जून 2019
अंक - 50 | कुल अंक - 53
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम

कहानी- श्राप


(1)
अरावली पर्वतमाला के उत्तरी छोर की तलहटी में एक घना जंगल था। उसी जंगल में नीम के विशाल पेड़ पर एक मोर एवं मोरनी का जोड़ा रहता था। जंगल पेड़-पौधों एवं जंगली जानवरों से भरा पड़ा था। नीम के पेड़ से कुछ कदम पर ही एक झरना गिरता था, जहाँ पशु-पक्षी अक्सर पानी पीने आते। इसी झरने के आगे एक शिव मंदिर था, जो अब खण्डहर में तब्दील हो गया था। मोर अक्सर इस मंदिर में सुबह-सुबह आता, यहाँ-वहाँ बिखरे तृण अपनी चोंच से उठाकर आँगन साफ करता, फिर झरने से मुँह में पानी भरकर शिवलिंग पर अर्घ देता। पशु-पक्षियों में ऐसा आध्यात्मिक भाव दुर्लभ ही देखने को मिलता। अन्य पक्षी मोर के इस असामान्य कृत्य को देखकर विस्मय में डूब जाते। कुछ इसका कारण उसकी पूर्व पुण्याई बताते तो कुछ कहते यह बावरा हो गया है।

मोर एवं मोरनी दोनों में अनन्य प्रेम था, दोनों एक-दूसरे पर रीझते थे। मोर जब भी शिकार पर जाता, मोरनी उसका अपलक इंतजार करती। उसके आने पर ही उसको चैन मिलता। मोर भी कभी अपने शिकार को अकेला नहीं खाता। शिकार करते ही उसे सीधे पेड़ पर ले आता। दोनों साथ-साथ खाते, नीचे उतरकर झरने से पानी पीते एवं पेड़ पर वापस आ जाते।


रात जब चन्द्रमा अपनी छटा बिखेरता, मोर मुग्ध होकर ज़मीन पर उतर आता। अपने इन्द्रधनुषी पंख फैलाकर मोरनी को ‘पिया हो’ कहकर पुकारता, मोरनी बावली-सी नीचे उतर आती। प्रेममुग्ध दोनों; घंटों नाचते एवं अंततः विदेह होने का अनिर्वचनीय सुख प्राप्त कर पुनः पेड़ पर आ जाते। पेड़ पर आने के बाद चाँदनी में नहाये जंगल को निहार कर दोनों निहाल हो जाते। पेड़ों की पत्तियों पर छन-छन कर आती हुई चाँदनी जंगल को उल्लास से भर देती। दूधिया चाँदनी में नहाये जलप्रपात का शोर ऐसा लगता मानो निर्जन जंगल में स्वरलहरियाँ बह रही हों। जंगल में बहती मंद पवन वातावरण को और मादक बना देती। सारा जंगल, पेड़-पौधे एवं वनस्पतियाँ ठण्डी बयार का सान्निध्य पाकर झूमने लगती। सावन में जब मेघ गर्जना करते एवं धरती पर मेह बरसता तब दोनों का उन्माद चरम को छू जाता। मोर धीरे-धीरे सारे पंखों को खोलता, फड़फड़ाता फिर उन्मत्त होकर घण्टों नृत्य करता। मोरनी उसे एकटक निहारती। उसका यूँ निहारना मोर को प्रेम से सराबोर कर देता। वह और उन्मत्त होकर नाचने लगता। कई बार तो नाचते-गाते उसकी आँखों से प्रेमाश्रु छलकने लगते। मोरनी प्रेम के इन मोतियों को चुग कर कण्ठ के रास्ते हृदय में उतार लेती।

