प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जून 2019
अंक -51

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

मूल्याँकन

'विज्ञप्ति भर बारिश' में समय के संक्रमण से जूझती कविताएँ
- तेजस पूनिया



हिन्दी साहित्य आदिकाल से लेकर आज तक के दो हज़ार वर्ष से भी अधिक का एक दीर्घकालिक समयांतराल पार कर चुका है। इस दौरान इसमें कई आंदोलन हुए, कई विचारधाराओं ने जन्म लिया तथा अपनी साँसें स्वर्णिम इतिहास के रूप में छोड़ी। आद्योपांत इस सफर में साहित्य के विभिन्न रूपों से हम परिचित हुए। आदिकाल में चारण कवियों द्वारा गद्य एवं पद्य दोनों विधाओं में लिखा तथा गाया गया। इसके पश्चात भक्तिकाल में ईश्वर के सगुण तथा निर्गुण रूप का गद्य एवं पद्य में बखान हुआ और रीतिकाल में यह मनुष्य केंद्रित होकर नायिकाओं के नख-शिख वर्णन पर आकर अटक गया जिसे आधुनिक काल के कवियों ने भिन्न-भिन्न वादों-विवादों में बांधकर रचा। साहित्य ने हमें विपुल मात्रा में मनोरंजन के साथ-साथ संवेदनाएं, भावनाएँ, इच्छाएं, सोच-विचारने की शक्ति उपलब्ध कराई। गद्य की भांति पद्य में भी कालजयी रचनाएँ स्वतंत्र तथा केंद्रीय रूपों में हुई है तथा होती रहेंगी। इन रचनाओं में भाषाई-छंद विधान के साथ-साथ मुक्त कविताओं ने भी जन्म लिया। रीतिकाल के दौर में तो इस पर पूरी तरह से आधारित तीन शाखाओं का आविर्भाव भी हुआ जिसे रीतिबद्ध, रीतिमुक्त तथा रीतिसिद्ध नाम से जाना गया। किन्तु आधुनिक काल में यह भारतेंदु युगीन, द्विवेदी युगीन, छायावादी, प्रगतिवादी, प्रयोगवादी, नई कविता, अकविता, समकालीन कविता आदि कई आंदोलनों को लेकर खड़ी दिखाई देती है। आधुनिककाल में कविता ने भाषाई रूप से अधिक समृद्धता पाई तथा इस समय में केंद्र में स्त्री, दलित, किसान, आदिवासी जैसे वंचित, पिछड़े तथा हाशिए का वर्ग निकलकर सामने आया। आधुनिककाल की कविताओं की सबसे बड़ी विशेषता है कि ये जनजीवन की समस्याओं  से सीधा जुड़ी हुई दिखाई देती है। इनमें भक्ति तथा श्रृंगार के दोनों पक्ष संयोग-वियोग के साथ-साथ समाज सुधार की भावना भी अभिव्यक्ति पाती हुई दिखाई देती है। पिछड़े वर्ग की कोटि में ही एक वर्ग वह भी है जो असल मायने में इस पूरे ब्रह्मांड का पालनकर्त्ता है। जिसे सृष्टि के पालनकर्त्ता विष्णु की संज्ञा भी दी जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी और वह पिछड़ा वर्ग है, किसान। किसानों ने ही इस देश मे जब अनाज की कमी पड़ गई तो हरित क्रांति को जन्म दिया। किन्तु यह गहरे दुःख की बात है कि आज वह पालनकर्त्ता स्वयं ही भूखा सोने को मजबूर है। हिंदी साहित्य के साथ-साथ सिनेमा में भी इसे केन्द्रीयपात्र के रूप में रखकर भरपूर संवेदनाएं बटोरी गई हैं। किंतु मात्र संवेदनाओं से भी कोई काम नहीं चला करता। किसानों पर लिखे गए या किसानों को केंद्र में रखकर रचे गए कविता अथवा पद्य के रचना संसार की जब भी बात आती है तो सबसे पहले मैथिलीशरण गुप्त ही याद आते हैं और याद आती है उनकी कविता 'किसान'। गुप्त जी इसी किसान शीर्षक से एक पूरी कविता रच डालते हैं जिसमें वे कहते हैं।

