प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जुलाई 2019
अंक -52

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

आलेख

भारतीय सामाजिक व्यवस्था में स्त्री
- शिवानी कन्नौजिया


किसी भी समाज में स्त्रियों की सामाजिक स्थिति का निर्धारण उनके आर्थिक योगदान, राजनीतिक स्वतंत्रता की सीमा तथा समाज में प्राप्त प्रतिष्ठा के द्वारा किया जाता है, किन्तु आज के युग में उनकी प्रस्थिति को सबसे अधिक प्रभावित करने वाला सामाजिक दृष्टिकोण ही है, जिससे समाज के सांस्कृतिक स्तर का साहित्य, धर्म परम्परा और रीति-रिवाजों के कारण ह्रास होना शुरु हो जाता है लेकिन इन्हें समय के साथ तोड़ा-मरोड़ा जा सकता है क्योंकि 'साहित्य समाज का दर्पण है'। जब वह युगीन यथार्थ को प्रतिबिंबित करता है तो उसका लक्ष्य दोहरा होता है। एक युगीन विकृतियों, विसंगतियों और रुग्णताओं को विश्लेषण का विषय बनाकर उनके निवारण हेतु समाधान खोजना, दूसरा अपने अनुभव सत्य से गुजर कर बेहतर भविष्य के निर्माण हेतु भावी पीढ़ी का दिशा-निर्देशन करना।"1 यद्यपि भारतीय स्त्रियों का यह सौभाग्य ही है कि उन्हें विरासत में एक सशक्त परम्परा मिली है लेकिन हमारे देश की स्त्रियों को अतीत से प्राप्त गौरवपूर्ण विरासत के बावजूद 'अबला' जैसे सम्बोधनों से पुकारा जाता है।

हमारे समाज में स्त्री को जन्म से ही बोझ समझने के कारण उसके पारिवारिक अधिकारों से वंचित कर दिया जाता है। पितृसत्तात्मक समाज में कन्या के स्थान का पता इसी बात से लगाया जा सकता है कि बेटे के जन्म पर शुभ गीत गाये जाते हैं, ख़ुशी में थाली बजाई जाती है, इसके विपरीत कन्या के जन्म पर कोई खुशी नहीं मनाई जाती। कन्या के जन्म पर शोक मनाया जाता है और तरह-तरह के व्यंग्य किए जाते है। "किसी के घर बेटी होने पर लोग कहते सुने जाते हैं- ‘हूँ’ लक्ष्मी आई है। लक्ष्मी के आने की सूचना कोई हर्षित मन से नहीं दी जाती, व्यंग्य में लड़की को लक्ष्मी कहा जाता है।"2

स्त्रीा आरम्भ से ही इस तरह से समाजीकरण किया जाता है कि वह पितृसत्तात्मक व्यवस्था को शुरुआत से ही स्वीकार करके चलती है। वह यह मानकर चलती है कि परिवार में पुत्रों की तुलना में उसे सबकुछ कम मिलना है या बिल्कुल नहीं मिलना है। इस तरह वह यह स्वीकार करने को विवश कर दी जाती है चूंकि तुम लड़की हो इसलिए सहनशील बनो। इस विषय पर मृदुला सिन्हा कहती हैं कि "हमारा समाज कितने विरोधाभासों से भरा है। एक ओर कन्या की पूजा का विधान है तो दूसरी ओर परंपरा से लड़की को जन्म लेते ही गला दबाकर या नमक चटाकर मार देने का घिनौना रिवाज रहा है और कहीं इन उपायों से बेटी बच गई तो उसे भरपेट भोजन नहीं देना, शिक्षा से वंचित रखना, छोटी उम्र में विवाह कर देना, घर का सारा काम करवाना, तरह-तरह की यातनाएँ देना, यातनाएँ देने वाला भी पुरुष नहीं, महिलाएंँ अधिक होती हैं।"3 इस तरह यातनाएँ देकर लड़की को सिखाया जाता है कि जुल्म सहकर भी मुँह नहीं खोलना है। दूसरों के लिए समर्पण और सेवा का भाव लेकर रहना है। घर से जो मिले उसे स्वीकारना हैं, इससे अधिक माँगने का अधिकार तुम्हें नहीं है। इस तरह के सामाजिक व्यवहार में पलने वाली लड़की को न भरपेट भोजन मिलता है और न ही उसका स्वास्थ्य ठीक रह पाता है।

