अगस्त 2019
अंक - 52 | कुल अंक - 53
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

जो दिल कहे
स्त्री की स्वतंत्रता :~ तीन तलाक के बहाने !!
 
21वीं सदी में भी भारत में महिला स्वतंत्रता की बात करना किसी छलावे से कम नहीं है। भले ही आज स्त्री समाज की स्वतंत्रता के लिए सरकार एव बहुत सारे सामाजिक संगठन कई तरह के कार्यक्रमों के माध्यम से अपनी आवाज को उठा रहे हैं और यह माना जा रहा है कि आज की महिलाएं पूर्णतया स्वतंत्र हैं जबकि वस्तुस्थिति ठीक इसके विपरीत है क्योंकि महिलाएं स्वतंत्रता से कोसों दूर हैं।
 
नारी स्वतंत्रता का मुख्य अर्थ होता है “निर्णय लेने की स्वतंत्रता” न की समाज के नियम को मानने-मनवाने की बाध्यता। मात्र अपने मन के अनुरूप आधुनिक परिधानों को पहन लेना, बाहर घूम-फिर लेने को स्वतंत्रता से परिभाषित नहीं किया जा सकता है। आज भी महिलाएं उस आजादी से वंचित हैं जो उन्हें मिलनी चाहिए थी। आज भी पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं को निर्णय लेने की आजादी या बराबरी का दर्जा उन्हें नहीं मिल सका है।
 
22 अगस्त 2017 को माननीय सर्वोच्च न्यायलय की खंडपीठ ने 3:2 के माध्यम से मुस्लिम समुदाय में पिछले 1400 वर्षों से प्रचलित तीन तलाक जैसी कुप्रथा को अमानवीय मानते हए इसे नए कानून बनाए जाने तक के लिए निरस्त कर दिया था। हालाँकि तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश ने तीन तलाक प्रथा के पक्ष में अपनी सहमति दर्ज की थी। जस्टिस कुरियन जोसेफ ने बहुत ही गंभीर मुद्दे को उठाते हुए कहा जब तीन तलाक इस्लाम का अनिवार्य हिस्सा नहीं है और इस प्रथा को संविधान के अनुच्छेद 25(मौलिक अधिकार) का संरक्षण हासिल नहीं है तो इसे निरस्त कर दिया जाना चाहिए। जस्टिस ललित ने स्पष्ट तौर पर तीन तलाक पर अपनी राय जाहिर करते हुए कहा कि “हर वह प्रथा अस्वीकार्य है, जो कुरान के मूल तत्व के खिलाफ है।“
 
माननीय सर्वोच्च न्यायलय के प्रयाशों से एवं वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के अनथक सराहनीय प्रयाशों के बाद 28 जुलाई 2019 को राज्य सभा के द्वारा तीन तलाक बिल को ध्वनिमत सहयोग से विधेयक को पारित करवा लेना निश्चित ही बहुत स्वागत योग्य है उन महिलाओं के लिए जो एक अनजाने भय के अधीन जीने के लिए वर्षों से लाचार थीं। परन्तु हमें बहुत ही गंभीरतापूर्वक यह विचार करना ही पड़ेगा कि क्या मात्र इस फैसले से मुस्लिम समाज की महिलाये स्वतंत्र हो गयीं हैं?
 
तलाक जैसी कुप्रथा के मूल मुद्दों पर हमें विचार करना होगा, मनोवैज्ञानिकों एव समाजशास्त्रियो से सहयोग लेनी होगी उन वजहों को तलाशने में कि क्यों घर टूटते हैं। कोई भी पुरुष या स्त्री जानबूझ कर अपना घर नहीं तोडना चाहता है, परिस्थितियां ऐसी उत्पन्न हो जाती है जब एक-दुसरे के साथ जीना दुश्वार होने लगता है। मैं व्यक्तिगत तौर पर हिन्दू डॉक्टर, इंजिनीयर, वकील जैसे प्रतिष्टित पद पर आसन महिलाओं को सिर्फ घर बचाने के लिए पिटते हुए देखा है, जाना है।
 
आज भी महिलाओं को प्रमुख मुद्दों पर निर्णय लेने का अधिकार नहीं प्राप्त है, चाहे वह कोई भी समुदाय हो। तलाक जैसे खास मुद्दों के अलावा भी बहुत कुछ ऐसा है जो महिला स्वतंत्रता पर सवाल खड़ा करता है।
 
हमें अपनी सरकार एवं विपक्ष समेत तमाम राजनीतिक दलों से यह पूछना चाहिए कि तीन तलाक को कानूनन अवैध बनाने और उसके लिए सज़ा तय करने के बाद अब जरा संसद उत्तर दे कि ‘हिन्दू विधवा कल्याण’ विधेयक पर बहस कब होगी और इस विधेयक को कब पारित करेगी। साथ ही परित्यक्ताओं को आर्थिक मदद कैसे दी जाएगी। संसद से यह भी पूछा जाना चाहिए कि निर्भया कांड के बाद बने कड़े कानून के बाद भी बलात्कार, एसिड अटैक की घटनाएँ क्यों नहीं रुक रहीं। सरकार क्यों नहीं प्रति हजार महिला क्राइम दर की गणना करवाने पर विचार कर रही है जिसमें छेड़छाड़, दहेज-प्रताड़ना, घरेलू-हिंसा, बलात्कार, हत्याएँ, एसिड-अटैक, कार्य-स्थलों पर यौन-शोषण को सम्मिलित किया जाए।
 
सरकार/संसद  कानून बना कर ग्रामीण-शहरी सभी इलाकों में किशोर बच्चियों के लिए मेंस्ट्रुअल हाइजीन प्रोडक्ट्स स्कूलों में कब से मुहैया कराना सुनिश्चित कराने पर विचार कर रही है जिसकी वजह से हर साल लाखों लड़कियाँ किशोरवय में पहुँचते ही पढ़ाई छोड़ने को मजबूर हो जाती हैं।
सरकार पुनः परिवार नियोजन / गर्भ-निरोधक क्यों नहीं कोई नया और सटीक अभियान चलाने पर विचार संसद/विधान सभाओं में करती है, जबकि अनेक समस्याओं की जड़ यही है।
 
तीन तलाक जैसी प्रथा तो हिन्दू समाज में नहीं हैं तो क्या हिन्दू समाज की महिलाएं पूर्ण रूप से स्वतंत्र हैं? क्या उन्हें अपनी इच्छा के अनुसार जीने और सोचने की स्वतंत्रता मिली हुई है? सिर्फ 10% शहरी हिन्दू महिलाओं को देख कर यह निर्णय लेना की मुस्लिम महिलाओं की अपेक्षा हिन्दू महिलाओं की सामाजिक और आर्थिक स्वतंत्रता अच्छी है कुछ अतिश्योक्ति होगी।
आज हमें मुस्लिम और हिन्दू समाज की महिला के तौर पर नहीं अपितु महिला के तौर पर उनका मूल्याङ्कन हमें भी करना होगा और खुद महिलाओं को भी करनी होगी कि वे कितनी स्वतंत्र हैं अपने घर-परिवार और समाज के लिए निर्णय लेने में।
 
देश की सभी महिलाओं की बेहतर एवं सुरक्षित जीवन हेतु हमें किसी ‘हिन्दू कोड बिल’ या ‘मुस्लिम कोड बिल’ नहीं- बल्कि एक सशक्त Indian Women’s Code Bill के बनाये जाने की आवश्यकता है। 

- नीरज कृष्ण

रचनाकार परिचय
नीरज कृष्ण

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