मोर का नाम मयूरा एवं मोरनी का मयूरी था। दोनों एक-दूसरे को इसी नाम से पुकारते थे। सावन की एक रात मेघ-गर्जना थमी तो दोनों पेड़ पर आकर बतियाने लगे। अक्सर मयूरा ही पहले बात प्रारंभ करता पर आज मयूरी ने पहल की। ‘‘तुम तो नाचते-नाचते इतने मुग्ध हो जाते हो कि तुम्हें कुछ होश ही नहीं रहता। आज मैंने तुम्हें आगाह न किया होता कि लोमड़ी माँद से निकल चुकी है तो अनर्थ हो जाता। उसे पंजा मारने में कोई देर लगती है। सारी आदम नस्ल जूनूनी होती है, आगे-पीछे कुछ नहीं सोचती।’’
‘‘वह प्रेम ही क्या मयूरी, जो मृत्यु के भय को न लाँघ सके! अपूर्ण एवं आंशिक प्रेम भी कोई प्रेम है? प्रेम तो अंधा ही भला, अगर प्रेम चौकन्ना होता, उसके आँखें होती तो उसमें वो नशा, मादकता एवं उन्मत्तता कभी नहीं होती। असावधानी, लापरवाही एवं दुस्साहस प्रेम के सोपान हैं। तुम्हारी तरह मैं चारों तरफ ध्यान रखूं तो नाच ही न सकूँ। जब तक देहभान विस्मृत नहीं होता, पैर थिरकते ही नहीं। मस्ती में गहरा उतरने से ही नृत्य में जान आती है। मेरे पिता कहते थे कि नृत्य वही है, जब नृत्य करने वाला एवं नृत्य दोनों एक लय हो जायें।
‘‘तुम्हारा मतलब मैं चारों तरफ निगाह रखती हूँ तो क्या तुम्हें प्रेम नहीं करती? जिस बेफि़क्री के साथ तुम प्रेम करते हो, नाचते हो, वह क्या मेरी चौकसी के बिना संभव है? बाँस ही न रहेगा तो बाँसुरी क्या बजेगी?’’
‘‘बात तो तू ठीक कहती है मयूरी! हम दोनों एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं।’’ कहते-कहते मोर ने कृतज्ञ आँखों से मयूरी की ओर देखा।


उसकी आँखों के उपकृत भाव को समझकर मयूरी दम भरते हुए बोली, ‘‘जंगल के सभी नर नस्ल के पशु-पक्षी इसीलिए मस्त रहते हैं कि मादा उनकी एवं बच्चों की देखभाल करती है। हाँ, यह बात अवश्य है कि इसी वजह से हमारी नस्ल प्रेम की उस दिव्यता एवं उत्कर्ष को नहीं छू पाती, जिसे नर छू लेता है। तुम्हारे इसी गुण के कारण मनुष्यों के एक देव कृष्ण तुम्हारे पंखों को अपने मुकुट में धारण कर बाँसुरी बजाते थे। ऐसा करके उन्होंने तुम्हारे प्रेम को तो अमर कर दिया पर उसमें हमारी चौकसी, तपस्या एवं बलिदान का उल्लेख तक नहीं।’’
‘‘शायद तुम ठीक कहती हो। प्रभु ने हमारे पंखों को अपने मुकुट में धारण कर हमें अक्षय गौरव दिया है। पर तुम नाराज़ क्यूँ होती हो, जिसके कारण एवं जिसके लिए हम उत्कर्ष छूते हैं, वह तुम्हीं तो हो।’’ मोर को अब जमुहाई आने लगी थी। पेड़ों के झुरमुट से छन-छन कर आ रही चाँदनी की चादर ओढ़कर दोनों कब सोये, पता ही नहीं चला।