"हो जाये अच्छी भी फ़सल, पर लाभ कृषकों को कहाँ।
खाते, खवाई, बीज ऋण से हैं रंगे रक्खे जहाँ।।
******************
"देखो कृषक शोषित- सुखा कर हल तथापि चला रहे।
किस लोभ से इस आँच में, वे निज शरीर जला रहे।।
मैथिलीशरण गुप्त की ही भांति किसानों पर आधारित अनेक कविताएं तथा कहानियाँ और उपन्यासों का भी रचना संसार गढ़ा गया है। प्रेमचंद को हम कैसे भूला सकते हैं जिन्होंने गोदान नाम से एक पूरा महाकाव्य ही रच डाला। उनके इस महाकाव्य को आने वाले एक लंबे दौर तक ज्वलंत उदाहरण के रुप में साहित्याकाश में जगमगाता हुआ देखा जाएगा। इसी कार्यशाला पर चलते हुए राजस्थान राज्य के बारां जिले में 20 नवम्बर 1980 को जन्मे युवा कवि, भारतीय ज्ञानपीठ का नवलेखन पुरस्कार, साहित्य अकादमी युवा पुरस्कार, शब्द साधक युवा सम्मान आदि जैसे प्रतिष्ठित सम्मानों से अलंकृत ओम नागर ने अपनी कविताओं में किसानों को तथा उनकी पीड़ाओं को अभिव्यक्ति दी है। यूँ तो उन्होंने 'विज्ञप्ति भर बारिश' के अलावा 'देखना एक दिन', 'जद बी मांडबा बैठूं हूँ कविता', 'प्रीत', 'छियापताई' आदि काव्य संग्रह भी लिखे और सम्पादन कार्य के साथ-साथ अनुवाद कला एवं डायरी लेखन में भी हाथ आजमाया। दरअसल आज का साहित्यिक दौर गांवों की बदहाली से नजरें चुराता हुआ दिखाई देता है। वहीं जाकर ओम नागर की कविताएँ अंधेरों में प्रकाश पुंज बनती हुई दिखाई देती है। अपने काव्य संग्रह 'विज्ञप्ति भर बारिश' में उन्होंने बेरोजगारी की विज्ञप्तियों, विस्थापन की विज्ञप्तियों, पर्यावरणीय विज्ञप्तियों, छोटी होती कृषि योग्य जोतों की विज्ञप्तियों तथा राजनीतिक दृष्टि से हताश तथा बैचेन करती विज्ञप्तियों पर शाब्दिक प्रहार किया है। ओम नागर युवा कवि हैं किंतु उनके काव्य के केंद्र में जो है उसकी समस्याएँ प्राचीन है। वर्तमान दौर में तो उस पर और भी संकट गहराता जा रहा है। एक ओर जहां राजनैतिक उथल-पुथल के चलते नोटबन्दी जैसे कदम उठाए गए हैं। वे सब राजनैतिक कदम किसानों के हित में बिल्कुल भी नहीं दिखाई देते हैं। सबका साथ-सबका विकास जैसे नारे देने वाली सरकारों की कथनी और करनी में जमीन आसमान का अंतर देखने को मिल रहा है। यहाँ किसी एक राजनैतिक सत्ता पार्टी को केंद्र में रख कर ऐसा नहीं कहा जा रहा है अपितु इससे पूर्ववर्ती सरकारों ने भी यही सब कुछ किया है। एक कहावत यहां सटीक बैठती है - " ढाक के तीन पात"


आने वाला समय जिस तरह जोरो शोरों से प्रचार-प्रसार के माध्यम से बताया जा रहा है कि डिजिटल इंडिया का युग होगा, मेक इन इंडिया का युग होगा किन्तु कोई पूछने वाला हो तो इस जैसे कार्यक्रम भी तो किसानों की जमीनों पर ही विकास पाते हुए, सफ़ल होते हुए देखे जाते हैं और विकास का यह पहिया उन सभी को कुचलता हुआ आगे बढ़ता दिखाई देगा।  इस भयानक दौर के लक्षण भी अभी से दिखाई देने भी लगे हैं। ऊपर से एक विडम्बना यह भी कि राष्ट्रीय खबरों में भी इन्हें गम्भीरता से नहीं लिया जा रहा। ओम नागर अपने काव्य संग्रह विज्ञप्ति भर बारिश में इसी संक्रमण के समय को दर्शाने का सफल प्रयास करते हैं तथा अपनी कविताओं के माध्यम से प्रश्नचिन्ह छोड़ते हुए चले जाते हैं उनकी कविताओं में प्रश्नों की एक लंबी फेहरिस्त है।

