जुलाई 2019
अंक - 51 | कुल अंक - 53
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कविता-कानन

टूटने से पहले

लड़ती न झगड़ती किसी से
कभी नहीं देती हैं गालियाँ
उन्हें भी देती हैं खाने को फल
आते-जाते हनते हैं जो उन पर
उठाकर पत्थर दिन-दुपहर
विनम्र टहनियाँ पेड़ों की
फल-भार से लदी-झुकी
पत्थरों की चोट खा-सहकर भी
बस देने और देते रहने के औदार्य से भरी
उम्मीद नहीं रखतीं पाने की
किसी से, कभी, कुछ भी
झोली झाड़कर
कमोबेश सब कुछ देने पर भी
झुकायी जाती हैं,
पंछियों के खाने को
बच रहे दो-चार फलों को भी
पाने-हथियाने को
झुकायी जाती हैं लगातार
झुकाया जाता है बार-बार
सीधा, विनम्र, त्यागी
सेवाभावी कोई आदमी जिस तरह से
रीढ़ टूटने की हद से पहले
चीखता-चिल्लाता है जैसे
हर संभव सहता-झुकता है
चरमराती हैं टहनियाँ भी वैसे
ज़ोर-ज़बरदस्ती के ख़िलाफ़
रुकते नहीं आततायी के हाथ तब भी
टूटने से पहले समूचे वजूद और
विरोध की ताक़त के साथ तभी
टहनियों को उनकी डगाल
एकबारगी ऊपर को देती उछाल
तनकर खड़ी होती
विनम्रता सहनशीलता आदमी की
'सड़ाक-सड़ाक' कर चाबुक-सी
छीलकर लहूलुहान कर जाती
चेहरा-हाथ उस आततायी का
टूटने से पहले हर संभव विरोध
और एकजुटता को जान चुकीं टहनियाँ
आततायियों के ज़ुल्म-ज़बरदस्तियों के ख़िलाफ़
तनकर खड़े होते और
टूटते-मरते सीधे लोग
टूटने से पहले विरोध में
खड़े होना और जूझना सिखा जायेंगे
विनम्र टहनियों को
सीधे सहनशील लोगों को
विरोध की ताक़त दिखा जायेंगे


***********************


पूरे अस्तित्व की पृथ्वी के साथ

सृष्टि करती है
वह सदियों-युगों से फिर क्यों
सृष्टा से कमक़द रहती है
रचने-सिरजने का धर्म
धारण करती है
कोख से लेकर समूची देह
देह से भी बाहर जीवन-जगत में
भाव-संवेदन भरती-वहन करती है
वह धरा, धरणी, धरती है
नवरात्रियों में किये नौ रूप नामकरण उसके
कितने अर्थ-आशय, प्रतीक गढ़े बढ़-चढ़ के
मिथक-कथाओं में शक्ति धारिणी
क्यों कहीं द्वार नर्क का बनी
कभी आठ अवगुणों की खान
जो दस बरस तक देवी-स्वरूपा पूजी जाती
वयः संधिकाल से हर माह के दिन पाँच-सात
प्रौढ़ा होने तक अस्पृश्या क्यों कहलाती?
स्त्री की कोई जाति नहीं
वह पहले पिता फिर पति की जाति से जुड़
अपनी पहचान बना पाती
पिता, भाई, पति-प्रेमी आदि कई-कितने
रचे पुरुषसत्ता ने रिश्ते जो, जैसे-जितने
रखे स्वयं पुरुषों ने ही सच्चे, मर्यादित कितने
मर्यादाओं, सीमाओं और अनुशासन की
तन-मन, वचन, कर्म से शुचिताओं की
विश्वासों की अग्निपरीक्षाओं की
कर्तव्य, धर्म, रीति-नीति, संस्कार-परम्पराओं
और सन्तानों को निष्ठा, समर्पण-भाव से
रक्षा-परिपालन, संवहन, संरक्षण की
लादे गठरी वह चल रही सधीरा
नहीं कही उसने कभी अपनी पीड़ा
और तुम शक्ति पौरुष के प्रतीक
उसे कहते रहे पतिता, अबला
जो रही सदा ही प्रबला-सबला
नहीं करेगी परिक्रमा अब स्त्री
अपनी आधी दुनिया और
पूरे अस्त्तित्व की पृथ्वी के साथ
पुरुष सूर्य की खींची परिधि पर
वह बढ़ रही है सधे पाँव
लेकर साथ अपनी-अपनी छाँव
उसने बनायी है स्वयं
अपनी नैतिकता की राह
अपनी देह की चाह
मन-ज़ेह्न की सोच-समझ
हृदय का संवेदन
स्वतन्त्रता अपने होने
और पहचाने-चीह्ने जाने की
अब अपने ढंग-ढर्रे से
वह अपने नये तौर-तेवर में करेगी
अपना स्वानुभूत सच का दर्शन


- देवेन्द्र कुमार पाठक

रचनाकार परिचय
देवेन्द्र कुमार पाठक

पत्रिका में आपका योगदान . . .
कविता-कानन (1)