सुबह होते ही मोर शिव मंदिर आया तो उसने एक अद्भुत नजारा देखा। शिव मंदिर में भगवा वस्त्र पहने एक साधु तपस्या में लीन था। उनके मुखमण्डल पर दिव्य तेज था। इस तेज का वृत्त प्रकाश बनकर साधु के चारों ओर फैला था। उनके दिव्य ललाट एवं प्रलंब बाहों पर भस्म की रेखाएँ खिंची थी। सर पर सफेद जटाओं का जूड़ा था। लम्बी सफेद दाढ़ी पेट तक आ रही थी। वे नीचे धोती एवं कंधे पर श्वेत दुपट्टा डाले थे। कांधे से त्रिवली तक आता जनेऊ उनकी दिव्यता को ओर बढ़ा रहा था।
मोर दौड़ा-दौड़ा मोरनी के पास आया। उसे बदहवास देख; मयूरी बोली, ‘‘क्या हो गया? आज वापस इतनी जल्दी कैसे आ गये?’’
‘‘आज शिव मंदिर में कोई दिव्य साधु आये हैं। उनके अंग-अंग से प्रकाश बह रहा है।’’ मयूरा हाँफते हुए बोला।
‘‘हमें क्या काम है किसी साधु से? हमें कौन-सा दुख है कि हम साधुओं से डरें?"
‘‘तुम तो बिल्कुल बावरी हो। मेरे दादा कहते थे मनुष्य जन्म बड़ा दुर्लभ है, उसी जन्म में जीव मुक्ति तक के उत्कर्ष को छू सकता है। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष सभी व्यवस्थाओं का आनन्द उसी जन्म में है। कहते हैं साधुओं की सेवा करने से ही परम दुर्लभ मनुष्य जन्म मिलता है। तू चल तो। आज हम दोनों मिलकर मंदिर की बुहारी देते हैं, उनके लिए कंद, मूल, फल लाते हैं। शायद हमारी सेवा से प्रसन्न होकर वे हमें भी अगले जन्म में मनुष्य होने का वरदान दे दें।’’


आश्चर्यचकित मयूरी ने अपने प्रेमी का आदेश शिरोधार्य किया। दोनों भागे-भागे शिव मंदिर आये। दोनों ने आस-पास बिखरे तृणों को चोंच से उठाकर मंदिर की सफाई की, इधर-उधर से लाकर कंद-मूल-फल के ढेर लगा दिये। तपस्वी के पास ही पड़े कमण्डल को मोर अपने गले में डालकर उड़ा एवं झरने से पानी भरकर तपस्वी के आगे लाकर रख दिया। तपस्वी की आँखें खुली तब दोनों उनकी प्रदक्षिणा कर रहे थे। प्रदक्षिणा कर दोनों उनके चरणों में यूँ लेट गये, मानो कह रहे हों, ‘‘प्रभु! इस विवेकशून्य, मूढ़ पक्षी का जीवन जीतेे वर्षों हो गये। आप कृपा करें तो हमें भी मनुष्य का जन्म मिले ताकि हम भी ज्ञान-विज्ञान का चरम छू सकें।’’

तपस्वी इस दृश्य एवं समर्पण को देखकर मुग्ध हो गये। उन्होंने प्रेम से दोनों के सिर पर हाथ फेरा। उनके दिव्य स्पर्श का अनुभव कर दोनों निहाल हो गये। दोनों अब तपस्वी के आगे नत खड़े थे। अपने दिव्य दृष्टि से तपस्वी ने उनके मन का हाल जान लिया। दायें हाथ की प्रथम अंगुली से अंगुष्ठ को छूते हुए उन्होंने हाथ ऊपर उठाया, दोनों को आशीर्वाद दिया, फिर कुछ क्षण रुककर बोले, ‘‘तुम्हारा मनोरथ मैं जान गया हूँ। तुम दोनों मनुष्य का जन्म चाहते हो ताकि मुक्त हो सको। तुम्हारा मनोरथ ऊँचा है पर एक बार मनुष्य को जान तो लो। यहाँ से थोड़ी दूर पर इस प्रदेश की राजधानी है। वहाँ हर तरह के मनुष्य रहते हैं। मैं तुम्हें वरदान देता हूँ कि तुम मनुष्य की बोली, भाषा एवं विचार समझ सकोगे। तुम उसकी भाषा बोल भी सकोगे पर ऐसा हरगिज़ मत करना। ऐसा करते ही तुम मर जाओगे। मेरे वरदान की शक्तियाँ फिर स्वतः समाप्त हो जाएँगी।’’ इतना कहकर संत उस मंदिर से उठकर चले गये। मयूरा एवं मयूरी दोनों इस अलौकिक वरदान को पाकर निहाल हो गये। ओह! पक्षी जीवन में भी उन्हें मनुष्य जीवन को समझने का दुर्लभ सुख मिलेगा? दोनों कृतकृत्य हो गये।

