अगस्त 2019
अंक - 52 | कुल अंक - 53
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कविता-कानन
कविताएँ
 
घर लौटते हुए 
 
काम पर गया 
एक शख्स लौट रहा है 
शहर अपने।
गाड़ी घर ले जा रही है उसे
मगर दूनी रफ्तार से भाग रहा है वह
कि अरमानों को पंख लग गए हैं
आंखों को मिल गया है
आसमान सा विस्तार 
कि गाड़ी की इत्तू सी 
खिड़की से
दिखलाई दे रहा 
पूरे घर, मोहल्ले में बिखरा उत्सव।
गाड़ी के पहियों को पंख लग गए हैं
कि उड़ रहे हैं ख्याल।
हाथ कभी संभालते हैं वस्त्र...
जांच लेते सामान 
कि कुछ छूट तो न गया पीछे
कि अफसोस हो क्यों भूल आए
वह जो लाया गया था
खास इस प्रसंग के लिए। 
टिकट तक जांच लिया जाता
बीसियों बार।
बैचेनी में बार-बार
उतारे-पहने जाते जूते।
आउटर पर ठिठकी ट्रेन
को कोसा जाता है 
सबसे ज्यादा,
देरी से पहुंचाने वाली हर
बाधा पर होती कोफ़्त।
ज्यों ज्यों करीब आता 
अपना शहर, मोहल्ला, घर
धड़कनें बढ़ जाती
आंखें चमक जाती
चेहरे पर आ जाती लालिमा
हर पहचानीे शै देख 
बढ़ जाता है रक्त प्रवाह
इस तरह घर लौटता 
शख्स
होता जाता है और खूबसूरत...
 
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सवाल तो तुम से भी होगा!
 
सवाल तो तुम से भी होगा
क्या कर रहे थे 
जब हो रही थी 
बेटियों की भ्रूण हत्याएं
जब नोंची जा रही थी मासूम
कि जहर की हो रही थी बुआई
जब काटी जा रही थी नफरत की फसल
जब फतवे तमाचे मार रहे थे
जब मानवता सलीब पर टांगी जा रही थी
हां, जिस वक़्त 
बोलना था तुम्हें
उस वक़्त क्या कर रहे थे? 
मोर्चा न खोलते भले 
लेकिन मुट्ठी कसी थी या 
तब भी निपट कोरे 
बैठे रहे थे तुम? 
जब तुम्हारी पृथ्वी 
कलुषित की जा रही थी
क्या कर रहे थे तुम
सवाल तो तुम से भी होगा..
 
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दो कुर्सियाँ
 
एक कमरा है 
एक आलमारी 
एक आईना 
एक ही बेड 
एक कंबल 
एक टेबल 
मगर कुर्सियां दो हैं
टेबल पर रखी प्यालियां दो हैं 
इसका मतलब यह कि
 
जब टूटने लगे एकांत 
छाने लगे अकेलापन 
तब संवाद के बहाने दो हैं
जरूरत हो तोड़ने की सन्नाटा 
तो मुलाकात के इरादे दो हैं।
 
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तुम्हारी हँसी
 
तुम हँसी थी उस दिन
आसमान पर औचक छाये
बादलों की तरह,
ऐसे जैसे एफएम पर बज उठे
अपना पसंदीदा गीत।
 
तुम उस दिन ऐसे हँसी थी
कि सितार के सुर
मेरे भीतर झंकृत हो उठे थे।
 
तुम्हारा हँसना अब भी वैसा ही होगा
मगर
जब भी सोचता हूँ तुम्हारी हँसी के बारे में तो
बरसों पुराने राग ही ताजा हो उठते...
तुम्हारी हँसी से खिले फूल 
किताबों में रह सूखे नहीं हैं अभी,
आज भी ताजा हैं
ऐसे जैसे सीप में मोती।
 
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उपहार 
 
प्रकृति ने हर अंग को दी है
प्रतिक्रिया जताने की ताकत
धरती जब खुश होती
बढ़ जाता है हरापन,
जब उम्मीद से भरा होता है आसमान
तब बढ़ जाती है बादलों की आवाजाही,
पेड़ जब खुश होते लद जाते फलों से
खिल जाते फूलों की मुस्कान में।
चिड़ियाएं अधिक चहचहाती
लीक पर चलने वाला बाघ भी
बौराकर बदल देता राह।
हम भी अपने ख़ुशी के पलों में
ठहाके मारते, चपलता से भर जाते,
कि कभी कभी आंखें छलक आती
कभी ओढ़ लेते खामोशी 
कभी तपाक से गले लग जाते 
कभी रूठ जाते बित्ते भर की बात से
हम लाख रोकना चाहें
भीतर की बात आ ही जाती जुबां पर।
जब पाते अपने मन का कोई
खाली होते समय में भर जाते 
अपनेपन से 
कि बसन्त आ जाता 
पीली सी उम्मीद ले कर।

 


- पंकज शुक्ला

रचनाकार परिचय
पंकज शुक्ला

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