ग्रामीण परिवेश तथा अंचल के साथ-साथ किसानों के इर्द-गिर्द घूमती ओम नागर की कविताओं में कृषक वर्ग के अलावा उनके अपने किसान के रूप में पिता भी हैं तो खेती समय उड़ने वाले पक्षी भी, जो खेतों को बीजते समय वहां से दाने निकालकर ले जाते हैं और अपना पेट भरते हैं। ओम नागर ने अपनी अभिव्यक्ति कौशल का आधार कविता को बनाया जो कि वाक़ई साहित्य लेखन की श्रेणी में एक कठिन विधा मानी जाती रही है। इनकी कविताओं में किसान मूल तो है किंतु साथ ही उसकी समस्याएं भी हैं। अपने संग्रह की पहली ही कविता " पिता की वर्णमाला" में वे लिखते हैं।

पिता के लिए
काला अक्षर भैंस बराबर।
****
काली स्लेट पर
जोड़ बाकी, गुणा-भाग
****
पिता बचपन से बोते आ रहे हैं।
हल चलाते हुए
स्याह धरती की कोख में शब्द-बीज


इस कविता की प्रत्येक पंक्ति में एक तो किसान का अशिक्षित होना भी है। किंतु साथ ही खेती के माध्यम से सृष्टि जगत का पालनकर्त्ता बनना भी है फिर भी इसके मूल में जो है वह है केवल समस्या और समस्या। अपने पिता के माध्यम से समस्त कृषक समाज का प्रतिनिधित्व कराते हुए ओम नागर ने वर्णमाला को ऋतुओं के अनुसार बांटा है और उससे प्राप्त फसल को शब्द बीज। ये शब्द बीज किसान तब से बोता हुआ आ रहा है जब से सृष्टि का निर्माण हुआ हूं। केवल यही उसका कर्म है और उस कर्म से प्राप्त फल ही उसकी नियति। हालांकि गीता में भले ही कृष्ण यह कह देते हैं कि - "कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन" अर्थात्

कर्म करो फल की इच्छा मत करो। किन्तु यदि एक किसान फल की इच्छा नहीं करेगा तो खायेगा क्या और खिलायेगा क्या। भले ही गीता में इसका  संदर्भ दूसरा हो सकता है अथवा है। किन्तु कर्म प्रधान इस सृष्टि जगत में किसान का किसानी करना भी सबसे बड़ा कर्म है। 'पिता की वर्णमाला' के बाद ओम नागर लिखते हैं। 'कितना कुछ बचा रह पाऊंगा मैं' जिसमें वे अपने अस्तित्व की निरन्तर खोज में लगे दिखाई देते हैं।

कितना कुछ बचा रह पाऊंगा मैं
मेरे नहीं रहने के बाद
****
प्यास की तरह
उन तालाबों की तरह
जिनकी  छाती पर उग आये
कंकरीट के वन
बाहर पड़ी रह गई मछलियाँ
कितना कुछ बचा रह पाऊंगा मैं
इतना उपेक्षित होने के बाद


ओम नागर अपने स्वयं के माध्यम से आम नागरिक की चिंता को अभिव्यक्त करते हैं। जिस तरह का ह्मार्क समाज, वातावरण हो चला है। उसके बाद किसी मनुष्य के भीतर कुछ शेष रह जाने की कल्पना नहीं की जा सकती। वैसे भी हर इंसान अपने-अपने मायनों में जरूरी होता है। किंतु उसका जरूरी होना न होना आज कंक्रीटों के इस भयानक जंगल में कोई महत्व नहीं रखता। इसके अलावा वे 'मुख़ौटों के मेले' कविता में इंसान के द्वारा एक प्राकृतिक चेहरे पर कई कृत्रिम चेहरे लगा कर अपने काम निकालने की भयानक प्रवृत्ति को भी दिखाने का प्रयास किया है। भारतीय सिनेमा में अपनी विशेष पहचान तथा अहमियत रखने वाले किशोर कुमार साहब द्वारा एक फ़िल्म 'दाग' में गाना गया था। 'एक चेहरे पर कई चेहरे लगा लेते हैं लोग' जैसी ही स्थिति को ओम नागर ने अपनी इस कविता में दर्शाने का प्रयास किया है और इसी संदर्भ में वे लिखते हैं।