 

(2)

साँझ ढल चुकी थी। राजधानी के एक विशाल मंदिर की छत पर मयूरा एवं मयूरी घूम रहे थे। अभी-अभी मंदिर के महंत ने पचास बाती वाली आरती उतारी थी। आरती समाप्त होने के पश्चात् भक्त पहले भगवान के आगे दण्डवत् करते फिर महंत के चरणों में शीश नवाकर उनका आशीर्वाद पाते। कई भक्त उन्हें दक्षिणा में मोटी रकम भेंट कर आगे बढ़ते। मयूरा, मयूरी को समझा रहा था कि मनुष्यों में मंदिर के महंत देवतुल्य होते हैं। इसीलिए लोग उन्हें दण्डवत् प्रणाम करते हैं एवं यथायोग्य न्यौछावर करते हैं। उन्हें वेद, उपनिषद एवं शास्त्रों की अनेक बातें कण्ठस्थ होती हैं। मयूरी, मयूरा की बातें सुनकर अभिभूत हो गयी। ओह! कैसे दिव्य लोग हैं? मनुष्यों में भी परम मनुष्य? उसने गर्दन नत कर मन ही मन महंत को प्रणाम किया।

देव शयन के पूर्व महंत ने भक्तों को एक संक्षिप्त उद्बोधन दिया कि, ‘‘सदैव धर्म पर रहो, पुण्यरत रहो। धर्म की जड़ें कभी नहीं सूखतीं, सदा हरी रहती हैं। धर्म-ध्वजा बिना हवा फहराती है।’’ इस संक्षिप्त उद्बोधन को सुनकर मयूरा एवं मयूरी भावमग्न हो गये। भाव विभोर मयूरी बोली, ‘‘तुम ठीक ही कहते थे, मनुष्य जन्म धर्म का अक्षयवट है। ज्ञान, विज्ञान, मुक्ति एवं सद्गति इसी जन्म में संभव है।’’
धीरे-धीरे सभी भक्तगण चले गये। रात्रि में चंद विश्वासपात्र सेवकों को छोड़कर मंदिर में प्रवेश वर्जित था। देवशयन में बाधा पाप से कम नहीं। रात अब चढ़ने लगी थी। अर्धरात्रि होते-होते चाँद आसमान को आधा पार कर चुका था। तारों एवं नक्षत्रों के बीच बे-खौफ बढ़ता हुआ पूर्ण चन्द्र मानो कह रहा था, जिन्होंने उत्कर्ष छू लिया, उन्हें किसका भय?