प्राचीन काल से ही वैश्विक स्तर पर प्रत्येक समुदाय व समाज पितृसत्तात्मक प्रधान समाज रहा है। इसी के अनुरूप सामाजिक संस्कृति भी पितृसत्तात्मक प्रधान रही है। पितृसत्तात्मक मूल्यों के अनुसार ही बेटों और बेटियों का अलग-अलग ढंग से पालन-पोषण किया जाता है। यह पितृसत्तात्मक प्रधान समाज के मूल्य ही हैं, जो स्त्री-पुरुष के सेक्स भेद को जेंडर में बदलते हैं। स्त्री-पुरुष दोनों समान रूप से मनुष्य हैं लेकिन पितृसत्तात्मक मूल्य स्त्री को स्त्रीत्व के सांचे में ढालते हैं और पुरुष को पुरुषत्व के सांचे में। इसका कारण बताते हुए रमणिका गुप्ता कहती हैं कि "मनुष्य ही समाज का निर्माण करता है और उसके नियम स्त्री-पुरुष दोनों की सहमति से बनते हैं, वे समानता, उदारता और सहयोग को प्रोत्साहित करते हैं, जहाँ पुरुष हावी हो जाता है, वहाँ स्त्री को गुलाम होकर रहने पर मजबूर कर दिया जाता है।"4 स्त्री को झुकना, दबना, आत्मबलिदान करना और पुरुषों को निर्मम, बुद्धिमान व कठोर होना सिखाया जाता है।

पितृसत्तामक समाज व्यवस्था ने परिवार और सामाजिक मूल्यों की जिम्मेदारी मुख्य रूप से स्त्रियों को ही सौंप रखी है। "पुरुष यदि वेश्यागमन करता है तो समाज में वह बहिष्कृत नहीं होता बल्कि यहाँ तक कहा जाता है कि वेश्या उसे लुभा लेती है।"5 इसके विपरीत स्त्री को घर की इज़्ज़त और इज़्ज़त रखने वाली भी माना जाता है। स्त्रियों से यह उम्मीद की जाती है कि वह घर में रहे, सिर्फ परिवार के बारे में सोचे। उसकी स्वयं की कोई इच्छा नहीं होती है। उसे सिर्फ दूसरों के लिए जीना सिखाया जाता है। इस विषय पर रमणिका गुप्ता कहती हैं कि "स्त्री अपने लिए नहीं जीती। उसे दूसरों के लिए जीना सिखाया जाता है- पुरुष के लिए, पुरुष के परिवार के लिए, पुरुष निर्मित व्यवस्था के लिए इसीलिए परिभाषाओं और वर्जनाओं में मात्र उसी की सत्ता को बांधा जाता है पुरुष की नहीं, जन्म से स्त्री और पुरुष दोनों संस्कार समान रूप से स्वीकार करते हैं और उन्हीं के अनुरूप अपनी जीवनशैली विकसित करते हैं।"6 यही कारण है कि वह अपनी दुर्बलता के कारण तो कभी इस पितृसत्तात्मक व्यवस्था को बनाए रखने में और कर्तव्य का निर्वाह करते-करते ऐसा आचरण करने लगती है कि जिससे स्पष्ट होने लगता है कि स्त्री ही स्त्री की दुश्मन है। ये चीजें भी पुरुषों की ही देन हैं, जिससे स्वयं ही स्त्रियाँ एक-दूसरे के प्रति द्वेष का भाव रखने लगती हैं।

