प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जून 2019
अंक -52

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

बाल-वाटिका

बाल कहानी- पेड़

दूर कहीं पहाड़ियों पर एक बहुत घना जंगल था। जहाँ ऊँचे-ऊँचे पहाड़ थे। उन पहाड़ों से बहती नदी और उसके आसपास तरह-तरह के पेड़-पौधौं से घिरा हुआ विशाल जंगल। उस जंगल के बीचो-बीच एक छोटी-सी कुटिया थी। मानो जंगल ने उसे अपने गोद में संभाल रखा हो। उस कुटिया में एक बूढ़ा व्यक्ति रहता था, जिसे जंगलों से बेहद प्यार था। वह पेड़-पौधों की देखभाल ऐसे करता था मानो वे उसके बच्चे हों या फिर समझो तो वह उन जगलों का बच्चा था, जिसे प्रकृति ने अपनी गोद में बड़े लाड और प्यार से पाल-पोष कर बड़ा किया था। परन्तु कुछ दिनों से वह बहुत चिंतित रहने लगा था क्योंकि जंगलों में पेड़ों की संख्या लगातार कम होती जा रही थी, नदी सूखती जा रही थी।

एक दिन जब वह अपनी कुटिया में लौट रहा था, उसने देखा- कुछ लोग पेड़ों को काट रहे हैं और एक बड़ी-बड़ी मूँछों वाला व्यक्ति वहाँ खड़ा उन्हें जल्दी-जल्दी काम करने का आदेश दे रहा है। काले-काले जूते, सफ़ेद कोर्ट-पैंट और सर पर काली गोल टोपी, शायद वह उनका मालिक था। उन पेड़ों को कटता देख उस बूढ़े व्यक्ति की चीख निकल गई, जैसे उन्होंने पेड़ पर नहीं, बल्कि उसके ऊपर कुल्हाड़ी से प्रहार किया हो। बूढ़ा व्यक्ति भागता हुआ उस मूँछों वाले व्यक्ति के पास गया और उसे समझाने की बहुत कोशिश की कि वह पेड़ों को न काटे। पर उसकी इन विनतियों का उस मूँछोंवाले व्यक्ति पर कोई प्रभाव न पड़ा। उसने घमंड भरी नज़रों से एक बार बूढ़े व्यक्ति की तरफ देखा और पास पड़े हुए एक पत्थर पर अकड़ कर बैठ गया और पानी पीने के लिए अपना थर्मस उठाया। जैसे ही उसने थर्मस को होंटों से लगाया तभी अचानक कहीं से एक सांप आया और उसने उस मूँछोंवाले व्यक्ति को डँस लिया। उसके मुँह से एक बार चीख निकली और वह वहीं ज़मीं पर गिर पड़ा। उसकी आँखें लाल होने लगी, सारा बदन अकड़ने लगा। सभी अपना काम छोड़ उसकी मदद के लिए भागे।

बूढ़े व्यक्ति ने तुरंत अपनी धोती से कपड़ा फाड़ा और उसके दो टुकड़े कर के जख्म के दोनों ओर बाँध दिया। वह भागता हुआ एक पौधे के पास गया और उसकी कुछ पत्तियाँ तोड़ लाया। उसने उन पत्तियों को पत्थर पर पीस कर सांप के डँसे हुए स्थान पर लगा दिया और उसका रस भी उसे पिलाया। उसका शरीर अब तक शांत पड़ चुका था। आसपास के पेड़ कटे होने की वजह से धूप सीधे उस मूँछोंवाले व्यक्ति पर पड़ रही थी। इसलिए बूढ़े व्यक्ति ने सभी से कहा कि उस पीड़ित व्यक्ति को पेड़ की ठंडी छाँव में लिटा दिया जाए। लोगों ने मिलकर उसे पेड़ की छाँव में लिटा दिया। कुछ ही देर में उस पीड़ित को होश आ गया। सबने राहत की सांस ली। सांप के डँसने के कारण उसका सारा बदन ठंडा पड़ गया था, होंठ बिलकुल सुख गए थे। उसे बहुत प्यास लगी थी। उसने बहुत धीमी आवाज़ में कहा- 'पानी...पानी...!' पर सारा पानी तो ज़मीन पर गिर चुका था और नदी वहाँ से दूर थी। तभी बूढ़ा व्यक्ति उठा, उसने एक पेड़ को हल्का-सा काटा और पत्तों का दोना बनाकर उसमें लगा दिया। थोड़ी ही देर में वो दोना मीठे पानी से भर गया। पीड़ित ने जब उस मीठे पानी को पिया तो उसकी जान में जान आई। बूढ़े व्यक्ति ने पेड़ से कुछ फल तोड़े और उसे खाने को दिया। बाकी मौजूद सभी लोगों ने भी फल खाये।

अब वह मूँछोंवाला व्यक्ति भी पूरी तरह से होश में आ चुका था। उसने उस बूढ़े व्यक्ति का शुक्रिया अदा किया। सभी लोग बहुत खुश हुए। फिर बूढ़े व्यक्ति ने बड़े प्यार से उसे समझाया कि- "देखो तुम जिन पेड़ों को काट रहे हो, उन पेड़-पौधों की वजह से ही आज तुम्हारी जान बची। वही तुम्हे खाने को भोजन और पीने को पानी देते हैं। तुम्हें धूप में छाँव और शीतल हवा देते हैं। इन्ही वनस्पतियों में सभी रोगो का इलाज छिपा है। यहाँ तक की हम सांस भी इन्हीं की सहायता से लेते हैं। और तुम सब इन्हें ही काट रहे हो...!" उस व्यक्ति को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने उस बूढ़े व्यक्ति से क्षमा मांगी और वचन दिया कि वह अब कभी पेड़ों को नहीं काटेगा, बल्कि जहाँ भी रहेगा वहाँ पेड़-पौधे लगाएगा और उनका पालन–पोषण करेगा।


- इबरार खान
 
रचनाकार परिचय
इबरार खान

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