मयूरा एवं मयूरी दोनों रोशनदान के पास आ गये। रोशनदान की जाली से महंत का बेडरूम साफ दिख रहा था। कितना भव्य बेडरूम था। पलंग पर स्वच्छ सफेद चादर बिछी थी, तिस पर मनभावन कशीदा किया हुआ था। मोटे रेशमी तकिये बेडरूम के ठाट को राजसी बना रहे थे।
एकाएक एक दृश्य देखकर मयूरा एवं मयूरी दोनों सहम गये। महंत के एक विश्वासपात्र सेवक ने दरवाजा खोला, उसके हाथ में शराब की बोतल थी। सेवक के पीछे-पीछे दो युवतियाँ दबे पाँव अंदर आ रही थीं। सेवक शराब की बोतल पलंग के पास ही पड़ी मेज पर रखकर चला गया। एक युवती ने सेवक के जाते ही दरवाजा बंद कर दिया। तीनों ने छककर शराब पी। नशा चढ़ने के साथ-साथ उनकी अश्लील हरकतें भी बढ़ती जा रही थीं। मयूरा एवं मयूरी इस कुत्सित दृश्य को देखकर दंग रह गये, दोनों ने आँखें मूंद लीं। कुछ देर बाद महंत ने दोनों औरतों को कुछ रुपये दिये। सेवक चुपचाप इन औरतों को लेकर चला गया। मयूरी से अब रहा न गया, हृदय आँवे की तरह जलने लगा। आँखों में रोष भर कर बोली, ‘‘यह कैसी अंधेर है? करनी कौए की एवं वेष हंस का। रात देवशयन के समय तो धर्म एवं पुण्य की ऊँची बातें कर रहा था और अब ऐसा रूप? यह तो घोर वंचक निकला। धर्म की झूठी ध्वजा फहराने वाले यह महंत स्वयं तो लोभ, मोह एवं काम के गुलाम हैं, दूसरों को उपदेश देते रहते हैं? ढोल धर्म का पीटते हैं एवं कृत्य अधर्म के करते हैं? सुबह तो यह युवतियाँ भगवा कपड़े पहने मंजीरे बजा रही थीं और रात में ऐसा दुष्कृत्य? शहर के लोग तो कहते हैं, महंत अखण्ड ब्रह्मचारी, संस्कारी एवं ज्ञानी मानी है। उस पर विश्वास करके इतना न्यौछावर करते हैं एवं यहाँ ऐसी अंधेरगर्दी है।’’ मयूरी की आँखें विस्मय से फैल गयी।


‘‘मैं खुद हैरान हूँ , मयूरी! हमारी कौम में ऐसी धोखाधड़ी कभी नहीं देखी। पशु-पक्षी हिंसक होते हैं तो मात्र पेट भरने के लिए। हमारे पास अन्य कोई विकल्प भी नहीं होता। हमारा प्रेम अथवा रोष सदैव सच्चा एवं स्वाभाविक होता है पर मनुष्य ज्ञानी होकर भी कितना छल एवं दुराव करता है।’’
वे दोनों बातें कर रहे थे तभी किसी चीज के गिरने की टनSSSS ध्वनि आई। दोनों पुनः रोशनदान के पास आये। महंत अपने सेवक से कह रहा था, ‘‘ये दोनों मूर्तियाँ विदेशों में लाखों की बिकेंगी, तुम इन्हें मेरे विश्वासपात्र मि. फर्नांडीस को दे देना। ध्यान से जाना, ज़रा भी चूक न हो।’’ सेवक दोनों मूर्तियों को कार की डिक्की में रखकर चला गया।
मयूरा इस दृश्य को देखकर आग-बबूला हो गया। क्रोध में भरकर बोला, ‘‘प्रभु की मूर्तियों के साथ इतना छल? कल सुबह ही मैं पुलिस थाने जाकर भण्डाफोड़ कर दूँगा, अब तो मैं मनुष्यों की बोली भी बोल सकता हूँ।’’
‘‘भूल गये, साधु बाबा ने वरदान देते समय क्या कहा था? क्या मुझे विधवा बनाने के लिए उनसे वरदान लिया था? अगर ज़रा भी बोले तो याद रखना, मैं आग में कूद कर मर जाऊँगी।’’ क्रोध में मयूरी का चेहरा तमतमा रहा था।
‘‘अरे, तुम तो खामख्वाह रूठ गई। मैं तो भावावेश में ऐसा कह गया था।’’ मयूरा सम्भलते हुए बोला।
‘‘कसम दो, ऐसा कभी नहीं करोगे! तुम्हें होश भी रहता है?’’
‘‘तुम्हारी कसम।’’ मयूरा उसके गले से चोंच लगाते हुए बोला।
‘‘अब यहाँ से शीघ्र चलना ठीक होगा। चलो, अन्यत्र कहीं चलते हैं।’’ मयूरी बोली।
‘‘मेरी मानो तो वापस जंगल चलते हैं। सर मुंडाते ही ओले पड़ गये।’’ मोर का मन भर आया था।
‘‘सभी व्यक्ति एक से नहीं होते, हो सकता है अब हमें अच्छे मनुष्य मिलें।’’ मयूरी ढाढ़स देते हुए बोली।
‘‘देगची का एक चावल सारे चावलों की ख़बर दे देता है।’’
‘‘इतना निराश क्यूँ होते हो, अच्छे-बुरे जगत में हर जगह मिलते हैं। मुखौटे लगाकर जगत को ठगने वाले एक दिन खुद चौड़े हो जाते हैं। हर इंसान एक-सा नहीं होता। साधु बाबा भी तो मनुष्य ही थे। आओ, अब कहीं ओर चलते हैं। जिस काम के लिए निकले हैं, उन्हें पूरा किये बिना वापस लौटना उचित नहीं।’’
मयूरा ने क्षुब्ध हृदय से मयूरी को सहमति दी।


