प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जून 2019
अंक -51

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम

कहानी- सौतन

अल्मोड़ा का मार्ग बहुत सुन्दर और मनमोहक है। वहाँ के प्राकृतिक सौन्दर्य को निहारते हुए मन अनायास ही कविता करने लगता है क्योंकि वहाँ की प्राकृतिक सुषमा विधाता की बहुत सुन्दर कविता जान पड़ती है। एक ऐसी कविता जिसमें छोटी-बड़ी पहाडियाँ और चीड़ के ऊँचे-ऊँचे पेड़ों को देखकर ऐसा लगता है कि नवयौवना-सी हरी-भूरी पहाड़ियाँ अपनी बाहें फैलाये सर्पीले रास्तों के मोड़ों को ऐसे निहार रही हैं कि दूर देश गया प्रियतम बस उस मोड़ से आते ही अभी पुकार उठेगा और दौड़ता हुआ पहाड़ी पर बसे छोटे से घर में आ जाएगा। ढ़ेर सारी चीज़ें उसके सामने फैला देगा। एक-एक कर उन चीज़ों की विशेषता बताएगा और उसे बार-बार दिखाएगा। लेकिन उसका मन उन चीज़ों से प्रसन्न नहीं होगा। वह तो बस अपने प्रियतम की बाहों की जकड़न अपने तन पर महसूस करना चाहती है। उसके लिए वह झूठमूठ का गुस्सा दिखाएगी तब कहीं जाकर प्रियतम उसे अपनी बाहों में भरेगा और वह उससे पूछगी ‘मेरी याद नही आती थी क्या?’ प्रियतम उसका चेहरा अपने चेहरे के पास लाकर उसे कहेगा ‘याद आती थी तभी तो दौड़ता चला आया।’ फिर दोनों मिलकर कोई पहाड़ी प्रेमगीत गाएँगे। ऐसी ही परिकल्पना में खोया मैं अचानक ड्राइवर हरि सिंह की आवाज से चौंक उठा, “वह देखिये साहब नन्दा देवी पर्वत साफ चमक रहा है।” मैंने कार रोकने को कहा और कार से बाहर निकलकर सड़क के किनारे आ गया। सामने सफेद पर्वत मालाएँ मुस्कुराती हुई लग रही थीं। उसने मुझे बताया, “वह देखिये साहब! वह नन्दा देवी पर्वत है। कितना विशाल! कितना सुन्दर!” मैं अपलक उसे निहारता रहा जैसे बर्फ की शीतलता को आँखों के रास्ते अपने मन में उतार देना चाहता था। सचमुच कितनी सुन्दरता है इन विशाल हिमाच्छादित शिखरों में। उनकी शान्ति उन्हें निहारने वाले को शान्त कर देती है। “ये इधर-उधर जो पहाड़ हैं क्या उनके नाम बता सकते हो?” मन में उठे प्रश्न को ड्राइवर से पूछ लिया। “हाँ साहब! वह देखिये वह नन्दा घुंटी, वह नन्दा कोट...” हरि हाथ का इशारा करके बताने लगा। मैंने कार में रखा कैमरा निकाला और उसकी बातें सुनते हुए उन पहाड़ियों के चित्र लेने लगा।


मन कर रहा था कि उन पर्वत मालाओं को निहारता रहूँ लेकिन मुझे एक कार्यक्रम में भाग लेने कौसानी जाना था। अतः वहाँ अधिक देर रुक नहीं सकता था। मैंने ड्राइवर को चलने को कहा और कार में बैठ गया। हरि बोलने लगा, “साहब! कौसानी से भी बहुत सुन्दर दृश्य दिखाई देते हैं। आपका मन खुश हो जाएगा। वापस आने का मन नहीं करेगा। साहब!” मैं उसकी बातें सुनने लगा। “साहब मेरे गाँव से तो नन्दा देवी एकदम साफ दिखाई देता है। और भी बहुत सारी पहाड़ियाँ दिखती हैं। अगर आपका काम जल्दी निपट जाए तो चलिएगा साहब। यहीं अल्मोड़ा से थोड़ा ऊपर ही है मेरा गाँव। गाँव तक सड़क है, कार आराम से चली जाएगी।” “अच्छा, चलो देखते हैं। अगर कल कार्यक्रम समय से खत्म हो गया तो कल वापसी में तुम्हारे गाँव चलेंगे।” “जी साहब, बहुत अच्छा।” उसने खुशी ज़ाहिर की।