अमल की तलाश में मुख़ौटे हटाते हुए
बीत न जाए जीवन
टूट न जाये कांच की मानिंद सपने
पारे सी डोलती आशंकाएँ
कविता की इन पंक्तियों से ऐसा प्रतीत होता है।

मानो कवि ने स्वयं इस यथार्थ को भोगा है अथवा कम से कम उसे महसूस तो अवश्य ही किया है। इसीलिए उनकी कविताएँ समाज तथा उसके आसपास घट रही घटनाओं के इर्द-गिर्द ही मंडराती दिखाई देती है। भले ही सामने वाला कितना भी मृदु व्यवहार जताने तथा दिखाने की कोशिश क्यों न करें वर्तमान दौर ही ऐसा है कि मनुष्य यह सोचने पर मजबूर हो जाता है कि इसमें कहीं न कहीं हो न हो कुछ गड़बड़ जरूर है। वैसे भी कहा जाता है कि मीठे में ही हमेशा कीड़े लगते हैं। तो यही मानवीय स्वभाव भी है। कि वह काम निकालने के लिए भले ही वह नीम सदृश कड़वा हो किन्तु वह गन्नों की भांति मीठास उसमें डालने का प्रयास अवश्य करता है।


हालांकि भक्तिकाल में कबीरदास कह गए थे।
वाणी ऐसी बोलिए मन का आपा खोए
ओरन को शीतल करे आपहुँ शीतल होय।।

किन्तु कबीर के इस दोहे का वर्तमान में गलत तरीके से उपयोग हो रहा है। कहने का तात्पर्य है कि अपने मतलब के लिए सब मतलबी हो रहे हैं। ओम नागर वस्तुतः अपने पूरे इस कविता संग्रह में किसान तथा उसकी चिंताओं के आसपास ही विचरण करते हुए दिखाई देते हैं। ऐसा होना लाज़मी भी है। क्योंकि वे स्वयं एक किसान हैं तथा किसान परिवार से सम्बद्ध रखते हैं। 'उपजायें तो क्या उपजायें' कविता में भी किसान का द्वंद्व तथा उसके माथे पर पड़ने वाली चिंताओं की लकीरें साफ दिखाई देती हैं। इन चिंताओं की लकीरों में उसके पूरे मेहनताने की चिंता भी झलकती है। जिसे वह आशानुरूप कभी नहीं पा सका है और शायद ना ही कभी पा सकेगा।


उपजायें तो क्या उपजायें।
कि खेत से खलिहान होती हुई फ़सल
पहुँच सके घर के बंण्डों तक
मंडियों में पूरे दाम तुले अनाज के ढ़ेर।

इस कविता में उनके मन की व्यथा स्पष्ट परिलक्षित हुई है। किसान अपने खेती की शुरुआत ही साहूकार की तिज़ोरी से करता है और उसका अंत भी उसी तिजोरी में हो जाता है। जिस तरह भारतीय साहित्य तथा सिनेमा में किसान को दिखाया गया है। हूबहू वही किन्तु नए शब्दों तथा नई अभिव्यक्ति कौशल एवं भाषा विधान, शब्द विधान के माध्यम से अपनी कविताओं में नयापन देने का सार्थक प्रयास किया है। हमारे देश में जिस तरह दिनों दिन इमारतें बड़ी होती जा रही हैं। उसी तरह दिनों दिन सड़कें छोटी तथा हमारे दिल और दिमाग भी छोटे होते जा रहे हैं। अब किसी को भी कुछ भी उद्वेलित नहीं करता है। ये भाव ओम नागर ने अपनी कविता 'भरपूर उदासी के साथ लौटना' में उकेरे हैं। ऐसा नहीं है कि ओम नागर अपने इस संग्रह में किसानों के पैरोकार बनकर सिर्फ समस्याओं की ओर प्रश्न उठाते हैं। अपितु ने सामाजिकता के धरातल पर ही प्रेम तथा प्रेरणा पाने वाले पात्रों तथा नायक नायिकाओं के बारे में भी चित्रण करते हैं। ओम नागर के काव्य संग्रह में अन्य कविता है। जमीन और जमनालाल:तीन कविताएँ' इस कविता की पहली ही पंक्ति किसान की अंतर्व्यथा को स्पष्ट करने के लिए काफ़ी है, जिसमें वे कहते हैं।

