प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जुलाई 2019
अंक -52

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

गीत-गंगा

छवियाँ तो छवियाँ हैं

ओ मेरे मन क्यों छवियों में,
तू अपनापन ढूँढ़ रहा है।
तप्त मरुस्थल में प्यारे क्यों,
रिमझिम सावन ढूँढ़ रहा है।

छवियाँ तो छवियाँ हैं, इनका-
सच्चाई से कैसा नाता!
पल-पल भेष बदलती हैं ये,
ये इनका इतिहास बताता।
चल इनकी चिंता मत कर अब,
तू भी अपनी राह बदल ले।
क्यों इनके मस्तक-मंडन को,
रोली-चंदन ढूँढ़ रहा है।।

कभी चिढ़ातीं, कभी रिझातीं,
कभी लुभातीं, कभी हंसातीं।
हृदयहीन होती हैं लेकिन-
ये गहरा अपनत्व जतातीं।
सोच ज़रा क्या मतलब इनका,
तेरी गहन भावनाओं से।
क्यों बदरंग शिलाओं में तू,
उजले दरपन ढूँढ़ रहा है।।

तेरे-मेरे दुख-सुख अपने,
छवियों के भ्रम में मत पड़ना।
भूले से इनके हाथों की,
कठपुतली तू कभी न बनना।
स्वार्थ और छल-छद्म भरा है,
ओ पगले! इनकी नस-नस में।
क्यों फिर इनके आलिंगन में,
तू संजीवन ढूँढ़ रहा है।।


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दर्पण चकनाचूर हुआ

मतभेदों के चलते मन का,
दर्पण चकनाचूर हुआ।
राह तुम्हारी भी बदली है,
मैं भी कुछ मजबूर हुआ।।

कभी हृदय में संबंधों की,
धूप गुनगुनी आती थी।
अपनेपन की ख़ुशबू स्वप्निल,
दुनिया को महकाती थी।
अब अतीत यह पूछ रहा है,
वर्तमान से रह-रहकर-
मैंने तुझको जो सौंपा था,
कैसे तुझसे दूर हुआ।।

कभी वाटिका मन-सुमनों की,
इठलाती थी खिली-खिली।
मुझको तुमसे, तुमको मुझसे,
एक नई पहचान मिली।
लेकिन यह क्या हुआ अचानक,
सावन बाज़ी हार गया।
अंतस के कोने-कोने में,
पतझर यूँ भरपूर हुआ।।

कभी हृदय में आशाओं के,
दीप हज़ारों जलते थे।
आँखों के आँगन में सुंदर,
सपने रोज़ टहलते थे।
चली गई वो खनक हँसी की,
रूठ गईं सब मुस्कानें।
सबका-सब श्रृंगार कभी का,
चेहरे से काफ़ूर हुआ।।


- डॉ. कृष्णकुमार नाज़
 
रचनाकार परिचय
डॉ. कृष्णकुमार नाज़

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