अब हम अल्मोड़ा शहर से आगे आ चुके थे और कार कौसानी मार्ग पर सरपट दौड़ी जा रही थी। मैं लगातार बाहर बिखरी पहाड़ी सुन्दरता को निहारे जा रहा था। कोई दृश्य अच्छा लगता तो ड्राइवर को कार धीमी करने को कहता और उसका फोटो ले लेता। दूर पहाड़ी पर छोटे-छोटे रंग-बिरंगे घर। नीचे सीढ़ीनुमा खेत। शहरी भाग दौड़ से त्रस्त मन को शान्त करने के लिए इन पर्वतीय स्थलों से अच्छी जगह कुछ नहीं होगी। सामने दिखती शान्त पर्वतमालायें श्वेत वस्त्रों में चिरसाधना में लीन ऋषियों की भाँति लगती हैं। जैसे वे साधक को शान्ति का पाठ पढ़ा रहे हों। उन्हें देखकर ऐसी अलौकिक शान्ति का अनुभव हुआ कि मन वहाँ बस जाने को करने लगा। ऐसा लग रहा था कि सामने वाली पहाड़ी पर ऐसा ही एक छोटा-सा घर बन जाए और...“क्या हुआ साहब? बहुत शान्त हैं। कोई कहानी सोच रहे हैं या फिर कोई कविता...” ड्राइवर हरि की हँसती हुई मीठी वाणी ने मानों मेरे ध्यान को भंग किया। “कहाँ तक पहुँच गये?” मैंने गाड़ी से बाहर झाँकते हुए उससे प्रश्न किया। “साहब सोमेश्वर आ गये। चाय पी ली जाए अगर आपकी इजाज़त हो तो?” उसने उत्तर के साथ प्रश्न भी मेरे सामने रखा। “हाँ-हाँ क्यों नहीं...मैं भी पिऊँगा।” अँगड़ाई और जम्हाई लेते हुए मैंने कहा, “कहीं ठीक जगह देखकर गाड़ी किनारे लगा दो, जिससे कुछ फोटो...” मैं कह भी नहीं पाया कि कार सड़क के किनारे खाई की तरफ लग चुकी थी। सामने ठिगनी-सी पहाड़ी पर बहुत सुन्दर सीढ़ीनुमा खेत था, जिसके किनारे एक नदी अंग्रेजी के ‘यू’ आकार में उस पहाड़ी को अपने आलिंगन में बाँधे थी। यह दृश्य देखकर मन वहीं खोने लगा। ड्राइवर सड़क के पार पहाड़ी की तरफ चाय की दुकान पर जा चुका था और मैं अपना कैमरा लिए उस खेत और नदी की तस्वीरें उतारने लगा।
 

एक के बाद एक फोटो लेने में मस्त मैं उस समय पलटा जब अपने हाथ में दो चाय के गिलास लेकर हरि आया। एक गिलास मुझे दिया और कहने लगा, “साहब, प्लीज़ कल मेरे गाँव चलिएगा ज़रूर।” “अरे पहले कार्यक्रम से तो निबट लूँ। फिर देखूँगा।” मैंने चाय की चुस्की लेते हुए कहा। “साहब...न हो तो एक दिन रुक जाएँगे वहाँ...” वह संकोच से बोला। “ओह...तो अपना गाँव बहुत मिस कर रहे हो। तुम्हारा खुद का मन है और मुझसे चलने को कह रहे हो।” उसके मन को समझते हुए मैंने हँसते हुए कहा। वह भी हँस दिया। “कौन-कौन है तुम्हारे घर में?” मैंने पूछा। “ईजा यानि माँ, बाज्यू यानि पिताजी, छोटा भाई, दो बहनें हम एक घर में रहते हैं और थोड़ा-सा ऊपर चाचा का घर है उसमें चाची और उसका बेटा।” “ओह! तो पूरा परिवार वहीं रहता है। क्या करते हैं तुम्हारे पिताजी?” “पिताजी तो अब कुछ नहीं करते साहब, लेकिन पहले मेरे चाचा और पिताजी पोर्टर थे। पहाड़ चढ़ने वाले लोगों का सामान लेकर उनके पीछे-पीछे चलते थे।“ “ओह...वाह क्या बात है? कौन-कौन से पहाड़ चढ़े उन्होंने?” “पिताजी तो अपनी पूरी ज़िन्दगी में दस-बारह पहाड़ चढ़े थे। लेकिन चाचा तो केवल एक ही चढ़ पाया और उसी में...” वह एक साँस में गिलास में बची चाय पी गया और चाय वाले की दूकान पर जाकर बीड़ी पीने लगा। मुझे उसकी अधूरी छूटी बात कुछ अटपटी लगी लेकिन उस पर ज्यादा ध्यान न देकर मैंने अपनी आँख कैमरे के ब्यूफाइंडर में लगा दी। अभी दो तीन शॉट की लिए थे कि हरि ने पूछा, “चलें साहब?” हामी भरकर मैं अपने कैमरे समेत कार में बैठ गया। सोमेश्वर के बाजार में अच्छी चहल-पहल थी और सड़क कम चौड़ी होने के कारण कार बहुत धीमे चल रही थी। मैं कैमरे में प्ले का बटन दबाकर अपने खींचे हुए फोटो देखने लगा।
 