सामन्ती समाज में पितृसत्तामक व्यवस्था में स्त्री को एक वस्तु के रूप में माना जाता है, जिसे सन्तान उत्पन्न करने वाली दैहिक सुख पूरी करने वाली से अधिक नहीं समझा गया। इस सेवा, उपयोग और वफादारी के बदले पुरुष स्त्री को अपने प्रिय जानवरों की तरह सजाता-संवारता रहा है और संरक्षण देता रहा है। ऐसी सामंत व्यवस्था पर कात्यायनी ने व्यंग्य करते कहा है कि "स्त्री सामंती समाज में विलासिता और निजी उपभोग की वस्तु थी और साथ ही वंश चलाने का ज़रूरी साधन। उसकी अपनी कोई स्वतंत्र पहचान या अस्मिता नहीं थी। अपने पवनी-परजा हाथी-घोड़े, नौकरों आदि के प्रति संरक्षण भाव रखने वाले सामंत स्त्रियों के प्रति भी संरक्षण भाव रखते थे।"7 जिस समाज में स्त्रियों का शोषण होता है या उत्पीड़न होता है। उसका अर्थ यह है कि समाज का आधा अंग शोषित और पीड़ित है। यदि समाज के इस आधे हिस्से के अधिकारों का हनन हो, उन्हें आगे बढ़ने से रोका जाए तो ऐसी स्थिति में सम्पूर्ण समाज की उन्नति सम्भव नहीं है। भारतीय समाज व्यवस्था में विवाह-व्यवस्था के नियम भी इसी प्रकार के हैं, जिसमें लड़की को ‘व्यक्ति’ के बजाय ‘वस्तु’ बना दिया गया है। कन्या का दान, दहेज देना, लड़के का हाथ ऊपर होना, विवाहित स्त्री के लिए सुहाग चिह्नों का निर्धारण आदि सभी रीति-रिवाज लड़की को अवलम्बित तथा माँ-बाप पर बोझ सिद्ध करते हैं। "आज के भारत में दहेज जैसी अमानवीय प्रथा के लगातार फलने-फूलने और गर्भस्थ कन्या भ्रूण, लड़कियों और औरतों के प्रति हिंसा के बढ़ने में गहरा रिश्ता है, जो आजादी के छः दशकों में पुष्ट होता गया।"8 इसके अतिरिक्त विवाह पश्चात् लड़की का नाम या पति का कुल/गोत्र/जाति लगाने की भी परम्परा है। कई स्थानों पर तो स्त्री के विवाह से पूर्व ही नाम बदल दिये जाते हैं। जिसमें विवाह से पूर्व ही स्त्री की अस्मिता को समाप्त करने का चलन है। इस विषय में मैत्रेयी पुष्पा का कहना है कि "जाति/गोत्र बदलने का यह विधान असल विवाह की शर्त है जो लड़की पर लागू होती है। यह परम्परा आज की नहीं, प्राचीनकाल के गोमुख से इस दिव्यता का सोता फूटा है, जो इसी रूप में स्त्री सम्मान को सींच रहा है।’’9

भारतीय समाज में स्त्रियों को विवाह के पश्चात् भी अनेक प्रकार की हिंसा का सामना करना पड़ता है, जिसमें दहेज से जुड़ी एवं प्रजनन सम्बन्धी हिंसा, वैवाहिक बलात्कार, सुन्नत आदि प्रथाओं द्वारा स्त्रियों का शारीरिक उत्पीड़न होता है। इन हिंसाओं के विषय में अनामिका कहती हैं- "मारपीट, गाली-गलौज, भ्रूण हत्या, कटाक्ष, इनसेट (कौटुम्बिक व्यभिचार), बलात्कार और तरह-तरह के यौन दोहन, सती, पर्दा, डायन-दहन, दहेज-दहन, पोर्नोग्राफी ट्रैफिकिंग, वेश्यावृत्ति, यान्त्रिक सम्भोग, प्रेमविहीन विवाह-बन्धन, अनचाहा गर्भ, साफ-सुथरे और सुरक्षित प्रसव केन्द्र का अभाव दुनिया के जितने अपराध हैं- प्रायः सबकी आधार पीठिका स्त्री शरीर ही तो है।"10  हमारे समाज की यह शर्मनाक स्थिति है कि कभी स्त्री को दहेज के नाम पर जला दिया जाता है तो कभी पति की मृत्यु के बाद उसे सती होने के लिए मजबूर किया जाता है, कभी उसे भ्रूण में ही समाप्त कर दिया जाता है।

