अगस्त 2019
अंक - 52 | कुल अंक - 53
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ग़ज़ल-गाँव
ग़ज़ल-

ज़हरीली हुई जाती है नफ़रत की हवा और
क्या दौर यहाँ आएगा अब इससे बुरा और

क्यों नाम पे उसके किसी बेकस को सताया
क्या तेरा ख़ुदा और है और उसका ख़ुदा और

तुम ज़ुल्म से चाहो कि ये आवाज़ दबा दें
मज़लूम की गूंजेगी फ़ज़ाओं में सदा और

इक दीप भला कैसे करे तनहा उजाला
हर सिम्त अँधेरा है तू कुछ दीप जला और

हासिल हो शिफ़ा कैसे तबीबों की दवा से
है मर्ज़ मेरा और वो देते हैं दवा और

एहसास-ए-मुहब्बत में ये लिपटी हुई बारिश
मौसम का मज़ा देती है यादों की रिदा और

हो जाए मुलाक़ात तो क्या हाल हो सोचो
इक याद ही कर देती है ज़ख्मों को हरा और


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ग़ज़ल-

उड़ानों का हर इक मौक़ा सितमगर छीन लेता है
वो मुझको हौसला दे कर मेरे पर छीन लेता है

मुझे खैरात में दे के वो अपने प्यार के लम्हे
मेरी नींदें, मेरे ख़्वाबों के मंज़र छीन लेता है

किसी ने जाते-जाते छीन ली ऐसी मेरी साँसें
कि जारी साल को जैसे दिसम्बर छीन लेता है

मिज़ाजों को बदलने की है चाहत इस क़दर इसको
थमा कर हाथ में गुंचे वो खंजर छीन लेता है

वो चाहे तो अता कर दे न हो जो कुछ मुक़द्दर में
अगर देना न चाहे तो वो दे कर छीन लेता है


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ग़ज़ल-

कर के हमको ग़मों के हवाले गये
हादसे ज़िन्दगी का मज़ा ले गये

हमसफ़र साथ कोई न ही कारवां
साथ मेरे ये पाँवों के छाले गये

ख़ास लोगों की फ़रियाद सुन ली गई
हम हमेशा ही वादों पे टाले गये

रौशनी उनके महलों की क़ायम रहे
मेरे दर का दिया जो उठा ले गये

वो अदब का ज़माना कहाँ खो गया
मीर से वो सुख़नवर निराले गये

बस दिखावे की ही बन्दगी थी मिली
चाहे मस्ज़िद गये या शिवाले गये

बन सके हम तबस्सुम कहाँ आज तक
ढल गए जैसे साँचे में ढाले गये


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ग़ज़ल-

ग़ौर से देखिये नदी हूँ मैं
मुख़्तसर-सी ही बच गई हूँ मैं

अब नज़ाकत नहीं रही मुझमें
दौरे हाज़िर की शायरी हूँ मैं

मुझसे क्या पूछना मेरा मज़हब
क्या ये कम है कि आदमी हूँ मैं

मेरी परवाज़ पर न कर बंदिश
अपने माँ-बाप की परी हूँ मैं

लोग डरते हैं मेरे साए से
सर्द रातों की चाँदनी हूँ मैं

अब तो सैराब करदे अब्र मुझे
तपते सेहरा की तिश्नगी हूँ मैं

आप चाहे मेरा यकीं न करें
सच वही है जो कह रही हूँ मैं


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ग़ज़ल-

सिर्फ ऐसा नहीं मयकशी छोड़ दी
बा-ख़ुदा हमने तो ज़िन्दगी छोड़ दी

फ़स्ल उगती रहे ख़्वाबों की इसलिए
अपनी आँखों में थोड़ी नमी छोड़ दी

बढ़ गयी फिर ज़ुबां की भी आवारगी
जबसे लहजे ने शाइस्तगी छोड़ दी

ले के इसको भटकते कहाँ उम्र भर
दर पे दरिया के ही तिश्नगी छोड़ दी

उसने चाहा नहीं हो मुकम्मल कोई
इसलिए हर किसी में कमी छोड़ दी

ज़िन्दगी मुझसे हँस कर मिलेगी कभी
आस रक्खी कभी और कभी छोड़ दी

काश कह पाते तुझसे ऐ प्यारे नबी!
तेरी उम्मत ने राहे-बदी छोड़ दी  
 

- ग़ज़ाला तबस्सुम

रचनाकार परिचय
ग़ज़ाला तबस्सुम

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