दोनों उड़कर अब एक अन्य भव्य भवन की छत पर आ गये। यह भवन शहर के एक जाने-माने व्यापारी का था। व्यापारी मसाले बनाने एवं विक्रय का थोक व्यापार करता था। कल रात मंदिर में मयूरा एवं मयूरी दोनों ने उसे देव-दर्शन करते हुए देखा था। देव-दर्शन के बाद उसी ने सबसे ज्यादा रकम महंत को न्यौछावर की थी। शहर में दानदाताओं की सूची में उसका नाम सबसे ऊपर होता। ऐसे महादानी पर सारा शहर गर्व करता था।

मयूरा एवं मयूरी दोनों ने रोशनदान से झाँककर देखा तो दंग रह गये। व्यापारी के सेवक रात को मसालों में मिलावट कर रहे थे। लाल मिर्च में ईंट का चूरा एवं कलर मिलाया जा रहा था। दालों में मिट्टी, कंकर मिलाकर उनका वजन बढ़ाया जा रहा था। घी में चर्बी एवं कृत्रिम खुशबू मिलायी जा रही थी। धनिये में जानवरों की सूखी लीद का चूरा डाल रहे थे। व्यापारी बेधड़क अपने सेवकों को निर्देश दे रहा था। इतने में किसी सेवक ने आकर सूचना दी, बाहर एक पुलिस अधिकारी आपका इंतजार कर रहे हैं। व्यापारी बे-खौफ बाहर आया, दोनों में एक मौन वार्तालाप हुआ। व्यापारी का सेवक अपने मालिक के इशारे पर नोटों से भरा एक बैग लेकर बाहर आया एवं पुलिस अधिकारी की ओर बढ़ाया। पुलिस अधिकारी ने जीप से नीचे उतरकर बैग हाथ में लिया, दोनों के चेहरे पर एक कुटिल मुस्कराहट फैल गयी।
मयूरी ने विस्मय से मयूरा सेे पूछा, ‘‘व्यापारी ने यह क्या किया? पुलिस  अधिकारी से तो वो ऐसे मिल रहा था जैसे वह उसका परममित्र हो।’’
‘‘क्या बताऊँ, मयूरी! थानेदार यह जानता है कि व्यापारी दालों, मसालों एवं घी इत्यादि में मिलावट करता है पर हर माह सुविधा शुल्क लेकर मौन हो जाता है।’’ मयूरा समझाते हुए बोला।
‘‘यह सुविधा शुल्क क्या है? मैंने तो सुना है मिलावटी मसाले एवं खाद्य पदार्थ खाने से मनुष्य अकाल काल का ग्रास बन जाता है, अनेक अनचाही बीमारियों का शिकार हो जाता है।’’
‘‘यह सुविधा शुल्क कलियुग का प्राण है प्रिये! कलियुग में हराम में ही बरकत है। सुविधा शुल्क पहाड़-सी भारी एवं विशाल समस्याओं को रुई की तरह हल्का कर देता है। व्यावसायिक उन्नति का मूलमंत्र है यह। जो इस समीकरण को सिद्ध करना सीख लेता है, वह स्वयंसिद्ध हो जाता है। मान, कीर्ति, यश, राजनैतिक एवं कूटनैतिक शक्तियाँ बलात् उसका अनुसरण करने लगती हैं।’’ मयूरा गंभीर होकर बोला।