 

आज भी कई ऐसे प्रान्त हैं, जहाँ पर आज के आधुनिक युग में भी पति की मृत्यु के बाद स्त्रियों को सती होने के लिए बाध्य किया गया है। "जिस तरह रूपकंवर के भीतर की औरत की चीखों को नज़रअंदाज कर, ज़िन्दा जलाकर हमने उसे ‘सती’ के ऊँचे आसन पर बिठाया, उसी तरह पिछली सदी की औरत के सामाजिक भय के कारण निबाहते चले जाने की मजबूरी, सहते चले जाने की विवशता और ‘नो आल्टरनेटिव’ (विकल्पहीनता) की स्थिति को ‘समर्पण’ और ‘त्याग’ के महामण्डित फ्रेम में जड़कर हमने एक आदर्श औरत की परिकल्पना गढ़ ली।"11 और अपने सम्मान के नाम पर खाप पंचायतों द्वारा किसी भी स्त्री को सिर्फ अपना जीवन साथी चुन लेने के नाम पर ही मृत्यु की सजा सुना दी जाती है। पूरे समाज के सामने उन्हें सूली पर चढ़ा दिया जाता है।

 

राजस्थान और पश्चिम बंगाल में सती प्रथा आज भी निरन्तर जारी है। जिस पर प्रश्न करते हुए मृणाल पाण्डेय कहती हैं कि क्या "सती प्रथा की निन्दा में समाज-सुधारकों और ग़रीबों के सतत पक्षधर जनवादियों में सम्पादकीय धरने और प्रदर्शन शाब्दिक रूप से एकदम तर्कसम्मत और न्याय संगत होते हुए भी राजस्थान, उत्तर प्रदेश के ग़रीब इलाकों की जनता के मन को प्रभावित नहीं कर पा रहे और वह आज भी औरतों को लेकर सदियों पुरानी धार्मिक जड़ता पूर्वाग्रहों और बर्बर अमानुषिक परिपाटियों से लगातार चिपकी बैठी हैं।"12 और आज भी स्त्रियों की स्थिति में बहुत परिवर्तन नहीं हो पा रहे हैं। उनके साथ आमानवीय व्यवहार और क्रूरता के व्याभिचार दिन-पर दिन बढ़ते ही जा रहे हैं।

 

स्त्री जीवन की वास्तविकता यह है कि उसे समाज और परिवार दोनों ने मिलकर अपनी साजिश का शिकार बनाया। उसे उभरने का मौका ही नहीं दिया गया। ऐसा नहीं है कि समाज में आज तक स्त्रियाँ जागरुक नहीं हुई हैं। अपनी अस्मिता के प्रश्न को लेकर सामने नहीं आयी हैं, प्रारम्भ से स्त्रियाँ अपने अधिकारों के लिए लड़ती आयी हैं। गुफा मानव व आदिमानव से लेकर अपाला, घोषा तक के अनेक उदाहरण हैं, जो स्त्रियों की बेहतर स्थिति को दर्शाते हैं। पितृसत्तात्मक समाज व्यवस्था ने स्त्रियों को बढ़ने में क्या भूमिका निभाई है, इस पर व्यंग्य करते हुए नासिरा शर्मा कहती है कि "इन कुरीतियों को पुनः पुनः लौटाने वाले कौन हैं? उनके मन में पुराना विश्वास क्यों ठोस बन गया है, जो नए विश्वास को जमने नहीं देता। आखिर इस जड़ता के पीछे कौनसा भय काम कर रहा है? क्या शिक्षा ने पिछले पचास वर्ष में ऐसा कोई ठोस कदम नहीं उठाया, जिससे समाज में उन लोगों की मानसिकता बदल सकती, जो उपभोक्ता के रूप में हर नवीन उपकरण घर में सजाना चाहते हैं मगर अपने दिल और दिमाग़ को नए प्रकाश से ज्योतिमान करने को तैयार नहीं"13 इस प्रकार देखा जा सकता है पितृसत्तात्मक व्यवस्था ने स्त्री के लिए कहीं पर भी जगह नहीं छोड़ी है और न ही स्त्री को अपनी इच्छा के अनुसार जीने का अवसर मिल रहा है। समाज आधुनिकता की ओर बढ़ रहा है, लेकिन स्त्रियों को उन्हीं पुरानी बेड़ियों में जकड़े रहने देना चाहता है।

