प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जुलाई 2019
अंक -52

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कविता-कानन

प्रेम-दीप जलाएँ

दीपक का जलना
प्रकाशमय कर देता है
एक घेरे को
वैसे ही
दो आत्माओं का मिलन
सम्पूर्ण ब्रह्मांड में
प्रेम रूपी सुगन्ध
फैला देता है
दीपक के जलने से
आसपास का
अँधेरा मिट जाता है
दो आत्माओं में
प्रेम अंकुर
विश्व कल्याण में
सहायक बन जाते हैं
राधे-कृष्ण की आत्माएँ
प्रेम के महत्व को
समझ कर
कल्याण को प्राप्त हुईं
अर्थात् कल्याण ही प्रेम है
प्रेम ही ईश्वर
ईश्वर ही सर्वत्र
हम आत्मा में
प्रेम-दीप जलाएँ


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मुहब्बत

वो सारे लम्हें
जो तुमको सोचा करते थे
वो लम्हें ही
हमनें जीये
अल्हड़-सा इश्क़ मुझमें
उनकी सादगी में प्यार
कौन कहता है
मुहब्बत मासूम नहीं होती है
रूह में बसा प्रेम
दो आत्माओं की
हर मुश्किल मिटा देता है
प्रेम की गहराइयों में छिपा
निश्छलता का वास
परम् सौंदर्य का
अनूठा अहसास है
शायद वहीं
ईश्वर का निवास है


- स्वाति सरू जैसलमेरिया
 
रचनाकार परिचय
स्वाति सरू जैसलमेरिया

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कविता-कानन (1)