प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जून 2019
अंक -51

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम
आकाश अपना ना धरती
 
उस छोटे से दड़बेनुमा घर में खड़े होकर, शैला ने धीरे से खिड़की में से बाहर देखा। चारों तरफ़ बिखरे हुए छोटे-छोटे माचिस की डिब्बी जैसे फ्लैट। न छत अपनी, न धरती। शैला का मन रोने- रोने को हो आया। महानगरीय संस्कृति। मुंबई में कदम रखते ही उसने देखी, ऊँची-ऊँची इमारतें, विशाल अट्टालिकाएं, एक दूसरे पर गिरते पड़ते फ्लैटस। उसे याद आया, जब वह और दूसरे भाई-बहन मिलकर माचिस की डिब्बी से घर बनाते थे। एक ऐसी ही माचिस की डिब्बी के सामने ले जाकर अक्षर ने उसे खड़ा कर दिया। पास की दूसरी तीन डिब्बियों में से तीन उत्सुक चेहरे झाँके और फिर सबके दरवाजे बन्द हो गये।अपने घर का दरवाजा बन्द करके शैला ने अपने सपनों के महल को देखा। दो छोटे- छोटे कमरे, एक छोटा सा किचन, एक बाथरूम, बस हो गया। 
 
इसी के साथ उसे याद आया, अपना घर, अपने पिता का घर। बड़े-बड़े अनगिनत कमरे, बड़ा सा आँगन, आँगन में नीम का बड़ा सा पेड़, पेड़ पर बँधा झूला। आँगन के बीचोंबीच तुलसी का चौरा। बड़ा भरापूरा परिवार। सारे दिन बच्चों की धमाचौकड़ी मची रहती। कभी झूला झूल रहे हैं, कभी बड़े से आँगन में लंगड़ी खेल रहे हैं, कभी गुड्डे-गुड़िया का व्याह रचाया जा रहा है। खेलों का कोई अन्त नहीं। और छत ! इतनी बड़ी कि सौ लोग एक साथ सो जायें फिर भी जगह बच जाये। इसी छत पर प्रेम के अनगिनत किस्से बुने गये।अल्हड़ता और मस्ती भरे दिन।
 
जापानी गुड़िया सी दादी।एकदम गोरी, छोटा सा कद, निस्तेज नीली आँखें। वह बहुत कम सुन सकती थीं, इसलिए अपने अन्दर की दुनिया में कैद, अन्दर ही अन्दर मुस्कुराती रहतीं। नीम के पेड़ के नीचे एक चारपाई बिछी रहती, जिस पर वह बड़े ठसके से बैठी रहतीं। बच्चे उन पर लदे रहते, बच्चे उनकी दुनिया थे वह बच्चों का जीवन्त खिलौना थीं
शैला कॉलेज से थक कर आती और दादी की गोद में सिर रख कर सो जाती। नीम का पेड़ अपनी छाया से पूरे आँगन को घेरे रहता। हरे- पीले पत्तों के बीच से दिखता आसमानी आकाश। अनेक आकृतिमय बादलों के बिखरे- बिखरे टुकड़े, झरते हुए नीम के पत्ते। नीम के उस वृक्ष पर बैठे हुए अनगिनत पक्षी, चिड़ियों का मधुर कलरव। जैसे ही दादी मुठ्ठी भरकर बाजरा आँगन में बिखेरती, असंख्य चिड़ियों से आँगन भर जाता।प्रकृति जैसे स्वंय वहाँ आकर साकार हो उठती।
 
दादी धीरे धीरे शैला के बालों में हाथ फिराती, शैला का मन डूबने डूबने को हो जाता। वह जानती थी, घर में उसके विवाह की बात चल रही है। ये घर छोड़कर उसे जाना होगा। धीरे-धीरे वह सब भूल जायेगी,यह घर, नीम का पेड़, उसमें से दिखता नीला आकाश, झरते हुए नीम के पत्ते, यह आँगन और बचपन की खट्टी- मीठी यादें।
शैल
हाँ दादी
तुझे कैसा दूल्हा चाहिए रानी
दूल्हा कैसा भी हो, पर मुझे घर ऐसा ही चाहिए दादी।खुला -खुला बड़ा सा ।
पगली, काश चाहने पर सब मिल सकता।दादी की निस्तेज आँखों में कोई पुराना सपना तैर कर विलीन हो गया। वह शैला को भूलकर फिर अपनी यादों के समन्दर में डुबकी लगाने लगी।
 
माँ ने जब उसे अक्षर का फोटो दिखाकर बताया कि लड़का सी.ए. है और मुंबई में नौकरी करता है तो उसका दिल डूबने - डूबने को हो आया। उसने सुन रखा था मुंबई की भागती -दौड़ती ज़िन्दगी के बारे में, पर ना कहने की कोई वजह ही नहीं थी। अक्षर सुन्दर था, पढ़ा-लिखा था, अच्छे खानदान का इकलौता बेटा था। बड़ी धूमधाम से उसका विवाह सम्पन्न हुआ। शादी के बाद उसके जीवन में एक लम्बा दिन शुरू हुआ, जो एक कोहरे की धुंध में लिपटा हुआ था। कहाँ चला गया वह नीम,कहाँ चली गयीं चिडियाँ, कहाँ रह गया आँगन, कहाँ गया वह नीला आसमान? बहुत ढूँढने पर भी उसे कहीं बादल का एक टुकड़ा भी नहीं दिखा। चारों तरफ़ विशाल अट्टालिकाएं। जिधर देखो ईंट पत्थरों के मकान, मकानों में से झाँकते चित्र - विचित्र चेहरे। जिधर देखो सीमेंट, कच्ची मिट्टी का नामो- निशान नहीं।
 