कार के रफ्तार पकड़ते-पकड़ते मुझे अचानक याद आया और मैं पूछ बैठा, “हाँ...तो तुम्हारे चाचा के बारे में तुम कुछ बता रहे थे...क्या हुआ बताओ?” हरि कुछ असहजता से बोलकर चुप हो गया, “हाँ...साहब...बता तो रहा था...आप घर चलेंगे तो सब समझ जाएँगे।” मैंने उसके स्वर और असहजता से अन्दाज़ा लगा लिया कि अवश्य ही कोई अनहोनी घटी होगी। मैं आँखें बन्द करके बैठ गया और उसके गाँव जाने के लिए समय सहेजने की योजना बनाने लगा। इसी बीच न जाने कब मुझे नींद भी आ गयी।
“अब कहाँ जाना है साहब?”  हरि की आवाज़ से मैं झटके से जागा। बाहर देखा हम कौसानी के चौराहे पर थे। मैंने कहा “प्रशान्त होटल में मेरे ठहरने की व्यवस्था है। अनासक्त आश्रम के बराबर में।“ दस मिनट के अन्दर ही मैं प्रशान्त होटल में था। सारी औपचारिकताएँ कार्यक्रम आयोजकों ने पहले ही कर दी थीं, अतः मैं सीधे ही अपने कमरे में चला गया। कमरा बहुत सुन्दर और आकर्षक था। हर तरफ सुन्दर पर्दे पड़े थे। सामने का पर्दा जैसे ही हटाया आँखें चमत्कृत हो गयीं और अनायास ही मुँह से निकला, “वाह...अद्भुत...” मैं मंत्रमुग्ध-सा एकटक निहार ही रहा था कि हरि वेटर के साथ मेरा सामान लेकर अन्दर आ गया, “यह त्रिशूल पर्वत है साहब...इसकी सुन्दरता तो सुबह देखिएगा।”


सुबह लगभग साढ़े तीन बजे मेरे कमरे की घंटी बजी। मेरे “कौन” पुकारने पर आवाज़ आई “साहब! सूर्योदय होने वाला है…आप सामने त्रिशूल पर सूर्य की पहली किरणें अवश्य देखें। अगर ऊपर टैरेस पर आ जाएँ तो और भी अच्छा।” मैंने झट से खिड़की का पर्दा खोला, लेकिन सामने अंधेरा ही व्याप्त था। दैनिक क्रियाओं से निवृत्त हो अपना कैमरा लेकर मैं ऊपर टैरेस पर पहुँच गया। ठंडी हवा के स्पर्श ने सारी सुस्ती उतार दी। आसपास के होटलों में और मेरे होटल में ठहरे कई लोग मुझसे पहले ही अपने कैमरों को स्टैण्ड पर जमाए हुए खड़े थे। मैं सामने देख ही रहा था कि कुछ चमकती हुई-सी चीज़ मुझे दिखाई दी। ध्यान दिया तो “वाह...” मुँह से निकला। उधर पूर्व में पंचाचूली पर्वत के पीछे से निकलते सूर्य की पहली किरण जैसे ही त्रिशूल पर्वत के ऊँचे शिखर पर पड़ी वह सोने की तरह चमकने लगी और पूर्व में पंचाचूली की छाया पूरे आकाश में फैलने लगी। तुरन्त बचपन में चित्रकला में बनाने वाले सूर्य और उसकी किरणें मानस पटल पर अंकित होने लगीं। सभी अपने-अपने कैमरों में प्रकृति की इस पल-पल बदलती कलाकृति को चित्रित करने में लग गये। मैंने भी बहुत चित्र लिए।