मयूरी कुछ देर तो मूक अपने प्रियतम की बातों को सुनती रही फिर क्रोध में भरकर बोली, ‘‘इस कमीने ने तो स्वांग करने में सबको पीछे छोड़ दिया। लगता है मनुष्य की मुक्ति का मार्ग अब धर्म नहीं होकर पैसा हो गया है। जब प्रशासन एवं धर्मवेत्ता दोनों अर्थबल के आगे बौने हो गये हों तो धर्म रुग्णशैया पर पड़े बुड्ढे की तरह आखिरी श्वासें नहीं गिनेगा तो और क्या करेगा?’’
मयूरी की बातें सुनकर मोर ने सहमति में गर्दन हिलायी।


उस रात एवं आगे कुछ दिन दोनों उड़-उड़ कर कहाँ-कहाँ नहीं गये! मनुष्य का वीभत्स रूप हर जगह एक से बढ़कर एक था। पुलिस थानों में बेगुनाहों को फँसाया जा रहा था, जेल में निरपराध सड़ रहे थे। राजनेता तरह-तरह के षड्यंत्र रच रहे थे। इंजिनियर ठेकेदारों से साँठ-गाँठ कर रहे थे, डॉक्टर मरीजों से पैसे ऐंठ रहे थे। दवाई वालों एवं प्रयोगशालाओं तक से उनका कमीशन बंधा था। अध्यापक अपने ही विद्यार्थियों को ट्यूशन के जरिये लूट रहे थे। अनाचार, अत्याचार एवं व्यभिचार अपना नग्न नृत्य कर रहा था। अनेकों घर में सास-बहू, भाई-भाई एवं यहाँ तक कि पति-पत्नी में कलह मची थी। खून के रिश्ते खूनी रूप ले चुके थे। दंपती आपस में विश्वासघात कर रहे थे। पुत्र अपने ही पिता के विरुद्ध षड्यंत्र रच रहे थे। आस्था और जीवन मूल्यों की होली जल रही थी। हर जगह लोभ, लालच, मिलावट, महत्वाकांक्षाओं एवं कूटनीति की खिचड़ी पक रही थी।

क्या मनुष्य इतना गिर गया है? दोनों का मन कसैला हो गया।
अगली सुबह शहर के बड़े बगीचे के पीछे एक व्यक्ति पक्षियों के चुगने वाले दानों में जहर मिलाकर बिखेर रहा था। देखते-ही-देखते कई पक्षी वहाँ आये एवं दाने खाकर मर गए। कुछ देर पश्चात् वह व्यक्ति वापस आया एवं मरे हुए पक्षियों को अपने थैले में डालकर ले गया। व्यक्ति गले में रुद्राक्ष की माला पहने था। दोनों इस दृश्य को देखकर हतप्रभ रह गये।
दुपहर उन्होंने एक और नजारा देखा। एक मदारी जोर-जोर से चिल्लाकर बंदर का खेल दिखा रहा था। बंदर के गले में रस्सी बंधी थी। वह जब-जब रस्सी पर जोर देता, बंदर बलात् करतब दिखाता। दिन चढ़ते उन्होंने एक और मनुष्य को देखा जो रीछ की नाक में नकेल डालकर उसे नचा रहा था। एक मनुष्य तोते को पिंजरे से बार-बार अंदर बाहर कर शकुन विचार कर रहा था। कहीं लोग मुर्गियों को आपस में लड़ा रहे थे तो कहीं मेढ़ों को। ऊँट-गाड़ी में लोग मनों बोझ लादकर ले जा रहे थे। यही हालत बैलों, गधों एवं भैंसों की थी। मनुष्य हाथ में चाबुक लिये उन्हें पीट रहा था। कुछ जानवरों की खाल से खून बह रहा था। शहर के एक मुख्य बाजार में एक व्यक्ति साँप-नेवले को लड़ा रहा था। दोनों लहूलुहान हो गये थे। भीड़ में खड़े लोग तालियाँ बजाकर इन पर पैसे फेंक रहे थे।


