प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
मार्च 2015
अंक -49

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

समकालीन कविता की एक महत्वपूर्ण पुस्तक यह भी एक रास्ता है- डॉ. राधेश्याम सिंह
 
 
कविता परिवर्तन और बेहतरी के लिए उकताए किसी संवेदनशील हृदय का आख्यान है। मस्तिष्क की अतितार्किकता को दी गयी एक सांस्कृतिक थपकी ही कविता, संज्ञा को सार्थक करती है। असंगतियों में संगति की लय तलाशती कविता एक प्रतिसंसार के रचाव की विराट आकुलता है। मौन और चीत्कार को सांगठनिक तौर पर एकीकृत करने का एक ज़बरदस्त प्रयास है कविता। कविता, विश्वास और आश्वासन का विज्ञान है, जिसमें शक्ति ग्रहण करती मानवता ने हजार बार अपनी राह की बाधाओं को पार किया है। यह प्रश्न बड़ा मौजूँ (सामयिक) है कि असंगतियों के कराल समय में हजारों-हजार कविताओं और काव्य-संकलनों के शोभापरक प्रकाशनों के बावजूद वह प्रतिसंसार कहाँ है? प्रतिरोध की वह धार कहाँ है, जिससे शोषक व्यवस्था भयभीत रहा करती है? वह आक्रोश कहाँ है, जिसे कविता, अपने पाठकों में रोपती है? तटस्थता के भारी गत्यावरोध को झेलती मानवता जब तटस्थ रहने की आदी हो जाएगी तो कविता की भूमिका कितनी कारगर रह पायेगी? शायद यही कारण था कि धूमिल को कहना पड़ा कि "इन बैलमुत्ती इबारतों में अर्थ खोजना व्यर्थ है" अथवा जब इस ससुरी कविता से न कुर्ता बन सकता है न पाजामा, तो इसे जंगल से जनता तक ढोने का क्या फ़ायदा? 'बैलमुत्ती इबारतों’ से इतर लगती कविताओं का एक संग्रह ’यह भी एक रास्ता है’, कवि डी.एम. मिश्र का नया काव्य संकलन है। यह गढ़ी हुई नहीं, रची हुई कविताओं का एक सार्थक संकलन है।
प्रस्तुत संकलन में धूप, नदी, चाँदनी, मिट्टी, पत्ते, पेड़, पत्थर, झरना, गुलाब, खुशबू, रोशनी, अँधेरा, स्वप्न, आग, बर्फ़, हवा, फूल, कभी अपनी स्थूलता से तो कभी अपनी प्रतीकात्मकता से जीवन का स्पर्श करते रहते हैं। यह संस्पर्श जीवन को जीवंत बनाता चलता है और जीवन अपने आस-पास पसरे इन तत्वों में नवीन अर्थमयता भरता रहता है। ’जीवन को बेहतर आलोक मिले’ कवि का मूल प्रयोजन बन जाता है। यद्यपि कवि डी.एम. मिश्र का कैनवस व्यापक परिधि का सृजन करता है, जिसमें बबूल के साथ ही देवदार और चंदन भी है पर कवि की नैतिक पक्षधरता बबूल के साथ है- देवदार-चंदन से/अपना क्या नाता/गाँव-गली के लोग/हमें प्यारा बबूल/सुबह बना मुँह की शोभा/शाम पाँव में चुभा/स्वप्न में सबक़ बन गया। (पृष्ठ-25) लघुता को महिमा मंडित कर कवि ने उस वर्ग में संकल्प का आलोक स्थापित करने की चेष्ठा की है, जो उसे तटस्थता की हद तक अक्रियाशील दीखता है- ’नर्म पत्ती/तेज धार/धूप की दाल नहीं गली/सिर उठाकर मुस्कराती/एक नन्ही-सी कली/एक मूठा सूखा सरपत/सूर्य का रास्ता रोके खड़ा/जो परायी आग में कूदा/वो सबसे बड़ा/एक तिनका शीर्ष पर। (पृ. 29)
इन्हीं तिनको को संगठित कर कारवाँ का स्वप्न पाले कवि तिनकों के गाँव में जागरण गीत के चारण की तरह प्रविष्ट होता है और आशा का एक नया सवेरा आयेगा, ऐसा संकल्प व्यक्त करता है- ’इस सफ़र को/जीतना जो चाहते हो/भावनाओं से निकलकर/दूर जाओ/एक मुट्ठी आग लो/इस कोयले को फूँक दो/फूटकर अंगार से/सूरज उगेगा/तोड़कर काला धुआँ। (पू. 27) कवि मूलतः अँधेरे के विरूद्ध इसी सूरज का चारण है। उसका यह गत्याम्तक दस्तावेज़ इसी रोशनी का विवरण पैदा करता है।