कार्यक्रम आरंभ होने में समय था। अतः मैं इधर-उधर टहल ही रहा था कि हरि मेरे पास आया, “साहब...मेरे गाँव चलेंगे न...।” उसके शब्दों और आँखों के निवेदन को ठुकराने की हिम्मत नहीं हुई “ठीक है चलना…” कहकर मैं फिर सामने विस्तृत विशाल त्रिशूल पर्वत के चित्र लेने लगा। कार्यक्रम के दौरान हरि सबसे पीछे बैठा मुझे ऐसे देख रहा था मानों कह रहा हो, ‘साहब अब चलें क्या?’ उसकी व्यग्रता मुझ तक सीधे पहुँच रही थी। कार्यक्रम यद्यपि लम्बा चलने वाला था लेकिन मेरा कार्य पहले सत्र में ही समाप्त हो गया। मैंने आयोजकों से विदा ली और सीधे होटल पहुँचकर वापसी की तैयारी करने लगा। हरि मेरे साथ मेरा सामान रखवा रहा था क्योंकि उसे मुझसे अधिक जल्दी थी अपने गाँव पहुँचने की।


हम वापस अल्मोड़ा के लिए निकल पड़े। हरि बहुत उत्सुकता से मुझे अपने गाँव के बारे में बता रहा था किन्तु सुबह जल्दी उठने के कारण मुझे नींद आ गयी और मैंने उसकी बातों में कोई रुचि नहीं दिखाई। “साहब...” की आवाज़ पर आँख खुली तो देखा हम अल्मोड़ा पहुँच चुके थे। “कहाँ पहुँच गये?” “अल्मोड़ा है साहब...बस अब यहाँ से एक घंटा लगेगा मेरे गाँव का...आप चाय पीएँगे?” सुस्ती तो थी ही अतः हामी भरकर मैं भी कार से बाहर आ गया। एक बार फिर ठंडी हवा ने मुझे लपेट लिया। सामने फैली पर्वतमालाओं में नन्दा देवी की चोटी को इस बार देखते ही पहचान गया लेकिन अब फोटो खीँचने का मन नहीं कर रहा था। चाय और बीड़ी पीकर हरि तुरन्त कार में बैठ गया और दुगुने उत्साह से अपने गाँव की ओर चल दिया।
 

कार थोड़े संकरे मार्ग पर थी लेकिन ऊँचाई के कारण सामने का दृश्य एकदम साफ था। सफेद फैली पर्वत मालाएँ एकदम स्पष्ट थीं। लगभग एक घंटे बाद वह अपने गाँव पहुँच गया। घर के बाहर कार रुकती इससे पहले ही उसके परिवार के तथा आसपास के अन्य लोग वहाँ हमारे स्वागत में उपस्थित थे।
औपचारिक परिचय के बाद हरि मुझे ऊपर के कमरे में ले गया और बोला “साहब! आप थोड़ा आराम कर लीजिए। हम भोजन के समय बातें करेंगे।” थकावट के कारण मैंने स्वीकृति दे दी और लेट गया। किन्तु अपनी खिड़की के सामने एक दीवार देखकर विचार करने लगा कि ‘अगर यह दीवार नहीं होती तो मैं लेटे-लेटे ही नन्दा देवी पर्वत की चोटी के दर्शन कर लेता...पता नहीं क्यों यह बेतुकी-सी और इतनी ऊँची दीवार बना रखी है।’ विचार करते-करते कब आँख लग गयी पता ही नहीं चला। हरि की आवाज़ से मेरी नींद टूटी, “चलिए साहब, नीचे पिताजी खाने पर आपका इंतज़ार कर रहे हैं।” मैं उठा और उसके पीछे-पीछे सीढ़ियाँ उतरकर नीचे के कमरे में आ गया, जहाँ हरि के पिताजी खाने की मेज पर मेरा इंतज़ार कर रहे थे। मुझे देखते ही वे उठ गये और हाथ जोड़कर “आइए साहब” बोले। मैंने कहा, “अरे, बैठिये, आप तो बैठिए।” वे मेरे सामने ही बैठ गये। चमकती हुई स्टील की खाली थालियाँ हम दोनों के आगे रखी थीं। एक थाली मेरे दायीं ओर थी हरिसिंह की और एक थाली उसके पिताजी के दायीं ओर रखी थी। हरिसिंह हमारे लिए भोजन लेने अन्दर रसोई घर में चला गया। मैंने उसके पिताजी से औपचारिक बातें शुरू कर दीं, “हरि बता रहा था कि आपने बहुत सारे पहाड़ चढ़े हैं। वैसे कौन-कौन सी चोटियाँ चढ़ीं?” मेरी बात सुनकर एक पल के लिए हरि के पिताजी के चेहरे पर चमक आई लेकिन अगले ही पल गला साफ करते हुए उन्होंने कहा, “अरे साब! क्या बताएँ...बहुत से पहाड़ चढ़े हैं हमने। लेकिन अब तो जैसे सोच कर भी डर लगता है।” “क्यों क्या हो गया?” मैंने पूछा, “अगर कोई समस्या न हो तो बताइए तो सही...रास्ते में हरि भी कुछ कहते-कहते रुक गया था।” इससे पहले वह कुछ कहते हरिसिंह हमारे लिए भोजन ले आया था, “लीजिए साहब! खाना तैयार है।” “खाना खाइए साहब...फिर बात करेंगे।” हरि के पिताजी ने कहा। “ठीक है...” कहकर मैंने खाना शुरू किया। लेकिन दो-तीन निवाले ही खाए थे कि मेरी नज़र उनके दायीं ओर रखी थाली पर पड़ी। “वह थाली किसके लिए है?” मैंने मुँह चलाते हुए पूछा। “मेरे छोटे भाई के लिए...” हरि के पिताजी ने कहा। “ओह... तो कहाँ है वह? आया नहीं?” मैंने पूछा ही था कि रसोई से रोने की आवाज़ आने लगी। हरि ने कहा, “साहब! आप खाना खा लीजिए, फिर आपको सब बताऊँगा।” मुझे न जाने क्यों सबकुछ रहस्यमय लग रहा था। एक अजीब-सी दीवार, एक अतिरिक्त थाली और हरि और उसके पिताजी का कहते-कहते रुक जाना। मैंने आवश्यकतानुसार भोजन किया और उठ गया। हरि ने बाहर आँगन में मेरे हाथ धुलवाए और वहीं पर एक ओर जलती लकड़ी के पास पड़ी कुर्सियों पर बैठने के लिए कहा।


