जुलाई 2019
अंक - 51 | कुल अंक - 53
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कविता-कानन

बेनाम चित्रकार

वो प्यार और संघर्ष से बनाते हैं
अपनी-अपनी कलाकृतियाँ
ज़िन्दगी के कैनवस पर
अनगिनत रंगों के उतार-चढ़ाव,
तूफ़ानों से जूझते हुए

वो आँच भी नहीं आने देते
अपनी कलाकृतियों पर
अंदर से ख़ुद कितने ही बेरंग हों
लेकिन भर देते हैं अपनी रचनात्मकता को
दुनिया के हर चटक रंग से
वो निस्वार्थ होम देते हैं
अपनी ज़िन्दगी सारी
इसे भव्य और दिव्य बनाने के लिये

माता-पिता वो 'बेनाम चित्रकार' हैं
जो बनाते हैं
दुनिया के सबसे बेहतरीन
मास्टरपीस।


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वो मासूम लड़की

मैं थक चुकी हूँ
ख़ुद को तलाशते हुए
न जाने कहाँ खो गई है!
वो मासूम लड़की
जो प्यार करती थी ख़ुद से
और पंख़ फैलाकर उड़ना चाहती थी
मगर इस क्रूर दुनिया को देर न लगी
उसके पऱ काटने में

लड़की होना जैसे- गुनाह हो कोई
लिंगभेद की बेड़ियों में
बाँधकर मेरा बचपन फेंक दिया
किसी अंधेरे तालाब में
कलम, किताबों संग आशाएँ छीनकर
चूल्हा-चौका थमा दिया
लड़कपन, खेलकूद की उम्र में
शादी तय कर बिठा दिया

जहाँ ये हाथ
मिट्टी के घरौंदे बनाकर खेलते रहे
आज वे हाथ
अपना घर बसाने चल दिये हैं
सजना-संवरना किस लड़की को नहीं पसंद!
लेकिन आज ये सारा श्रृंगार बेकार लग रहा है
अपना गुस्सा और आँसू करके मुठ्ठी में बंद
शादी के जोड़े में देख रही हूँ ख़ुद को

दर्पन में आज वो लड़का भी नहीं दिख रहा है
जो हमेशा दिखता था...तब
कि जब...हो जाती थी निराश
और उम्मीद टूटने लगती थी मेरी
जिसके सामने मैं कुरेदती थी ख़ुद को
जिससे मैं करती थी सवाल-
मैं कौन हूँ?
तुममें और मुझमें क्या अंतर है?

वो मुझे दिलासा देकर कहता-
"तुम लड़की हो
सहनशीलता, कोमलता, ख़ूबसूरती से भरी
तुम वो हो जो हर दुख, परेशानी
मीठी मुस्कान के साथ झेलती रहती है।

तुम वो हो...जो जानती है
कि सपने पूरे नहीं होंगे
फिर भी उन्हें देखने से कतराती नहीं
और उम्मीद बाँधे रखती है।"

आज वो लड़का कहीं नहीं दिख रहा
दिख रही है तो बस एक बेबस लड़की
जिससे उसके सारे हक छिन चुके हैं
वो एक नयी ज़िन्दगी शुरू करने जा रही है
जो इस उम्र में उसने सोची ही नहीं थी
वो ज़िन्दगी जो कभी उसकी थी ही नहीं


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बाल मज़दूर

वो उठते हैं
हर रोज़ मुँह-अंधेरे
सूरज से भी पहले

यही है फ़र्क
हम में, उनमें
हम रोते हैं
मगर वो हँस के सह लेते हैं
वे जाएँ कामकाज पर
और हम विद्यालय जाएँ
रोज़ी-रोटी को तपते दिनभर वो
हम पकी पकाई खाएँ

मज़दूरी करते हो जाती
कब सुबह से शाम
समझ नहीं आती
शिक्षा उनके नसीब में कहाँ!
मज़दूरी ही उनकी थाती

यदि है कुछ है उनके हिस्से
तो सिर्फ़
काम और काम
वहीं हम सुविधाओं में रहकर
करते ख़ूब आराम

जिन हाथों में होनी थी किताबें
उनमें होते हथौड़े हैं
आँखों के सपने सारे
भट्टियों में पिघलने छोड़े हैं

है दुखद ये सोच
कि हमने सोचा नहीं कभी उनको
क्या मिलता है पूरा खाना
नींद, चैन, कपड़ा तन को!

सोचो!
क्या हो अगर
उनका जीवन हमको मिल जाये!
चलो करो कुछ उनके लिये
कि वो भी हम सब जैसे बन पाएँ


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अपनी-अपनी बारिश

जुलाई में मॉनसून दस्तक दे चुका था
बारिश सुबह से बिना रुके बरस रही थी
मेरे लिये महीने का कोई आम-सा
बोरिंग बरसाती दिन था
जिसके नज़ारे
मैं अपनी बालकनी में बैठी ले रही थी
तभी मुझे सड़क पर भरे
बरसात के पानी में
मेंढ़क की तरह कूदता
एक लड़का दिखाई दिया
मैंने उसे मंदिर की सड़क पर
बहुत बार घूमते देखा है
मंदिर के पुजारी ने माँ को बताया था
कि उसका इस दुनिया में कोई नहीं है
लेकिन आज उसे देखकर ऐसा लगा
कि उसे कोई कमी महसूस नहीं हो रही थी
उसे बारिशों ने लिपटा रखा था
उसके चेहरे की चमक
आसमानों तक फैलकर
इंद्रधनुष बना रही थी

उस दिन मैंने जाना
कि मेरा आम-सा दिन
उसके लिये बहुत ख़ास था
हम सब ज़िन्दगी को वैसे ही देखते हैं
जैसी कि हम ख़ुद उसे देखना चाहते हैं।


- ऐशानी राघव

रचनाकार परिचय
ऐशानी राघव

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