कवि डी.एम. मिश्र का वैचारिक विश्वास किसी जूठी आयातित विचारधारा में न होकर शुद्ध भारतीय मन की सोच पर आधारित है। किसी ’इड’ और वर्ग संघर्ष को दरकिनार करता हुआ वह एक अदने से भारतीय आदमी की तरह जीवन का विश्लेषण करता हैं। अपने जीवनानुभवों के आधार पर अपना जीवन दर्शन रचता है। वह जानता है कि आज की जनता में क्रांति की पात्रता का विकास करना है। उसे कृत्रिमता की चकाचौंध से बाहर खींचकर सहज बनाना है। उसे मालूम है कि- 'सामने ताक़तवर फ़ौज हो/तो कोई अकेला/और निहत्था/क्या लड़ेगा/भले ही/वह इन्साफ़ की लड़ाई हो।’ इसीलिए वह समझाव के भाव में, परिवर्तन के इंतज़ार का दंश झेलता है और दूसरों को भी इस दंश को झेलने की प्रेरणा देता है- ’समय देखकर/चुप हो जाना/पराजय का संकेत नहीं/इंतज़ार भी/क्रांति का हिस्सा है/यह भी एक रास्ता है।’ वह धुर तार्किक समय में भी हृदय के स्पंदन के आलोक पर अटूट विश्वास करता है। उसका यह विश्वास ही उसे कविता के सामर्थ्य पर विश्वास करने का बल देता है। परिवर्तनकारी शक्ति पर भरोसा पैदा करता है- ’आदमी के भीतर का/कुरूक्षेत्र जब/जंग के लिए/ललकारता है तो/कोई और हथियार/नहीं तलाशता/ठीक वैसे/जैसे शब्द/देखने में/गोला- बारूद नहीं होता।’ (पृ. 75) कविता उसके लिए अंगार है, जो शोषक, सत्ता और असंगत व्यवस्था को विचलित कर देने की सामर्थ्य रखती है- ’वह जल भुन गया/कविता का/अंगार पड़ गया/राग दरबारी वाले कान/सही बात के लिए/बहरे होते हैं/कसाई के लिए/आम आदमी/बकरे होते हैं। (पृ. 31) उसे कविता पर भरोसा इतना है कि- 'यह मिट्टी/अलग-अलग रंग में/लोगों को जोड़ती है/आग में तपे तो ईंट/पानी में गले तो गारा/और काटने पर उतरे तो आरा।’ (पृ. 14)
कवि की स्पष्ट सोच है कि आज के समय को सबसे बड़ा संकट संवेदना का संकट है। संवेदना के इस अकाल को कविता की भट्ठी ही पुर्नउत्पादित कर सकती है। इसी विश्वास पर वह दुःख व्यक्त करते हुए कहता है- ’काश, संवेदनाएँ/नदियों की अँजुरी से निकलतीं/और पहाड़ों के शीर्ष को छूतीं। (पृ. 20) कवि डी.एम. मिश्र, श्रमशील जनता के द्वंद्वों-संघषों और उनकी अनुभूतियों के लय में कविता का प्रवाह ढूँढते हैं। जहाँ-जहाँ श्रम दिखायी देता है, जीवन का सौंदर्य भी वहीं होता है। श्रमशील कभी भी अनैतिक नहीं हो सकता, अराजक नहीं हो सकता। संवेदना से भरा-पूरा जीवन व्यापक मानवता के पक्ष में, चुपचाप ही सही, बना रहता है। श्रम-सौंदर्य की एक बानगी देखिए- ’बोझ धान का लेकर/वो जब/हौले-हौले चलती है/धान की बाली-कान की बाली/दोनों संग-संग बजती है।' अथवा- ’लुढ़क-लुढ़क कर गिरे पसीना/जो श्रम का संवाद लगे/भीगा वसन,/मचलता भार/यौवन का अनुवाद लगे।’ (पृ. 47) कवि को श्रमशील का पसीना कभी ’जाँगर का सुवरन’ तो कभी इत्र की तरह गमकने लगता है- ’पात-पात लहराकर मौसम/शाख-शाख़ जो जिस्म छुआ/श्रम का खिला गुलाब/पसीना इत्र हुआ।’ (पृ. 49)
भूमण्डलीकरण और बाज़ारीकरण के दबावों ने देश की सामाजिक संरचना के खाके में बड़ा फेर-बदल कर डाला है। गाँवों से शहरों की ओर हो रहे अनायास पलायन से गाँव, गाँव नहीं रह गये। गाँवों के जीवन-संसाधनों में परिवर्तन हुए, जैसे गाँव ने अपनी आत्मा में ही परिवर्तन कर डाला। साझी संस्कृति, सहकार, भाईचारा सभी अर्थज्ञान की वेदिका पर होम कर दिये गये। इस गाँव की स्मृति कवि के मानस पटल पर अमिट तौर पर अंकित है। कवि, बदलते हुए गाँव के रासायनिक अभिक्रियाओं का कोई सामाजिक लेखा-जोखा प्रस्तुत नहीं करता तो इसलिए कि उसके अपने गाँव की स्मृति में कोई बट्टा न लग जाए- ’धूप निकलते खिल उठती/गुंचा-गुंचा प्रीत/होते साँझ, सँझौती गाती/उजियारे का गीत/तेज़ रोशनी के/अंधे गलियारे/पाँव तेले।’ (पृ. 110)