 

स्त्री शक्ति का सम्यक् विकास तभी सम्भव है, जब उसकी कुशलता, प्रतिभा व अनुभवों का समुचित सदुपयोग कर उनकी सामाजिक प्रस्थिति में सुधार लाया जाए। यथार्थ में स्त्रियों की प्रस्थिति में विषमता दृष्टिगोचर होती है। जहाँ कुछ स्त्रियाँ उच्च शिक्षा, बौद्धिक योग्यता और नेतृत्व के गुणों को संजोये हुए हैं, जो आज भी निरक्षर हैं। घर की चारदीवारी तक ही उनका जीवन है। किसी भी मानव समाज में स्त्रियों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसलिए स्त्री-मुक्ति के सवालों से लड़ने वाले लोगों के लिए कई गम्भीर चुनौतियाँ हैं- जैसे कि दहेज, स्त्री की आर्थिक आत्मनिर्भरता, सत्ता में भागीदारी, समान शिक्षा का अधिकार, कानूनी सहायता, वेश्यावृत्ति, धर्माडम्बर और अंधविश्वास आदि। ये सभी समस्याएँ पुरुष के विरुद्ध लड़ने से हल नहीं होंगी, बल्कि पुरुष को साथ लेकर लड़ने से हल होंगी।

 

 



सन्दर्भ-

1. अग्रवाल रोहिणी, स्त्री लेखन: स्वप्न और संकल्प, संस्करण- 2011, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ. सं.- 11
2. सिन्हा मृदुला, ‘मात्र देह नहीं है औरत’ संस्करण-2009, सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ. सं.- 44
3. सिन्हा मृदुला, ‘मात्र देह नहीं है औरत’ संस्करण-2009, सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली, वही, पृ.सं.- 43
4. गुप्ता रमणिका, संघर्ष और इतिहास, संस्करण-2014 सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ.सं.- 140
5. खेतान प्रभा, बाज़ार के बीच: बाज़ार के खिलाफ, संस्करण-2004, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ.सं.- 153
6. अग्रवाल रोहिणी, स्त्री लेखन: स्वप्न और संकल्प, संस्करण- 2011 राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ.सं.- 12
7. कात्यायनी, दुर्ग द्वार पर दस्तक, संस्करण- 1997, परिकल्पना प्रकाशन, लखनऊ, पृ.सं.- 43
8. पाण्डेय मृणाल, जहाँ औरतें गढ़ी जाती हैं, संस्करण- 2006, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ.सं.- 98
9. पुष्पा मैत्रेयी, खुली खिड़कियाँ, संस्करण- 2009, सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ.सं.- 15
10. अनामिका, स्त्री विमर्श का लोकपक्ष, संस्करण- 2012, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ.सं.- 8
11. अरोड़ा सुधा, आम औरत जिन्दा सवाल, संस्करण- 2009, सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ. सं.- 46
12. पाण्डेय मृणाल, जहाँ औरतें गढ़ी जाती हैं, वही, पृ.सं.- 53


- शिवानी कन्नौजिया
 
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