम छह महीने उसे यह क्लिनिक चलाना पड़ेगा, उसके बाद ही वह उस पर कोई और कदम उठा सकेगी या उसे बेच पाएगी। लेकिन घर-परिवार, दुनिया वालों के खिलाफ जाकर बेबी सिंह इस क्लिनिक को चलाती है। होशियारपुर की इस होशियार लड़की ने बहुत ही होशियारी से न केवल क्लिनिक चलाया बल्कि अभिनय में भी बहुत होशियारी से फ़िल्म को अपने कंधों पर खींच ले जाने की भरपूर और सफल कोशिश की।
लेकिन इस हट के वाली कहानी पहला भाग जितना सही और ठीक निर्देशन से खूबसूरतबन पाया है उतना ही बदसूरती का दाग इसका दूसरा भाग लगता है। यहीं से फ़िल्म स्क्रिप्ट, निर्देशन , किरदार, संवाद के मामले में कमजोर पड़कर पूरी फ़िल्म को बेअसर बनाते हैं। 
इस फिल्म के ही एक संवाद में कहें तो दुनिया की 17 फीसदी आबादी वाले इस देश के 130 करोड़ लोग कोई  प्रसाद वाले केले खा के तो प्रकट हुए नहीं हुए। लेकिन उसी  देश में ‘सैक्स’ शब्द सुनते ही सबके कान खड़े क्यों हो जाते हैं? आम लोगों में वर्जित और टैबू समझे जाने वाले इस विषय पर फिल्मों में बात होती है तो अच्छा तो लगता है।साथ ही इस तरह के अच्छे विषय पर लेखन करने वाले फ़िल्म के  लेखक गौतम मेहरा इस मोर्चे पर नाकाम साबित होते हैं। 
 
इस तरह की फ़िल्म के अच्छे विषय पर  फिल्म की डायरेक्टर शिल्पी दासगुप्ता बड़ी हिम्मत करके जब यह फ़िल्म बना रही है और उसमें भी एक औरत को ही आगे रखती है उसके लिए वे जरूर बधाई की हकदार बनती हैं।  फ़िल्म के किरदार या कहें नया नया अभिनेता प्रियांश जोरा (प्रियांश जोरा राजस्थान राज्य के अंतर्गत श्री गंगानगर शहर के रहने वाले हैं। एक छोटे से शहर के ग्रामीण इलाके, रायसिंहनगर से आने वाले प्रियांश इससे पहले कई धारावाहिकों में भी काम कर चुके हैं) और सोनाक्षी सिन्हा की जोड़ी कुछ खास कमाल पर्दे पर नहीं दिखा पाए। फ़िल्म में अभिनय तो सभी का औसत है। वहीं फ़िल्म के गानों में सिर्फ एक गाना है जो आपकी रूह को पकड़ता है वह है- 'दिल जानिए'
लेकिन कुल मिलाकर यह फ़िल्म दर्शकों के साथ न तो सच्ची मोहब्बत के साथ अपनी बात रख पाती है और न ही उसे दिल में बसने का मौका देकर उसे करार दे पाती है। 
कायदे से इस फ़िल्म में सेक्स पर खुलकर बात होनी चाहिए थी। जबकि उसी सेक्स शिक्षा की जरुरत को हास्य के मसाले के साथ बहुत ही हल्के तौर पर पेश किया गया लगता है। संगीत और बैकग्राउंड म्यूजिक भी फिसलता सा है। सिर्फ़ तनिष्क बागची इस मामले में अच्छे साबित हुए हैं। यूँ भी तनिष्क बागची अपनी संगीत प्रतिभा का लोहा इससे पहले कई फिल्मों में मनवा चुके हैं। 
 
अपनी रेटिंग-  2 स्टार
 
 

- तेजस पूनिया