यहाँ से उड़कर दोनों शहर के जंतुआलय आये। शेर, चीते, हिरण एवं न जाने कितने जानवर यहाँ कैद थे। पक्षियों तक को मनुष्य ने कैद कर लिया था। इन्हें देखने वाले जब-तब इन्हें लकड़ी से छेड़ रहे थे, कुछ अन्य इन्हें चिढ़ा रहे थे। मनुष्य का अमानुषिक रूप देखकर दोनों की साँस रुक गई। क्या ऐसे मनुष्य को कभी मुक्ति मिल सकती है? असंभव!

 

(3)

दोनों पुन: जंगल में आ गये। कुछ रोज़ बाद वही साधु उसी खण्डहर में आकर रुके। दोनों ने पेड़ पर बैठेे उन्हें दूर से देख लिया। संत को देखते ही दोनों बदहवास उसके चरणों में लौट गये। संत मुस्कुराकर बोले-
‘‘क्या मनुष्य एवं उसकी जीवनशैली पसंद नहीं आयी?’’
‘‘अब हम क्या कहें मुनिवर! क्या यही मनुष्य का जन्म है, जिसे आप मुक्ति का मार्ग कहते हैं? इससे तो हम पशु-पक्षी भले। जैसा स्वाभाविक प्रेम, अनुराग एवं रोष हमारे हृदयों में है वह तो मनुष्य में किंचित् भी नहीं। हम पक्षी संग्रहण, कूटनीति, असत्य एवं छल-कपट से कोसों दूर हैं। क्या मनुष्य का जीवन चेतना की निम्नतर अवस्था है? क्या यही चेतना का उन्नयन है? आप जैसे संत तो हमें पूरे शहर में नहीं मिले।’’ मयूरा एक श्वास में सब कुछ कह गया।


‘‘तुम ठीक कहते हो मयूरा! मनुष्य मोह, मद और मान के बीहड़वन में खो गया है। मनुष्य के जन्म में अब मुक्ति सम्भव नहीं। मैं भी भक्ति इसीलिए कर रहा हूँ कि मेरा अगला जन्म स्वाभाविक प्रेम एवं अनुराग से भरे पशु-पक्षियों में हो। मानव-जन्म मुक्ति का निम्नतर सोपान है। उच्चतर सोपान तो पशु-पक्षियों का ही जन्म है जो मनुष्य सत्कर्म करते हैं उन्हें ही दुर्लभ पशु-पक्षियों का जन्म मिलता है।’’
‘‘मुनिवर, फिर आपके इस वरदान का हमारे लिए क्या प्रयोजन? कृपा कर इसे वापस ले लीजिये। यह वरदान तो श्राप से भी बुरा है।’’
‘‘तथास्तु!’’
इतना कहकर संत वहाँ से उठकर चले गये।


साँझ होते-होते मेघ पुनः शोर मचाने लगे थे। मेघ गर्जना ने मयूर दम्पती की ज्ञान गर्जना पर सम्पूर्ण प्रभुत्व पा लिया था। प्रेम की दिव्यता एवं विशालता के आगे भला ज्ञान का क्षुद्र निनाद कैसे टिकता?
जंगल में उसी नीम के पेड़ के नीचे मयूरा अपने पंख फैलाकर नाच रहा था। मयूरी एक बार फिर उसके प्रेमाश्रुओं के मोती चुग रही थी।


- हरिप्रकाश राठी

रचनाकार परिचय
हरिप्रकाश राठी

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कथा-कुसुम (1)ख़ास-मुलाक़ात (1)