मेरी कुर्सी के साथ पड़ी दो कुर्सियों पर हरि और उसके पिताजी बैठ गये जबकि उसके परिवार के अन्य लोग भी इधर-उधर बैठकर आग तापने लगे। “अच्छी ठंडक हो रही है।” मैंने बात शुरू करने के लिए शुरूआत की लेकिन मेरी बात का उत्तर न देकर हरि के पिताजी ने अपनी बात कहनी शुरू कर दी, “साहब, सुन्दर नाम था उसका। मेरा छोटा भाई। उसे पहाड़ पर चढ़ने का बहुत शौक था। अक्सर मुझसे कहा करता था कि “दाज्यू, मुझे भी अपने साथ ले जाया करो।“ वहाँ...ऊपर…उस जगह बहुत-बहुत देर तक खड़े होकर सामने नन्दा देवी की चोटियों को देखा करता और कहता एक दिन मैं वहाँ जाऊँगा।“ उन्होंने ऊपर की ओर इशारा किया, जिस कमरे में मुझे टिकाया था और जिसके सामने एक बहुत ऊँची दीवार थी। वह आगे बोले, “हम सब उसकी बात पर हँसते। उसकी बीवी अक्सर उससे झगड़ते हुए कहती कि “मुझे तो उस नन्दा देवी की चोटी से चिढ़ होने लगती है। ऐसा लगता है कि आप मुझसे ज्यादा उसे चाहते हो। कमबख्त सौतन लगती है मुझे वह अपनी।“ उनकी बात खत्म होते ही एक ठहाका लगा और एकदम शान्ति छा गयी। हरि के पिताजी ने आगे कहा, “उस साल ग्यारह लोगों का दल आया था। सब नन्दा देवी पर चढ़ाई करने के लिए जा रहे थे। मैं उस समय सबसे अनुभवी पॉर्टर था। उन्हें किसी ने मेरा पता बताया तो वे मुझसे मिलने आए थे। यहीं बैठे थे वे लोग। उन्हें दो लोग चाहिए थे। वह मुँह माँगी कीमत देने को तैयार थे। मैंने सोचा कि मैं अपने साथ सुन्दर को भी ले जाऊँ। सुन्दर तो जैसे उछल पड़ा और तुरन्त चलने को तैयार हो गया।

 