अक्षर सुबह जाते और रात को आते। सारे दिन वह उस बन्द डिब्बी में कैद पड़ी रहती ।पास के तीनों फ्लैटस में दो महाराष्ट्रियन और एक गुजराती परिवार रहते थे। चाहने पर भी वह उनसे आत्मीय सम्बन्ध नहीं बना पाई। दिन महीनों में, महीने साल में परिवर्तित होने लगे। इसी बीच वह एक पुत्र की माँ बन गयी। नन्हे से बेटे के कामों में अब वह रात दिन व्यस्त रहने लगी पर एकान्त के क्षणों में आज भी उसे एक आँगन और छत की कसक सालने लगती।
 
धीरे-धीरे समय का प्रवाह बहता रहा और देखते ही देखते अंशुल बड़ा हो गया। मास्टर्स करने के लिए उसे अमेरिका भेजा और जब वह लौटा तो अकेला नहीं था, उसके साथ उसकी नवविवाहिता क्रिस्टीना भी साथ थी। इस छोटे से फ्लैट में अब वह एक साथ नहीं रह सकते थे इसलिए अंशुल बड़ा फ्लैट देखने में जुट गया। बरसों से दबी चिंगारी फिर से जल उठी, काश! अंशुल फ्लैट की जगह बँगला ले ले। चिंगारी अन्दर ही दबी रह गयी। मरीन ड्राइव के उस बड़े से फ्लैट के सामने ले जाकर उसे अंशुल ने खड़ा कर दिया।
 
ये देखो मॉम, कितना बड़ा ड्रॉइंग - रूम, यह बच्चों का कमरा, यह आपका और पापा का कमरा, यह हमारा कमरा और ये है आपकी स्टडी। यहाँ बैठकर आप आराम से लिखना-पढ़ना और जब थक जाओ तो यहाँ से जी भरकर मुंबई का खूबसूरत नज़ारा देखना। अंशुल ने उसे ले जाकर खिड़की के सामने खड़ा कर दिया और खिड़की खोल दी। तेज हवा के शीतल, मृदुल झोंके ने शैला का तन-मन भिगो दिया। समुद्री पवन के झोंके, दूर दूर तक जगमगाती नियोन लाइट्स , सड़क पर भागती खिलौनों जैसी कारें। सब कुछ होते हुए भी शैला के मन का एक कोना अतृप्त ही रहा।
वह घुलती गयी। न जाने रात दिन क्या क्या सोचती रहती। कृशकाय देह, रूग्ण मन।
 
अक्षर उसके बालों पर हाथ फिराता, गालों को सहलाता, उसके चेहरे से अपना चेहरा सटा कर प्यार से पूछता’ तुम्हें क्या चाहिए शैला’बोलो जो कहोगी, लाकर दूँगा। कहीं से भी, कैसे भी ।
शैला सोचती, कैसे बताऊँ, मुझे क्या चाहिए, मैं जानती हूँ तुम नहीं दे सकोगे और न देने की यातना मैं तुम्हें दे नहीं सकती। फीकी सी हँसी हँसकर रह जाती शैला। अक्षर का हाथ कस कस कर पकड़ लेती है। सन्तुष्टि का सुख, जो मिला उसी में सन्तुष्ट रहकर जीवन निकाल दिया उसने।
 
तेज बारिश हो रही है,बारिश की बूँदें सम्मोहन पैदा कर रही हैं। अन्तिम प्रयाण पर जाने को तैयार है शैला। अँशु और क्रिस उसके पलंग के पास खड़े हैं, पास बैठे अक्षर ने धीरे से शैला की हथेली थाम ली, मुस्कुरा कर शैला से कहा, शैल अब तो बता दो कि क्या था ऐसा जो तुम मुझ से जीवन भर ना कह सकीं।
बन्द होती आँखों में एक नन्हा सा सपना लहराया और शैला ने देखा- धुँधला -धुँधला सा नीम का पेड़,पेड़ के नीचे एक चारपाई, चारपाई पर बैठी एक जापानी गुड़िया सी वृद्धा, जिसकी आँखें नीली हैं बाल सुनहरे। उसकी गोद मे सोयी एक अल्हड़ सी लड़की। अचानक उसके ऊपर कुछ नीम के पत्ते गिरे और उसके साथ ही शैला की आँखों मे लहराता सपना विलीन हुआ। ज्योति की लौ मंद होने लगी। बुझते बुझते उसने अक्षर की तरफ देखा। उसके होट कुछ कहने के लिए काँपे। अक्षर ने अपने कान, उसके मुँह से सटा दिये, विराट सन्नाटा है, जैसे जैसे रात मंथर गति से , आगे सरकती सन्नाटा और भी गहरा रहा था। पत्तों से छन छन कर बरसती दुग्ध धवल चाँदनी में वह एकान्त भीग चुका था। कभी कभी आकाश भी अपनी नीलाभ अलिप्तता को छोड़कर धरती पर उतर आता है।
 
कुछ कहना है शैला? 
दिये की लौ थरथरायी, आँसुओं की दो बूँदे गालों को भिगो गयीं। उसके होट काँपे, अस्फुट स्वर में वह बोली-
खुला विस्तृत आकाश, बड़ा सा आँगन, आँगन में एक नीम का पेड़, पेड़ से दिखते बादल के टुकड़े और... और.. और अक्षर ने देखा, दिये की लौ बुझ चुकी थी ।

- निशा चंद्रा
 
रचनाकार परिचय
निशा चंद्रा

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कथा-कुसुम (2)