हालांकि अब गाँवों के गुंचे-गुंचे में प्रीत ढूढ़ना बड़ा दुष्कर कार्य है। भौतिकता की गलाकाट प्रतिस्पर्धा का साक्षी आज का गाँव अपनी संवेदना के मूल्य पर बदलते हुए इठलाना सीख रहा है। परंतु कवि को अपने बचपन के गाँव की स्मृति सताती है। वह अतीत के पंखों पर चढ़कर गाँव जाता है। उसे लगता है कि शहर में आकर हम अपनी जड़ों से कट गये हैं। वह निजड़ेपन की व्यथा से व्यथित है- ’घोंसले से निकलकर/चूजा डाल पर बैठा/और सीखने लगा/उड़ने की तरकीब/कल जब थकान/उड़ान के/आड़े आयेगी/घोसला बहुत याद आयेगा।’ (पृ.- 53) कवि ने पक्षी-घोसला-उड़ान-थकान के बिंबो द्वारा जो अर्थमयता सृजित की है, वह उसकी सिद्धि का परिचायक है। टूटते-विखंडित होते हुए परिवार का दर्द, माँ-बाप का अपने ही बच्चों के बीच बेगाना हो जाना, स्थापित सामाजिक संस्थाओं का नकार हमारे समय की सच्चाई बनती जा रही है। प्रस्तुत संकलन में कवि ने समन्वित परिवारों को एक बग़ीचे के रूप में देखा है- ’शाख पर हरियालियाँ हों/फूल हों, फल हों/एक पूरा दऱख्त हो जो/ख़ुद में बाग़ीचा लगे/जैसे हमारे स्वर्गवासी पिता जी का कोट/खूँटी पर एक वस्त्र नहीं/पूरी दालान की/खुशबू है।’ (पृ. 15) उसी तरह कवि उस बूढ़ी माँ को याद करता है, जो ममत्व को बिना किसी शोर-गुल के अगली पीढ़ी में स्थानान्तरित करती है। माँ के ममत्व का विस्तार अनंत है। उसे अपने बेटे और प्रकृति के एक सूक्ष्म से जीव, चींटी की भूख का समान तौर पर ख्याल है- ’माॅ से दादी बनने के/सूने विस्तार में/कभी उसे देखिए/दूसरे के दुःख में/वह आठ-आठ आँसू बहाती है/पर अपने दुःख का पहाड़/उठा लेना/उसे भाता है/क्योंकि कच्ची मिट्टी को/सुधड़ बनाना/उसे आता है।’ (पृ. 98) आज की पीढ़ी ममत्व के इस मूल्य का आँकलन नहीं कर पा रही है। शायद यही कारण है कि मनुष्य के रूप मे व्यक्ति की पहचान तेज़ी से खोती जा रही है। बाज़ारवाद के इस ज़माने में अच्छे मनुष्य को कौन पूछता है? उसे एक समर्थ उपभोक्ता चाहिए जो मनुष्यता के धुर खिलाफ़ हो। कवि के शब्दों में ही देखिए- ’क्या आप इन्सान हैं/यदि हाँ तो/फिर आप क्या हैं/कोई खूबसूरत ची़ज/जिसकी ’मार्केट वैल्यू’ है/या मालदार/मार्केट जिसकी जेब में/यदि दोनों नहीं तो/फिर आप/तीसरे कौन हैं।’ (पृ. 82)
निष्कर्षतः कहूँ तो प्रस्तुत संकलन इसी ’तीसरे आदमी’ की पहचान कायम करने का एक सार्थक सांस्कृतिक उपक्रम है। कवि का मानसिक जगत्, जागतिक जुड़वों के तंतुओं के उत्पादन की एक कार्यशाला है, जहाँ संवेदना, साझेदारी, भाईचारा, विश्वास और मानवता के पनपाव की उर्वरक धरती अपनी सौंधी गंध को पाठकों के बीच बिखेरती रहती है। मनुष्यता को बचाने का दूसरा रास्ता भी क्या हो सकता है इसलिए ’यही एक रास्ता है’ चूँकि मानव असंगतियोें से आदिम तौर पर जूझता रहता है, आज भी जूझ रहा है, रास्ते भी निकल रहे हैं, आगे भी निकलेंगे। शायद कवि ने इसी उदारतावश ’वह भी एक रास्ता है’ का सृजन किया है। डाॅ. मिश्र की ये कविताएँ पूरे तौर पर समकालीन और बिल्कुल नई हैं, जो तर्क और संवेदना की सम्मिलित भूमि पर अपने समय का रेखांकन करती हैं। समकालीनता की पड़ताल में इस कृति को अनदेखा नहीं किया जा सकता, ऐसा मेरा विश्वास है। मैं यह नहीं कहता कि यह एक महान् कृति है परंतु विशिष्ट कृति है ऐसा कहने में कोई गुरेज़ भी नहीं है।
 
 
 
 
 
 
समीक्ष्यकृति- यह भी एक रास्ता है (काव्य संग्रह)
कवि- डॉ. डी.एम. मिश्र
प्रकाशक- नमन प्रकाशन, 4231/1, दरियागंज, नई दिल्ली

- डाॅ. राधेश्याम सिंह