मुझे याद है वह यात्रा कितनी खतरनाक और कठिन थी। लेकिन मुझे खुद पर भरोसा था और सुन्दर जैसे जवान और ताकतवर भाई का साथ मिल जाए तो आदमी पहाड़ क्या दुनिया को अपने पैरों तले रौंद दे।“ गर्व से उनका सीना चौड़ा हो उठा। मैं बहुत ध्यान से उनकी बातें सुन रहा था। लेकिन साहब कहते हैं न कि घमंडी का सिर नीचा...बस मेरे साथ भी वही हुआ। हम बेस कैम्प से आगे बढ़ रहे थे। सुन्दर ने मेरी पीठ का सामान कुछ कम करके अपनी पीठ पर बाँध रखा था...वह मुझसे पीछे-पीछे चल रहा था। उसके हाँफने से मुझे अन्दाजा लग गया था कि उसकी हालत ठीक नहीं है। मैंने उससे कुछ सामान कम करने को कहा लेकिन नहीं...भाई की पीठ पर ज्यादा बोझा लादना नहीं चाहता था...पागल....।“ सुबकने की आवाज़ से वातावरण बहुत ग़मगीन हो गया था। मेरा पूरा ध्यान हरि के पिताजी की बातों पर था। “मैं लगातार उसका हौसला बनाए हुए था...और आगे आने के लिए कह रहा था कि अचानक उसके चीखने की आवाज़ आई... दा...ज्यू... और जैसे ही मैंने मुड़कर देखा वह बर्फ के अन्दर धँस चुका था। मैं एकदम पीछे भागा लेकिन मेरे दल के लोगों ने मुझे पकड़ लिया और कहा कि “भागना बेकार है, तुम तो जानते हो कि वह बच नहीं पाएगा...अब भूल जाओ उसे।“ मैं अपनी आँखों के सामने अपने भाई को मरते हुए कैसे देख सकता था...बहुत कोशिश की, हाथ-पाँव जोड़ें लेकिन दल के लोगों ने मुझे जाने ही नहीं दिया। क्योंकि वह जानते थे कि मैं भी उस खाई में गिर जाऊँगा।“ मेरी आँखें भी नम हो रहीं थीं। कुछ पल के लिए सबकुछ एकदम शान्त हो गया। आँखें पोंछ कर उन्होंने बात आगे बढ़ाई, “मैंने जैसे-तैसे रोते-बिलखते वह यात्रा पूरी की और अकेला वापस आ गया। जी तो करता था कि मैं भी वहीं से कूदकर जान दे दूँ...लेकिन बच्चों की मासूम सूरतें सामने आ जातीं।” “बहुत बुरा हुआ...” मैंने कहा। “साहब...उसकी बीवी ने कभी नहीं माना कि वह मर गया है...वह तो हमेशा कहती है कि उस सौतन ने मेरे पति को अपने जाल में फँसा रखा है...एक दिन दौड़कर चला आएगा। इसीलिए वह तब से लगातार एक थाली मेरे साथ लगाकर रख देती है।” मुझे लगा कि धीरे-धीरे रहस्यों से पर्दा उठ रहा है तो मैंने प्रश्न पूछ ही लिया, “लेकिन यह दीवार क्यों...!” मेरे प्रश्न पूरा होने से पहले ही वह बोल पड़े, “सौतन मानती है उसे...कहती है कि उसकी ओर न देखूँगी। हर समय नन्दा देवी की चोटी की ओर पीठ या पर्दा किये रहती है। उसी ने ज़िद करके ऐसी दीवार बनवा ली कि किसी भी सूरत से नन्दा देवी पर उसकी नज़र न पड़े।” “ओह...तो यह बात है...” कहकर मुझे ध्यान आया कि इसलिए हरि सिंह की चाची इतना लम्बा घूँघट निकाले रहती है। “जी साहब...इस घटना को पूरे दस साल हो गये लेकिन वह आज भी उसका इंतज़ार कर रही है। कहती है दूसरी वाली हमेशा साथ नहीं देगी। एक न एक दिन तो पहले वाली के पास आएगा ही। पगली सचमुच नन्दा देवी की सौतन बनी बैठी है।” कहकर हरि के पिताजी अन्दर चले गये। मेरे लिए सारे रहस्यों से पर्दा उठ चुका था। आग भी बुझ गयी थी और मैं सीढ़ियाँ चढ़कर अपने कमरे में पहुँच गया था। बिस्तर पर लेटा और अपने द्वारा मार्ग में खींचे गये फोटो देखने लगा। जैसे ही नन्दा देवी पर्वत का फोटो आया, मेरे मुँह से अचानक निकला “सौतन”।


- डॉ. लवलेश दत्त
 
रचनाकार परिचय
डॉ. लवलेश दत्त

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