'आठों पहर यूँ
खेत की मेड़ पर उदास क्यों बैठे रहते हो जमनालाल


पहली ही पंक्ति किसान के माथे पर झलकने वाली चिंता की लकीरों की ओर ध्यान ले जाती है। जहाँ किसान कभी अतिवृष्टि, कभी सूखे, कभी पाला तो कभी अन्य फसली बीमारियों के कारण फसल नष्ट हो जाने की घोर चिंता में पड़ा रहता है। साथ ही कविता की अगली पंक्ति हमारे द्वारा तेजी से अपनाई जा रही पाश्चात्य संस्कृति तथा औद्योगिकीकरण की नीति की ओर ध्यान केंद्रित करती है। जिसमें वे लिखते हैं।

क्या तुम नहीं जानते जमनालाल
कि तुम्हारे इसी खेत की मेड़ को चीरते हुए
निकलने को बेताब खड़ा है राजमार्ग

एक ओर कृषि योग्य छोटी होती जोतें तथा दूसरी ओर भू अधिग्रहण राजमार्ग बनाने के लिए जो हो रहा है। वह किसान की चिंताओं को और बढ़ा दी रहा है। भू अधिग्रहण की बात को कवि ओम नागर अपनी इस कविता में शानदार शब्दों के संयोजन से अभिप्रेत करते हुए लिखते हैं-

बेटी बाप की और धरती राज की होती है
और राज को भा गये हैं तुम्हारे खेत।

और राज यानी सरकार और उस सरकार के कामों में अगर कोई किसान या जमीन मालिक अवरोध उत्पन्न करता है। तो वह उनके द्वारा निर्मम गोलियों का शिकार बनता है। यहाँ भी कवि उन किसान आंदोलनों की ओर ध्यान केंद्रित कराना चाहते हैं। जिनमें निर्दोष किसानों तथा लोगों की क्रूरतापूर्वक हत्याएं की गई और ये क्रूरता और हत्याएँ भी तुम्हारे द्वारा अपने हिस्से के लिए काती गई कपास, गन्ने की मिठास के बदले कंक्रीटों का जंगल ही देना चाहती है। इस कविता में सीधे-सीधे हमारे कदम जो आधुनिकता की ओर बढ़ रहे हैं। उस पर चिंता जाहिर की गई है। कुछ दिन पहले एक पर्यावरण की रिपोर्ट आई थी जिसमें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सर्वे करके बताया गया था कि हमारे भारत में प्रति व्यक्ति औसत पेड़/वृक्ष संख्या में मात्र 28 ही हैं। जबकि विकसित देश रूप में यह आंकड़ा 628 का है। दरअसल हमारा देश विगत कई वर्षों से तेजी से विकास पथ पर बढ़ रहा है। जिसके चलते भी पर्यावरणीय बदलाव हमारे यहां सबसे अधिक देखने को मिल रहा है। लेकिन इसी कविता के दूसरे भाग में कवि किसानों को विरोध करने के लिए आगाह करते हैं और कविता के माध्यम से ही नारा देते हैं।

"हाथी घोड़ा पालकी, जमीन जमनालाल की।


ओम नागर के कविता संग्रह 'विज्ञप्ति भर बारिश' में कविता है। समय का संक्रमण जिसे पढ़कर एकदम ही नागार्जुन की कविता 'अकाल और उसके बाद' स्मृति पटल में तैरने लगती है। उस कविता में भी नागार्जुन ने अकाल से पूर्व और पश्चात की जिस विभीषिका का चित्रण किया था लगभग वैसा सा ही चित्रण समय का संक्रमण में देखने को मिलता है। हालांकि यहां अकाल जैसे शब्द नहीं है। ना ही उसकी विभीषिका का सीधा बिम्ब प्रस्तुत करने वाले चमत्कारिक शहद विधान किन्तु पलाश के फूलों का रंग बदलना, कोयल के गले में मधुरपन न रह जाना, गिरगिट का रंग नहीं बदलना और बगुले की चोंच का सूखे पोखर में गढ़ जाना उसी मौसम की बानगी है और इस मौसम में परिवर्तन के चलते ही वे दूसरी ओर रुख करने लगे हैं। जिसे एकटक यह समय देख रहा है क्योंकि इस बदलते मौसम की बानगी भी यही कहने वाला है।


- तेजस पूनिया