प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जून 2019
अंक -51

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

जो दिल कहे

मुझे विश्वास है यह पृथ्वी रहेगी
- गंगा शरण सिंह

 

हम सब बचपन से ही एक बहुत पुरानी ऐतिहासिक किंवदंती सुनते आ रहे हैं कि इस देश के एक महाकवि अपनी युवावस्था तक महामूर्ख थे। बौद्धिक अक्षमता के उसी कालखण्ड में एक बार वे किसी वृक्ष की जिस डाल पर बैठे थे, उसी को काट रहे थे। इस कथा का ज़िक़्र यहाँ पर किसी व्यक्तित्व के चरित्र हनन के उद्देश्य से नहीं किया जा रहा है। दरअस्ल यह किंवदंती मनुष्य की आत्मघाती मूर्खता और विवेक-रहित चरित्र का एक बहुत बड़ा रूपक है।

सृष्टि की हज़ारों वर्षों की जीवन-यात्रा के दौरान हमने जितनी भौतिक उपलब्धियाँ और सफलताएँ हासिल कीं, उसी अनुपात में हमारा बौद्धिक ह्रास भी निरन्तर होता रहा है। बात थोड़ी कड़वी है, शायद आपत्तिजनक भी हो, किन्तु एक चेतन सत्ता के रूप में क्या यह हमारा दायित्व नहीं था कि हम अपनी धरती, अपने पर्यावरण से थोड़ा प्रेम करते! जिस धरती को हम ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ रचना मानते हैं यदि हमें उससे थोड़ा-सा भी अनुराग होता तो क्या हम अपने हाथों उसकी यह दुर्गति करते? इस शस्य श्यामला धरती के सौंदर्य और उसके जीवनदायिनी तत्वों को जिस तरह हमने अनवरत नष्ट किया है, उसके पसमंज़र भविष्य की एक बड़ी ही भयावह तस्वीर सामने उपस्थित है।
जिस प्रकृति ने हमें खनिज, जल, प्राण-वायु और जीवन जीने के लिए अनिवार्य तमाम आवश्यकताओं की पूर्ति की, नैसर्गिक सम्पदाओं का अक्षय कोष विरासत में सौंपा, उसी प्रकृति का ऐसा विनाशकारी दोहन हमने किया कि आज पूरा विश्व विनाश के कगार पर खड़ा है।


हमारी साँसों के लिए जिन हरे-भरे जंगलों से ऑक्सीजन मिली उन्हीं को हम निरन्तर ख़त्म करते जा रहे हैं। समुद्र, नदी, तालाब आदि को इस क़दर बाँधा गया कि जल की कमी से चारों तरफ़ त्राहि-त्राहि मची हुई है। अपने सुख-सुविधा से ज़रा-सा भी समझौता न करने वाली आत्ममुग्ध पीढ़ी ने उन तमाम गुनाहों को बार-बार दोहराया, जिनसे पर्यावरण को घातक हानि पहुँच रही थी। 1990 के बाद पहली बार ओजोन परत के तेज़ी से हो रहे क्षरण की बात विश्व स्तर पर उठी थी और उन बिंदुओं को रेखांकित किया गया था, जो इस परत को निरंतर नुकसान पहुँचा रहे थे। गाड़ियों का धुआँ और ए.सी, फ्रिज से निकलने वाली गैस इन हानिकारक तत्वों में प्रमुख थे।
पर इन चीज़ों के बगैर जीना किसी को मंजूर नहीं था। नतीजा सामने है। इन बीते दशकों में पर्यावरण इतना असंतुलित हो चला है कि 45 से 48 डिग्री तापमान ने इस वर्ष अधिकांश क्षेत्रों को झुलसने पर मजबूर कर दिया। जंगल लगातार काटे जा रहे हैं। नदियाँ सूखी पड़ी हैं। काश.... मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे, चर्च, गाय, बैल और हिन्दू , मुस्लिम के साथ ही इस सृष्टि को सँवारने की चाह भी हमारी सोचों में शामिल होती! काश... हमने ये समझा होता कि हम, हमारी ये दुनिया और यह चर-अचर सृष्टि तभी तक सुरक्षित है जब तक यह धरती सुरक्षित है। अन्यथा जिस दिन कुदरत ने अपना विकराल स्वरूप ग्रहण किया, कुछ भी शेष नहीं रहेगा।


मैं इस बात में बहुत ज़्यादा यक़ीन नहीं रखता कि साहित्य में समाज को बदलने की ताक़त है, किन्तु ये ज़रूर मानता हूँ कि साहित्य अच्छी बातों को दूर तक पहुँचाने में हमारी बहुत सहायता करता है। भले ही कोई क्रांति न हो सके, किन्तु साहित्य और कला के कारण यदि कुछ लोगों का भी हृदय परिवर्तन हो तो ये भी छोटी बात नहीं है। यदि अपनी-अपनी नैतिक ज़िम्मेदारियों के तहत छोटे-छोटे लक्ष्यों को साधा जा सके तो समग्रता में उसके परिणाम बड़े भी हो सकते हैं।

हिन्दी कविता को चिर-परिचित लफ्फाजी और अनावश्यक विषयों के विस्तार ने बहुत हानि पहुँचायी है। बौद्धिक जटिलता के इस दौर में जब भी किसी कवि ने आसान भाषा में ऐसी बात कही; जो जनमानस के मन को सहजता से छू गयी तो उन कविताओं को अद्भुत लोकप्रियता मिली। नरेश सक्सेना की प्रसिद्ध कविता 'ताकि एक वृक्ष बचा रहे' पढ़कर एक पूरी पीढ़ी प्रेरित हुई और मैं व्यक्तिगत स्तर पर ऐसे तमाम लोगों से परिचित हूँ, जिन्होंने अपने घर के सदस्यों से यह वचन लिया है कि उनकी मृत्यु के बाद उनका अन्तिम संस्कार विद्युत शव गृह में किया जाय। कविता जैसे माध्यम की इससे बढ़कर सफलता और क्या होगी!

चित्रा देसाई भी अपनी एक चर्चित कविता में इन मानवीय चिन्ताओं को सलीके से व्यक्त करती हैं-

कभी सोचा है
धरती अगर संन्यासी हो जाए
तो कैसा हो!
बीज रोपें
तो भी पेड़ न दे
कुदाली से खोदें
तो पानी न दे
समुद्र न बने
बादल न बरसे


जब भी सकारात्मक चिन्तन की तरफ़ ख़ुद को एकाग्र करने की कोशिश करता हूँ, हमारे समय के बड़े कवि केदारनाथ सिंह की ये पंक्तियाँ बरबस ज़ेह्न में तैरने लगती हैं-

मुझे विश्वास है
यह पृथ्वी रहेगी
यदि और कहीं नहीं तो मेरी हड्डियों में
यह रहेगी जैसे पेड़ के तने में
रहते हैं दीमक
जैसे दाने में रह लेता है घुन
यह रहेगी प्रलय के बाद भी मेरे अन्दर
यदि और कहीं नहीं तो मेरी ज़ुबान
और मेरी नश्वरता में
यह रहेगी।


एक सदिच्छा जागती है मन में कि कवि का यह विश्वास हम सबका साझा विश्वास हो। हमारे क़दम छोटे ही सही, किन्तु उस दिशा में प्रेरित हों, जहाँ किसी सकारात्मक परिवर्तन की संभावना व्यावहारिक रूप ले सके।


- गंगा शरण सिंह
 
रचनाकार परिचय
गंगा शरण सिंह

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